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Rajasthan की सभ्यताएँ :-

प्रस्तावना :- 

राजस्थान भारत के उत्तरी-पश्चिम भाग का एक राज्य है। 

● इसका क्षेत्रफल 342,239 वर्ग किलोमीटर है जो भारत के कुल क्षेत्रफल का 10.4% /10.2% भाग है। 

राजस्थान आकार में विषमकोणीय चतुर्भुज है जिसके उत्तरी, पश्चिमी, दक्षिणी और पूर्वी कोणों में बीकानेर, जैसलमेर, बांसवाड़ा तथा धौलपुर की सीमाएं मिलती है।

● इसके पश्चिम में तथा उत्तर-पश्चिम में पाकिस्तान , उत्तर-पूर्व में पंजाब, उत्तर-पूर्व और पूर्व में उत्तरप्रदेश और पूर्व में ग्वालियर और दक्षिण में मध्यप्रदेश और गुजरात है।

राजस्थान राज्य की बनावट का आधार पर्वतीय प्रदेश, पठारी भाग, मैदानी हिस्सा, मरूस्थलीय भाग तथा नदियां है। 

● यदि इन प्राकृतिक भू-भागों की जलवायु, वर्षा तथा वनस्पति तथा उपज के सन्दर्भ में अध्ययन किया जाये तो यह स्पष्ट हो जायेगा कि राजस्थान की भौगोलिक अवस्था का प्रभाव ऐतिहासिक घटनाओं और यहां के राजनीतिक तथा सांस्कृतिक जीवन पर विशेष रूप से परिलक्षित होता है।


राजस्थान का नामकरण :-

● प्राचीनकाल से ही राजस्थान के विभिन्न भागों को अलग-अलग नामों से जाना जाता था। 

● 'राजस्थान' नाम प्राचीनकाल की देन नहीं बल्कि स्थान विशेष, भौगोलिक परिस्थिति के आधार पर अलग-अलग कालों में इसका नाम बदलता रहा। 

● वर्तमान बीकानेर और जोधपुर के जिले महाभारत काल में जांगलदेश' कहलाते थे।

● काफी समय तक यह 'कुरू जांगला' या माद्रेय जांगलाः' के नाम से विख्यात रहा और उस समय इसकी राजधानी अहिच्छपुर (नागौर) थी। 

जांगल प्रदेश के आस-पास के भाग को 'सपादलक्ष' कहते थे। इसकी राजधानी शाकम्भरी (साँभर) थी। 

● प्राचीनकाल में उत्तर भारत में कुरु, मत्स्य और शूरसेन बहुत विस्तृत राज्य थे। 

अलवर राज्य का उत्तरी भाग कुरू देश, दक्षिणी और पश्चिमी मत्स्य देश तथा पूर्वी भाग शूरसेन देश के अन्तर्गत आता था। 

भरतपुर और धौलपुर राज्य तथा करौली का अधिकांश भाग शूरसेन देश के अन्तर्गत था। 

● शूरसेन की राजधानी मथुरा, मत्स्य की विराट (वैराट), और कुरू की इन्द्रप्रस्थ थी। 

● उदयपुर राज्य का प्राचीन नाम 'किव' था जिसकी राजधानी मध्यमिका थी। 

● डूंगरपुर, बांसवाड़ा प्रदेश 'बागड़' कहलाते थे। जैसलमेर राज्य का प्राचीन नाम मॉड था वहीं जोधपुर के दक्षिणी भाग को गूर्जरत्रा कहते थे।

● सिरोही के हिस्से की गणना अर्बुद (आबू) देश से होती थी। 

मालवा देश के अन्तर्गत आधुनिक झालावाड़ और टोंक के कुछ प्रान्त आते थे।

● मुगलकाल के इतिहासकारों ने 'राजपूत' शब्द प्रयोग में लिया और इसी आधार पर उन्होंने इसे राजपूताना अर्थात् राजपूतों का देश कहा।

● राजपूताने के प्रथम और प्रसिद्ध इतिहास लेखक 'कर्नल जेम्स टॉड' पुरानी बहियों के आधार पर इसका नाम 'राजवाड़ा' या 'रायथन' शब्द का प्रयोग करते थे। 

● आगे चलकर सारे राज्य लिये इस लौकिक रूप को बदलकर राजस्थान प्रयुक्त किया जाने लगा और आज भी एक ईकाई के रूप में वह नाम से विख्यात है।

राजस्थान और प्रस्तर काल :-

● विद्वानों का अनुमान है कि लगभग 80 करोड़ वर्ष पूर्व पृथ्वी पर वन के चिह्न प्रकट होने लगे थे और उनके क्रमिक विकास में करोड़ों वर्ष लग गये। 

● यद्यपि इसका लिखित इतिहास मिलता है लेकिन विभिन्न विद्वानों ने इस दीर्घकाल का चित्र, जीव शास्त्र, मानव शास्त्र एवं पुरातत्त्व के आधार पर प्रयास किया है और ये आधार थे :- पाषण के औजार ओर धातुएं। 

● राजस्थान में प्रागैतिहासिककाल के चरण :- पूर्वपाषाणकाल , उत्तर पाषाण काल 

पूर्व पाषाणकाल और उत्तर पाषाण काल :- 

राजस्थान में पूर्व पाषाण कालीन एवं उत्तर पाषाणकालीन अनेक केन्द्र पाये गये है जहां मानव जीवन का संकेत मिलता है। 

● डॉ. विजय कुमार के अनुसार पाषाण कालीन संस्कृति का प्रसार राजस्थान की अनेक प्रमुख तथा सहायक नदियों के किनारे, जैसे - जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर, अजमेर, अलवर, भीलवाड़ा, चित्तौड़गढ़, जयपुर, झालावाड़, जालौर, पाली, टोंक आदि जिलों में हो चुका था। 

● बनास, गम्भीरी, बेड़च, बाथन तथा चम्बल नदियों की घाटियों तथा इनके समीपवर्ती तटीय स्थानों के अध्ययन से प्रमाणित हो चुका है कि दक्षिण-पूर्वी तथा उत्तर-पूर्वी तथा दक्षिण-पूर्वी राजस्थान की नदियों के किनारे प्रस्तरयुगीन मानव रहता था और पत्थरों के हथियारों का प्रयोग करता था। 

● ये हथियार भद्दे और भौंडे थे। 

● इन हथियारों को प्रयोग में लाने वाला मनुष्य निरा बर्बर था। उसका आहार शिकार किये हुए बनैले जानवरों का मांस और प्रकृति द्वारा उपजाये कन्द, मूल, फल आदि थे।

● इस काल का मानव आग जलाना नहीं जानता था । अतः वह कच्चा मांस एवं कच्चे कन्द-मूल व फल-फूल ही खाता था। 

आदिम मानव ने शिकार अथवा कन्द-मूल बटोरने में अपनी बुद्धि का प्रयोग किया।

राजस्थान का आदि मानव पूर्णतया आत्मनिर्भर था। 

● वह अपनी दैनिक आवश्यकताओं की वस्तुओं की व्यवस्था स्वयं करता था।

● समय के साथ-साथ उसने एक कदम आगे बढ़ना भी सीख लिया था। 

● अपने हथियारों एवं औजारों को फैककर शिकार करने से लेकर अब उसने धनुष और बाण का ज्ञान प्राप्त कर लिया फिर शिकार में उसने अधिक तेज व सफल औजारों का प्रयोग करना आरम्भ कर दिया। 

● अब मानव ने चमड़े की खाल से और उसी के धागों का उपयोग करके सींग, हड्डी अथवा हाथी दांत की बनी हुई सुइयों से उसने तम्बू अथवा अपने पहनने और ओढ़ने के लिये खोल बनाना भी सीख लिया। 

● प्राप्त साक्ष्यों से पता चलता है कि आदि मानव ने व्यापार विनिमय के लिये विभिन्न सामग्री (कोड़ियों, शंख) का प्रयोग प्रारम्भ कर दिया। 

● इसी काल में उसे (आदि मानव) लज्जा की अनुभूति भी उत्पन्न हुई और उसने अपने गुप्त अंगों को ढकना शुरू कर दिया। 

● अब वृक्षों के पत्ते, छाल तथा पशुओं की खाल उनके वस्त्र बन गये। 

● वृक्षों की छाल को वह कमर में लपेटता था और पत्तों की माला बनाकर कटि प्रदेश के नीचे लटका देता था। 

● पशुओं की खाल भी वह अपनी कमर में लपेटता था।

● यद्यपि धार्मिक भावनाओं का स्पष्ट उदय इस समय तक नहीं हुआ था, फिर भी राजस्थान के तद्युगीन मानव में एक विचार काफी गहराई में प्रवेश कर चुका था कि मनुष्य के व्यवहारिक जीवन का अन्त मृत्यु के साथ नहीं हो जाता बल्कि उसके पश्चात् भी उसे उन सभी वस्तुओं की आवश्यकता पड़ती है, जो वह अपने जीवन में प्रयोग करता रहा है। 

● इसी धार्मिक विचारधारा का परिणाम था कि जमीन में गाड़े गये शवों के साथ औजार, आभूषण, मांस आदि जीवन की उपलब्ध उपयोगी वस्तुओं को भी रख दिया जाता था, जिनके अवशेष शव के अस्थ-पंजर के साथ मिलते हैं। 

● विद्वानों का अनुमान है कि उस समय का मनुष्य किसी निराकार, अज्ञात शक्ति अथवा देव को प्रसन्न रखने के लिये आखेट करता था।

● वे अपने मृतकों को खुले मैदान में छोड़ देते थे, जिसको या तो जंगली जानवर खा जाते थे या फिर वे स्वयं ही सड़ गल जाते थे। 

● उत्तर पाषाण काल में मानव ने बौद्धिक विकास किया। 

● अब मानव जीवन में अपने पूर्वाधिकारियों की अपेक्षा उत्कृष्ट संस्कृति के लक्षण दिखाई देते हैं। 

● वास्तव में देखा जाये तो राजस्थानी मानव सभ्यता की आधार शिला इसी युग में रखी गई थी।

उत्तर पाषाणकालीन मानव ने प्राकृतिक खोहो, कन्दराओं व कगारों को त्यागकर उसने नदी तट पहाड़ियों की समतल पीठों पर अपने मकान बनाने का प्रयास किया। 

● पत्थर के छोटे-बड़े टुकड़ों को एक दूसरे पर रखकर मकान की दीवार बनाई गई और फिर घास-फूस, पेड़ों की टहनियों, लकड़ी व जानवरों की हड्डियों को जोड़कर मकान की छत तैयार की गई। 

● इस समय के औजारों में स्क्रेपर तथा पाइण्टर विशेष उल्लेखनीय है।

 

● ये मकान झुण्डों में बनते थे जो मानव की सामाजिकता और संगठनात्मक प्रवृत्ति को प्रकट करते है। 

● यही सामुहिक जीवन का श्रीगणेश था।

● उत्तरपाषाणकालीन मानव के औजार अधिक परिष्कृत, सुघड़, पॉलिशयुक्त एवं आकृति लिये हुये होने लगे।

● जहाँ पूर्व पाषाण काल में मानव हाथ से बर्तन बनाता था अब चाक के आविष्कार के साथ बर्तनों में कलात्मक अंलकरण भी देखने को मिलने लगा। 

उत्तर पाषाणकालीन औजार एवं अवशेष मुख्यतः चम्बल, भैसरोड़गढ़, नवाघाट, बनास तट पर हमीरगढ़, जहाजपुरु देवली व गिलूड, लूनी नदी के तट पर पाली, समदड़ी, शिकारपुर, सोजत, पीपाड़, खींवसर, बनास नदी के तट पर टॉक में भरनी आदि अनके स्थानों से प्राप्त हुए हैं।

उत्तरपाषाणकाल में मानव ने पत्थरों को रगड़कर आग जलाना सीख लिया था और इसी आग में उसने अपना भोजन पकाना भी सीख लिया परिणामस्वरूप अब उसका भोजन कच्चे के पक्का हुआ होने लगा। 

पशु-पालन का व्यवसाय शुरू होने के कारण अब उसका पेय पदार्थ दूध भी हो गया।

● धीरे-धीरे समय के साथ-साथ दूध से दही, घी निकालने की भी प्रक्रिया प्रारम्भ हो गई या यूं कह सकते हैं कि पूर्व पाषणकाल की उत्तरपाषणकालीन मानव ने अपने भोजन में काफी विकास कर लिया था। 

● इस काल तक आते-आते मनुष्य ने यह तय कर लिया था कि निरन्तर शिकार करते रहने या घूमक्कड़ जीवन जीने से उसका जीवन यापन नहीं हो सकता परिणामस्वरूप उसने पुशओं के मारने (शिकार) के साथ-साथ उनका पालन प्रारम्भ कर दिया । विशेषतः वे जानवर जो दूध देते हैं।  जैसे गाय, बकरी आदि। 

● इनके अलावा भार ढोने वाले पशुओं को भी पाला जाने लगा। 

● सबसे बड़ा क्रांतिकारी आविष्कार उत्तर पाषाणकाल में कृषि कार्य का शुभारम्भ था।

● अब मनुष्य ने स्थायी निवास बनाकर जीवन यापन करना प्रारम्भ कर दिया। 

● परिणामस्वरूप सभ्यता का विकास तेजी से होने लगा। 

● इस प्रणाली से सामुहिकता की भावना और संगठन की भावना का विकास हुआ।

● उत्तरपाषण काल में पशु पालन और खेती होने के कारण कपास की खेती प्रारम्भ हो गई।

● परिणामस्वरूप सूत कातने और कपड़ा बुनने का काम आरम्भ हो गया । 

● पशुओं की ऊन से भी कपड़ों की बुनाई प्रारम्भ हुई। 

● इस प्रकार राजस्थान में उत्तर पाषाणकालीन मानव , सूती और ऊनी वस्त्र पहनने लगा। 

● रंगों के प्रति मानव में आकर्षण स्वाभाविक था।

● अतः वनस्पति से तैयार किये रंगों से लाल, पीले, हरे और नीले कपड़े रंगें जाने लगे। 

● स्त्रियों विशेषतः अधोवस्त्र (लहंगे जैसा) जैसा वस्त्र धारण करती थी। 

● बाल संवारने की कला भी विकसित हो गई थी। 

आभूषण का शौक स्त्री पुरुष दोनो को था।

● स्त्रियां विशेषकर पत्थर, कौड़ी, सीप, हड्डी आदि की मालाएं बालियां, अंगुठियां, कड़े व कंकणों से शृंगार करने का विशेष शोक रखती थी।

● कृषि कर्म के कारण अब इस काल में मनुष्य ने बड़े-बड़े परिवार में रहना प्रारम्भ कर दिया ऐसे में सम्बन्ध भी प्रगाढ़ होने लगे और परिवार के सबसे वयोवृद्ध व्यक्ति को परिवार का मुखिया मान लिया जाता था और यहीं से राज-संस्था का विकास प्रारम्भ हो सका।

● अब मानवीय भावना के साथ-साथ मनुष्य में आध्यात्मिक एवं धार्मिक प्रवृत्ति भी बढ़ने लगी यद्यपि प्रत्यक्ष किसी देवी देवता का तो उल्लेख नहीं है लेकिन मनुष्य के जीवन-मरण के सम्बन्धी विचार अधिक स्थिर होने लगे। 

● अब यह विचार अधिक बल पकड़ने लगा कि मृत्यु के बाद जीव का पुनर्जन्म होता है। 

● अब पूजा पद्धति भी धीरे-धीरे प्रचलन में आने लगी।

● समय के साथ-साथ धातु का ज्ञान, पत्थरों की बनाई हुई भट्टी अथवा चूल्हें का उपयोग मानव के विकास में सहायक सिद्ध हुआ। 

● धातु ज्ञान से अब मनुष्य को पाषाण हथियारों के स्थान पर धातु हथियार पर ज्यादा विश्वास होने लगा। 

● ऐसे में मनुष्य ने उपयोगी धातुओं की खोज करनी प्रारम्भ कर दी। 

● राजस्थान में भी मानव ने पत्थर के पश्चात् ताम्र की खोज की। 

राजस्थान में भी हथियार, औजार आदि बनाने में तांबे का प्रयोग अधिक होने लगा।

● राजस्थान के विभिन्न भागों से ताम्बे की वस्तुओं के अवशेष प्राप्त हुये हैं। 

● इन अवशेषों में राजस्थानी सभ्यता की नव–अंकुरित सभ्यता के चिह्न स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। 

ताम्र युगीन सम्भ्यता मुख्तः सिन्धुघाटी में विकसित हुई और इसका प्रसार निकटवर्ती भागों में दूर तक पर्याप्त रूप से हुआ था।

● राजस्थान के विभिन्न स्थानों कालीबंगा, आहड़, बागौर, रंगमहल, बैराठ, गिलूड, नोह आदि स्थानों से सिन्धु घाटी सभ्यता के समकक्ष, और कहीं-कहीं इससे भी प्राचीन सभ्यता के साक्ष्य मिले हैं।

● ऐसा माना जाता है कि ऋग्वैदिक काल से सदियों पहले राजस्थान में वर्तमान रेगिस्तान क्षेत्र में समुद्र था तथा आहड़ (उदयपुर के निकट) और द्वषद्धति एवं सरस्वती नदियां उस समुद्र में आकर मिलती थी। 

● कहा जाता है कि प्राचीन ऋषियों ने यही पर ऋग्वेद के कुछ मण्डलों की रचना की थी।

● ऋग्वेद में सरस्वती एवं मरू दोनों का उल्लेख हुआ है। 

आहड़, द्वषद्धति और सरस्वती नदियों के कॉठों पर मानव संस्कृति सक्रिय थी। 

● ये संस्कृति हडप्पा तथा मोहनजोदड़ों की सभ्यता के समकक्ष एवं समकालीन सी थी।

● आज से लगभग पांच-छ: हजार वर्षों पूर्व इन नदी घाटी में मानव ने अत्यन्त ही समुन्नत सभ्यता का निर्माण किया था। 

● इनमें कालीबंगा तथा आहड़ की सभ्यता अत्यधिक प्रसिद्ध है।


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कालीबंगा सभ्यता (हनुमानगढ़) :- 


प्राचीन दृषद्वती और सरस्वती नदी घाटी (वर्तमान में घग्घर नदी का क्षेत्र) क्षेत्र में हड़प्पा सभ्यता से भी प्राचीन कालीबंगा की सभ्यता विकसित हुई। 

हनुमानगढ़ का प्राचीन नाम क्या है?

● हनुमानगढ़ का प्राचीन नाम भटनेर था।

राजस्थान की सर्वाधिक प्राचीन सभ्यता कौन सी है ?

कालीबंगा सभ्यता कहाँ स्थित है?

राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में स्थित यह सभ्यता आज से 6 हजार वर्ष से भी अधिक प्राचीन मानी जाती है। 

●  इस सभ्यता का परिपक्व अकाल 2400 से 2250 ईसवी पूर्व माना जाता है।

कालीबंगा क्यों प्रसिद्ध है?

कालीबंगा पत्थर की  काली चूड़ियों के कारण प्रसिद्ध है।

● इस स्थल का कालीबंगा नाम यहाँ से खुदाई के दौरान प्राप्त काली चूड़ियों के कारण पड़ा है, क्योंकि पंजाबी भाषा में बंगा का अर्थ होता है चूड़ी। 

● सर्वप्रथम 1952 ई. में अमलानन्द घोष ने इसकी खोज की और तत्पश्चात् 1961-62 ई. में बी.बी. लाल, बी.के. थापर द्वारा यहाँ उत्खनन कार्य करवाया गया। 

● उत्खनन में इस सभ्यता के पाँच स्तर सामने आये हैं. प्रथम दो स्तर तो हड़प्पा सभ्यता से भी प्राचीन है. वहीं तीसरे, चौथे व पाँचवे स्तर की सामग्री हडप्पा सभ्यता की सामग्री के समान और समकालीन है।

● इस आधार पर कालीबंगा की सभ्यता को दो भागों में बांटा गया है-(1) प्राक् हड़प्पा सभ्यता (2) हड़प्पा सभ्यता।

कालीबंगा सुव्यवस्थित रूप से बसा हुआ नगर था। 

● यहाँ दुर्ग को दो भागों में बाँटने का साक्ष्य मिलता है।

● यहाँ से सात हवनकुण्ड होने का साक्ष्य प्राप्त हुआ है। हवनकुण्ड हड़प्पा सभ्यता में मात्र कालीबंगा और लोथल से प्राप्त हुए हैं।

● मकान बनाने में मिट्टी की ईंटों को धूप में पकाकर प्रयुक्त किया जाता था। 

● उत्खनन से प्राप्त मिट्टी के बर्तन एवं उनके अवशेष पतले और हल्के हैं तथा उनमें सुंदरता व सुडौलता का अभाव है।

● बर्तनों का रंग लाल है, जिन पर काली एवं सफेद रंग की रेखाएँ खींची गई हैं। 

● यहाँ से जुते हुए खेत के साक्ष्य मिलते हैं, ऐसा अनुमान है कि लोग एक ही खेत में दो फसलें उगाते थे। 

कालीबंगा से मिले कब्रिस्तान से यहाँ के निवासियों की शवाधान पद्धतियों की जानकारी मिलती है, साथ ही एक बच्चे के कंकाल की खोपड़ी में छः छिद्र मिले हैं, जिसे मस्तिष्क शोध बीमारी के इलाज का प्रमाण माना जाता है। 

● यहाँ से प्राप्त खिलौना बैलगाड़ी, हवनकुण्ड, लकड़ी की नाली व बेलनाकार मुहर का हड़प्पा सभ्यता में अपना विशिष्ट स्थान है।

● यहाँ से कपास व भूकंप के साक्ष्य और अंडाकार व आयताकार क़ब्रे में प्राप्त हुई है। कालीबंगा स्थल का आकार चतुर्भुज के समान है।

●  यहां से जो और गेहूं ऊपजाने के प्रमाण मिले हैं। कालीबंगा के निवासी लकड़ी के हलों का प्रयोग करते थे।


कालीबंगा सभ्यता के मूल स्रोत :-

भग्नावशेष :- 

● यहां दो टीले प्राप्त हुए हैं और उन दोनों टीलों के उत्खनन में पुराने मकानों के अवशेष तथा प्रचीर के अवशेष मिले हैं। 

दोनों के भवनों में भिन्नता मिली है तथा भवन निर्माण के उपकरणों में भी भिन्नता पाई गई है। 

● भवनों के उन अवशेषों के आधार पर तत्कालीन स्थापत्य-कला, नगर-निर्माण कला का पता लगाया गया हैं । इसके साथ ही उन अवशेषों आधार पर तत्कालीन जन-जीवन तथा आर्थिक अवस्था का पता लगाने का भी प्रयास किया गया है।

कालीबंगा में विभिन्न प्रकार के मिट्टी के बर्तन पर्याप्त मात्रा में मिले है। उन बर्तनों से तत्कालीन कला व विभिन्न रंगों का ज्ञान होता है। 

● रंगों के अलावा वे मृद-भाण्ड यह भी स्पष्ट करते हैं कि चाक पर निर्मित होनेपर भी उनकी गढ़न साफ सुथरी नहीं थी।

मृण्मूर्तियां :– 

कालीबंगा के उत्खनन में मृणमूर्तियां भी उपलब्ध हुई हैं। इससे ज्ञात होता है है कि यहां के निवासी भी हड़प्पा के लोगों की भांति मूर्ति कला से परिचित थे।

आभूषण :- 

कालीबंगा में विभिन्न पदार्थों से निर्मित आभूषण भी प्राप्त हुए हैं। मिट्टी से निर्मित चूड़ियां तथा तांबे के मणिएं भी मिले हैं। इससे स्पष्ट है कि कालीबंगा के निवासी आभूषणों के प्रेमी थे। वे तांबे का प्रयोग भी जानते थे। इसके साथ ही यह भी पता चलता है कि कालीबंगा के लोग अधिक समृद्ध नहीं थे।

चोसर की गोटियां :- 

● कालीबंगा के उत्खनन में शतरंज व चौसर की गोटियां मिली है। बच्चों के मिट्टी के खिलोने मिले हैं। इनसे स्पष्ट है कि बच्चे व युवा दोनों ही अपने मनोरंजन के साधन भी रखते थे।

अस्थियां :- 

● प्राप्त अस्थियों के आधार पर यहां पाये जाने वाले विभिन्न पशुओं का अनुसंधान किया जाता है। पुराविद् यह भी विचार करते थे कि यहां के मनुष्य मांसाहारी थे। वे पशुओं का शिकार करके भी अपना भरण-पोषण करते थे।


इस आधार पर कालीबंगा की सभ्यता और संस्कृति को दो भागों में बाटा गया है :-

(1) प्राक् सैन्धवयुगीन सभ्यता और संस्कृति 

(2) सैन्धवयुगीन सभ्यता और संस्कृति।


(1) प्राक् सैन्धवयुगीन सभ्यता और संस्कृति :-

प्रारम्भिक बस्ती - 

कालीबंगा में उत्खनित टीलों में से प्राक् सैन्धवयुगीन सभ्यता और संस्कृति के अवशेष चिह्न केवल पश्चिम टीले के दो प्रारम्भिक स्तरों से मिले हैं। 

● इस काल में यह बस्ती 40/30 x 20 x10 सेन्टीमीटर माप की कच्ची ईंटों से बने परकोटे के अन्दर स्थित थी। 

● यह परकोटा दो चरणों में बना था। प्रारम्भ में परकोटे की दीवार की चौड़ाई 1.90 मीटर थी, किन्तु कालान्तर में उसे अन्दर की ओर बढ़ाकर 3.10 से 4.10 मीटर तक चौड़ा किया है, किन्तु पश्चिमी और पूर्वी दीवारों की निश्चित दूरी अज्ञात है। विद्वानों की मान्यता है कि सम्भवतः यह दूरी 180 मीटर होगी।


भवन निर्माण :-

● इस काल में बस्ती के अन्दर के मकान भी परकोटे में ईंटों की माप की कच्ची ईंटों से ही बने है। 

● इन मकानों में दालान, 4-5 बड़े और छोटे कमरे होते थे। 

● मकानों की छतें बल्लियों ओर मिट्टी से बनाई जाती थीं और उन्हें कवेलू से ढका जाता था। मकानों के बाहर चबूतरे होते थे। 

● सामार कमरों की फर्श चिकनी मिट्टी से लीपी जाती थी। किन्तु कुछ मकानों में पकाई गई ईंटों के फर्श भी मिले है। 

● मकानों की छत पर जाने के लिए सीढ़ियां भी मिली है। 

● मकानों में बने चूल्हे सतह और सतह के अन्दर बने हैं। 

● नीचे वाले चूल्हों में ईंधन देने और धुंवों के निकालने के लिये छेद बने है। 

● घरों की सफाई का विशेष प्रबन्ध था। 

गन्दे पानी के निकास के लिये पूरे मकान में पक्की नालियां थी जिनका पानी मकान के बाहर बने विशेष प्रकार के बने गढ्ढ़ों में गिरता था।


जुता हुआ खेत :-

कालीबंगा के प्राक् सैन्धवा की सर्वोत्तम उपलब्धि बस्ती के दक्षिण-पूर्वी प्राचीर के बाहर जुते हुये खेत के अवशेष है। 

● उल्लेखनीय तथ्य यह है कि संसार भीतर में उत्खनन में प्राप्त जुते हुये खेत के अवशेषों में यह प्राचीनतम है। 

● साथ ही इस खेत की उपलब्धता ने सिन्धु सभ्यता के प्रारम्भिक रूप और उद्भव सम्बन्धी प्रश्न को हल करने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। 

● वस्तुतः नगरीय सभ्यता का विकास प्रायः ग्रामीण सभ्यता से होता है। किन्तु इस सभ्यता की जानकारी के पूर्व नगर प्रधान सिन्धु सभ्यता की 'प्रारम्भिक कड़ियां लुप्त थी, किन्तु इस सभ्यता के प्रकाश में आने से ये कड़ियां पुनः जुड़ गई है। 

● इस खेत में दो प्रकार की फसलों को एक साथ उगाया जाता था। 

कालीबंगा के आसपास के क्षेत्र में आज भी दो प्रकार के अनाजों सरसों और चने की मिली-जुली खेती होती है। 

● उत्खनन में मिले खेत की दुतरफा जुताई में हराईयों के चिह एक वर्ग के रूप में बने हैं।

● उत्तर दक्षिण की हराईयों की दूरी 1.10 मीटर है, किन्तु पूर्व से पश्चिम की हराइयों के मध्य केवल 30 सेन्टीमीटर की दूरी है। 

● यहां के प्रमुख कृषि उत्पादनों के सम्बन्ध में कोई निश्चित जानकारी नहीं मिलती, किन्तु यहां की नदियों के आधार पर विद्वानों का अनुमान है कि यहां रबी की फसल के रूप में जौ, गेहूँ आदि उगाये जाते उत्खनन में प्राप्त बहुसंख्यक कृषि उपकरण और अन्नसंग्रह के साधन, यहां की आर्थिक समृद्धि के परिचायक है। 

● विद्वानों का मत है कि प्राचीन संस्कृत साहित्य में उल्लेखित बहुधान्यदायक प्रदेश यही था।


बर्तन :- 

● कालीबंगा के उत्खनन से मिट्टी के कई बर्तन और उनके अवशेष मिले है जिनको फेबरिक 'बी', 'सी': और 'ई' की संज्ञा दी जाती है। 

● यहां के बर्तनों की विशेषता, उनका पतला एवं हल्का होना है।

● उन्हें चाक से बनाया जाता था, फिर भी ये भोंड़े ढंग से बने है। 

● इनका रंग लाल है परन्तु ऊपर और मध्य भाग में काली एवं सफेद रंग की रेखाएं दिखाई देती है। 

● इन पर अंलकरण चौकोर, गोल जालीदार, वृत्ताकार, घुमावदार, त्रिकोण एवं समानान्तर रेखाओं से किया जाता था। 

● फूल, पत्ती, चौपड़, पक्षी, खजूर आदि का अलंकरण भी इन पर रहता था। 

● बर्तनों में घड़े, प्याले, लौटे, हाडियां, रकाबियां, सरावलें पैदे वाले ढक्कन व लोटे भी होते थे। 

● मछली, कछुए, बतख, हिरण आदि की आकृतियां भी इन पर बनाई जाती थी।


अन्य वस्तुएं :- 

● मकानों के अवशेषों व बर्तनों के अतिरिक्त यहां कई अन्य प्रकार की वस्तुएं भी उपलब्ध हुई है जिनमें खिलौनें, पशुओं एवं पक्षियों के स्वरूप, मिट्टी की मुहरें, चूड़ियां, नाप-तोल के पैमाने, तांबे की चूड़ियां, चाकू, तांबे के औजार, काँच के मणिये आदि प्रमुख है। 

● मिट्टी के भाण्डों एवं मुहरों पर अंकित लिपि सैन्धव लिपि के तुल्य है।


कालीबंगा का प्रथम काल (प्राक-हड़प्पा) उपलब्धियों की दृष्टि से उल्लेखनीय था। 

● भारत के प्रमुख व्यवसाय कृषि के यहां अवशेष प्राप्त हुए हैं। 

● भवन निर्माण में यहां के लोग दक्ष थे। 

ईंटों को पकाना वे जानते थे। 

● नगर की सुरक्षा हेतु परकोटे का महत्व वे समझते थे। 

● मिट्टी के विभिन्न प्रकार के कलापूर्ण बर्तन बनाना उन्हें ज्ञात था। 

● ताम्बे व पाषाण के वे शस्त्र बनाते थे। 

● गाड़ी के मिले पहिये व खंडित बैल की मूर्ति इस तथ्य का परिचायक हैं कि माल ढोने में बैलगाड़ी का प्रयोग किया जाता था। 

● सम्भवतः आवागमन के साधन रूप में भी बैलगाड़ी का प्रयोग किया जाता होगा।

● कालीबंगा के इन अवशेषों व उपकरणों की प्राप्ति के लिए 60 मीटर की गहराई तक खुदाई करनी पड़ी । 

● सैन्धव सभ्यता की भांति यहां के अवशेष भी कई परतों (प्रकालों) को हटाने के उपरान्त मिले हैं। 

● इस सभ्यता के अवशोषों ने पाकिस्तान की चुनौती को स्वीकार करते हुए बता दिया है कि वह जिस हड़प्पा व मोहनजोदड़ों की प्राचीनता पर गर्व कर बैठा था- उससे भी प्राचीन सभ्यता भारत के राजस्थान प्रदेश के उत्तरी भाग में विकसित हो चुकी थी। 

● इसकी प्रथम पढ़त पर जमी बालू रेत इस बात का संकेत देती है। 

● संभवतः सरस्वती नदी में कभी भयंकर बाढ़ आई होगी- उसमें यह विकसित सभ्यता विनाश के गर्त में समा गई

● प्राक्-हडप्पा बस्ती सम्भवत: नदी की बाढ़ में उसी प्रकार समा गई जिस प्रकार नदियों की घाटियों में विकसित होने वाली अन्य सभ्यताएं विनाश को प्राप्त हो गई। 

● यह भी सम्भव हैं कि भूकम्प के प्रकोप से यह नष्ट हुई हो।


(2) सैन्धवयुगीन सभ्यता और संस्कृति :

● कालान्तर में सरस्वती व दृषदती नदियों की चाटियों में सभ्यता का पुनःविकास हुआ।

● दूसरे काल में विकसित सभ्यता के जो पुरावशेष कालीबंगा में प्राप्त हुए वे प्राक-हड़प्पा सभ्यता से भिन्न है। 

● उन प्राप्त उपकरणों के आधार पर पुराविद् अपना मत व्यक्त करते हैं कि इस दूसरी सभ्यता को विकस्ति करने वाले हड़प्पा निवासी थे क्योंकि दूसरे काल के प्राप्त पुरातत्व-उपकरण हड़प्पा सभ्यता के उत्खनन में प्राप्त पुरातत्व-उपकरणों से मेल खाते हैं। 

● हो सकता है कि दूसरे काल की कालीबंगा (हडप्पा युगीन) सभ्यता व संस्कृति को विकसित करने में कालीबंगा के प्राक हडप्पा युगीन लोगों का भी सहयोग रहा हो। 

● परन्तु यह यथार्थ है कि हड़प्पा कालीन संस्कृति ने सभ्यता को पूर्णतः अपने में आत्मसात कर लिया। 

● इसका प्रमुख कारण यह था कि हड़प्पा युगीन सभ्यता प्राक् हड़प्पा सभ्यता से अधिक विकसित एवं श्रेष्ठ थी।


दुर्ग :- 

● कालीबंगा का सैन्धवकालीन दुर्ग की दृष्टि से पश्चिम के ऊँचे टीले पर प्राक् सैन्धवयुगीन बस्ती के अवशेषों पर बनाया गया था। 

● दुर्ग उत्तर-दक्षिण में 240 पीटर व पूर्व-पश्चिग में 120 गीटर में विस्तारित था। 

● दुर्ग के परकोटे की दीवार 3 से 7 मीटर चौड़ी थी जिसमें दृढ़ता बीच में बुर्ज बने थे। 

दीवार में प्रयुक्त ईटों का माप 40 x 20 x 10 सेमी. और 30 x 15x7.5 सेमी. है। 

● सम्भवतः दीवार का निर्माण भी दो चरणों में सम्पन्न हुआ था। 

● निर्माण के प्रथम चरण ने बड़ी और द्वितीय चरण में छोटी ईटों का प्रयोग हुआ था। 

● दुर्ग के दक्षिणी भाग के एक हिस्से में 5-6 चबूतरे बने है जिन पर सीढ़ियां बनी थी और वहां तक के लिये ईटों को जड़ाई कर मार्ग बना था। 

● कुछ चबूतरों पर आयताकार कुण्डनुमा वेदियों और कुवें बने है। 

● इन वेदियां प्राप्त हड्डियों, सींगों, राख आदि के अवशेषों के आधार पर विद्वानों का अनुमान है कि सम्भवतः इनका कोई धार्मिक प्रायोजन रहा होगा। 

● दुर्ग के प्रवेशद्वार उत्तर और दक्षिण दिशा में बने थे। 

● दो बुम्बो के मध्य बने उत्तरी द्वार में प्रवेश के लिये सीढ़ियां बनी थीं, किन्तु दक्षिण में सीढ़ियों के साथ गलियारा भी था। 

● अनुमान है कि उत्तरी द्वार से अभिजात वर्ग के और दक्षिणी द्वार से सामान्य वर्ग के लोग प्रवेश करते थे। 

● दुर्ग के दूसरे भाग में अभिजात वर्ग के निवास थे जो वैसी ही ईटों से बने थे जिससे दुर्ग की प्राचीर बनी थी। ये भवन एक मंजिले थे, जिनमें 3-4 कमरे और नालियां बनी होती थी।


नगर एवं भवन निर्माण :- 

● दुर्ग के पूर्व दिशा में नीचे की ओर की भूमि पर 360 x 240 मीटर माप में सैन्धव सभ्यता की विशिष्ट नगर आयोजन के अनुरूप कालीबंगा का सुनियोजित नगर या बस्ती खण्ड बसा था।

● दुर्ग की भांति नगर के चतुर्दिक कच्ची ईंटों का परकोटा बना था। ईंटों का माप 40 x 20 x 10 सेमी. था। 

● नगर के भवनों व सड़कों की आयोजना शतरंज पट्ट की भांति थी। 

● नगर उत्तर से दक्षिण की ओर जाने वाली तीन सड़कों के द्वारा अनेक खण्डों में विभक्त था।

● इन सड़कों की चौड़ाई 80 के गुणज में थी।

प्रारम्भिक काल की सड़के कच्ची थीं, किन्तु परवर्ती काल की सड़के मृदपिण्डों से पटी थी।

● स्थानीय दुर्घटनाओं को रोकने के लिए प्रत्येक सड़क के कोने पर रक्षा स्तम्भ बने थे।

● सुनियोजित नगर निर्माण के आधार पर विद्वानों का अनुमान है कि सम्भवतः इन तथ्यों को नियन्त्रित करने के लिये यहां कोई स्थानीय सत्ता रही होगी। 

● सड़कों द्वारा विभाजित नगर के प्रत्येक खण्ड में 5-6 मकान बने थे। 

● प्रायः प्रत्येक भवन दो या तीन सड़कों की ओर खुलता था। 

● प्रत्येक भवन में एक आगन और 6-7 कमरे होते थे। 

● भवनों में प्रयुक्त ईंटों की माप दुर्ग की ईटों के अनुरूप ही थी। 

●भवनों की फर्श और छतें प्राक् सैन्धवयुगीन भवनों की भांति मिट्टी की ही बनी थी। 

● कुछ भवनों की फर्श कच्ची ईंटों और अंलकृत खपरैलों से भी बनी है। 

● इन भवनों की छतें भी कच्ची ही है जो प्रायः लकड़ी की शहतीरों पर खपरैल और कवेलू डालकर बनाई गई है। 

●एक भवन में छत पर जाने के लिये सीढ़ियां भी बनी हुई है।


मिट्टी के बर्तन :- 

● कालीबंगा सभ्यता के जिस प्रकार प्रथम काल में मिट्टी के बर्तन पर्याप्त संख्या में प्राप्त हुए थे, उसी प्रकार दूसरे काल में पुरावशेषों में भी मृद-भाण्ड काफी संख्या में उपलब्ध हुए हैं। 

● ये मिट्टी के बर्तन हडप्पा संस्कृति से सम्बद्ध दष्टिगत होते हैं। 

● बर्तन भी कई श्रेणी के मिले हैं। उनमें प्रमुख हैं : - खाना पकाने के , अनाज रखने व उसे छानने के बर्तन। 

● इनके अलावा धार्मिक अनुष्ठान सम्पन्न करने के भी बर्तन प्राप्त हुए हैं। 

● बर्तन अलंकरण युक्त भी हैं तो सादे भी हैं। अलंकरण प्रधानतः चित्रांकन के रूप में किया जाता था। 

● कुछ भाण्ड ऐसे भी उपलब्ध हुए हैं जिन पर सिधु-लिपि या उत्कीर्ण प्रतीक अकिंत है। 

● परन्तु बर्तनों की प्रमुख कि वे चाक पर निर्मित थे और वे पतले व हल्के होते थे। 

● बर्तनों की आकृति हड़प्पा संस्कृति के बर्तनों के समान थी। 

● अलंकरण उन पर ज्यामितिक वृत्त जालक पुल्ले, मत्स्य-शकल आदि रूप में किया गया है। 

● मछली, बतख कछुए हिरण आदि भी मृद-भाण्डों पर चित्रित है। 

● उल्लेखनीय बर्तनों में सपीठ थाली, नुकीली पैंदे के कुल्हड, छिद्रित मृदंकार मर्तबान, लम्बोदर घडा आदि उपलब्ध हुए है। 

● अन्य पुरातत्व उपकरण : उपर्युक्त मृद भाण्डों के अतिरिक्त कालीबंगा के उत्खनन निम्न उपकरण और प्राप्त हुयें हैं :-  

1. चकमक पत्थर के लम्बे फल 

2. तामड़े पत्थर 

3. यशव 

4. घीया पत्थर 

5. तांबे के मणियें 

6. मिट्टी से निर्मित चूड़ियां व कड़ें 

7. टोंटीदार प्यालियां 

8. शंख-वलय आभूषण 

9. मिट्टी के खिलौने (गाड़िया) 

10 चकमक पत्थर से निर्मित तौलने 

11. शतरंज व चौसर की गोटियां 

12. मृणमूर्तियां (मानव, पशु )

13. तिकोने और छोटे ढेलो से मिलते-जुलते 14. कांचली मिट्टी (मृदभाण्ड)

● मुद्राएं उपर्युक्त उपकरणों के अतिरिक्त सैन्धव सभ्यता से साम्यता रखती हुई यहां मुद्राएं भी उपलब्ध हुई है। 

● उन मुद्राओं पर विभिन्न आकृतियां मुद्रित करने की छापें भी प्राप्त हुई हैं। 

● मुद्राओं पर पौराणिक एवं वास्तविक पशुओं के चित्र चित्रित मिले हैं। 

● मुद्राएं घीया पत्थर, तांबा, व कांचली मिट्टी से निर्मित होती थीं। 

● सैन्धव सभ्यता के अन्तर्गत प्राप्त मुद्राओं पर जिस प्रकार कुछ लिखा मिला है - उसी प्रकार कालीबंगा की मुद्राओं पर भी कुछ लिखा मिला है। 

● परन्तु जिस प्रकार मोहनजोदड़ों व हड़प्पा में प्राप्त मुद्राओं के लेख आज तक नहीं पढ़े जा सके हैं, उसी प्रकार कालीबंगा की मुद्राओं की लिपि भी आज तक नहीं पड़ी जा सकी है।

● परन्तु कुछ मृत्पात्रों में उत्कीर्ण लेखों के लिखने के ढंग से यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि यह लिपि भी खरोष्ठी की भांति दायीं से बायीं ओर लिखी गई है। 

● कभी-कभी इसे सर्पाकार शैली में भी लिखा जाता था। 


मृण्मूर्तियां :- 

● हड़प्पा संस्कृति की भांति कालीबंगा में भी मिट्टी से निर्मित अनेक मूर्तियों मिली है। 

● प्राप्त मृणमूर्तियों में सर्वाधिक उल्लेखनीय मूर्ति आक्रामक सांड की है। इस मूर्ति को देख कर निःसन्देह कहा जा सकता है कि हड़प्पा युगीन कालीबंगा सभ्यता के लोग अच्छे मूर्तिकार थे।

● आक्रामक सांड का गठन इस प्रकार किया गया है कि लड़ने का उन्माद उसमें स्पष्ट झलकता है। उसका शरीर तना हुआ है तथा गर्दन कुछ झुकी हुई है। 

● यह मूर्ति हड़प्पा युग की जीवन्त और सशक्त लोक कला का परिचय देती है। इसके अलावा बेलनाकार सील, आशंकित पैमाना तथा एक मानव आकृति भी मिली है। 

● पशुओं के अवशेष देखने से स्पष्ट होता है कि कालीबंगा में उस युग में कूबड़ वाला बैल, भैंस, सूअर, बारहसिंघा, हाथी, ऊँट व गट ने पाले जाते थे। 

● जंगली पशुओं में गैण्डा व चीतल पशु की अस्थियां मिली है। परन्तु कूबड़ वाले बैल की हड्डियां अधिक मिली हैं। इससे स्पष्ट है कि बैल उस समय अति उपयोगी पशु बन गया था।

● ऊँट की हड्डियां व हिरण के सींग भी उत्खनन में प्राप्त हुए हैं जिन्हें पुराविदों ने अत्यन्त उपयोगी बताया है।

● लिपि खुदाई से प्राप्त मिट्टी के भाण्डों तथा मुहरों पर जो लिपि अंकित है, वह सिन्धु लिपि से मिलती-जुलती है। 

● यह लिपि दाई ओर से बाईं ओर को लिखी गई प्रतीत होती है। यह लिपि अभी पढ़ी नहीं जा सकी है। 

● इसके पढ़ने में एक कठिनाई यह है कि लिपि के अक्षर एक दूसरे के ऊपर खुदे हुए प्रतीत होते हैं।


मृतक संस्कार विधि :- 

● कालीबंगा के दुर्ग से 300 मीटर दूर मिले कब्रिस्तान से यहां के निवासियों की शवाधान पद्धतियों की जानकारी मिलती है। 

यहां तीन प्रकार की शवाधन पद्धतियां प्रचलित थी :- 

1. आयताकार या अण्डाकार कब्रों में शव को सीधा लिटा देना

2. वृत्ताकार गर्गों में शवाधान

3. आयताकार या अण्डाकार गर्तों में मृद्भाण्ड निक्षेप ।

● प्रथम प्रकार की कब्र में शव के सिर को उत्तर दिशा में रखकर सीधा लिटाया जाता था और उसके पास मिट्टी के पात्र आदि रखे जाते थे।

● एक कब्र में तांबे का दर्पण भी मिला है। 

द्वितीय प्रकार की गोल एक कलश और उसके चतुर्दिक 4 से लेकर 29 तक मृद्भाण्ड रखे जाते थे। 

● कुछ कब्रों में मनके, शंख, वलय तथा पत्थर की वस्तुएं भी मिली है। 

● तृतीय प्रकार की कब्रों की दीर्घ अक्ष उत्तर दक्षिण की ओर है तथा इनमें भी द्वितीय प्रकार की कब्रों की भांति मृद्भाण्ड व अन्य सामग्री मिली है। 

● किन्तु द्वितीय व तृतीय प्रकार की क़ब्रे शव रहित है। सम्भवतः प्रतीकात्मक शवाधान की प्रतीक है। 


सभ्यता का ह्रास :- 

● लगभग 1800 ई. पू के आस-पास कालीबंगा की सभ्यता का ह्रास हो गया। 

सिधु सभ्यता के अन्य केन्द्रों की भांति कालीबंगा की सभ्यता के अन्त का प्रश्न भी अनुमानों पर आधृत है। 

● किन्तु प्राप्त साक्ष्यों से यह निश्चित है कि इसका अन्त बाह्य आक्रमणों या जल प्लावन (बाढ) आदि से नहीं हुआ क्योंकि कालीबंगा में सभ्यता के अवशेषों के ऊपर किसी अन्य संस्कृति के अवशेष नहीं मिले है ।

● स्पष्ट है इसके पश्चात् यह स्थान हमेशा के लिए निर्जन हो गया। 

● कालीबंगा की सभ्यता के अन्त के सम्बन्ध में विद्वानों का अनुमान है कि कालीबंगा की सभ्यता के ह्रास का प्रमुख कारण जलवायु तथा नदियों के मार्ग का परिवर्तन होना था।

● कतिपय विद्वानों का मत है कि कालान्तर में उत्तर-पश्चिमी भारत की जलवायु शुष्क हो गई, जो समुद्री हवायें पहले इस ओर आर्द्रता (नमी) लाती थी और वर्षा का कारण बनती थी, वे ही हवाएं अब सूखी चलने लगी और कालान्तर में यह भू–भाग रेत का समुद्र बन गया। 

● बीरबल साहनी, पुरा वनस्पति संस्थान के श्री गुरुदीप सिंह ने भी इस क्षेत्र के पराग परीक्षणों के आधार पर यह मत व्यक्त किया है कि लगभग 1800 ईसवी पूर्व में राजस्थान में शताब्दियों से व्याप्त आर्द्रता और हरियाली समाप्त हो कर शुष्क जलवायु आरम्भ हो गई। इनका मत है कि यह जलवायु परिवर्तन ही कालीबंगा सहित उत्तर पश्चिमी भारत में सिंधु सभ्यता के ह्रास के लिए मुख्य रूप से उत्तरदाई था । 

● कार्बन - 14 से भी कालीबंगा के अन्त की तिथि भी लगभग यही निश्चित होती है।

सभ्यताओं की पोषिका नदियों का मार्ग परिवर्तन भी सभ्यताओं के पतन का मुख्य कारण रहा है। 

● सिन्धु सभ्यता के अनेक केन्द्र भी इसकी अपवाद नहीं है। 

● कालीबंगा के सर्वेक्षण के आधार पर पुरातत्ववेत्ता डेल्स का मत है कि 1750 ई. पू. के आसपास घघर और उसकी सहायक नदियां के दिशा परिवर्तन और उनका गंगा ओर उसकी सहायक नदियों में मिलना, कालीबंगा सभ्यता के अन्त का मुख्य कारण था। 

● सम्भवतः नदियों के दिशा परिवर्तन के कारण इस क्षेत्र में पीने और सिंचाई के लिये जल का अभाव हो गया होगा। 

● इस सम्बन्ध में डॉ गोपीनाथ ने लिखा है कि "ज्यों-ज्यों यहां की नदियों का पानी सूखता गया और अन्य सहायक नदियों के बहाव के मार्ग दूसरी ओर मुड़ते गये और धीरे-धीरे वर्षा की कमी आती गयी तो इस स्थान का कृषि कार्य नष्ट होता गया। सूखे के कारण जंगल नष्ट हो गये और हरियाली भी चराई से कम होती गयी। मरूस्थल की बढ़ोतरी के कारण पीने के पानी की भी कमी होती गयी। सम्भवतः यहां के लोग देश के अन्य भागों में जाकर बस गये।


आहड़ सभ्यता (उदयपुर) :- 

उदयपुर शहर के पास बहने वाली आहड़ नदी (आयड़ नदी) के तट पर बसे आहड़ के उत्खनन के फलस्वरूप चार हजार वर्ष पुरानी पाषाण धातु युगीन सभ्यता के अवशेष सामने आए। 

●  इस सभ्यता का काल 2100 से 1500 ईसवी पूर्व माना जाता है। डॉक्टर गोपीनाथ शर्मा ने आहड़ सभ्यता का काल 1900 से 1200 ईसवी पूर्व माना है।

आहड़ का प्राचीन नाम क्या है?

आहड़ का प्राचीन नाम धूलकोट है। 

● यह सभ्यता एक टीले के नीचे दबी हुई प्राप्त हुई थी जिसे धूलकोट (धूल यानि मिट्टी का टीला) कहते हैं। 

बैराठ सभ्यता की खोज कब हुई?

● सर्वप्रथम 1953 में यहाँ अक्षयकीर्ति व्यास एवं उसके बाद रतन चन्द्र अग्रवाल (1956) एवं एच.डी. साँकलियां (1961) के निर्देशन में उत्खनन कार्य करवाया गया।

● इस सभ्यता के लोग मकान बनाने में धूप में सुखाई गई ईटों एवं पत्थरों का प्रयोग करते थे। 

आहड़ के लोग अपने मृतकों को गहनों व आभूषणों के साथ दफनाते थे, जो इनके मृत्यु के बाद भी जीवन की अवधारणा का समर्थक होने का प्रमाण है। 

● उत्खनन में मिट्टी के बर्तन सर्वाधिक मिले हैं, जो आहड़ को लाल-काले मिट्टी के बर्तन वाली संस्कृति का प्रमुख केन्द्र सिद्ध करते हैं। 

आहड़ का दूसरा नाम ताम्रवती नगरी भी मिलता है जो यहाँ ताँबे के औजारों एवं उपकरणों के अत्यधिक प्रयोग के कारण रखा गया होगा। 

● उत्खनन से प्राप्त ठप्पों से यहाँ रंगाई-छपाई व्यवसाय के उन्नत होने का अनुमान भी लगाया जाता है। 

डॉ. गोपीनाथ शर्मा की मान्यता है कि यहां प्रस्तर युगीन मानव रहता था। 

● यह सभ्यता चार हजार वर्ष पुरानी मानी जाती है।


आहड़ की सभ्यता के स्रोत :-

● इस सभ्यता के निम्न प्रमुख स्रोत हैं :- 

1. मृद भाण्ड, 

2. भग्नावशेष

3. प्रस्तर के उपकरण

4. तांबे से निर्मित शस्त्र तथा अन्य उपकरण

5. कीमती पत्थरों से निर्मित मणियां तथा 

6. अस्थियां


आहड़ की खोज तथा उसका उत्खनन :- 

● स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद आर.सी. अग्रवाल राजस्थान पुरातत्व विभाग के निदेशक हुए।

● उन्होंने 1954-55 में यहां पर खुदाई का कार्य आरम्भ करवाया। 

● खुदाई से यह प्रमाणित हो गया कि आहाड़ में पूर्व दूसरी सहस्राब्दी में एक ऐसी सभ्यता विकसित थी, जो न हड़प्पा सभ्यत जैसी थी और न ही राजस्थान, मध्य प्रदेश तथा महाराष्ट्र की समकालीन ताम्र-पाषाणीय सभ्यताओं की जैसी थी और न ही राजस्थान, मध्यप्रदेश तथा महाराष्ट्र समकालीन ताम्र-पाषाणीय सभ्यताओं की जैसी थी अपितु यह एक विशिष्ठ प्रकार की सभ्यता थी जिसे 'ताम्र सभ्यता' कहा जा सकता है। 

● इस सभ्यता को ताम्र युगीन कहने का मुख्य कारण यह है यहाँ से उत्खनन में तांबे के औजार तथा आभूषण पर्याप्त मात्रा में मिले हैं।


आहड़ की भौगोलिक स्थिति :-

● आहाड अरावली पर्वत की दक्षिणी पूर्वी ढाल पर स्थिति है। 

● मेवाड़ के इस प्रदेश को प्राचीन काल में 'मेदपाटक' कहा जाता था। 

● डॉ. गोपी नाथ शर्मा ने इसका 10-11वीं शताब्दी का नाम आधारपुर या आधार दुर्ग बताया है। 

● बोलचाल की भाषा में उन्होंने इसे धूल कोट भी कहा है।

● धूलकोट प्राचीन नगरी के अवशेषों को आवृत किये हुए हैं। 

● धूल कोट का अर्थ धूल का टीला बताया गया है। 

● आहड़ सभ्यता के प्राचीन अवशेषों को इस महान् धूल ने ही अपने आंचल में छुपा लिया ऐसा लगता है।

● उत्खनन से प्राप्त 8 स्तरों से ज्ञात होता है कि लगभग 2000 ई.पू. से 1800 ई. तक के लगभग 4000 वर्षों में यह बस्ती लगभग 8 बार बनी और उजड़ी । पुरानी बस्ती के अवशेष को प्रधानतः दो कालखण्डों में बांटा गया है :-

(1) प्रागैतिहासिक युग

(2) ऐतिहासिक युग

● कार्बन-14 विधि के अनुसार आहड़ सभ्यता का प्रागैतिहासिक युग 2000 ई पूर्व से 1200 ई. पू. तक रहा। 

● इसके पश्चात् यह स्थान कुछ समय तक वीरान रहा। 

● तदनन्तर ऐतिहासिक युग में मौर्यकाल से 18वीं शताब्दी ई. तक यहां अविच्छन्न से एक के बाद एक बस्तियां बसती रही। 

● किन्तु आहड़ की सभ्यता की विशिष्टता उसके प्रागैतिहासिक है।


आहड़ के प्रागैतिहासिक युग की सभ्यता और संस्कृति की प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार है :-


निवास स्थान :-

● आहड़ की खुदाई में कई घरों की स्थिति का पता चलता है। 

● सबसे प्रथम बस्ती नदी के ऊपर के भाग की भूमि पर बसी थी जिस पर उत्तरोत्तर बस्तियां बनती चली गई। 

● यहां मुलायम काले पत्थरों से मकान बनाये गये थे। ये मकान छोटे व बड़े बने थे। नदी के तट से लाई गई मिट्टी से मकानों को बनाया जाता था। यह मकान छोटे-बड़े बने थे। 

● नदी के तट से लाई गई मिट्टी से मकानों को बनाया जाता था। 

● यहां बड़े कमरों की लम्बाई चौड़ाई 33 x 20 फीट तक देखी गई है। 

● इनकी छतें बांवों से ढकी जाती था। 

● कुछ मकानों में 2 या 3 चूल्हें ओर एक मकान में तो 6 तक चूल्हों की संख्या देखी गई।

● इससे अनुमानित है कि आहाड़ में बड़े परिवारों में भोजन की व्यवस्था थी या संभवतः सार्वजनिक भोजन बनाने की भी व्यवस्था यहां की जाती थी। 

● यहां कुछ अनाज खाने के बड़े भाण्ड भी गढ़े हुए मिले है जिन्हें स्थानीय भाषा में 'गोरे' व 'कोठे' कहा जाता है। 

● इस व्यवस्था से प्राचीन आहड की समृद्धि प्रमाणित होती है।


मृदभाण्ड एवं बर्तन :-

● आहड़ की खुदाई में हड़प्पा व मोहनजोदड़ों के विशिष्ट आकृति वाले कुछ मृदभाण्ड भी मिले हैं, जिनसे ज्ञात होता है कि आज से लगभग तीन-चार हजार वर्ष पूर्व अर्थात् सिन्धु सभ्यता के अन्तिम चरण में सिन्धु सभ्यता का मेवाड़ में प्रवेश हुआ होगा। 

● यद्यपि यह कहना अत्यन्त कठिन है कि यह सम्पर्क किस दिशा से और किस साधन के द्वारा सम्पन्न हुआ। 

● उत्खनन से प्राप्त सामग्री में सबसे अधिक संख्या मृदभाण्डों की है। 

● यहां से प्राप्त लाल-काले रंग के बर्तनों से पता चलता है कि आहड़ लाल-काले मृदभाण्ड वाली संस्कृति का एक प्रमुख केन्द्र था। 

● लाल-काले धरातल वाले चमकीले पात्र, अन्दर से सम्पूर्ण काले रंग के एवं बाहर से ऊपर की ओर गर्दन तक काले और उसके नीचे सम्पूर्ण लाल रंग के है। 

ऐसे पात्र तीन प्रकार के हैं :- 

प्रथम -  सादे, जिन पर किसी प्रकार की डिजाइन नहीं है।

दूसरे - जिन पर अन्दर व बाहर की ओर हल्की डिजाइनें बनी है।

तीसरे - इस प्रकार में बाहर की ओर गर्दन पर सफेद रंग से कई प्रकार की लाइनें व बिन्दु बने हुए हैं। 

● इन बर्तनों में दैनिक उपयोग में आने वाले बर्तन सभी आकार के मिलते हैं, जिनमें घड़े, कटोरियां, रका प्याले, मटके, भण्डार के कलश, ढक्कन आदि मुख्य है। 

● साधारणतः मिट्टी के बर्तनों को हाथ से बनाया जाता था, परन्तु इनको बनाने में चाक का प्रयोग भी किया जाता था। 

● इस सम्बन्ध में डॉ. गोपीनाथ शर्मा ने लिखा है कि, “यह सामग्री अपनी विविधता तथा प्रचुरता के विचार से बड़े महत्त्व की है। 

● आहड़ का कुम्भकार इस बात में निपुण दिखाई देता है कि बिना चित्रांकन के भी मिट्टी के बर्तन सुन्दर बना सकता था। 

● काटकर, छीलकर तथा उभारकर इन बर्तनों को आकर्षक बनाय जाता था और ऊपरी भागों पर पतली भीतर गढ़ी हुई रेखा बना दी जाती थी जिससे भाण्ड में एक स्वाभाविक अलंकरण उत्पन्न हो जाता था।

● यद्यपि खुदाई में किसी प्रकार का धान उपलब्ध नहीं हुआ है, किन्तु बर्तनों पर भूसे व धान के चिह्नों से सम्भव है कि पुरातत्त्ववेत्ता भविष्य में उस धान की किस्म का भी पता लगा लेंगे जिनका उपयोग आहड़वासी करते थे। 

● अनाज रखने के बड़े मृदभाण्ड भी गढ़े हुए मिले हैं, जिन्हें यहां की बोलचाल की भाषा में 'गोरे व कोठ' कहा है। 

● यहां से प्राप्त बर्तनों से पता चलता है कि यहां बर्तन बनाने का व्यवसाय काफी विकसित हो चुका था और इससे आहड़ की समृद्धि का भी पता चलता है। 

● यहां से प्राप्त हुए विभिन्न प्रकार के बर्तनों से इस बात का संकेत मिलता है की  2000 ईसवी पूर्व से -1000 ईसवी पूर्व के काल में आहड़वासियों का ईरान से भी सम्बन्ध था।


मुद्राएं व मुहरे :- 

● आहड़ के द्वितीय काल की खुदाई से 6 तांबे की मुद्राएं और तीन मुहरे प्राप्त हुई है। 

● इनमें कुछ मुद्राएं अस्पष्ट है। 

● एक मुद्रा में त्रिशुल खुदा हुआ दिखाई देता है और दूसरी में खड़ा हुआ अपोलो है जिसके हाथों में तीर व पीछे तरकस है। 

● इस मुद्रा के किनारे यूनानी भाषा में कुछ लिखा हुआ है जिससे इसका काल दूसरी सदी ईसा पूर्व आंका जाता है। 

● यहां से मिलने वाली तीन मुहरों पर विहिवम विस', 'पलितसा तथा तातीय तोम सन' अंकित है जिनका अर्थ स्पष्ट तो नहीं है परन्तु लिपि से यह किया जाता है कि ये सामग्री आहड़ की तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से प्रथम सदी ईसा की स्थिति पर प्रकाश डालने सहायक है।


मिट्टी के अन्य उपकरण :- 

● मिट्टी से निर्मेत अनेक प्रकार के भाण्डों व दैनिक जीवनोपयोगी अन्य कई उपकरणों का हम वर्णन कर चुके हैं। इनके अलावा भी आहड़ में मिट्टी से अन्य वस्तुएं बनाई जाती थी जो कि आहड़ तथा गिलूण्ड की तत्कालीन विकसित सभ्यता का अच्छा परिचय दे रही हैं।


पूजा थाली :-

● पूजा की थाली का मिलना भी अपने आप में एक विशेषता रखता है। 

● यह थाली इस बात की द्योतक है आज से 4000 वर्ष पूर्व भी राजस्थान के लोग अपने इष्ट देव की उपासना करते थे। 

● थाली गोल व चौकोर दोनों प्रकार की होती थी। उनके बीच में दीपक रखने के लिए स्थान बने होते थे। 

● दीपक रखने के खानों के अलावा पूजा की थालियों में नाग-नागिन व देवता भी मिट्टी के बने मिले है। 

● पुराविदों की धारणा है कि इन थालियों को स्त्रियां जगमगाते दीपों से सजा कर नदी किनारे जाती थीं और वहां अपने इष्ट देवों की उपासना करती थी। 

● उपासना के उपरान्त इन्हें नदी के जल में प्रवाहित कर देती थीं। 

● यह प्रथा हम आज तक हमारे देश में पाते हैं। प्राप्त थालियां भी दोनों कालों का प्रतिनिधित्व करने वाली मिली है।

धातु गलाने के यन्त्र :- 

● धातुओं का गलाना प्राचीन काल में एक आसान कार्य नहीं था। 

● उस युग तो शक्ति के रूप में कोयले तक का प्रयोग आरम्भ नहीं हुआ था। परन्तु आहड़ के निवासी आज से चार हजार वर्ष पूर्व तांबे को गला लिया करते थे और उससे विभिन्न उपकरण बना लिया करते थे। 

● आहड़ के प्रथम काल के ही दो ऐसे यन्त्र प्राप्त हुए हैं जो आकार में लम्बे तथा खोखले हैं। सम्भवतः इन्हें तांबा गलाने में प्रयुक्त किया जाता था।

खिलौने :-

● आहड़ की खुदाई में सैन्धव सभ्यता के सदृश्य मिट्टी के खिलौने भी उपलब्ध हुए हैं। 

मिट्टी के बैल, हाथी तथा घोड़े यहां उत्खनन में मिले हैं। 

● अश्व की कोई मूर्ति आहड़ में नहीं मिली है।

बैलों की मूर्तियां सीधी सादी हैं। केवल उनके सींग व कूबड़ से ही उन्हें पहिचाना जा सकता है।

दीपक एवं गोलियां :-

● आहड़ में मिट्टी के 6 दीपक भी मिले है। पुराविदों के अनुसार वे प्रथम काल के है।

आहड़ में 54 गोलियां प्राप्त हुई हैं। इनमें 44 प्रथम काल की हैं तथा शेष द्वितीय काल की है।

मानवकृतियां :- 

● अब तक आहड़ के उत्खनन में चार मूर्तियां मिली हैं। उनमें दो तो स्पष्ट रूप से नारी-मूर्तियां है और एक मूर्ति पुरुष की है। चौथी मूर्ति अभी तक संदिग्ध बनी हुई है। 

● नारी मूर्तियों के सिर तो गायब है परन्तु उनकी वेश-भूषा से स्पष्ट होता है कि वे नारियां हैं। उन्हें लहंगा पहने दिखाया गया है तथा उनकी कमर में मनकों की करधनी भी लटकती बताई गई है। 

● उरोजों के मध्य लटकती दो शृंखलाओं की एक लम्बी माला भी पहनाई गई है, जो उनकी नाभि के नीचे तक लटक रही है। 


पहिये :-

● आहड़ सभ्यता के प्रथम काल में जो खुदाई की गई - उसमें 3 पहिये उपलब्ध हुए हैं। तीनों पहिये आहड़ सभ्यता के प्रथम काल के माने जाते हैं। 

● कालीबंगा की भाति यहां भी माल लाने जाने के लिए बैल गाड़ियों का प्रयोग किया जाता था।


खपरैल :- 

● जैसा कि भवन निर्माण में स्पष्ट कर आये हैं कि की छतें कच्ची होती थी। उन कच्ची छतों के निर्माण में खपरैल का भी प्रयोग किया जाता था। 

● तीन खपरैल प्राप्त हुए हैं। वे आहाड़ सभ्यता के प्रथम काल के माने जाते हैं।


मणियां एवं आभूषण :- 

● आहड़वासी कीमती पत्थरों, जैसे – गोमेद, स्फटिक आदि से गोल मणियां बनाते थे। ऐसी मणियों के साथ काँच, पक्की मिट्टी, सीप और हड्डी के गोलाकार छेद वाले भाग भी लगाये जाते थे।

● इनका उपयोग आभूषण बनाने तथा ताबीज की तरह गले में लटकाने के लिए किया जाता था। इनके ऊपर सजावट और अलंकरण का काम भी किया जाता था। 

● इनका आकार गोल, चपटा, एवं षट्कोणीय होता था।

● आहड़वासियों के आभूषण अधिकांशतः पकी मिट्टी के मणकों के थे, लेकिन कुछ कीमती पत्थरों के भी थे। 

● खुदाई में दो प्रकार के मणके या मणियां प्राप्त हुई हैं।

● प्रथम तो कीमती पत्थरों की ओर दूसरी पकी हुई मिट्टी की। 

● मिट्टी के मणके कुछ तो छोटे आकार के है ओर कुछ बड़े आकार के। उनके बीच में छिद्र हैं और कुछ पर रेखाओं द्वारा डिजाइन भी बनाई गई है। 

● डॉ. एच.डी. सांकलिया की मान्यता है कि जन मणकों पर रेखाएं अंकित हैं, वे मध्य एशिया की सभ्यता के प्रभाव को प्रदर्शित करते हैं।

● पत्थर "बने मणके लाल, गुलाबी, हरे, नीले, काले आदि कई रंगों में पाये गये हैं। इन पर अंकित रेखाओं एवं इनके आकार को देख कर प्रतीत होता है कि कुशल कारीगरों ने ही उन्हें यह रूप दिया होगा। 

● सम्भवतः कीमती पत्थरों के मणकों का प्रयोग यहां के सम्पन्न वर्ग के लोग करते थे। बड़े आकार वाले मिट्टी के मणकों को जानवरों के गले में पहनाया जाता था। 

● कीमती पत्थरों व मिट्टी के के अतिरिक्त इनके आभूषण सीप, मूंगा, बीज आदि के होते थे। 

ये लोग सींग वाले पशु, कुत्ते, मेंढ़क, हाथी, मेंढक, गेंडा तथा मानव आकृति वाले मिट्टी के खिलौने बनाते. मानव आकृतियों में नाक अत्यन्त नुकीली बनाई गई है।

 


कृषि, व्यवसाय एवं रहन-सहन :-

● आहड़ सभ्यता के लोग कृषि से परिचित थे। यहां से मिलने वाले बड़े-बड़े भाण्ड तथा अन्न पीसने के पत्थर से यह प्रमाणित होता है कि ये लोग अन्न का उत्पादन करते थे। 

● एक बड़े कमरे में बड़ी-बड़ी भट्टियां मिली हैं, जिससे पता चलता है कि यहां सामूहिक भोज और दावतें भी हुआ करती थी। 

● इस भाग में वर्षा अधिक होने तथा नदी पास में होने से सिंचाई की पर्याप्त सुविधा यह प्रमाणित करती है कि यहां अन्न प्रभूत मात्रा में पैदा होता रहा होगा।

● खुदाई में यहां कपड़ों आदि पर छपाई करने के ठप्पे में प्राप्त हुए हैं, जिनसे पता चलता है कि यहां रंगाई और छपाई का व्यवसाय भी विकसित हो चुका था। 

● शरीर से मैल छुड़ाने के झाबे से पता चलता है कि आहड़वासी अपने शारीरिक सफाई का बहुत ध्यान रखते थे। 

● खुदाई में तोल के बाट व माप भी मिले हैं, जिनसे यहां व्यापार-वाणिज्य होने का पता चलता है। 

● आहड़ के ऐतिहासिक काल के अन्य उपकरणों में चमड़े के टुकड़े, मिट्टी के पूजा के पात्र, चूड़ियां आदि का भी महत्त्वपूर्ण स्थान है। 

पूजा के पात्र विभिन्न आकार-प्रकार के प्राप्त हुए है। यह सामग्री उस काल के लोगों के रहन-सहन और आचार-विचार पर पर्याप्त प्रकाश डालती है। 

● इनके मृतक संस्कार के सम्बन्ध में कुछ निश्चित नहीं कहा जा सकता, परन्तु ऊपरी सतह पर मिले मनुष्य के अस्थि-पिंजर से यह अनुमान लगाया जाता है कि वे शव को गाड़ते थे।

● मृतकों के शव का मस्तक उत्तर और पांव दक्षिण की ओर रखा जाता था तथा उसके साथ उसके पहनने के आभूषण भी गाड़ दिये जाते थे। 


चावल तथा सिल बट्टा :-

● रसोई घरों के आस-पास खुदाई में सिल बट्टे भी पड़े हुए मिले हैं। ये सिल-बट्टे वर्तमान में काम में आने वाले सिल बट्टों के समान लगते हैं।

● इनका प्रयोग वे गेहूं, ज्वार जैसे अन्न पीसने में करते थे। 

● हाल ही के शोध कार्यों से जानकारी मिली है कि आहड़ सभ्यता के लोग चावल का प्रयोग करते थे। 

● वे चावल की खेती करना जानते थे।


मृतक संस्कार विधि :- 

● प्रागैतिहासिक युग में आहड़वासियों की मृतक संस्कार विधि की निश्चित जानकारी नहीं मिलती। 

● किन्तु परवर्ती काल के अस्थिपंजरों से ज्ञात होता है कि वे अपने मृतकों को गाड़ते थे।

मृतक के पैर दक्षिण में और सिर उत्तर में रखा जाता था तथा उसके साथ आभूषण आदि भी गाड़े जाते थे। सम्भवतः में भी यही विधि प्रचलित रही है।


सभ्यता का विस्तार :-

● किन्हीं प्राकृतिक प्रकोप से विध्वंस हुई इस सभ्यता के लोगों में से कई लोग आहड़ से उत्तर-पूर्व की ओर बढ़े। 

● बी.बी. लाल के निर्देशन में खोदे गये गिलूंड तथा भगवानपुरा से मिलने वाली पुरा–सामग्री इसकी पुष्टि करती है। 

● अब यह भी ज्ञात हो चुका है कि आहाड़ संस्कृति उदयपुर, राजसमन्द, चित्तौड़, भीलवाड़ा, टोंक, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, और कोटा के निकट बहने वाली नदियों के किनारे फली-फूली थी। 


आहड़ सभ्यता का सांस्कृतिक महत्व :-

● आहड़ सभ्यता राजस्थान की अत्यन्त प्राचीन तथा गौरवपूर्ण सभ्यता थी। 

● इस सभ्यता के कारण ही राजस्थान भारत की प्राचीन सभ्यताओं में अपना महत्वपूर्ण स्थान बना सका है वस्तुतः आहाड़ इस युग की ताम्र-पाषाण संस्कृति विशेष का प्रमुख केन्द्र था तथा इसकी सभ्यता और संस्कृति काफी विकसित और उन्नत थी।


बैराठ (जयपुर) :-

● प्राचीन मत्स्य जनपद में स्थित बैराठ (जयपुर) की बीजक पहाड़ी, भीम की डूंगरी व महादेव जी की डूंगरी से हडप्पा सभ्यता व मौर्यकाल के अवशेष प्राप्त हुए। 

● दयाराम साहनी, नील रत्न बनर्जी, कैलाशनाथ दीक्षित जैसे विद्वान इसके उत्खनन से जुड़े हुए थे। 

बैराठ से एक गोल मंदिर व अशोक के स्तम्भ के अवशेष प्राप्त हुए हैं। 

बैराठ के समीप अशोक का भाव अभिलेख प्राप्त हुआ है, जो अशोक के बौद्ध धर्म का अनुयायी होने का सबसे पुख्ता प्रमाण माना जाता है।

बैराट नगर जयपुर नगर से 52 मील की पर जयपुर-अलवर मार्ग पर स्थित है। 

● यह चारों ओर से पर्वतों से घिरा हुआ है। 

● जिस घाटी में बैराट बसा हुआ है वह 5 मील लम्बी तथा 3-4 मील चौड़ी है। 

● पहाड़ियों के अलावा बैराट रेतीले टीलों से भी आवर्त है। 

● उन टीलों में बीजक की पहाड़ी और भीमजी की डूंगरी अति महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुई है।

● उत्खनन कार्य प्रमुख रूप से इन्हीं स्थानों पर हुआ है। 

● बीजक की पहाड़ी 50 कि.मी. दूरी पर गांवड़ी गणेश्वर का स्थान है। 

● वहां काफी संख्या में ताम्बे के उपकरण उपलब्ध हुए हैं। उनके आधार पर ही बैराट को 'ताम्र युगीन सभ्यता का भी प्रमुख केन्द्र माना है। 

● बैराट के उत्तर में 18 कि.मी. की दूरी पर जोधपुर स्थित है। 

● वहां लोह गलाने की भट्टी भी मिली है। इससे स्पष्ट कि यहां 'लोह-युगीन' सभ्यता भी फलीभूत हुई थी। 

● अतः प्राचीन सभ्यताओं की ऐतिहासिकता की दृष्टि से बैराट नगर अति प्राचीन तथा ऐतिहासिक नगर है। 

● परन्तु लिखित साहित्य के अभाव में इसका ऐतिहासिक महत्व विवादों के गर्त में ही समाया हुआ है। 

● स्वतन्त्रता की रश्मियों के प्रस्फुटित होते ही पुराविद् डॉ. सुन्दर राजन, ए.घोष, डॉ. के.एन.दीक्षित की दृष्टि अरावली पर्वत की पहाड़ियों से आर्वत इस बैराट नगर पर पड़ी और उन्होंने इसके अतीत को उजागर किया।

● मौर्य कालीन सभ्यता का यह प्रमुख केन्द्र रहा।

● इसकी पुष्टि वहां प्राप्त अशोक अभिलेख से होती है। 

● बृहत्संहिता के लेखक वराहमिहिर ने जनपदों में मत्स्य जनपद को प्रमुख बताया है। मनुस्मृति में भी इसे प्रमुख जनपद बताया है। 

● यहां के निवासियों को वीर समझते हुए उन्हें सेना में स्थान देना भी उचित बताया है।

● वर्धनकाल में इस जनपद का विखण्डन आरंभ हो गया था।


उपलब्ध पदार्थ :-

● खनिज पदार्थों में यहां तांबा बहुतायत से पाया जाता था जो मुगल काल तक यह काफी मात्रा में मिलता रहा। 

● इसी कारण मुगल सम्राटों ने यहां टकसाल बनवाई थी। 

● यहीं तांबे के सिक्के ढाले जाते थे। 

● गांवड़ी गणेश्वर, खोदरीबा, अहीरवाला, सुनारी क्षेत्रों में तांबा पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध था।

● खेतड़ी का तो तांबे के खान लिए आज भी भारत में महत्त्वपूर्ण स्थान बना हुआ हैं यहां उत्खनन में 5 हजार से भी अधिक ताम्र-उपकरण उपलब्ध हुए हैं। 

● इसीलिए यहां की सभ्यता को ताम्र-युग में उच्च शिखर पर पहुंची मानते हैं।


शैल प्रस्तर कालीन सभ्यता का प्रमुख केन्द्र :-

● ताम्रयुगीन सभ्यता तो यहां अपने विकास की चरम सीमा पर थी पर इससे पूर्व यहां पाषाण कालीन सभ्यता भी फलीभूत हो चुकी थी।

● इसलिए बैराट को पुरातात्विक दृष्टि से भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण समझा जाता है। 

● आदि मानव की शैल-सभ्यता के यहां अवशेष मिले है ओर वे अवशेष ही यहां की सभ्यता को हजारों वर्ष पुरानी सिद्ध करते हैं।

● स्वयं विराट नगर की पर्वतमालाओं में जो शैल चित्र मिले हैं वे 1,50, 000 से 4000 वर्ष ई.पू. पुराने बताये जाते हैं।

 


बैराठ सभ्यता की विशेषताएं :-

भवन :-

● भवन उत्खनन में बैराठ से प्राप्त भवन मिट्टी की पकाई गई ईंटों से बने हैं।

● विचित्र और अस्पष्ट तथ्य है कि पर्वतीय प्रदेश होने व पत्थरों की प्रचुरता के उपरान्त भी यहां के निवासियों ने भवन निर्माण में ईंटों का प्रयोग क्यों किया? 

● भवन निर्माण में प्रयुक्त ईंटों का माप और बनावट, सिन्धु सभ्यता से प्राप्त ईंटों के समान 20 X 10.5 X 3" और 21x31x 3" हैं। 

फर्श में 26" माप की वर्गाकार टाइलें प्रयुक्त की गई है। 

● उत्खनन से प्राप्त एक भवन में 7-8 कमरे बने है जिसकी मुख्य दीवार की चौड़ाई 20" है।

विद्वानों की मान्यता है कि सम्भवतः यह कोई बौद्ध मठ रहा होगा। 

● इसके अतिरिक्त उत्खनन में गोदामों और चबूतरों के अवशेष भी मिले हैं। 


मुद्राएं :- 

● बैराठ के एक बौद्ध मठ से चांदी की 36 मुद्राएं मिली है ' 8 पंचमार्क मुद्राएं है और 28 हिन्द-यूनानी शासकों की है। 

● बैराठ में मिले टकसाल के अवशेषों से ज्ञात होता है कि शायद यह स्थल पंचमार्क मुद्रा निर्माण का प्रमुख केन्द्र था। 

● यूनानी मुद्राओं के आधार पर कुछ विद्वानों की मान्यता है कि किसी समय यह क्षेत्र यूनानी शासकों के प्रभाव में था। 

● किन्तु चूंकि साहित्यनुसार प्राचीनकाल में बैराठ एक प्रसिद्ध व्यापारिक केन्द्र था। 

● अतः कुछ विद्वान इस मुद्राओं को व्यापारियों द्वारा लाई हुई मानते हैं। 

● ये मुद्राएं सूती कपड़े में बंधी हुई थी ज्ञात होता है कि इस काल में हमारे पूर्वज कपास की खेती और इससे कपड़ा बनाने में निपुण हो चुके थे।


मृद्भाण्ड :-

● बैराठ से मिले मृद्भाण्ड लौह के पश्चात् की स्लेटी रंग के चित्रित और काली पॉलिशयुक्त मद्भाण्ड संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हैं। 

● स्लेटी रंग मृद्भाण्ड के संस्कृति को विद्वान् बैराठ, आर्यों की आदि संस्कृति के रूप में स्वीकार करते हैं। 

● बैराठ में मुदभाण्डों में विभिन्न आकार-प्रकार के घडों की प्रचुरता है जो त्रिरत्न, स्वास्तिक आदि चिह्नों से अलंकृत है। 

● मृद्भाण्डों के अतिरिक्त वहां से मिट्टी के बने पूजापात्र, थालियां, कटोरे, लोटे, चुण्डियां आदि भी मिले हैं। 

● बैराठ में तांबे और लोहे की सामग्री तो मिली, किन्तु इन धातुओं की वस्तुएं बनाने के औजार अवश्य मिले हैं। 


अशोक स्तम्भ :-

● बीजक की पहाड़ी पर चुनार पत्थर के कुछ सादा और पालिशदार टुकड़े बिखरे पड़े हैं। 

● इन पत्थरों पर उत्कीर्ण मौर्यकालीन सिंह आकृति के भागों के आधार पर विद्वानों का अनुमान है कि ये टुकड़े अशोक स्तम्भों के है।  संभवत वे स्तम्भ बौद्धगठ के की ओर स्थित थे। किन्तु स्तम्भो की संख्या के संबंध में मतभेद है। 

कुछ विद्वानों का मत है कि यहां एक स्तम्भ था जबकि डॉ. सत्यप्रकाश इनकी संख्या दो बताते हैं। 

● इन स्तम्भों के ध्वंस के बारे में विद्वानों का मत है कि मुसलमानों के आगमन के काफी पहले ही सम्भवः 510-540 ई. में मध्य मिहिरकुल के आक्रमणों के समय ये स्तम्भ ध्वस्त कर दिये ।


मन्दिर :- 

● बौद्ध मठों के पास ही एक गोल मन्दिर के भी अवशेष मिले हैं। 

● डॉ. गोपीनाथ शर्मा का कहना है कि उस मन्दिर का निर्माता भी सम्राट अशोक ही था जबकि मन्दिर की वास्तुकला को डॉ. दशरथ शर्मा भारतीय वास्तुकला साम्यता रखती बताते हैं।

● इसके अलावा जो बौद्ध-मठ प्राप्त हुए हैं वे भी हीनयान सम्प्रदाय के ही प्रतीत होते उस समय महायान सम्प्रदाय तो प्रचलित नहीं हुआ था।

● इसके अतिरिक्त यहां उत्खनन में बौद्ध-प्रतिमायें भी नहीं मिली है। 

● महायान के प्रचलन के उपरान्त ही महात्मा बुद्ध को विष्णु का अवतार भी मान लिया गया था तथा महात्मा बुद्ध व बोधिसत्वों की पूजा हाने लगी थी। 

● अतः देवालय के प्राप्त अवशेषों से भी विभिन्न अनुमान लगाये जाते हैं। 

● मन्दिर के द्वार काष्ठ निर्मित है तथा इसकी फर्श ईंटों से निर्मित है। 

● लकड़ी के किवाड़ों को सुदृढ़ता प्रदान करने हेतु उनमें कीलों का प्रयोग किया गया है। 

मन्दिर में धूपदानी व पूजा के अन्य पात्र भी मिले हैं, ये सब मिट्टी के ही हैं। 

● इनके अलावा मन्दिर में ही मृण्मय पक्षी की मूर्तियां व खप्पर आदि मिले हैं। 

● मन्दिर की बाहर की दीवर भी ईंटों से ही निर्मित है तथा मन्दिर के चारों तरफ 7 फीट चौड़ी गैलरी भी है। 

● प्रवेश द्वारा पूर्व दिशा में है और वह द्वार 6 फीट चौड़ा है।


अन्य वस्तुएं :- 

● इन मुद्राओं के अतिरिक्त मठ की इमारत से अन्य कई वस्तुएं भी उपलब्ध हुई है। जिस कपड़े में मुद्राएं बंधी हुई थी वह कपड़ा रूई का था जिसे हाथ से बुना गया था। 

● मृद्भाण्डों से अलंकृत घड़े, जिन पर स्वस्तिक तथा त्रिरत्नचक्र के चिह बने हुए थे, बड़े रोचक दिखाई देते हैं। 

● मिट्टी की वस्तुओं में दीपक, नाचती हुई पक्षी, खप्पर, थालियां, कुंडियां, मटके, लोटे, कटोरे, घड़े आदि यहां उपलब्ध हुए है। 

● कुछ पत्थर की थालियां तथा छोटी सन्दूकें भी यहां मिली हैं। 

● लोह व ताम्बे की वस्तुओं के बनाने के औजार भी यहां की उपलब्धियों में सम्मिलित है। 

● ये वस्तुएं 250 ई. पू. से 50 ईसवी तक के काल की निर्धारित की जाती है।

 


गिलूण्ड सभ्यता (राजसंमद) :-

राजसमन्द जिले में स्थित गिलूण्ड कस्बे में बनास नदी के तट पर दो टीलों के उत्खनन के फलस्वरूप आहड़ संस्कृति से जुड़ी यह सभ्यता प्रकाश में आई जिसे बनास संस्कृति के नाम से भी पुकारा जाता है। 

1957-58 ई. में बी.बी. लाल के निर्देशन में यहाँ उत्खनन किया गया।

● तत्पश्चात् 1998 से 2003 ई. के मध्य पूना के डॉ. वी.एस. शिन्दे एवं पेन्सिलवेनिया विश्वविद्यालय (अमेरिका) के प्रो. ग्रेगरी पोशल के निर्देशन में यहाँ उत्खनन किया गया। 

● उत्खनन से ताम्रयुगीन सभ्यता के अवशेष मिले हैं, जिसका समय 1900-1700 ई.पू. निर्धारित किया गया है।

गिलूण्ड से पाँच प्रकार के मिट्टी के बर्तन मिले हैं- सादे, काले, पालिशदार, भूरे, लाल और काले चित्रित मृदभांड। 

● उत्खनन में मिट्टी के खिलौने, पत्थर की गोलियाँ एवं हाथी दाँत की चूडियों के अवशेष मिले हैं। 

● आहड़ में पक्की ईटों (आग में पकाई हुई ईंटे) का उपयोग नहीं हुआ है, जबकि गिलूण्ड में इनका प्रचुर उपयोग होता था। 

बागोर सभ्यता (भीलवाड़ा) :- 

भीलवाड़ा जिले में स्थित बागोर में कोठारी नदी तट पर डॉ. वी. एन. मिश्र के निर्देशन में 1967 से 1970 ई. तक उत्खनन कार्य किया गया। 

● उत्खनन के दौरान यहाँ प्रागैतिहासिक काल की सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुए हैं जो चार से पाँच हजार ईसा पूर्व के माने जाते हैं। 

● यहाँ से बड़ी संख्या में लघु पाषाण उपकरण मिले हैं, जो इस सभ्यता के निवासियों के आखेटक होने को प्रमाणित करते हैं।

बागोर से तांबे के उपकरण प्राप्त हुए हैं, जिनमें छेद वाली सुई सबसे महत्वपूर्ण है। यहाँ से कृषि व पशुपालन के प्राचीनतम साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। 

● बागोर मध्य पाषाण कालीन सभ्यता का स्थल और लघु पाषाण उपकरण का प्रमुख केन्द्र था। 

गणेश्वर सभ्यता (सीकर) :- 

गणेश्वर (नीम का थाना, सीकर) कांतली नदी के उद्गम पर स्थित ताम्रयुगीन संस्कृति का महत्त्वपूर्ण स्थल है। 

गणेश्वर सभ्यता की खोज कब हुई?

● इसकी खोज / खुदाई 1967 से 1971 ईस्वी के मध्य श्री वीरेंद्रनाथ मिश्र के द्वारा की गई थी।

रतनचन्द्र अग्रवाल के निर्देशन में हुए उत्खनन से यहाँ 2800 ईसा पूर्व की सभ्यता के अवशेष मिले हैं। 

● गणेश्वर से अत्यधिक मात्रा में तांबे के आयुध व उपकरण मिले हैं जो इसे ताम्रयुगीन सभ्यताओं में प्राचीनतम सिद्ध करती हैं। 

● यहाँ से प्राप्त तांबे के उपकरणों व पात्रों में 99 प्रतिशत तांबा है, जो इस क्षेत्र में तांबे की प्रचुर प्राप्ति का प्रमाण है। 

●  यहां से पाषाणकालीन पत्थरों के औजारों का विशाल भंडार मिला है जो भारत में पाषाणकालीन औजारों का सबसे बड़ा भंडार है

● बागोर से जली हुई हडिड्यां , 5 नर कंकाल और मांस को भुने जाने के साक्ष्य मिले हैं।

● यहाँ से जो मिट्टी के बर्तन प्राप्त हुए है, उन्हें कृपषवर्णी मृदपात्र कहते है, यह बर्तन काले व नीले रंग से सजाये हुऐ हैं। गणेश्वर भारत की ताम्र सभ्यताओं की जननी माना जाता है। 

● यहाँ से तांबा हडप्पामोहनजोदड़ो को भी भेजा जाता था। 

भीनमाल (जालोर) :-

भीनमाल (जालोर) की सभ्यता भी एक महत्त्वपूर्ण सभ्यता है, जिसका उत्खनन आर.सी. अग्रवाल ने करवाया था। 

● यहाँ से एक रोमन ऐम्फोरा (सुरापात्र) व एक यूनानी सुराही मिली है, जो इसके विदेशी व्यापार का केन्द्र होने की पुष्टि करता है। 

भीनमाल का प्राचीन नाम श्रीमाल था।

ईसवाल (उदयपुर) :- 

● इसी प्रकार ईसवाल (उदयपुर) से प्राक् ऐतिहासिक कालीन सभ्यता के प्रमाण मिले हैं। यहाँ से समृद्ध लौह उद्योग के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।

● यहां से 2000 वर्ष तक निरंतर लोहा गलाने के प्रमाण मिले हैं।

●  उत्खनन में यहां से सिक्के प्राप्त हुए हैं जिन्हें आरंभिक कुषाण काल का माना जाता है।

●  उत्खनन में लोहेमल लौह अयस्क भट्टी में प्रयुक्त होने वाले पाइप भी मिले हैं । उत्खनन से प्राप्त अवशेषों से अनुमान लगाया जाता है कि पांचवी शताब्दी ईसा पूर्व के लगभग यहां लोहा गलाने का कार्य प्रारंभ हो गया था। इसके अलावा यहां से उत्खनन में कुछ हड्डियां भी मिली हैं जिनमें ऊँट का दांत महत्वपूर्ण है।

बालाथल (उदयपुर) :-

बालाथल (उदयपुर) में 1993 में प्रो. वी.एन. मिश्र के निर्देशन में हुए उत्खनन से एक ताम्र पाषाणकालीन सभ्यता प्रकाश में आई। 

● यहाँ से उत्खनन में लौहे के औजार व लोहा गलाने की पाँच भट्टियाँ तथा 12 कमरों वाले भवन के अवशेष भी प्राप्त हुये हैं।

● यहाँ से तांबें के विभिन्न उपकरण और तांबे के सिक्के भी मिले हैं जिन पर हाथी और चंद्रमा की आकृतियां उत्कीर्ण हैं।

● यहाँ के लोगों का जीवन क़ृषि, पशुपालन और मछली पकड़ने पर निर्भर था।

● इस सभ्यता का सम्पर्क हड़प्पा सभ्यता से होने का पुख्ता प्रमाण प्राप्त होता है। क्योंकि उत्खनन में यहाँ से प्राप्त मृदभांड हड़प्पा संस्कृति से समानता रखते हैं।

● यहाँ से खुदाई में हाथ से बुने हुए कपड़े का टुकड़ा मिला है , जिसे लगभग 500 ई. पु. का है।

 


नगर (टोंक) :- 

● नगर सभ्यता को 'खेड़ा सभ्यता' भी कहा जाता है। यह मालव जनपद का प्रमुख स्थान था। खुदाई में 6000 ताँबे के सिक्के मिले

हैं, जो मालव जनपद के हैं।

● नगर से शुंगकालीन स्लेटी पत्थर से बनी महिषासुर मर्दिनी की प्रतिमा, कुषाणकालीन रति-कामदेव की मूर्ति, पत्थर पर मोदक रूप

में गणेश का अंकन, देवी दुर्गा का अंकन, फनधारी नाग का अंकन, कमल धारण किए हुए लक्ष्मी की खड़ी प्रतिमा मिली है।


रंगमहल (हनुमानगढ़) :- 

हनुमानगढ़ जिले में घग्घर नदी के तट पर स्थित रंगमहल की खुदाई 1952 ई. में स्वीडन की पुरातत्वविद् डॉ. हन्नारिड के निर्देशन में

हुआ था।

● यहाँ की सभ्यता कुषाणकालीन एवं पूर्व गुप्तकालीन सभ्यता के समान है। रंगमहल से घंटाकार मृत्पात्र, टोंटीदार घड़े, प्याले, कटोरे, बर्तनों के ढक्कन, दीपक, दीपदान, धूपदान आदि प्राप्त हुए

● यहाँ से अनेक मृणमूर्तियाँ मिली हैं, जिनमें गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण का अंकन सर्वप्रमुख है। ये मूर्तियाँ गांधार शैली की हैं। 

● पात्रों पर बनी कलाकृतियों में मानव आकृतियाँ तथा पशु आकृतियाँ चित्रित हैं। 

● यहाँ से बच्चों के खेलने की मिट्टी की छोटी पहियेदार, गाड़ियाँ भी मिली हैं।


नगरी (चित्तौड़गढ़) :-

नगरी राजस्थान में उत्खनित प्रथम स्थल माना जाता है। 


नगरी सभ्यता का उत्खनन कब हुआ ?

● नगरी में उत्खनन 1904 ई. में डी.आर. भण्डारकर द्वारा करवाया गया था।


माध्यमिका किसका प्राचीन नाम था। ?

● नगरी को प्राचीनकाल में 'माध्यमिका' नाम से जाना जाता था। यहाँ से शिवि जनपद के सिक्के प्राप्त हुए हैं।

● नगरी की खुदाई से लेखांकित पाषाण खण्ड, मृण्मय-कलाकृतियाँ और मूर्तिखण्ड तथा गुप्तयुगीन एक मन्दिर, जिसमें शिव की मूर्ति

प्रतिष्ठापित थी, चार चक्राकार कुएं, लाल पॉलिशदार पात्रों के टुकड़े तथा सफेद खड़िया मिट्टी के पात्र मिले हैं।

● यहाँ से पाँचवीं शताब्दी (गुप्तकाल) में निर्मित नटराज शिव की मूर्ति प्राप्त हुई, जो राजस्थान में नटराज मूर्ति के निर्माण का प्राचीनतम साक्ष्य है।

सुनारी (झुंझुनूं) :- 

खेतड़ी तहसील के सुनारी गांव में काँतली नदी के तट पर खुदाई में अयस से लोहा बनाने की भट्टियों के अवशेष प्राप्त हुए हैं। ये भारत की प्राचीनतम भट्टियाँ मानी जाती हैं।

● यहाँ से लोहे के तीर, भाले के अग्रभाग, लोहे का कटोरा तथा कृष्ण परिमार्जित मृद्पात्र भी मिले हैं जो मौर्ययुगीन माने जाते हैं।

● सुनारी के निवासी चावल का प्रयोग करते थे, घोड़ों से रथ खींचते थे तथा साधारण मकानों में रहते थे। 

● यहाँ मातृदेवी की मृणमूर्तियाँऔर धान संग्रहण का कोठा भी मिला है।

नोह (भरतपुर) :- 

भरतपुर जिले में नोह गाँव में 1963-64 ई. में श्री रतनचन्द्र अग्रवाल के निर्देशन में की गई खुदाई में ताम्रयुगीन सभ्यता के अवशेष मिले

हैं। यहाँ उत्खनन में पाँच सांस्कृतिक युगों के अवशेष मिले हैं।

● नोह से कच्ची ईंटों से बना एक परकोटा जो प्रथम शताब्दी ई.पू. का माना जाता है, लाल रंग के साधारण बर्तनों के टुकड़े, मित्र शासकों

के ताँबे के सिक्के, वसुन्धरा तथा कामी-युगल के अंकन वाली कलाकृति आदि वस्तुएँ प्राप्त हुई हैं।

● यहाँ के कुषाण शासक हुविष्क और वासुदेव के सिक्के तथा गंदा पानी एकत्रित करने के लिए बनाये गये चक्रकूप भी मिले हैं।

● प्रस्तर निर्मित विशालकाय (8 फीट ऊँची) यक्ष प्रतिमा (जाख बाबा) जो शुंगकालीन मानी जाती है, नोह से प्राप्त महत्त्वपूर्ण कलाकृति है।

ओझियाना (भीलवाड़ा) :- 

ओझियाना के उत्खनन में प्राप्त मृत्पात्र परम्परा एवं भवन संरचना के आधार पर इस संस्कृति का विकास तीन चरणों में हुआ माना

जाता है।

प्रथम चरण कृषक वर्ग से सम्बन्धित लोगों द्वारा बसाई गई बस्ती का है। 

● द्वितीय चरण में पत्थर से आवास संरचनाएं बनाई गई। इस चरण का अन्त अग्निकांड से होने के प्रमाण भी मिले हैं।

● यहाँ से प्राप्त पुरासामग्री में वृषभ एवं गाय की मृण्मय मूर्तियाँ, मृण्मय खिलौना, गाड़ी के पहिये, सिलबट्टा, प्रस्तर हथौड़ा, गोलछेद वाला

पत्थर आदि प्रमुख हैं।

तिलवाड़ा (बाड़मेर) :- 

लूणी नदी के तट पर स्थित तिलवाड़ा की सभ्यता का काल डॉ. वी. एन. मिश्र ने 500 ई.पू. से 200 ई. माना है।

● यहाँ से लोहे के टुकड़े, काँच की चूड़ियों के टुकड़े, हड्डी के मणके तथा सीप की चूड़ी आदि प्राप्त हुए हैं।

तिलवाड़ा से एक अग्निकुण्ड मिला है जिसमें मानव अस्थि भस्म तथा मृत पशुओं के अस्थि अवशेष मिले हैं।

रैढ़ (टोंक) :- 

● रैढ़ से तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से द्वितीय शताब्दी ईस्वी तक के अवशेष मिले हैं। रैढ प्राचीन भारत के 'टाटानगर' के रूप में प्रसिद्ध है।

● यहाँ से टूटे प्याले,मणके, मृण्मय कलाकृतियाँ तथा घरों के अन्दर अनाज के दाने भी मिले हैं।

● रैढ़ से ताँबे, सीसे, चाँदी तथा सोने से निर्मित कई वस्तुएँ मिली हैं।

● यहाँ से लगभग तीन हजार आहत मुद्राएँ मिली हैं, जिनमें मालव तथा मित्र शासकों एवं अपोलाडोंट्रस का सिक्का तथा इण्डोससेनियन

सिक्के प्रमुख हैं।


नलियासर (जयपुर) :- 

जयपुर जिले में साँभर के पास स्थित नलियासर से खुदाई में आहत मुद्राएँ, उत्तर इण्डोससेनियन सिक्के, हुविष्क के सिक्के, इण्डोग्रीक सिक्के, योधेय गण के सिक्के तथा गुप्तयुगीन चाँदी के सिक्के प्राप्त हुए हैं।

● यहाँ से सोने से निर्मित खुदा हुआ सिंह शिर, ताँबे की घण्टिका, मिट्टी के तोलने के बाट, मिट्टी की तलवार, नालियों के गोल पाईप, हड्डी का बना पासा तथा ताँबे की 105 कुषाण कालीन मुद्राएँ भी मिली हैं।

नलियासर से प्राप्त सामग्री के आधार पर यह अनुमान लगाया जाता है ।

● यह स्थल तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से चौहान युग तक की संस्कृति का केन्द्र रहा है।

अन्य महत्त्वपूर्ण प्राचीन सभ्यताएं :-

● इन महत्त्वपूर्ण सभ्यताओं के अतिरिक्त हमें बरोर (गंगानगर), जोधपुरा (जयपुर), सोंथी (बीकानेर) , गरदड़ा (बूंदी), तिपतिया (कोटा) आदि प्राचीन सभ्यताओं के अवशेष भी राजस्थान में प्राप्त हुए हैं।

 


राजस्थान में आर्य संस्कृति का प्रसार :-

हड़प्पा सभ्यता के पतन (1800 ई.पू. के आस-पास) के बाद भारतीय इतिहास में वैदिक सभ्यता का समय प्रारम्भ होता है।

● इस सभ्यता के बारे में जानने का प्रमुख स्रोत चार वेद (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद व अथर्ववेद) हैं, इसलिए इसे वैदिक सभ्यता कहा गया है।

● राजस्थान में इस सभ्यता के अवशेष अनूपगढ़, तरखान वाला डेरा व चक-64 से मिले हैं।

महाकाव्य काल में राजस्थान में आर्यों की अनेक बस्तियों के उल्लेख मिलते हैं।

रामायण से ज्ञात होता है कि राम-रावण युद्ध के समय जब दक्षिणी सागर ने अपने ऊपर सेतु बनवाना स्वीकार नहीं किया तो भगवान राम ने उसे भयभीत करने के लिये खींचा हुआ अपना अमोघअस्त्र राजस्थान की ओर ही फेंका था, जिससे यहाँ समुद्र के स्थान पर मरूस्थल हो गया। 

महाभारत में भी राजस्थान के आर्यों का पर्याप्त उल्लेख हुआ है। 

महाभारत के अनुसार राजस्थान का जांगलदेश (बीकानेर) कौरव-पाण्डव राज्य के अधीन था और मत्स्य राज्य उनका मित्र या अधीनस्थ राज्य था। 

● कहा जाता है कि पाण्डवों ने अपने अज्ञातवास का एक वर्ष भेष बदल कर मत्स्य देश के शासक विराट के दरबार में ही व्यतीत किया था। 

महाभारत युद्ध में विराट अपनी सेना सहित पाण्डवों की ओर से लड़ता हुआ मारा गया था।

भारतीय इतिहास की भाँति महाभारत के युद्ध के पश्चात् से महात्मा बुद्ध के समय तक का राजस्थान का इतिहास भी अंधकारमय है क्योंकि इस समय के बारे में जानने के पर्याप्त पुरातात्त्विक व लिखित साक्ष्य प्राप्त नहीं होते हैं। 

● किन्तु बुद्ध के समय से भारतीय इतिहास के ऐतिहासिक युग के आरम्भ होने के साथ ही राजस्थान के इतिहास के सम्बन्ध में भी पहले की अपेक्षा कुछ अधिक स्पष्ट और प्रामाणिक जानकारी मिलने लगती है। 

बौद्ध ग्रन्थों के आधार पर विद्वानों का मत है कि छठी शताब्दी ई.पू. में भारतीय राजनीति के रंगमंच पर दो प्रवृत्तियां विशेष रूप दिखाई देती हैं- 

प्रथम :- जनपदों का उदय 

द्वितीय :- साम्राज्य विस्तार हेतु जनपदों के मध्य संघर्ष ।



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