1857 की Kranti -1857 की क्रांति Notes IN HINDI PDF


1857 की Kranti -1857 की क्रांति Notes IN HINDI PDF


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1857 की क्रान्ति - एक महासंग्राम


1857 की क्रांति पर निबंध

1857 की क्रान्ति :-(10 May 1857 – 1 Nov 1858)

1857 की क्रांति GK :- 

East India Company ने भारत में आते ही आर्थिक शोषण व राजनैतिक हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया था। 
● उनकी हर नीति का उद्देश्य धन की प्राप्ति व साम्राज्य का विस्तार करना था। 
● उनके इस कलुषित उद्देश्य से भारतीयों में भय व असंतोष बढता गया। 
● भारतीयों का असंतोष भिन्न -भिन्न भागों में विद्रोह के रूप में प्रकट हो रहा था :-  
  ◆ 1806 में वैल्लोर का विद्रोह
  ◆ 1824 में बैरकपुर का विद्रोह
  ◆ 1842 में फिरोजपुर में 34 वीं रेजीमेन्ट विद्रोह
  ◆ 1849 में सातवीं बंगाल कैवलरी विद्रोह
  ◆ 1855-56 में संथालों का विद्रोह 
  ◆ 1816 में बरेली में उपद्रव
  ◆ 1831-33 में कौल - विद्रोह
  ◆ 1848 में काँगडा का विद्रोह
  ◆ 1855-56 में संथालों का विद्रोह 
● ये सब विद्रोह राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक कारणों से हुए थे। 
● धीरे-धीरे सुलगती हुई आग 1857 में धधक उठी और उसने अंग्रेजी साम्राज्य की जड़ों को हिला दिया।

1858 की क्रांति का नेतृत्व किसने किया :-

1857 ki kranti ka netritva kisne kiya :-
1857 की क्रांति का नेतृत्व बहादुर शाह जफ़र नें किया ।

1857 की क्रांति के प्रमुख केन्द्र :-

1857 ki kranti ke mukhya kendra :-

1857 की क्रांति के प्रमुख केंद्र क्रमशः मेरठ, दिल्ली, कानपुर, लखनऊ, झाँसी, ग्वालियर, राजस्थान आदि थे।

1857 की क्रान्ति के कारण :- 

1857 ki kranti ke karan

● कुछ इतिहासकारों ने सैनिक असंतोष और चर्बी वाले कारतूसों को ही 1857 के स्वतन्त्रता संग्राम का सबसे मुख्य कारण बताया है। 
● लेकिन यह तो केवल एक चिनगारी थी जिसने उन समस्त विस्फोटक पदार्थों को जो राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक कारणों से एकत्रित हुए थे, आग लगा दी और वह भयानक रूप धारण कर गया। 

1857 की क्रांति के राजनैतिक  

1857 की क्रांति के  प्रशासनिक कारण :-

● अंग्रेजों ने साम्राज्य विस्तार की नीति से भारतीय रियासतों पर प्रभावशाली नियन्त्रण करना शुरू किया।
● धीरे धीरे इन रियासतों को समाप्त करने की नीति ने आग में घी डालने का काम किया।
● लार्ड वैलेजली के अधीन सहायक सन्धि के रूप में इस क्रांति नें एक निश्चित आकार ले लिया था।
● लेकिन अधिकांश राजनैतिक कारण लार्ड डलहौजी के शासन काल में व्यपगत सिद्धान्त के कारण पनपे।  
● झाँसी, नागपुर, उदयपुर, सतारा बघार, निजाम, मैसूर, मराठा, आदि और कुशासन का बहाना लेते हुए अवध का विलय जो अंग्रेजों के प्रति हमेशा वफादार रहा अवध के सैनिकों में असंतोष तेज हो गया।
● अंग्रेजों ने कई भारतीय जमींदारों के साथ अपमानजनक व्यवहार किया और इनकी भूमि को छीन कर उन्हें नाराज कर दिया।
● भारतीय मुसलमान अंग्रेजों से इस कारण नाराज थे क्योंकि अंग्रेज मुगल सम्राट *बहादुर शाह जफर* के प्रति अपमानजनक व्यवहार करते थे। 
बहादुरशाह की मृत्यु के पश्चात बादशाह पद को समाप्त करने की लार्ड केनिंग की घोषणा, ऐलनबेरा द्वारा बादशाह को भेंट देनी बन्द करना और सिक्कों से नाम हटाना तथा डलहौजी द्वारा लाल किले को खाली कराने की बातों ने मुसलमानों में और अधिक रोष उत्पन्न कर दिया।
● अंग्रेजों की शासन व्यवस्था से भारतीय संतुष्ट नहीं थे। 
अंग्रेजी न्याय व्यवस्था और उसमें व्याप्त भ्रष्टाचार एवं लूट खसोट ने भारतीयों में असंतोष बढ़ा दिया।
1833 के चार्टर एक्ट में यह स्पष्ट उल्लेख था कि धर्म, जाति, रंग, वंश आदि के आधार पर सैनिक और असैनिक सभी सार्वजनिक सेवाओं में बिना भेदभाव नियुक्ति दी जायेगी। लेकिन अंग्रेजों ने इस नीति का पालन नहीं किया। 

नोट :- उच्च पद केवल अंग्रेजों के लिए सुरक्षित थे।

1857 की क्रांति के आर्थिक कारणः- 

● भारत में अंग्रेजी शासन का मूल उद्देश्य भारत का आर्थिक शोषण था। 
● इनकी आर्थिक शोषण की नीतियों ने भारतीयों में असंतोष की भावना पैदा कर दी। 
● भारत में आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थ व्यवस्था की जो विशेषताएं थी अंग्रेजों की शोषण की नीति ने नष्ट कर दी। 
● अंग्रेजों की भूराजस्व पद्धतियाँ भी कृषकों के शोषण का कारण बनी। 
● भूराजस्व की अधिकता और वसूली में सेना का सहारा लेना पडता था।
भारत में निर्मित माल जो निर्यात किया जाता था, उस पर बहुत अधिक निर्यात कर था जबकि भारत के कच्चे माल पर कम निर्यात कर था। 
इंग्लेण्ड से जो माल भारत आता था उस पर बहुत कम आयात कर था। 
भारत से निर्यात किया जाने वाला मल-मल, सूती और रेशमी कपड़ों पर इंग्लैण्ड में 71 प्रतिशत तक कर लिया जाता था। 
भारतीय कपडे़ के मुकाबले जब अंग्रेजी कपडे़ की माँग न बढ सकी तो अंग्रेजों ने भारतीय कपड़ों का आयात ही बन्द कर दिया। 
● इस नीति का परिणाम यह हुआ कि भारत का कपडा उद्योग नष्ट होने लग गया।
इंग्लैण्ड में औद्योगिक क्रान्ति के कारण भारतीय उद्योग जो अंग्रेजों के व्यापारिक नीति से पहले ही जर्जर थे, मशीनों से सज्जित अंग्रेजों के उद्योगों का सामना न कर सके।
● परिणाम स्वरूप हस्तकला उद्योग नष्ट हो गये, कारीगर बेरोजगार हो गए और बस्तियांँ और नगर उजड़ गए।
Company के समय भारतीय धन का लगातार निष्कासन हुआ और वो इंग्लैण्ड पहुँचा इससे अंग्रेज अमीर और भारतीय निर्धन बनते चले गये। 
● इस प्रकार अंग्रेजों की विनाशकारी औपनिवेशिक नीतियों के कारण भारत में अंग्रेजों के प्रति गहरा असंतोष था।

1857 की क्रांति के सामाजिक कारण :-

● अंग्रेज जातिभेद की भावना से प्रेरित थे और भारतीयों को घृणा की दृष्टि से देखते थे।
● भारतीयों के प्रति उनका व्यवहार भी अपमानजनक था।  
● रेल्वे की प्रथम श्रेणी में भारतीयों के लिए यात्रा वर्जित थी।

नोट :- भारतीय लोग अंग्रेजों के साथ किसी प्रकार के सामाजिक उत्सवों में भाग नहीं ले सकते थे।

● यूरोपीय व्यवसायियो द्वारा संचालित होटलों और क्लबों में भारतीयों का प्रवेश वर्जित था।
● अंग्रेजों की मनोवृत्ति का अनुमान आगरा के एक मजिस्टेट के आदेश से लगाया जा सकता है, जिसमें उसने कहा था कि "प्रत्येक भारतीय को चाहे उसका पद कुछ भी हो, इस बात के लिए विवश किया जाना चाहिए कि वह सड़क पर चलने वाले हर अंग्रेज को सलाम करे यदि भारतीय घोडे़ पर या गाडी में सवार हो तो उसे नीचे उतर कर तब तक खडे़ रहना चाहिए जब तक कि अंग्रेज वहाँ से निकल न जाए।"
● पाश्चात्य शिक्षा नीति ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था को अस्त व्यस्त कर दिया। 
● उनकी शिक्षा नीति का उद्देश्य शासन के लिए लिपिक प्राप्त करना और काले अंग्रेज तैयार करना था। 
● स्थानीय लोगों में गुलामी की मानसिकता तैयार करने के लिए इतिहास का अपने अनुकूल लेखन करवाया।
● आर्य आक्रमण, मूल निवासी, आर्य-द्रविड़ जैसे भेद खडे़ किये। इन बातों से भारतीयों में अंग्रेजों के विरूद्व तीव्र असंतोष था।

1857 की क्रांति के धार्मिक कारण :-

हिन्दू उत्तराधिकार नियमानुसार कोई भी मतांतरण करने पर पैतृक सम्पत्ति से वंचित हो जाता था। 
● लेकिन अंग्रेजों द्वारा पैतृक सम्पत्ति सम्बन्धी कानून बनाया गया। जिसमें अब ईसाई बनने पर वह पेतृक सम्पत्ति के अधिकार से वंचित नहीं होता था। 
● इस तरह हिन्दू धर्म को छोड़ कर ईसाई बनने वालों को अंग्रेजों ने प्रोत्साहित किया। 
● ईसाई मिशनरियों द्वारा आर्थिक प्रलोभन व अन्य उपायों से मतांतरण का नियोजित अभियान किया गया। इन्हें राजकीय सहायता मिलती थी। 
● जो व्यक्ति ईसाई मत को स्वीकार कर लेता था, उसे अनेक सुविधाओं के साथ राजकीय सेवा का अवसर मिलता था। 
● इससे हिन्दू और मुसलमान दोनों ही अपने मतों को खतरे में अनुभव करने लगे। 
● ईसाई पादरियों को 1813 के अधिनियम द्वारा भारत में मजहबी प्रचार की स्वीकृति मिल गई।
● इन्होंने मत प्रचार के उद्देश्य से न केवल विद्यालयों की स्थापना की वरन् सेना में भी नियुक्ति होने लगी और छावनियों में ईसाई साहित्य का वितरण होने लगा। 
● भारत में मन्दिरों और मस्जिदों की सम्पत्ति अब तक कर मुक्त रही थी, लेकिन इन पर भी अंग्रेजों द्वारा कर लगा दिया गया। 
● Company के निदेशक मण्डल के प्रधान मैग्लीज ने हाउस आॅफ कामन्स में कहा कि "गाॅड ने हिन्दुस्तान के विशाल साम्राज्य को इंग्लैण्ड को इसलिए सौंपा है ताकि ईसाई धर्म का झण्डा हिन्दुस्तान के एक कोने से दूसरे कोने तक सफलता पूर्वक लहराता रहे।" 
● ऐसी धटनाओं से भारतीयों में यह शंका व्याप्त हो गई कि अंग्रेज उनके धर्म और संस्कृति को नष्ट करने पर तुले हुए हैं । 

1857 की क्रांति के सैनिक कारणः- 

1857 की क्रान्ति से पूर्व भी भारतीय सैनिकों ने अंग्रेजों के विरूद्व विद्रोह कर बगावत की थी :-
  ◆  बंगाल में 1764 में सिपाही विद्रोह 
  ◆ 1806 में बैल्लुर में, 
  ◆ 1824 में बैरकपुर में सैनिकों द्वारा समुद्री मार्ग से बर्मा जाने से इंकार
  ◆ 1844 में बिना अतिरिक्त भत्ते के सिन्ध जाने से इंकार कर दिया। 
  ◆ 1849 में 22वें एन.आई., 1850 में 66वीं एन.आई और 1852 में 38वीं एन.आई. ने विद्रोह कर दिया। 
  ◆ अफगान युद्ध(1839) में अंग्रेजों को पराजय का सामना करना पड़ा और पंजाब के संघर्ष से उन्हें बहुत क्षति हुई। 
● सेना मे अंग्रेजों की तुलना में भारतीय सैनिकों की संख्या लगातार बढती जा रही थी। 
● 1856 में भारतीय सेना में 2,33,000 भारतीय सैनिक और 45,322 यूरोपीय सैनिक थे।
● क्रिमिया युद्ध में अंग्रेजों की पराजय ने भारतीयों में उनके अजेय होने का भ्रम तोड़ दिया।
● अवध का अंग्रेजी साम्राज्य में विलय ने बंगाल की सेना में तीव्र आक्रोश व असंतोष उत्पन्न किया क्योंकि बंगाल की सेना में अवध के सैनिकों की संख्या अधिक थी।
● वेतन, भत्ते, पद व पदौन्नति के संबंध में भारतीय सैनिकों के साथ भेदभाव कर उनकी उपेक्षा की जाती थी। 

नोट :- भारतीय सैनिक को वेतन 9 रूपये मासिक जबकि यूरोपीय सैनिक को 60 से 70 रूपये मासिक दिया जाता था।

● 1856 में लार्ड केनिंग ने सामान्य सेना भर्ती अधिनियम पास कर दिया जिससे अब भारतीय सैनिकों को भारत के बाहर समुद्र पार भी सरकार आवश्यकतानुसार जहाँ सेना भेजे, उन्हें वहाँ जाना पडेगा। 
● इसी प्रकार 1854 में डाकघर अधिनियम के द्वारा सैनिकों को मिल रही निःशुल्क डाक सुविधा को समाप्त कर दिया गया।
● इन सब बातों से सैनिकों में अंग्रेजों के विरूद्व विद्रोह की भावना आ चुकी थी। उन्हें केवल एक चिनगारी की जरूरत थी और वह चिनगारी चर्बी लगे हुए कारतूसों ने प्रदान कर दी। 

1857 की क्रांति के तात्कालिक कारण :- 

● 1856 में भारत सरकार ने पुरानी बन्दूक ‘‘ब्राउन बैस‘‘ के स्थान पर नई एनफील्ड राईफल्स जो अधिक अच्छी थीं, प्रयोग करने का निश्चय किया । 
● इस नई राइफल से कारतूस के ऊपरी भाग को मुँह से काटना पड़ता था। 
● जनवरी 1857 में बगांल की सेना में यह बात फैल गई कि नई राईफल्स के कारतूसों में गाय और सूअर की चर्बी का प्रयोग किया गया है।
● गाय हिन्दूओं के लिए पवित्र थी और मुसलमानों के लिए सूअर निषिद्ध था।
कारतूसों में चर्बी होने की जाँच की गई। 
● जाॅन केयी व लार्ड राबर्टस ने भी इस सत्य को स्वीकारा है। 
● इस घटना से सैनिक भड़क उठे, अंग्रेजों के विरूद्व आक्रोश फैल गया। 
● उनकी यह धारणा बन गई की अंग्रेज हिन्दू और मुस्लिम दोनों का ही धर्म भ्रष्ट करने पर तुले हुए हैं। 
● चर्बी लगे कारतूसों की घटना ने विद्रोह की चिनगारी सुलगा दी और उससे जो धमाका हुआ 
उसने भारत में अंग्रेजी राज्य की जड़ें हिला दी।

1857 की क्रान्ति का विस्तार :-

● अधिकांश यूरोपीय इतिहासकारों ने 1857 की क्रान्ति  को आकस्मिक घटना बताने का प्रयास किया। 
● जबकि अधिकांश विद्वानों का मानना था कि यह क्रान्ति पूर्व नियोजित एक सोची समझी योजना का परिणाम थी। जिसका नेतृत्व विभिन्न प्रदेशों में अलग अलग नेताओं ने किया। 
● योजना के कर्णधार मुख्यरूप से नाना साहब (बाजीराव के दत्तक पुत्र) उनके भाई बाला साहब और वकील अजी मुल्ला थे।
● क्रान्ति का एक जगह से दूसरी जगह प्रचार का तरीका चपातियाँ और लाल कमल  था।
1857 की क्रान्ति योजना के अनुसार सम्पूर्ण भारत में एक साथ 31 मई 1857 को आरम्भ करनी थी।
● लेकिन चर्बी वाले करतूसों की घटना से क्रान्ति तय समय से पूर्व ही हो गई। 
29 मार्च 1857 को बैरकपुर की छावनी में सैनिक मंगल पाण्डे ने चर्बी वाले कारतूस को मुँह से काटने से मना कर दिया। उसे बंदी बना लिया गया और फाॅंसी दे दी गईं। 
● यह इस संघर्ष का प्रथम बलिदान था। 
● मेरठ में 85 सैनिकों ने इन कारतूसों को प्रयोग करने से मना कर दिया, परिणाम स्वरूप उन्हें कैद कर कारावास का दण्ड दिया गया। 
10 मई 1857 को सैनिकों ने विद्रोह कर सभी कैदी सैनिकों को मुक्त करवा लिया और वे दिल्ली की ओर चल दिए।  

1857 की क्रांति के नायक :-

1857 ki kranti ke krantikari in hindi
दिल्ली (बहादुर शाह जफर) : - 
क्रान्तिकारियों  ने 12 मई को दिल्ली पर अधिकार कर लिया।
● मुगल सम्राट बहादुर शाह द्वितीय ने क्रान्तिकारियों का नेतृत्व करना स्वीकार कर लिया, उसे भारत का सम्राट घोषित किया गया।
● इस समय लेफिटनेंट विलोबी ने क्रान्तिकारियों का कुछ प्रतिरोध किया लेकिन पराजित हुआ और भाग निकला। 
● सत्ता के प्रतीक के रूप में दिल्ली पर अधिकार के साथ ही इसे 1857 की क्रान्ति का आरम्भ माना जाता है। 
● विद्रोह शीघ्र ही उत्तरी और मध्य भारत में फैल गया। 
● भारतीय नरेशों को संग्राम में सम्मलित होने के लिए पत्र लिखे गये। 
● लखनऊ, इलाहाबाद, कानपुर, बरेली, बनारस, बिहार के कुछ क्षेत्र झाँसी और कुछ अन्य प्रदेश सभी में विद्रोह हो गया
लार्ड केनिंग ने शीघ्र ही क्रान्ति के दमन की योजना बनाई। 
● भारतीय नरेशों व नेताओं के आपसी सामन्जस्य की कमी का लाभ अंग्रेजों ने उठाया। 
● दिल्ली पर मात्र 5 दिन में ही अंग्रेजों ने अधिकार कर लिया और दिल्ली की जनता से प्रतिशोध लिया गया। 
● दिल्ली में क्रान्ति का वास्तविक नेतृत्व बहादुर शाह जफर  के सेनापति बख्त ख़ाँ ने किया।
● सम्राट को बन्दी बना लिया गया और निर्वासित कर रंगून भेज दिया, जहाॅं 1862 में उसकी मृत्यु हो गई।
अवध (बेगम हजरत महल):-
● लखनऊ में विद्रोह 4 जून को आरम्भ हुआ।
● बेगम हजरत महल ने अपने अल्प वयस्क पुत्र को  नवाब घोषित कर अंग्रेजों के विरूद्ध संघर्ष आरम्भ कर दिया। 
● जमींदारों, किसानों और सैनिकों ने साथ दिया और अंग्रेज रेजीडेंसी में आग लगा दी जिसमें रेजिडेंट हेनरी लॉरेन्स मारा गया।
● जनरल हेवलॉक और आउट्रम को भी सफलता नहीं मिली।
● ऐसी परिस्थितियों में सर कॉलिन कैम्बेल ने गोरखा रेजिमेन्ट की सहायता से पुनः लखनऊ पर अधिकार स्थापित कर लिया।
कानपुर (नाना साहब व तांत्या टोपे) :-
● नाना साहब ने अपने दक्ष सहायक तांत्या टोपे और अजीमुल्ला के सहयोग से 5 जून 1857 को कानपुर अंग्रेजों से मुक्त करा लिया। 
● सर कालिन कैेम्बेल के नेतृत्व में अंग्रेजों ने पुनः दिसम्बर में अधिकार कर लिया। 
● तांत्या टोपे बच निकले और  झाँसी की रानी से जा मिले।
झाँसी (रानी लक्ष्मी बाई) :-
● जून 1857 के आरम्भ में सैनिकों ने झाँसी में भी विद्रोह कर दिया। 
● ह्यूरोज ने झाँसी पर आक्रमण कर पुनः उस पर अधिकार कर लिया। 
● पराजित होने पर लक्ष्मीबाई काल्पी पहुंची और तांत्या टोपे के सहयोग से ग्वालियर पर अधिकार कर लिया। 
● जून 1858 में अंग्रेजों ने पुनः अधिकार कर लिया, रानी लक्ष्मी बाई वीरता पूर्वक संघर्ष करते हुए वीर गति को प्राप्त हुई।  तांत्या टोपे भागने में सफल रहे।

बिहार (कुँवर सिंह) : -  
● बिहार के जगदीशपुर के जमींदार 80 वर्षीय कुँवर सिंह ने क्रान्ति का नेतृत्व किया। 
● उन्होंने आरा जिले के आस पास के क्षेत्रों को अंग्रेजों से मुक्त करा दिया।
● अंग्रेज सेनापति मिलमेन,कर्नल डेक्स, मार्क और मेजर डगलस को इस बूढ़े शेर ने धूल चटाई।
● उसने गंगा पार कर अपनी रियासत
जगदीशपुर पर अधिकार कर लिया । 
● 26 आप्रेल 1858 को कुँवर सिंह ने अंग्रेजों से युद्ध किया लेकिन उसे अंग्रेजो के विरूद्ध
सफलता नहीं मिली।

राजस्थान और 1857 का स्वतन्त्रता संग्राम :-

● राजस्थान में बीकानेर, जयपुर, उदयपुर अलवर, डूँगरपुर, बाँसवाडा, कोटा, बूंदी, धौलपुर, जैसलमेर और सिरोही के शासकों की सहानुभूति अंग्रेजों के प्रति थी। 
● लेकिन राजस्थान की वीर भूमि में स्वतन्त्रता प्रेमियों की कमी नहीं थी। 
● आऊवां के डाकुर खुशाल सिंह सहित नसीराबाद, नीमच और ऐरनपुरा की
अंग्रेज सैनिक छावनियों में क्रान्ति का बिगुल बजाया । 
● मेवाड़ में जनता ने क्रान्तिकारियों को सहयोग किया, कोटा में विद्रोह ने उग्र रूप धारण कर लिया और मेजर बर्टन के दो पुत्रों को मौत के घाट उतार दिया।
● ठाकुर खुशाल सिंह नें अंग्रेज रेजिडेंट मॉक मासन की गर्दन अलग कर उसे आऊवां के किले पर लटका दिया, लेकिन अंग्रेज सेना ने शीघ्र ही आऊवां पर अधिकार कर लिया। 
● आमजन ने इस क्रान्ति में अभूतपूर्व साहस का परिचय दिया, लेकिन उचित नेतृत्व व शासकों के असहयोग से विद्रोह सुव्यवस्थित और सफल न हो सका।
रूहेलखण्ड : -
● रूहेलखण्ड में अहमदुल्ला ने क्रान्ति का नेतृत्व किया तो मेवात में सदरूदीन नामक किसान के नेतृत्व में क्रान्ति हुई। जालन्धर, अम्बाला रोहतक, पानीपत क्रान्ति के अन्य प्रमुख केन्द्र थे।
दक्षिण भारत में स्वतन्त्रा संग्राम :-
● नवीनतम अनुसंधान यह स्पष्ट करते हैं कि क्रान्ति का प्रभाव दक्षिण भारत के गोवा, पाण्डिचेरी सहित सुदूर दक्षिण तक रहा ।
● महाराष्ट्र में रंगा बापूजी ने अंग्रेजों के विरूद्ध जन सेना तैयार कर बेलगाँव, सतारा, कोल्हापुर, आदि स्थानों पर उसका नेतृत्व किया। 
● सतारा और पंडरपुर में क्रान्ति आरम्भ हुई उसके बाद नासिक, रत्नगिरी और बीजापुर में क्रान्ति की घटनाएँं हुई।
● विशाखापटनम में अंग्रेजों के विरूद्ध तेलगु भाषा में पोस्टर निकाले गये। 
● गोलकुण्डा में चिन्ताभूपति ने विद्रोह किया।
● बैंगलौर में मद्रास सेना की 8वीं घुड़सवार सेना और 20वीं पैदल ने बगावत कर दी।
● मद्रास में दो हिन्दू मंदिर क्रांतिकारी गतिविधियों के प्रमुख केन्द्र थें।
● उतरी अर्काट, तंजोर में भी क्रान्तिकारी घटनाएँ हुई। 
● वैल्लौर में जमींदारों नें अंग्रेजों के विरूद्व संघर्ष किया। 
● मदुराई में क्रान्तिकारी गतिविधियों के कारण अनेक क्रान्तिकारियों को कैद कर लिया गया।
● मालाबार, कालीकट, कोचीन, आदि क्रान्ति के प्रमुख केन्द्र थे। 
● गोवा में दीपू जी रागा ने क्रान्ति का शंखनाद किया तो दमन व दीव भी क्रान्ति से अछूते नहीं रहे।
● 1857 के स्वतन्त्रता संग्राम में यद्यपि उत्तरी भारत की अपेक्षा दक्षिण भारत में क्रान्तिकारियों की संख्या कम थी, फिर भी अनेक क्रान्तिकारी शहीद हुए, व कैद किये गये।
● दक्षिण भारत में क्रान्तिकारियों के प्रमुख नेतृत्व करने वालों में रंगा बापू जी गुप्ते(सतारा), सोना जी पण्डित, रंगाराव पांगे व मौलवी सैयद अलाउद्वीन(हैदराबाद), भीमराव व मुंडर्गी, छोटा सिंह (कर्नाटक),अण्णाजी फडनवीस (कोल्हापुर), गुलाम गौस व सुल्तान बख्श (मद्रास) अरणागिरि, कृष्णा (चिंगलफुट) मुलबागल स्वामी(कोयम्बटूर) मुल्ला सली, कोन जी सरकार और विजय कुदारत कुंजी मामा (केरल) आदि विशेष उल्लेखनीय हैं। 
● उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि स्वतन्त्रता संग्राम सम्पूर्ण भारत में व्याप्त था।

1857-58 के मध्य असैनिक और सैनिक विद्रोह :-


2 फरवरी, 1857
19वीं स्थानीय सेना का बहरामपुरम में विप्लव
10 मई, 1857
मेरठ में सैनिकों का विप्लव
11-30 मई, 1857
दिल्ली,फिरोजपुर,बम्बई, मुरादाबाद,शाहंजहांनपुर तथा अन्य उत्तर प्रदेश के नगरों में विद्रोह कर फूटना
जून 1857
ग्वालियर, भरतपुर,, झाँसी, इलाहाबाद, फैजाबाद, सुलतानपुर, लखनऊ, आदि में विप्लव
गंगा और सिन्ध के मैदानों में, राजपूताने में, मध्य भारत तथा बंगाल के कुछ भागों में असैनिक विद्रोह।
जुलाई 1857
इन्दौर, महू, सागर, झेलम और स्यालकोट, जैसे पँजाब के कुछ स्थानों पर विप्लव।
अगस्त 1857
सागर और नर्मदा घाटी के समस्त प्रदेश में असैनिक विद्रोह।
सितम्बर 1857
दिल्ली पर अंग्रेजों का पुनः अधिकार। मध्य 
भारत में विद्रोह।
नवम्बर 1857
विद्रोहियों ने जनरल विण्डहम को कानपुर के समीप परास्त किया।
दिसम्बर 1857
कानपुर का युद्ध सर काॅलिन कैम्बल ने जीता और तांत्या टोपे भाग निकला
मार्च 1858
लखनऊ पर पुनः अंग्रेजों का अधिकार
अप्रेल 1858
झाँसी पर अंग्रेजी अधिकार,, बिहार 
(जगदीशपुर) में कुँवर सिंह का विद्रोह
मई 1858
अंग्रेजों ने बरेली, जगदीशपुर , काल्पी को पुनः जीता। रूहेलखण्ड में विद्रोहियों द्वारा छापामार आक्रमण आरम्भ किए।

1857 की क्रान्ति के असफलता के कारण :-

● 1857 की क्रान्ति अंग्रेजों को भारत से बाहर निकालने का  सशस्त्र प्रयास था। 
● भारतीय सेना संख्या में अंग्रेजों से सात गुना अधिक थी और जनता का सहयोग भी प्राप्त था। 
● इतने पर भी अंग्रेज विद्रोह का दमन करने में सफल रहे और भारतीयों को हार का सामना करना पड़ा। 

कुशल एवं योग्य नेतृत्व का अभाव :-

● इस संग्राम को सही तरह से संचालित करने वाले कुशल एवं योग्य नेतृत्व का अभाव था।
● बहादुर शाह, वृद्ध और कमजोर शासक था।
● नाना साहब, रानी लक्ष्मी बाई, वाजिद अली शाह, हजरत महल, कुँवर सिंह, बख्त खां, अजीमुल्ला  आदि के हाथ में विद्रोहियों की बागडोर थी, लेकिन वे अपने उद्देश्य पर दृढ़ थे। इनमें आपसी समन्वय व नेतृत्व क्षमता का अभाव था।

क्रान्ति का समय से पूर्व होनाः- 

● क्रान्ति की पूर्व योजनानुसार 31 मई 1857 का दिन एक साथ विद्रोह करने हेतु तय किया गया था।
● लेकिन मेरठ में 10 मई,1857 को तय समय से पूर्व आरम्भ हो गया। 
● ऐसे में अलग अलग समय और स्थानों पर हुई क्रान्ति का दमन करने में अंग्रेज सफल हो गये।
● मेलिसन ने लिखा है, यदि पूर्व योजना के अनुसार 31 मई 1857 को एक साथ सभी स्थानों पर स्वाधीनता का संग्राम आरम्भ होता तो अंग्रेजों के लिए भारत को पुनः विजय करना किसी भी प्रकार सम्भव न होता।

भारतीय नरेशों का असहयोग :-

● अधिकांश रियासतों के राजाओं ने अपने स्वार्थवश इस विद्रोह का दमन करने में अंग्रेजों का साथ दिया। 
● लार्ड केनिंग ने इन राजाओं को तूफान को रोकने में बाघ की तरह बताया है।
● अपनी वीरता के लिए प्रसिद्व राजपूताने, मराठे, मैसूर, पँजाब, पूर्वी बंगाल आदि के शासक शान्त रहे। 
● डब्ल्यू एच रसेल ने लिखा है यदि भारतीय उत्साह और साहस के साथ अंग्रेजों का विरोध करते तो वे (अंग्रेज) शीघ्र ही समाप्त हो जाते। यदि पटियाला या जींद के राजा हमारे मित्र न होते, यदि पंजाब में शान्ति न बनी रहती तो दिल्ली पर हमारा अधिकार करना सम्भव न होता।

जमींदारों, व्यापारियों व शिक्षित वर्ग की तटस्थता :-

● बडे जमींदारों, साहूकारों और व्यापारियों ने अंग्रेजों को सहयोग किया। 
● शिक्षित वर्ग का समर्थन भी क्रान्तिकारियों को न मिल सका।

सीमित साधन :-

● अंग्रेजों के पास यूरोपीय देश के प्रशीक्षित और आधुनिक हथियारों से सुसज्जित अनुशासित सेना थी, समुद्र पर अपने नियन्त्रण का लाभ भी उन्हें मिला। 
● भारतीय सैनिकों में अनुशासन, सैनिक संगठन व योग्य नेतृत्व का अभाव था साथ ही इन्हें धन, रसद और हथियारों की कमी का सामना भी करना पडा। 

निश्चित लक्ष्य एवं आर्दश का अभाव :-

● क्रान्तिकारियों द्वारा अंग्रेजों को भारत से बाहर निकालने के लिए किया गया यह संग्राम यद्यपि व्यापक था और अंग्रेजों को भारत से बाहर निकालने के लिए किया गया था 
● लेकिन अंग्रेजों के यहाँ से जाने के बाद भावी प्रशासनिक स्वरूप के संबंध में कोई आदर्श या योजना क्रान्तिकारियों के सामने नहीं थी।
● वी.डी. सावरकर ने लिखा है- लोगों के सामने यदि कोई स्पष्ट आदर्श रखा होता, जो उनको हृदय से आकृष्ट कर सकता, तो क्रान्ति का अन्त भी इतना अच्छा होता जितना कि प्रारम्भ।

अंग्रेजों की अनुकूल परिस्थितियाँः- 

● 1857 का वर्ष अंग्रेजों के लिए हितकारी रहा।
● क्रीमिया व चीन से युद्ध में विजय के पश्चात अंग्रेज सैनिक भारत पहुँचे।
● अंग्रेजों ने 3,10,000 की एक अतिरिक्त सेना का गठन भी कर लिया था। 
● यातायात और संचार में डलहौजी द्वारा रेल, डाकतार की व्यवस्था भी इनके लिए अनुकुल रही। 

कैनिंग और अंग्रेजों की कूटनीतिः- 

● अंग्रेज अपनी कूटनीति से पंजाब, पश्चिमत्तोर सीमा प्रान्त के पठानों, अफगानों, सिन्धिया व निजाम का सहयोग प्राप्त करने में सफल रहे।
● क्रान्तिकारियों को शान्त करने में केनिंग की उदार नीति का भी प्रभाव पड़ा। 
● आर. सी. मजूमदार ने अंग्रेजों की कूटनीति को उनकी सफलता की चाबी बताया है। 
● संक्षेप में कहा जा सकता है कि राष्ट्रीय भावनाओं की कमी, पारस्परिक समन्वय और सर्वमान्य नेतृत्व का अभाव 1857 की क्रान्ति की असफलता का प्रमुख कारण था।

1857 की क्रान्ति के परिणाम :-

1857 ki kranti ke parinam
● यद्यपि 1857 की क्रान्ति असफल रही, लेकिन इसके परिणाम अभूतपूर्व, व्यापक और स्थायी सिद्ध हुए। 
1857 की क्रान्ति ने अंग्रेजों की आंखें खोल दी और इन्हें अपनी प्रशासनिक, सैनिक, भारतीय नरेशों के प्रति नीति आदि में परिवर्तन के लिए मजबूर होना पडा। 

कम्पनी शासन का अंत :-

● 1 नवम्बर 1858 को महारानी ने घोषणा के द्वारा ब्रिटिश सरकार ने भारत का शासन ईस्ट इण्डिया कम्पनी के हाथों से लेकर भारत सरकार अधिनियम (1858) द्वारा ब्रिटिश सम्राट  के हाथों में दे दिया। 
● बोर्ड आॅफ कंट्रोल और बोर्ड आॅफ डायरेक्टर्स को समाप्त कर भारत के शासन संचालन हेतु 15 सदस्यों की एक परिषद इंडिया कौंसिल का गठन किया गया जिसके सभापति को भारतीय राज्य सचिव कहा गया। 
● गर्वनर जनरल का पदनाम वायसराय कर
दिया गया।  

सेना का पुर्नगठन :-

1857 की क्रान्ति का आरम्भ सैनिक विद्रोह के रूप में हुआ था, अतः सेना का पुर्नगठन आवश्यक था। 
● 1861 की सेना सम्मिश्रण योजना के अनुसार कम्पनी की यूरोपीय सेना सरकार को हस्तांतरित कर दी गई। 
● 1861 में पील कमीशन की रिपोर्ट के अनुसार सेना में अब ब्रिटिश सैनिकों की संख्या बढा दी गई। 
● सेना और तोपखाने के मुख्य पद केवल यूरोपीयों के लिए आरक्षित कर दिए गए। 
● इस बात का भी ध्यान रखा गया समुदाय या क्षेत्र के भारतीय सैनिक एक साथ सैनिक टुकड़ियों में न रहे।

 भारतीय नरेशों के प्रति नीति परिवर्तन :-

● महारानी की घोषणा के अनुसार ‘‘क्षेत्रों का सीमा विस्तार की नीति‘‘ समाप्त कर दी गई और स्थानीय राजाओं के अधिकार, गौरव तथा सम्मान की रक्षा का विश्वास दिलाया गया।
● भारतीय शासकों को दत्तक पुत्र गोद लेने की अनुमति दी गई। 

फूट डालो और राज करो नीति को बढ़ावा :-

1857 के क्रान्ति में साम्प्रदायिक सौहार्द से घबरा कर अंग्रेजों ने  साम्प्रदायिकता, जातिवाद, क्षैत्रवाद आदि संकुचित प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया।
फूट डालो और शासन करो उनकी नीति का प्रमुख आधार बन गई।  

आर्थिक शोषण का आरम्भ :-

1857 की क्रान्ति के बाद अंग्रेजों ने प्रादेशिक विस्तार की नीति को छोड कर अपना घ्यान धन की ओर अधिक लगाया। 
क्रान्ति को दबाने पर होने वाले समस्त वित्तीय का भार भारतीयों पर डाल दिया गया। 
● सार्वजनिक ऋण का ब्याज प्रभार और यहाँ की अर्जित पूँजी लाभ के रूप में भारतीय धन का निष्कासन होकर इंग्लैण्ड जाने लगा।  

राष्ट्रीय आन्दोलनों को प्रोत्साहन :-

1857 की क्रान्ति के सामूहिक प्रयास से भारतीयो के राष्ट्रीय आन्दोलन को गति मिली। 
● क्रान्ति के नायक कुँवर सिंह, लक्ष्मी बाई, तांत्या टोपे, बहादुर शाह जफर, नाना साहब और रंगाजी बापू, गुप्ते आदि स्वतन्त्रता आन्दोलन के अग्रदूत के रूप प्रेरक बने।

1857 की क्रान्ति का स्वरूप :-

1857 के विद्रोह की प्रकृति
● इतिहासकारों नें क्रान्ति के स्वरूप पर भिन्न - भिन्न मत प्रकट किये हैं। 
● यूरोपीय विद्वानों ने 1857 की क्रांति को सैनिक विद्रोह , मुसलमानों का षडयन्त्र अथवा सामन्ती वर्ग का विद्रोह बताया है। 
● कुछ इसे ईसाईयों के विरूद्व धर्म युद्ध अथवा श्वेत और काले लोगों के मध्य श्रेष्ठता के लिए संघर्ष मानते हैं। 
● कुछ ने बर्बरता तथा सजगता के बीच युद्ध बताया। 
● सैनिक असंतोष से शुरू हुए 1857 की क्रांति  को जन समर्थन से राष्ट्रीय विद्रोह व स्वतन्त्रता संग्राम का रूप प्राप्त हुआ। 
● वीर सावरकर ने भी अपनी पुस्तक में यही मत प्रकट किया है। 
● अंग्रेजों के विरूद्ध यह प्रथम सामूहिक प्रहार था। 
● इसे स्वतन्त्रता का प्रथम संग्राम कहा जा सकता है। 

1857 की क्रांति के प्रमुख मत :-

 सैनिक विद्रोह :-

● राॅबर्टस जान लारेन्स और सीलें के अनुसार यह केवल ‘‘सैनिक विद्रोह‘‘ था  अन्य कुछ नहीं। 
● चाल्र्स राईक्स के अनुसार यह विद्रोह वास्तव में एक सैनिक विद्रोह ही था, यद्यपि कहीं कहीं पर यह जन विद्रोह भी बन गया। 
● दुर्गादास बंधोपाध्याय और सर सैयद अहमद खां ने भी ऐसे ही विचार प्रकट किये।
● निःसन्देह यह विद्रोह एक सैनिक विद्रोह के रूप में आरम्भ हुआ लेकिन समाज के प्रत्येक वर्ग ने इसमें भाग लिया, अतः इसे पूर्णतया सत्य नहीं माना जा सकता।  

मुस्लिम प्रतिक्रिया :-

● सर जेम्स आउट्रम व डब्ल्यू टेलर के अनुसार यह विद्रोह हिन्दू शिकायतों की आड़ में मुस्लिम षडयंत्र था। 
● यह मुस्लिम शासन की पुनःस्थापना का प्रयास था। 
● माॅलिसन व कूपलैण्ड भी इसी मत का समर्थन करते हैं। 
● लेकिन हिन्दुओं के अधिक संख्या में भाग लेने से यह मत भी पूर्णतया सही नहीं है।

 जन क्रांति :-

1857 के गदर को किसने एक क्रांति कहा :- 
● कुछ इतिहासकारों का मानना है कि किसान, जमींदार सैनिक और विभिन्न व्यवसायों में लगे लोगों ने इसमें भाग लिया। 
● सर जे केयी के अनुसार 1857 की क्रान्ति श्वेत लोगों के विरूद्व काले लोगों का संघर्ष थी। 
● लेकिन अंग्रेज सेना में अनेक भारतीय थे अतः यह कहना भी सही नहीं है, जिस तीव्र गति से यह विद्रोह फैला उससे यह बात प्रकट होती है कि विद्रोह को जनता का प्रबल समर्थन प्राप्त हुआ। 
● बहुत से स्थानों पर जनता ने क्रान्तिकारियों को पूर्ण सहयोग दिया। 
● डब्ल्यू एच रसेल ने लिखा है कि भारत में गोरे आदमी की गाड़ी को कोई भी मैत्री पूर्ण नजर से नहीं देखता था। 
● केनिंग ने लिखा अवध में हमारी सत्ता के विरूद्ध किया गया विद्रोह बहुत व्यापक था। 
● जोन ब्रूस नार्टन ने इसे जन विद्रोह बताया है। 
● मॅालिसन ने इस विद्रोह को अंग्रेजों को भारत से बाहर निकालने का सामूहिक प्रयास बताया है।  

किसान विद्रोह :-

● कुछ विद्वानों ने विद्रोह में किसानों की महत्वपूर्ण भूमिका रहने पर इसे किसान विद्रोह भी बताया है। 
● किसानों ने कम्पनी सरकार के साथ ही जमींदारों व बढे़ ताल्लुकदारों के विरूद्ध भी विद्रोह किए। 
● लेकिन इस मत को पूर्णतया सही नहीं कहा जा सकता।  

राष्ट्रीय विद्रोह :-

● बेन्जामिन डिजरेली जो इंग्लैण्ड के प्रमुख नेता थे, इन्होंने इसे ”राष्ट्रीय विद्रोह“ कहा है। 
अशोक मेहता ने भी अपनी पुस्तक ”दी ग्रेट रिबेलियन“ में यह सिद्व करने का प्रयत्न किया है कि विद्रोह का स्वरूप राष्ट्रीय था। 
● वीर सावरकर ने भी इस विद्रोह को सुनियोजित स्वतन्त्रता संग्राम की संज्ञा दी है।
● लेकिन पश्चिमी इतिहासकार राष्ट्रीयता का अर्थ यूरोप की 20वीं सदी की राष्ट्रीयता से लेते हुए इसे राष्ट्रीय विद्रोह नहीं मानते। 
● डा. सत्या राय ने अपनी पुस्तक ‘‘भारत में राष्ट्रवाद’’ में लिखा है हमे भारतीय परिप्रेक्ष में यूरोपीय परिभाषाओं को लागू नहीं करना चाहिए। 
● राष्ट्रीय भावना के कारण ही सभी वर्गो के लोगों ने बिना मतभेद के आपसी मतभेद भुलाकर अंग्रेजों को भारत से बाहर निकालने का सामूहिक प्रयास किया जो राष्ट्रीय विद्रोह की श्रेणि में आता है।

भारत का प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम :-

● कई विद्वानों ने इसे भारत का प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम बताया है। 
● भारत को अंग्रेजों से स्वतन्त्र कराने का यह पहला सामूहिक और राष्ट्र व्यापी संघर्ष था। 
● डा. एस.एन. सेन ने लिखा है जो युद्ध धर्म रक्षा के नाम पर आरम्भ हुआ उसने शीघ्र ही स्वतन्त्रता संग्राम का रूप धारण कर लिया और इसमें संदेह नहीं कि भारतीय अंग्रेज सरकार को समाप्त करना चाहते थे। 
● वी.डी. सावरकर ने अपनी पुस्तक "वर आॅफ इण्डियन इण्डिपेन्डेन्स" (भारत का स्वातंत्र्य समर) में इसे स्वतन्त्रता का प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम बताया है। 
● डा. आर.सी. मजूमदार ने इस तथ्य की और ध्यान आकर्षित करते हुए बताया कि इस विद्रोह का अप्रत्यक्ष रूप से राष्ट्रीय महत्व था। इसका वास्तविक स्वरूप कुछ भी क्यों न हो, शीघ्र ही यह विद्रोह भारत में अंग्रेजी सत्ता के लिए चुनौती बन गया और इसे अंग्रेजों के विरूद्व राष्ट्रीय स्वतन्त्रता युद्ध का गौरव प्राप्त हुआ। 
पण्डित जवाहर लाल नेहरू ने अपनी पुस्तक भारत एक खोज में लिखा है- सैनिक विद्रोह के रूप में आरम्भ हुआ यह विद्रोह सैनिक क्षेत्र तक ही सीमित नहीं रहा शीघ्र ही यह जन विद्रोह एवं स्वतन्त्रता संग्राम के रूप में परिवर्तित हो गया। 
● डा. ताराचन्द, डा. विश्वेश्वर प्रसाद, एस.बी. चैधरी ने भी इसे स्वतन्त्रता संग्राम माना है।
1857 की क्रान्ति के समय पूरे भारत में अंग्रेज विरोधी भावनाएँ थी। 
● जन साधारण और सभी क्रान्तिकारियों का एक ही लक्ष्य था, अंग्रेजों को भारत से बाहर निकालना। 
● यही लक्ष्य सामूहिक संघर्ष की प्रेरणा बना।
● अतः इसे भारतीय स्वतन्त्रता का प्रथम उद्घोष कहना उचित होगा, जिसमें राष्ट्रवादी तत्वों का समावेश था।

सारांश रूप में :-

● भारत की समृद्धि ने यूरोप वासियों को अपनी और आकर्षित किया। 
वास्कोडिगामा समुद्वी मार्ग से भारत आने वाला प्रथम यूरोपियन था जिसका कालीकट के राजा जमोरिन ने अतिथि के रूप में स्वागत किया। 
● पूर्व से व्यापार करने के उद्देश्य से 1600 ई. ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी, 1602 डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी और 1664 ई. में फे्रंच ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना की गई
● 1717 में अंग्रेजो को मुगल सम्राट के फरमान द्वारा अनेक व्यापारिक सुविधाऐं प्राप्त हुई ।
● अंग्रेजो ने कर्नाटक के युद्धों में फ्रांसिसीयों को पराजित कर भारत में अपना प्रभुत्व स्थापित किया ।
● 18वीं शताब्दी में मैसूर, बंगाल, हैदराबाद, अवध, मराठा और जाट प्रमुख प्रान्तीय शक्तियाँ थी।
● 1757 में प्लासी का युद्ध, 1761 में पानीपत का तृतीय युद्ध तथा 1764 में बक्सर का युद्ध लड़ा गया। 
● महाराजा रणजीत सिंह ने पंजाब में सिख राज्य की स्थापना की। अंग्रेजो ने 1849 में अपनी साम्राज्य वादी भूख का शिकार बना कर उसे कम्पनी राज्य में मिला लिया ।
● लार्ड वैलेजली की सहायक सन्धि प्रथा तथा डलहौजी के व्यपगत के सिद्धान्त द्वारा ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार किया
● गोद निषेध  से झाँसी, सतारा, बघाट, उदयपुर, सम्भलपुर, नागपुर , आदि का कम्पनी में विलय कर लिया गया । 

नोट :- अवध को कुशासन प्रथा का कारण बता कर अंग्रेजों नें अपने अधीन किया था 

● अंग्रेजो की आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक एवं सैनिक नीति 1857 ई. की क्रान्ति का कारण बना।
1857 की क्रांति का नेतृत्व किसने किया :-
1857 के स्वतन्त्रता संग्राम के महानायकों में तांत्या टोपे, बहादुर शाह जफर, लक्ष्मी बाई, नाना साहेब, कुँवर सिंह, मंगल पाण्डे, रंगा बापू जी गुप्ते आदि प्रमुख थे । 
● मेरठ, झाँसी, कानपुर, जगदीशपुर, हैदराबाद, नागपुर, मद्रास, दिल्ली आदि क्रान्ति के प्रमुख केन्द्र थे। 
विनायक दामोदर राव सावरकर एंव अन्य कई विद्वानों ने 1857 की क्रान्ति को भारत का प्रथम  स्वतन्त्रता संग्राम कहा है ।
क्रान्ति की असफलता के मुख्य कारण सर्वमान्य नेतृत्व व आपसी समन्वय का अभाव तथा देशी रियासतों के शासकों का सहयोग न मिलना रहा
● 1858 के अधिनियम द्वारा भारत में कम्पनी शासन का अन्त कर ब्रिटिश क्राउन को सौंप दिया ।
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