1857 की क्रांति के प्रमुख मत। 1857 Ki kranti ke Pramukh Mat

 1857 की क्रांति के प्रमुख मत


1857 की क्रांति के प्रमुख मत। 1857 Ki kranti ke Pramukh Mat

1857 की क्रांति को किसने क्या कहा 


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1857 की क्रांति के प्रमुख मत :-

 सैनिक विद्रोह :-

● राॅबर्टस जान लारेन्स और सीलें के अनुसार यह केवल ‘‘सैनिक विद्रोह‘‘ था  अन्य कुछ नहीं। 

● चाल्र्स राईक्स के अनुसार यह विद्रोह वास्तव में एक सैनिक विद्रोह ही था, यद्यपि कहीं कहीं पर यह जन विद्रोह भी बन गया। 

● दुर्गादास बंधोपाध्याय और सर सैयद अहमद खां ने भी ऐसे ही विचार प्रकट किये।

● निःसन्देह यह विद्रोह एक सैनिक विद्रोह के रूप में आरम्भ हुआ लेकिन समाज के प्रत्येक वर्ग ने इसमें भाग लिया, अतः इसे पूर्णतया सत्य नहीं माना जा सकता।  

मुस्लिम प्रतिक्रिया :-

● सर जेम्स आउट्रम व डब्ल्यू टेलर के अनुसार यह विद्रोह हिन्दू शिकायतों की आड़ में मुस्लिम षडयंत्र था। 

● यह मुस्लिम शासन की पुनःस्थापना का प्रयास था। 

● माॅलिसन व कूपलैण्ड भी इसी मत का समर्थन करते हैं। 

● लेकिन हिन्दुओं के अधिक संख्या में भाग लेने से यह मत भी पूर्णतया सही नहीं है।

 जन क्रांति :-

1857 के गदर को किसने एक क्रांति कहा :- 

● कुछ इतिहासकारों का मानना है कि किसान, जमींदार सैनिक और विभिन्न व्यवसायों में लगे लोगों ने इसमें भाग लिया। 

● सर जे केयी के अनुसार 1857 की क्रान्ति श्वेत लोगों के विरूद्व काले लोगों का संघर्ष थी। 

● लेकिन अंग्रेज सेना में अनेक भारतीय थे अतः यह कहना भी सही नहीं है, जिस तीव्र गति से यह विद्रोह फैला उससे यह बात प्रकट होती है कि विद्रोह को जनता का प्रबल समर्थन प्राप्त हुआ। 

● बहुत से स्थानों पर जनता ने क्रान्तिकारियों को पूर्ण सहयोग दिया। 

● डब्ल्यू एच रसेल ने लिखा है कि भारत में गोरे आदमी की गाड़ी को कोई भी मैत्री पूर्ण नजर से नहीं देखता था। 

● केनिंग ने लिखा अवध में हमारी सत्ता के विरूद्ध किया गया विद्रोह बहुत व्यापक था। 

● जोन ब्रूस नार्टन ने इसे जन विद्रोह बताया है। 

● मॅालिसन ने इस विद्रोह को अंग्रेजों को भारत से बाहर निकालने का सामूहिक प्रयास बताया है।  

किसान विद्रोह :-

● कुछ विद्वानों ने विद्रोह में किसानों की महत्वपूर्ण भूमिका रहने पर इसे किसान विद्रोह भी बताया है। 

● किसानों ने कम्पनी सरकार के साथ ही जमींदारों व बढे़ ताल्लुकदारों के विरूद्ध भी विद्रोह किए। 

● लेकिन इस मत को पूर्णतया सही नहीं कहा जा सकता।  

राष्ट्रीय विद्रोह :-

● बेन्जामिन डिजरेली जो इंग्लैण्ड के प्रमुख नेता थे, इन्होंने इसे ”राष्ट्रीय विद्रोह“ कहा है। 

अशोक मेहता ने भी अपनी पुस्तक ”दी ग्रेट रिबेलियन“ में यह सिद्व करने का प्रयत्न किया है कि विद्रोह का स्वरूप राष्ट्रीय था। 

● वीर सावरकर ने भी इस विद्रोह को सुनियोजित स्वतन्त्रता संग्राम की संज्ञा दी है।

● लेकिन पश्चिमी इतिहासकार राष्ट्रीयता का अर्थ यूरोप की 20वीं सदी की राष्ट्रीयता से लेते हुए इसे राष्ट्रीय विद्रोह नहीं मानते। 

● डा. सत्या राय ने अपनी पुस्तक ‘‘भारत में राष्ट्रवाद’’ में लिखा है हमे भारतीय परिप्रेक्ष में यूरोपीय परिभाषाओं को लागू नहीं करना चाहिए। 

● राष्ट्रीय भावना के कारण ही सभी वर्गो के लोगों ने बिना मतभेद के आपसी मतभेद भुलाकर अंग्रेजों को भारत से बाहर निकालने का सामूहिक प्रयास किया जो राष्ट्रीय विद्रोह की श्रेणि में आता है।


भारत का प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम :-

● कई विद्वानों ने इसे भारत का प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम बताया है। 

● भारत को अंग्रेजों से स्वतन्त्र कराने का यह पहला सामूहिक और राष्ट्र व्यापी संघर्ष था। 

● डा. एस.एन. सेन ने लिखा है जो युद्ध धर्म रक्षा के नाम पर आरम्भ हुआ उसने शीघ्र ही स्वतन्त्रता संग्राम का रूप धारण कर लिया और इसमें संदेह नहीं कि भारतीय अंग्रेज सरकार को समाप्त करना चाहते थे। 

● वी.डी. सावरकर ने अपनी पुस्तक "वर आॅफ इण्डियन इण्डिपेन्डेन्स" (भारत का स्वातंत्र्य समर) में इसे स्वतन्त्रता का प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम बताया है। 

● डा. आर.सी. मजूमदार ने इस तथ्य की और ध्यान आकर्षित करते हुए बताया कि इस विद्रोह का अप्रत्यक्ष रूप से राष्ट्रीय महत्व था। इसका वास्तविक स्वरूप कुछ भी क्यों न हो, शीघ्र ही यह विद्रोह भारत में अंग्रेजी सत्ता के लिए चुनौती बन गया और इसे अंग्रेजों के विरूद्व राष्ट्रीय स्वतन्त्रता युद्ध का गौरव प्राप्त हुआ। 

पण्डित जवाहर लाल नेहरू ने अपनी पुस्तक भारत एक खोज में लिखा है- सैनिक विद्रोह के रूप में आरम्भ हुआ यह विद्रोह सैनिक क्षेत्र तक ही सीमित नहीं रहा शीघ्र ही यह जन विद्रोह एवं स्वतन्त्रता संग्राम के रूप में परिवर्तित हो गया। 

● डा. ताराचन्द, डा. विश्वेश्वर प्रसाद, एस.बी. चैधरी ने भी इसे स्वतन्त्रता संग्राम माना है।

1857 की क्रान्ति के समय पूरे भारत में अंग्रेज विरोधी भावनाएँ थी। 

● जन साधारण और सभी क्रान्तिकारियों का एक ही लक्ष्य था, अंग्रेजों को भारत से बाहर निकालना। 

● यही लक्ष्य सामूहिक संघर्ष की प्रेरणा बना।

● अतः इसे भारतीय स्वतन्त्रता का प्रथम उद्घोष कहना उचित होगा, जिसमें राष्ट्रवादी तत्वों का समावेश था।


सारांश रूप में :-

● भारत की समृद्धि ने यूरोप वासियों को अपनी और आकर्षित किया। 

वास्कोडिगामा समुद्वी मार्ग से भारत आने वाला प्रथम यूरोपियन था जिसका कालीकट के राजा जमोरिन ने अतिथि के रूप में स्वागत किया। 

● पूर्व से व्यापार करने के उद्देश्य से 1600 ई. ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी, 1602 डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी और 1664 ई. में फे्रंच ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना की गई ।

● 1717 में अंग्रेजो को मुगल सम्राट के फरमान द्वारा अनेक व्यापारिक सुविधाऐं प्राप्त हुई ।

● अंग्रेजो ने कर्नाटक के युद्धों में फ्रांसिसीयों को पराजित कर भारत में अपना प्रभुत्व स्थापित किया ।

● 18वीं शताब्दी में मैसूर, बंगाल, हैदराबाद, अवध, मराठा और जाट प्रमुख प्रान्तीय शक्तियाँ थी।

● 1757 में प्लासी का युद्ध, 1761 में पानीपत का तृतीय युद्ध तथा 1764 में बक्सर का युद्ध लड़ा गया। 

● महाराजा रणजीत सिंह ने पंजाब में सिख राज्य की स्थापना की। अंग्रेजो ने 1849 में अपनी साम्राज्य वादी भूख का शिकार बना कर उसे कम्पनी राज्य में मिला लिया ।

● लार्ड वैलेजली की सहायक सन्धि प्रथा तथा डलहौजी के व्यपगत के सिद्धान्त द्वारा ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार किया ।

● गोद निषेध  से झाँसी, सतारा, बघाट, उदयपुर, सम्भलपुर, नागपुर , आदि का कम्पनी में विलय कर लिया गया । 


नोट :- अवध को कुशासन प्रथा का कारण बता कर अंग्रेजों नें अपने अधीन किया था 

● अंग्रेजो की आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक एवं सैनिक नीति 1857 ई. की क्रान्ति का कारण बना।

1857 की क्रांति का नेतृत्व किसने किया :-

1857 के स्वतन्त्रता संग्राम के महानायकों में तांत्या टोपे, बहादुर शाह जफर, लक्ष्मी बाई, नाना साहेब, कुँवर सिंह, मंगल पाण्डे, रंगा बापू जी गुप्ते आदि प्रमुख थे । 

● मेरठ, झाँसी, कानपुर, जगदीशपुर, हैदराबाद, नागपुर, मद्रास, दिल्ली आदि क्रान्ति के प्रमुख केन्द्र थे। 

विनायक दामोदर राव सावरकर एंव अन्य कई विद्वानों ने 1857 की क्रान्ति को भारत का प्रथम  स्वतन्त्रता संग्राम कहा है ।

क्रान्ति की असफलता के मुख्य कारण सर्वमान्य नेतृत्व व आपसी समन्वय का अभाव तथा देशी रियासतों के शासकों का सहयोग न मिलना रहा

● 1858 के अधिनियम द्वारा भारत में कम्पनी शासन का अन्त कर ब्रिटिश क्राउन को सौंप दिया ।


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2 टिप्पणियाँ

  1. इसकी पीडीएफ केसे डाउनलोड करे सर

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    1. Dear Student इस Post की PDF हमने नहीं बनाई है । आपके लिए हम 2 दिन के अंदर इस POST की PDF बना देंगे।
      आप 2 दिन बाद फिर से VISIT करें
      हमारी SITE पर Visit करने के लिए आपका आभार

      धन्यवाद

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