bhartiy संविधान का निमार्ण Notes hindi PDF | संविधान सभा

 

bhartiy संविधान का निमार्ण Notes hindi PDF | संविधान सभा

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भारतीय संविधान का निर्माण कैसे हुआ ?

परिचय :- 

● भारत का संविधान एक लिखित संविधान है, जिसका निर्माण एक संविधान सभा द्वारा  किया गया। 

● विश्व के इतिहास में हमें पहला उदाहरण संयुक्त राज्य अमेरिका से मिलता है। अमेरिका के संविधान की रचना के लिए एक संविधान सभा का गठन किया गया था जो लिखित संविधान था।

● उसके पश्चात् 19वीं शताब्दी में यूरोप के कई अन्य देशों में संविधान सभा की माँग की गई जिसके परिणामस्वरूप संविधान सभाओं की 

स्थापना की गई। 

भारत का संविधान बनाने के लिए भी संविधान सभा की मांग की गई। 

● लम्बे संघर्ष के बाद ब्रिटिश सरकार द्वारा संविधान सभा की मांग को अन्ततः 1946 में मन्त्रिमण्डल मिशन योजना के अंतर्गत मान लिया गया और संविधान का निर्माण किया गया। 

● इस संविधान सभा ने 2 वर्ष 11 महीने और 18 दिन में 26 नवम्बर, 1949 को संविधान निर्माण के कार्य को पूरा किया, जिसे 26 जनवरी, 1950 को लागू किया गया।


उद्देश्य :-  

भारतीय संविधान की निर्माण प्रक्रिया को समझना 

संविधान सभा की मांग की स्वीकृति तथा इसके गठन की प्रक्रिया को जानना 

भारतीय संविधान के विभिन्न स्रोतों को जानना

संविधान सभा के द्वारा संविधान निर्माण करते समय विभिन्न वाद-विवादा को समझना 


भारतीय संविधान का निमार्ण



● 1789 में क्रान्तिकारी फ्रांस ने क्रान्ति के सम्पन्न होने के बाद जो  पहला कार्य किया वह था संविधान सभा की स्थापना। 

● उस समय से लेकर संविधान सभा का विचार प्रत्येक राष्ट्रीय आंदोलन के साथ किसी न किसी रूप में जुड़ा हुआ है। 

● भारत में भी संविधान सभा की मांग राष्ट्रीय आंदोलन के कारण की गई थी। 

भारत के संविधान का निर्माण संवैधानिक सभा द्वारा किया गया था जो कि अप्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित की गई थी। 

संविधान सभा ने दिसम्बर 9, 1946 को काम 

प्रारम्भ किया। 

संविधान सभा का निर्माण, देश की जनता की आशाओं और राष्ट्रीय आंदोलन की माँग, भारतीय संविधान का निर्माण ब्रिटिश संसद नहीं बल्कि भारत की जनता द्वारा चुने गये प्रतिनिधि करेंगे की परिकाष्ठा थी। 

● जनता का आह्वान करते हुये गाँधी जी ने 1921 में कहा था कि भारतीय जनता को ही अपने भविष्य का निर्माण करना चाहिए। 

1922 में उन्होंने यह घोषणा भी की थी कि स्वराज, ब्रिटिश संसद का तोहफा नहीं होगा। यह तो भारतीय जनता द्वारा चुने गये प्रतिनिधियों की आकांक्षा से पैदा होगा। 

साइमन कमीशन की नियुक्ति के विरोध में नेहरू समिति का गठन किया गया। 

नेहरू समिति में भारत के विभिन्न राजनीतिक दल एवं संगठन शामिल हुए। 

पं० मोती लाल नेहरू इस समिति के अध्यक्ष थे । इस समिति को स्वतन्त्र भारत के संविधान को तैयार करने का काम सौंपा गया। 

● दिसम्बर 1929 में कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वतन्त्रता का प्रस्ताव पारित किया गया।

● इसके बाद संवैधानिक सभा की माँग जोर पकड़ने लगी। 

1934 में जब ब्रिटेन की संसद द्वारा भारत सरकार अधिनियम को अंतिम रूप दिया जा रहा था उस समय भी कांग्रेस ने संविधान सभा की माँग की। 

भारत सरकार अधिनियम 1935 के आधार पर चुनी गयी प्रान्तीय विधान सभाओं ने 1937 में एक प्रस्ताव पास किया गया। 

● इस प्रस्ताव में यह माँग की गई थी कि भारत सरकार अधिनियम,  1935 भारतीय जनता की इच्छाओं का प्रतिनिधित्व नहीं करता। इसलिए इस  एक्ट को रद्द कर दिया जाए। इसके स्थान पर वयस्क मताधिकार के आधार पर चुनी गई संविधान सभा द्वारा तैयार भारत का संविधान लागू किया जाए।

क्रिप्स मिशन प्रस्ताव के जरिये से ब्रिटिश सरकार ने पहली बार भारत के स्वतंत्रता के अधिकार तथा अपना संविधान स्वयं तैयार करने के अधिकार को मान्यता दी। 

16 मई 1946 की कैबिनेट मिशन योजना के अंतर्गत भारतीयों की संविधान सभा के 381 सदस्यों को चुना जाना था। ये सदस्य भारत के सभी प्रान्तों व भारतीय रियासतों का प्रतिनिधित्व करेंगे। 

● योजना के मुताबिक हर 10 लाख की आबादी पर संविधान सभा का एक सदस्य होगा और इस संविधान सभा का काम सारे भारत के लिए एक संविधान तैयार करना था। 

कैबिनेट मिशन योजना के अंतर्गत संविधान सभा के सदस्य समानुपातिक प्रतिनिधित्व के आधार पर अप्रत्यक्ष चुनाव द्वारा चुने जाने थे। 

● इन सदस्यों का चुनाव प्रांतीय विधान मंडलों को  करना था। 

प्रांतीय विधान मंडलों का चुनाव भी सीमित 

मताधिकार के आधार पर किया गया था। 

● इसमें वयस्क जनता का लगभग 20-24 प्रतिशत भाग ही शामिल था। 

● भारतीय जनसंख्या का यह छोटा सा हिस्सा देश में राजनीतिक तौर पर सबसे अधिक जागरूक हिस्सा था। 

● जनमत निर्माण पर भी इस छोटे से हिस्से का महत्वपूर्ण प्रभाव था। 

मूलरूप से इस संविधान सभा को सम्पूर्ण

भारतीय उपमहाद्वीप के लिए संविधान बनाने का काम सौंपा गया था। लेकिन ऐसा नहीं हो पाया।

● मुस्लिम लीग ने देश के बंटवारे से पहले ही संविधान सभा का बहिष्कार कर दिया। 

● 1947 में ब्रिटिश संसद ने भारतीय स्वतन्त्रता अधिनियम पास किया। इसके अंतर्गत भारत का विभाजन हुआ । भारत तथा पाकिस्तान नामक दो स्वतन्त्र देशों का जन्म हुआ । 

● पाकिस्तान में शामिल क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाले सदस्यों को छोड़कर , बाकी सदस्यों ने भारतीय संविधान सभा का गठन किया। 

संविधान सभा के सदस्यों की संख्या बदलती रही। इसका कारण था भारतीय रियासतों का भारतीय संघ में विलय होना

नवम्बर 1948 में संविधान सभा में 324 सदस्य थे। जिनमें से 232 सदस्य भारतीय प्रान्तों से थे।

● इन 232 सदस्या में से 197 सामान्य श्रेणी के 4 सिख व 31 मुसलमान थे। 

1945 के चुनाव में कांग्रेस काे भारी बहुमत प्राप्त हुआ। यहाँ पर यह बताना आवश्यक है कि कांग्रेस की यह स्थिति पाकिस्तान में शामिल हाेने वाले क्षेत्राें से बाहर के क्षेत्राें में थी। 

● अतः भारतीय संविधान सभा में कांग्रेस का वर्चस्व था। 

भारत की संविधान सभा में डिप्रेस्ड क्लासेज लीग, अखिल भारतीय अनुसूचित जाति संघ, ऑल 

इंडिया वुमेन्स कांफ्रैंस, ऑल इण्डिया लैंड हाेलडर्स कानफ्रैंस, आल इंडिया लिबरल फडटरेशन फ्रंट जैसे दलाें व संगठनाें काे भी प्रतिनिधित्व मिला था।

संविधान सभा में कुछ मार्क्सवादी भी शामिल थे लेकिन भारतीय साम्यवादी दल अथवा साेशलिस्ट पार्टी का काेई प्रतिनिधि इसमें शामिल नहीं था।

विभाजन से पहले की संविधान सभा में एक साम्यवादी दल का सदस्य था लेकिन विभाजन के कारण उसे अपनी सीट गवानी पड़ी। 

● जहाँ साेशलिस्ट पार्टी का सम्बन्ध है, आजादी से पहले यह कांग्रेस में कांग्रेस साेशलिस्ट पार्टी समूह के रूप में शामिल थी। लेकिन 1946 में साेशलिस्ट पार्टी ने कैबिनेट मिशन याेजना के अनुसार संविधान सभा में शामिल हाेने से इन्कार कर दिया था। 

● एक साल बाद साेशलिस्ट पार्टी के नेता जयप्रकाश नारायण ने नेहरू काे पत्र लिखकर कहा कि बदले हुए हालात में अगर आमंत्रित किया जाये ताे साेशलिस्ट सदस्य संविधान सभा में शामिल हाे सकते हैं। लेकिन नेहरू का कहना था कि संविधान सभा में स्थान खाली नहीं थे। 

● परिणामस्वरूप 1946 में समाजवादी, कांगेस से अलग हाे गये और उन्हाेंने साेशलिस्ट पार्टी का गठन किया। 

● इस पार्टी ने संविधान सभा काे भंगकर 

वयस्क मताधिकार के आधार पर फिर से इसके सदस्याें का चुनाव करवाने की मांग की एक महत्वपूर्ण तथ्य जिसका यहाँ जिक्र करना आवश्यक है वह यह है हालॉकि संविधान सभा में अधिकांश सदस्य कांग्रेस के थे लेकिन पार्टी के निचले स्तर के कार्यकर्ताओं काे जगह नहीं मिल गयी थी। 


जाति के आधार पर देखा जाए ताे संविधान सभा में 83 प्रतिशत सदस्य हिन्दू थे। इनमें से 45 प्रतिशत ब्राह्मण थे जाे जमींदार घरानाें से सम्बन्ध रखते थे। हिन्दू सदस्याें में से 10 प्रतिशत मारवाड़ी या बनिया थे। इनमें से 13 प्रतिशत कायस्थ थे। कायस्थ सदस्याें में अधिकांश डॉक्टर या वकील थे। इनमें से 6 प्रतिशत राजपूत थे। जिनका सम्बन्ध जमींदार वर्ग से था। कुल मिलाकर संविधान सभा के 74 प्रतिशत सदस्य उच्च वर्ग के थे। मराठा, पटीदार व दक्षिण भारत की गैर-ब्राह्मण जातियाें का अनुपात 18 प्रतिशत था। 


● संविधान सभा में 6 प्रतिशत सदस्य अनुसूचित जातियाें व जनजातियाें से थे। 

● संविधान सभा के अधिकांश सदस्य मध्य वर्ग से थे ये लाेग अंग्रेजी माध्यम से शिक्षित थे। 

● 20वीं शताब्दी में यूराेप के अनुभव के आधार पर इस वर्ग में एक क्रांतिकारी सामाजिक दृष्टिकाेण उत्पन्न हुआ था। 


संविधान सभा के प्रमुख 20 सदस्याें के बारे में यह बात बिल्कुल सच थी। इनमें से सभी विश्वविद्यालय के स्नात्तक थे, जबकि चार लाेगाें ने विदेशी विश्वविद्यालयाें से स्नात्तक की डिग्री हासिल की थी। इनमें से 12 लाेग ऐसे थे जाे वकालत के पेशे से जुड़े हुए थे या वकालत की डिग्री ले चुके थे। अन्य लाेगाें में एक डॉक्टर व एक व्यवसायी भी शामिल थे। इनमें से दाे मुसलमान, एक क्रिशचियन और शेष हिन्दू थे। 

इन 20 लाेगाें में 9 ब्राह्मण थे, डॉ० अम्बेडकर अनुसूचित जाति से थे। 

इन 20 सदस्याें के इलावा एक अन्य प्रमुख व्यक्ति बी०एन० राऊ थे, जाे संविधान सभा के सदस्य तो नहीं थे, मगर इसकी आंतरिक परिषद् के साथ सलाहकार के रूप में जुड़े हुये थे। 

श्री राऊ एक कानूनविद, वकील और जज के रूप में प्रसिद्ध थे। 


● संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि संविधान सभा भारत की जनता का सही प्रतिनिधित्व नहीं करती थी। केवल 20-24 प्रतिशत जनता ही इसमें वाेट दे पाती थी। 

● संविधान सभा का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से हुआ। इस सभा के कुछ सदस्याें का चुनाव ही नहीं हुआ था। ये भारतीय रियासताें के मनाेनीत सदस्याें के रूप में संविधान सभा में शामिल किये गये थे।

संविधान सभा में कांग्रेस का वर्चस्व था। 

● इस सभा में 20 लाेगाें की प्रमुख भूमिका रही। 


वैचारिक पृष्ठभूमि :- 

कांग्रेस पार्टी का संविधान सभा में दाे-तिहाई बहुमत था। इस पार्टी में फैसले लेने का अधिकार पार्टी हाई कमान काे था। 

● इस हाई कमान में नेहरू, पटेल और राजेन्द्र प्रसाद का महत्वपूर्ण नियन्त्रण था। 

संविधान सभा देश की जनता की आशाओं

व आकांक्षाओं से परिचित थी। 

स्वतन्त्रता आन्दाेलन ने देश के विभिन्न वर्गो व समूहाें में कांग्रेस को सामाजिक आधार पर मजबूत बनाया था। 

● विशेषताैर पर 1920 के बाद जब गाँधी जी ने कांग्रेस का नेतृत्व किया। अब कांग्रेस ने ग्रामीण इलाकाें की जनता काे इक्ट्ठा करना शुरू किया।

कांग्रेस नेतृत्व में छाेटे शहराें व ग्रामीण इलाकाें के कार्यकर्ताओं की भूमिका महत्वपूर्ण हाे उठी थी। इसका परिणाम यह हुआ कि कांग्रेस का राष्ट्रीय नेतृत्व एक द्वंद्व में फंस गया। 

● एक तरफ कांग्रेस पर व्यापारियाें, वकीलाें एवं जमींदारों का नियन्त्रण था ताे दूसरी तरफ यह दल जनता का हिमायती हाेने का दावा करती थी। कांग्रेस नेतृत्व का एक वर्ग इस बदलाव के प्रति काफी सचेत था। 

नेहरू के शब्दाें में ‘‘हमारा आर्थिक व सामाजिक ढांचा अब बेकार हाे चुका है और यह जरूरी है कि इस ढांचे का पुनर्गठन किया जाए ताकि देश की जनता के भाैतिक व आध्यात्मिक उत्थान का माध्यम बन सके। हमें एक ऐसे सामाजिक दर्शन का निर्माण करना है जाे इस ढांचे में मूलभूत बदलाव लाए। हमें एक ऐसे समाज का निर्माण करना है जहाँ निजी लाभ व व्यक्तिगत लालच का काेई स्थान न हाे और जहाँ आर्थिक व राजनीतिक अधिकाराें का उचित वितरण हाे।’’ 

● इसी संदर्भ में प्रसिद्ध संविधान विशेषज्ञ ग्रेनविल आस्टिन ने कहा था ‘‘प्रथम युद्ध की समाप्ति के बाद भारत में दाे क्रांतियाँ राष्ट्रीय व सामाजिक साथ-साथ चल रही है। स्वतन्त्रता प्राप्ति के साथ राष्ट्रीय क्रान्ति पूरी हाे जाएगी, लेकिन सामाजिक क्रान्ति जारी रहना चाहिए।’’ सामाजिक न्यास व बदलाव, एकता व स्थिरता और लाेकतंत्र व कानून का शासन शामिल है।

संविधान सभा के सभी सदस्य क्रांति के पक्षधर थे। उन्हाेंने यह आशा व्यक्त की कि इस क्रान्ति के माध्यम से भारतीय समाज के ढांचे में बदलाव आएगा। संविधान सभा के कई सदस्याें ने ‘समाजवाद’ की अवधारणा काे अपनाने पर बल दिया। 

संविधान सभा में शामिल मार्क्सवादियाें, गांधीवादी, समाजवादियाें व परम्परागत पूंजीवादियाें ने अपनी-अपनी तरह से समाजवाद काे परिभाषित किया। लेकिन वे सभी एक बात पर सहमत थे कि देश में सामाजिक न्याय की स्थापना करनी है।

● सामाजिक क्रान्ति की अवधारणा के आधार पर ही भारतीय संविधान में माैलिक अधिकार, राज्यनीति के निर्देशक सिद्धान्ताें और कार्यकारिणी विद्यायीकान्यायपालिका के अधिकाराें का निर्धारण हुआ। 

संविधान सभा ने राष्ट्रीय एकता व स्थिरता के उद्देश्य काे हासिल करने का भी महत्वपूर्ण स्थान दिया। 

● भारतीय अभिजात्य वर्ग ने केंद्रीकृत राष्ट्रीय सरकार की अवधारणा का समर्थन किया। जिसके जरिए राष्ट्रीय नेतृत्व के अधिकार काे मजबूती मिल सके और भारतीय समाज में फैंले विघटनकारी प्रवृत्तियाें पर अंकुश लग सके।

संविधान सभा के गठन से पूर्व इसके गठन के बाद की घटनाओं ने राष्ट्रीय नेताओं के केंद्रीकृत राजनीतिक व्यवस्था के आग्रह काे पुष्ट किया।

संविधान सभा काे विश्वास था कि आर्थिक विकास के लक्ष्याें काे हासिल करने के लिए भी केन्द्रीकृत सरकार जरूरी है। 

संविधान में विधायी प्रावधानाें का प्रारूप तैयार करते समय संविधान सभा के सदस्याें ने राष्ट्रीय एकता पर सबसे अधिक बल दिया। 

● आन्तरिक स्थिरता की चिंताओं ने संघीय ढांचे काे प्रभावित किया, विशेषताैर से आपातकाल स्थिति से सम्बन्धित प्रावधान इसी चिंता का परिणाम थे। 

● अल्पसंख्यकाें के हिताें की रक्षा सक्षम सरकार व प्रशासन और राष्ट्रीय सुरक्षा के लक्ष्याें ने भी संविधान निर्माण काे प्रभावित किया। 

राष्ट्रीय आन्दाेलन के दाैरान अधिकांश भारतीय नेता उदारवादी लाेकतांत्रिक परम्परा के प्रति बाैद्धिक रूप से प्रतिबद्ध थे। इस मामले में इन नेताओं पर औंपनिवेशिक शासन की सीमित उदारवादी संस्थाओं और शिक्षा का प्रभाव पड़ा।

वास्तव में 1920 के दशक से ही कांग्रेस ने वयस्क मताधिकार की मांग करनी शुरू कर दी थी।

● बहरहाल, प्रत्यक्ष चुनाव काे ही सामाजिक क्रान्ति का आधार बनाया गया। 

● नेहरू का मानना था कि प्रत्यक्ष चुनाव के आधार पर गठित विद्यायिका देश की जनता का 

प्रतिनिधित्व करेगी तथा जनता के सामाजिक व आर्थिक हिताें काे आगे बढ़ाएगी। 

संविधान सभा में यह भी कहा गया कि प्रत्यक्ष चुनाव से ग्रामीण समाज की रक्षा करनी संभव हाेगी। 

देश के सामाजिक व आर्थिक विकास के संदर्भ ने दाे विराेधी विचारधाराऔं - उदारवादी पूंजीवाद और समाजवादी - साम्यवादी काे जन्म दिया। दाेनाें धाराएँ देश काे प्रभावित करने की काेशिश में थी। 

उदारवादी विचारधारा का कहना था कि विकसित देशाें से पूंजी के विस्तार के माध्यम से अविकसित देशाें का विकास हाे सकता है। 

● दूसरी तरफ, साम्यवादी विचारधारा वाले विकासशील देशाें में आर्थिक विकास तेजी से हाे रहा था और इन देशाें की जनता काे सामाजिक न्याय की गारन्टी मिली हुई थी। पर इन देशाें में नागरिकाें काे व्यक्तिगत स्वतन्त्रता बहुत अधिक नहीं मिली हुई थी। भारतीय नेताओं के सामने यह चुनाैती थी कि या ताे वे इन दाेनाें विराेधी विचारधाराऔं में से ही काेई रास्ता निकाले या फिर काेई देशी विचारधारा काे जन्म दें। 

भारत के राष्ट्रीय नेताओं में इस मुद्दे पर काफी मतभेद थे। 

● इस संदर्भ मे तीन तरह की विचारधाराओं की चर्चा की जा सकती है। 

● पहली विचारधारा गांधीवादी थी। गांधी जी, जिन्हाेंने आधुनिक व परम्परागत विचारधाराओं के बीच अनिश्चित लेकिन प्रभावी सामंजस्य कायम करने में सफलता पायी, चाहते थे कि सुधारवादी व क्रान्तिकारी दृष्टिकाेण में तालमेल करके आगे बढ़ा जाए। 

● इसलिए गांधी जी के अनुसार स्वराज की स्थापना के साथ-साथ स्वतन्त्रता का अर्थ यह भी है कि ग्रामीण जीवन की सादगी व आत्मत्याग के सद्गुणाें काे बनाये रखा जाए। गांधी जी आधुनिक बुर्जुआ सभ्यता के आलाेचक थे व बड़े-बड़े उद्याेगाें व पूंजीवादी शहरीकरण की बजाय ग्रामीण व हस्तशिल्प उद्याेगाें के विस्तार की हिमायत करते थे। 

गांधीजी के अनुसार ग्रामीण व हस्तशिल्प उद्योगाें के विस्तार से अर्थव्यवस्था का विकेन्द्रकीकरण हाेगा और भविष्य में आत्मनिर्भर ग्रामीण समाज का निर्माण हाेगा। 

● शासन व्यवस्था के मामले में भी गांधी जी परम्परागत विचारधारा के पक्षधर थे। वे ग्राम पंचायत पर आधारित विकेंद्रीकृत व्यवस्था स्थापित करना चाहते थे। परन्तु साम्यवादी विचारक गांधी जी की इस विचारधारा के खिलाफ थे। इनकी 

नजर में आधुनिकता व परम्परा के बीच गांधी जी द्वारा स्थापित सामजंस्य नाजुक और कमजाेर है।

साम्यवादियाें ने गांधी की अहिंसा व वर्ग सामंजस्य की धारणा का विराेध किया। लेकिन इस मामले में साम्यवादियाें की भी सीमाएँ थी। क्याेंकि संविधान सभा में उनकी काेई हैसियत नहीं थी। पर कांग्रेस में समाजवादी भी शामिल थे।

● समाजवादियों की आशा का केन्द्र जवाहरलाल नेहरू थे। वे 1920 व 30 के दशक में मार्क्सवादी विचारधारा के प्रभाव में थे और जाे वर्ग सामंजस्य की अवधारणा का सिद्धांत का विराेध करते थे। लेकिन कांग्रेस समाजवादियों के दृष्टिकाेण में बदलाव आ रहा था। 

● स्वयं नेहरू भारतीय परिस्थितियाें में वर्ग संघर्ष के सफल हाेने के प्रति शंकित थे। उन्हाेंने समाजवादी आर्दशाें और गांधीजी के राजनैतिक दर्शन के बीच समन्वय कायम करने की काेशिश की। इस तरह राष्ट्रीय नेतृत्व में दाे तरह के वामंपथी थे। 

पहले जाे पूरी तरह से मार्क्सवादी क्रान्ति में विश्वास रखते थे और दूसरे जाे सामंती ढांचे काे बदलना चाहते थे, समताम आर्थिक व्यवस्था के पक्षधर थे और कुछ हद तक निजी सम्पति का भी विराेध करते थे। ये अनावश्यक संघर्ष की बजाय शांतिपूर्ण तरीके से यह सब हासिल करना चाहते थे। संविधान सभा में दूसरे तरह के समाजवादियाें का वर्चस्व था। 

संविधान सभा में बल्लभ भाई पटेल के नेतृत्व में एक तीसरा समूह भी था। यह दक्षिणपंथी समूह बुर्जवा व जमींदार वर्ग के हिताें का प्रतिनिधित्व करता था। यह समूह  चाहता था कि देश में एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था कायम की जाए जिसमें निजी पूंजी काे विकास का अवसर मिले, मजदूराें के आन्दाेलन दबाये जाऐ और पश्चिमी देशाें से सम्बन्ध बनाये जाये। यह समूह कांग्रेस काे भी अपने नियन्त्रण में रखना चाहता था। 

● संक्षेप में देश के वातावरण, जनता की आकांक्षाओं, राजनीतिज्ञाें की सामाजिक पृष्ठभूमि और राष्ट्रीय आन्दाेलन के दाैरान विकसित विचाराें के आधार पर संविधान सभा बहु-वैचारिक ढांचे के तहत काम कर रही थी। इसके साथ ही साथ प्रबल नेतृत्व  के प्रभाव और सत्ता हस्तान्तरण व विभाजन के बाद उपजी प्रशासनिक समस्याओं के 

कारण देश का नेतृत्व संविधान सभा में आम राय कायम करने के प्रति सचेत था।

संविधान सभा में निणर्य लेने की प्रक्रिया :-

ग्रेनविल आस्टिन (Granville Austin) के अनुसार भारत के संविधान के निर्माण में दो प्रक्रियाओं का महत्वपूर्ण योगदान है। ये है 

(I) सहमति से निर्णय  

(II) समायोजन का सिद्धान्त।

(I) सहमति से निर्णय :-  

भारतीय संविधान के निर्माता इस बात को अच्छी प्रकार से जानते थे कि वे कोई साधारण दस्तावेज नहीं बना रहे हैं, बल्कि एक संविधान का निर्माण कर रहे हैं, इसलिए उनके द्वारा बहुमत से निर्णय लेने के स्थान पर सहमति से निर्णय के सिद्धान्त को अपनाया गया। 

● सहमति के इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए उनके द्वारा उनके तरीके अपनाए गए। 

प्रथम, कांग्रेस विधनमण्डल दल की बैठक में संविधान की प्रत्येक धारा पर खुलकर वाद-विवाद होता था और उन बैठकों में डॉ.अम्बेडकर, ए०के० अय्यर और आयगर जैसे गैर कांग्रेसी नेताओं को भी आमन्त्रित किया जाता था। 

द्वितीय, संविधान निर्माण से सम्बन्धित सभी महत्वपूर्ण समितियों में विभिन्न समुदायों, हितों तथा वर्गो को उचित प्रतिनिधित्व दिया गया

था। कई स्थानों पर तो अल्पसंख्यक वर्ग के हितों के प्रतिनिधियों के रूप में उन व्यक्तियों को भी समिति में लिया गया था जो संविधान सभा के सदस्य नहीं थे। 

● संविधान निर्माण के कार्य की सबसे महत्वपूर्ण समिति, प्रारूप समिति के कुल 9 सदस्यों (7 + 2) में से केवल एक प्रमुख कांग्रेसी श्री मुंशी थे और समिति के अध्यक्ष डॉ. अमेडकर एक ऐसे व्यक्ति थे जो सदैव कांग्रेस के आलोचक रहे थे संविधान सभा की समितियों की बैठकों में भी बहुमत की जीत के स्थान पर एक दूसरे को समझाने-बुझाने की प्रवृति अपनाई गई। जिन सुझावों अथवा संशोधनों को अस्वीकृत किया गया, उन्हें अस्वीकार करने का कारण बताए गए, ताकि कोई सदस्य वह अनुभव न करे कि उनके सुझावों का अनादर किया गया है।

● इस सम्बन्ध में एम०वी० पायली ने लिखा है, "संविधान सभा में वाद-विवाद को पूरा प्रोत्साहन मिला, आलोचना के प्रति सहनशीलता अपनाई गई, लम्बे वाद-विवाद के प्रति असन्तोष नहीं दिखाया गया, अपने विचार दूसरों पर लादने

एवं शीघ्रता से कार्य समाप्त करने का प्रयास नहीं किया गया। यह एक पूर्ण लोकतांत्रिक प्रक्रिया थी, जिस पर भारतीय लोग गर्व कर सकते है।"

सविधान निर्माण में सहमति की जिस पद्धति को अपनाया गया उसके उदाहरण हैं, संविधान की संघीय व भाषायो प्रावधान और अल्पसंख्यकों से सम्बन्धित व्यवस्थाएँ।

संविधान निर्माण में सहमति संघीय ढांचे पर 1947 से ही विचार आरम्भ हुआ और नवम्बर 1949 तक इस पर विचार चलता रहा। इस सम्बन्ध में यह कोशिश की गयी कि सम्बन्धित प्रावधान संघ के प्रतिनिधियों और प्रान्तीय सरकारों के अधिक से अधिक प्रतिनिधियों को सन्तुष्ट कर सकें। ऐसी व्यवस्था करने की कोशिश की गयी कि न तो कोई प्रान्त संघ से अलग हो सके और न ही संघ को किसी पर थोपा जाए। 

● इस सम्बन्ध में उचित व्यवस्था करने के लिए 'संघ शक्ति समिति' में भिन्न-भिन्न प्रान्तों व देशी रियासतों के महत्वपूर्ण व्यक्तियों जैसे पंत, मित्तल टी०टी० कृष्णमचारी और रामास्वामी मुदालियर को शामिल किया गया।

● भाषा से सम्बन्धित प्रावधान भी सहमति से निर्णय के महत्वपूर्ण उदाहरण हैं। भाषायी विवाद का सर्वसम्मत हल ढूंढने के लिए तीन वर्षों तक प्रयत्न किए गए। 

● संविधान सभा की अन्तिम बैठक में अध्यक्ष डॉ० राजेन्द्र प्रसाद ने कहा था कि वे भाषायी प्रावधानों को मतदान के लिए नहीं रखेंगे, क्योंकि यदि कोई हल समस्त देश को स्वीकार्य नहीं हैं तो उसे लागू करना बहुत कठिन हो जाएगा। 

● इसके इलावा अल्पसंख्यकों के सम्बन्ध में की गई व्यवस्थाएँ, संविधान की प्रस्तावना और संसद से सम्बन्धित प्रावधान भी सर्वसम्मति के आधार पर लिए गए निर्णयों के प्रमुख उदाहरण है।

ग्रेनविल आस्टिन के अनुसार तीन तत्वों ने सर्वसम्मति के आधार पर निर्णय लेने में सहायता की। ये थे संविधान सभा में एकता का वातावरण, आदर्शवादिता का वातावरण और राष्ट्रीय उद्देश्य की विद्यमानता

(II) समायोजन का सिद्धान्त :- 

समायोजन के सिद्धान्त का अर्थ दो ऐसे तत्वों के बीच समन्वय स्थापित करना है जिन्हें प्रायः परस्पर विरोधी माना जाता है। वास्तव में, भारतीय संविधान सभा ने संविधान निर्माण में सिद्धान्तवादिता के स्थान पर व्यवहारिकता के दृष्टिकोण को अपनाया था और इसके अनुकूल ही समायोजन के सिद्धान्त के कुछ प्रमुख उदाहरण इस प्रकार है:

1. संघात्मक तथा एकात्मक तत्वों के बीच समन्वय :-

● साधारणतया संघात्मक और एकात्मक व्यवस्था को परस्पर विरोधी समझते हुए यह माना जाता है कि या तो एकात्मक व्यवस्था को अपनाया जा सकता है या संघात्मक व्यवस्था को। लेकिन भारत की अपनी विशेष परिस्थितियों के अनुकूल संघात्मक और एकात्मक व्यवस्था के बीच समन्वय को अपनाया गया है।


2. गणतंत्रीय व्यवस्था के साथ राष्ट्रमण्डल की सदस्यता :-

● सन् 1947 तक यह समझा जाता था कि कोई गणतन्त्र राज्य राष्ट्रमण्डल का सदस्य नहीं हो सकता, लेकिन संविधान सभा द्वारा भारत के गणतन्त्रात्मक स्वरूप को राष्ट्रमण्डल की सदस्यता के मार्ग में बाधक नहीं समझा गया। 

● इस सम्बन्ध में संविधान सभा के दृष्टिकोण को व्यक्त करते हुए श्री बी०एन० राव ने कहा था, "राष्ट्रमण्डल की धारणा का स्पष्टतया विकास होता जा रहा है और वह अब इस स्तर पर पहुंच चुका है कि उसमें गणतन्त्रात्मक संविधान वाले राज्य भी अपना स्थान पा सकते है।"


3. केन्द्रीयकृत शासन और पंचायत व्यवस्था के बीच समन्वय :- 

समायोजन के सिद्धान्त का एक अन्य उदाहरण केन्द्रीयकृत शासन और पंचायत व्यवस्था के दो परस्पर विरोधी सिद्धान्तों के बीच स्थापित किया गया समन्वय हैं संविधान सभा द्वारा इन दोनों सिद्धान्तों को स्वीकार करते हुए उन्हें शासन के अलग-अलग स्तरों पर लागू किया गया। 

ग्रनवेल आस्टिन के अनुसार “संघ तथा प्रान्तीय सरकारों के सम्बन्ध में केन्द्रीयकरण के सिद्धान्त को स्वीकार किया गया और प्रत्यक्ष निर्वाचन को अपनाया गया। 

● प्रांतीय सरकारों से नीचे के स्तर पर विकेन्द्रीकरण की व्यवस्था को स्वीकार किया गया और इस सम्बन्ध में व्यवस्था का कार्य प्रांतीय व्यवस्थापितकाओं के क्षेत्राधिकार में रखा गया। इसके साथ ही राज्य नीति के निर्देशक सिद्धान्तों में भी पंचायत व्यवस्था को स्थान दिया गया।"

राष्ट्रपति के निर्वाचन के सम्बन्ध की गई व्यवस्था तथा मौलिक अधिकारों और उनके दुरूपयोग के विरूद्ध की गई प्रतिबन्धों की व्यवस्था आदि भी समायोजना के सिद्धान्त को अपनाने के ही उदाहरण है।

(III) परिवर्तन के साथ चयन की कला :-

उपरोक्त दो सिद्धान्तों के इलावा संविधान का निर्माण कार्य परिवर्तन के साथ चयन कला के आधार पर भी किया गया। भारतीय संविधान के निर्माताओं का उद्देश्य किसी मौलिक अथवा आर्दश संविधान का निर्माण करना नहीं था। वे एक अच्छे तथा कामचलाऊ संविधान का निर्माण करना चाहते थे। 

● इसलिए उन्होंने विदेशी संविधानों की उन व्यवस्थाओं को अपने संविधान में शामिल किया जो उन देशों में सफलतापूर्वक काम कर रही थी और भारत की परिस्थितियों के अनुकूल थी। 

● इस सम्बन्ध में उल्लेखनीय बात यह है कि विदेशी संविधानों से कुछ व्यवस्थाओं को सोच विचार कर ही ग्रहण किया है और जो कुछ ग्रहण किया गया है उसे भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल ढाल लिया जाता गया है।

भारत की भावी राज्य व्यवस्था :- 

● भारत की भावी राज्य व्यवस्था के बारे में संविधान सभा कई उद्देश्यों को सामने रख कर चल रही थी। 

15 दिसम्बर 1946 को संविधान सभा में जवाहर लाल नेहरू द्वारा रखे गये उद्देश्य प्रस्ताव में इनकी विस्तृत चर्चा की गई। 

● यह प्रस्ताव 22 जनवरी, 1947 को आम सभा में पारित हो गया। 

● इस प्रस्ताव में कहा गया है कि "... सार्वभौम स्वतन्त्र भारत इसके संघटक अंग और सरकार के अंग अपनी सारी शक्तियाँ तथा अधिकार जनता से प्राप्त करेंगे और भारत के सभी लोगों को कानून व लोक नैतिकता का ध्यान रखते हुये, सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक न्याय, अवसरों की समानता, कानून के समक्ष समानता और विचार, संप्रेषण विश्वास व्यवसाय संगठन बनाने की स्वतन्त्रता की गारंटी होगी ...।" 

● इस प्रस्ताव में दिये गये उद्देश्यों की प्रकृति सामान्य है। इन उद्देश्यों के आधार पर ही संविधान का आधारभूत ढांचा तैयार किया गया और सामाजिक परिवर्तन की राह निकली। 

● इस उद्देश्य प्रस्ताव का मुख्य जोर भारत को एक स्वतन्त्र सार्वभौम गणराज्य बनाने पर था। 

देश का संविधान ब्रिटिश भारत व रियासतों के संघ के लिए बनाया जाना था। 

● संविधान के तहत भारत के नागरिकों को विचार, संप्रेषण, विश्वास, व्यवस्था आदि के उदारवादी अधिकारों की गांरटी दी जानी थी।

● इसके इलावा अल्पसंख्यकों पिछड़े वर्गो खासकर अनुसूचित जातियों व जनजातियों के लिए पर्याप्त सुरक्षा और सभी नागरिकों को सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक न्याय प्राप्त करवाने के लिए उपयुक्त माहौल तैयार करने का प्रावधान भी संविधान के तहत किया जाना था।

भारत की भावी राज्य व्यवस्था के बारे में देश के नेताओं ने तीन उद्देश्य तय किये :- 

1. देश को ब्रिटिश शासन के प्रभाव से मुक्त करना

2. उदारवादी संस्थाओं के आधार पर भारत को इस उपमहाद्वीप में एक शक्तिशाली राष्ट्र राज्य के रूप में विकसित करना।

3. देश की जनता की उत्पादकता में बढ़ोतरी।

● लेकिन ये उद्देश्य प्रभु वर्ग व अभिजन की सत्ता और स्वतन्त्रता के समय देश की समस्याओं के परिवेश में ही प्राप्त किये जाने थे। इन उद्देश्यों के आधार पर ही भारत का संविधान बना जिसका दर्शन अस्पष्ट है।


संविधान का दर्शन तथा विचारधारा :-

भारत के संविधान के आधारभूत सिद्धान्तों तथा संविधान सभा के बोध के विश्लेषण से स्पष्ट है कि विचारधारा के आधार पर व सामाजिक लक्षणों के दृष्टिकोण से कुछ हद तक यह अस्पष्ट व स्वप्नदर्शी हैं। भारतीय संविधान की विचारधारा का वर्णन संविधान की प्रस्तावना ,मौलिक अधिकारों व राज्यनीति के निर्देशक सिद्धान्तों के रूप में किया गया है। 

● भारत में जिन संवैधानिक संस्थाओं का निर्माण किया गया है वे हमारे ऐतिहासिक अनुभव के आधार पर नहीं किया गया है। इन संस्थाओं की अवधारणा, इनकी संरचना तथा अन्य विशेषताएँ देश के पश्चिम के साथ सम्बन्धों से पैदा हुई थी।

● इसलिए कहा जा सकता है हालॉकि हमारे संविधान निर्माता सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन के प्रति सचेत थे लेकिन वे मार्क्स व मिल की बजाय लास्की व फैबियन समाजवाद से प्रभावित थे।

● इस विचारधारा के अन्तर्गत लोकतन्त्र को सर्वसत्तावादीएकदलीय सरकार के खिलाफ एक कारगर यन्त्र के रूप में देखा गया। लोकतन्त्र को सामाजिक क्रान्ति के प्रति प्रतिबद्धता के रूप में देखा गया। 

● लोकतन्त्र में इतना अधिक विश्वास था कि संविधान में 'समाजवाद' तथा 'धर्मनिरपेक्ष' शब्द जोड़ने के लिए संविधान सभा में पेश संशोधनों को रद्ध कर दिया गया। संविधान सभा में यह तर्क दिया गया कि देश का संविधान इन वैचारिक प्रतिबद्धताओं को समाहित कर लेगा।

● इसीलिए संविधान में राष्ट्रीय आन्दोलन की सर्ववर्गीय छवि देखी जा सकती है। 

● राज्य के नीति निर्देशक सिद्धान्तोंमौलिक अधिकारों के प्रावधान के रूप में भी इस संस्कृति की झलक देखी जा सकती है। 

● इन वर्ग में उच्च जाति के हिन्दुओं की प्रमुखता थी, लेकिन इसी वर्ग ने अस्पृश्यता को दंडनीय अपराध बनाया और इसे समाप्त किया। गरीबों व अनपढ़ों वाले देश में इस वर्ग ने वयस्क मताधिकार व राजनीतिक समानता का अधिकार प्रदान करवाया। इसके साथ ही शोषित तथा कमजोर वर्गो वाले देश में इसी वर्ग ने शोषण के खिलाफ अधिकार का प्रावधान किया।

● इस प्रकार देखा जाए तो संविधान को मुक्ति के साधन के रूप में देखा जा सकता है। इसमें देश की जनता को सामाजिक न्याय का वादा किया गया। 

● गहराई से देखा जाए तो संसदीय प्रजातंत्र की धारणा व्यवहारिक भी थी। इसमें कोई शक नहीं हैं कि ब्रिटिश शासन की वैचारिक सोच का इस दृष्टि से काफी महत्व है। अगर भारत के प्रभु वर्ग के हितों की अनदेखी होती तो वे इस विचारधारा को कभी न अपनाते। 

● संसदीय प्रजातंत्र की धारणा के अन्तर्गत ऐसा लगता था कि आजादी की लड़ाई के राजनीतिक लाभों का समान वितरण हो रहा है। 

● इसके साथ ही साथ सामाजिक क्रान्ति के अभाव में एक अत्याधिक विषमतामूलक सामाजिक ढांचे में, संसदीय प्रजातंत्र ने प्रभु वर्ग को कमजोर वर्ग पर अपना वर्चस्व बनाये रखने का अवसर प्रदान करवाया। 

● इसमें संपति का अधिकार महत्वपूर्ण साधन बना। 

सम्पति के मौलिक अधिकार के अन्तर्गत सरकार को किसी व्यक्ति की सम्पति जब्त करने का अधिकार नहीं था। 

● सम्पति के अधिग्रहण के खिलाफ वह न्यायालय की शरण में भी जा सकता था। 

● इस तरह से सम्पति के मौलिक अधिकार ने श्रम शक्ति पर सम्पति मालिकों की विजय का ठोस आधार प्रदान किया। 

● यह सत्य है कि राज्य नीति के निर्देशक सिद्धान्तों में भारत के सामाजिक व आर्थिक परिवर्तन का दर्शन था, परन्तु सम्पति के मौलिक अधिकार ने नीति निर्देशक सिद्धान्तों की संभावनाओं को कुंद कर दिया। 

संविधान में खेत जोतने वालों को जमीन का अधिकार व प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी का प्रावधान नहीं था।

● इस संदर्भ में केन्टी० शाह ने संविधान सभा में कहा था कि संविधान के अध्ययन के अनुसार इसका लक्ष्य सामाजिक या आर्थिक परिवर्तन नहीं बल्कि राजनीतिक परिवर्तन था। 

डॉ० बी०आर० अम्बेडकर के शब्दों में, "26 जनवरी 1950 को हम विरोधाभासों के जीवन के जीवन में प्रवेश कर रहे हैं। राजनीति के क्षेत्र में हम समानता की बात करते है लेकिन सामाजिक व आर्थिक क्षेत्र में असमानता के जितनी जल्दी हो सके हमें इस विरोधाभास को दूर करना चाहिये।"

● स्पष्ट है कि नये समाज के निर्माण के लिए भारत के प्रभु वर्ग ने क्रान्ति की जगह समन्वय का मार्ग चुना। 

● प्रभु वर्ग की रणनीति थी कि निर्धन जनलोकतांत्रिक व्यवस्था को राजनीतिक औजार के रूप में इस्तेमाल कर सामाजिक व आर्थिक न्याय के युग का सूत्रपात करेंगे। 

● इस रणनीति के अन्तर्गत असमानता व ग्रामीण विपन्नता को दूर करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया। लेकिन तत्कालिन भूमि सम्बन्धों में मूलभूत बदलाव का जिक्र नहीं किया गया।

● अन्त में हम कह सकते हैं कि भारत के संविधान को आधारभूत विचारधारा उदारवादी प्रजातान्त्रिक थी। इसमें व्यवहारिकता का तत्व शामिल था।

● इसमें मौजूदा सामाजिक ढांचे में कोई महत्वपूर्ण बदलाव लाये बिना, समाज के सभी वर्गों के लिए आश्वासन था। भारत जैसे बहुलतावादी समाज को एकता के सूत्र में बांधने के लिए यह जरूरी भी समझा गया। 

● भारत के राजनीतिक प्रभु वर्ग ने संसदीय प्रजातन्त्र को विभिन्न राजनीतिक शक्तियों के बीच गठबंधन, लोकनीति में निरन्तरता, एकता व अखण्डता, जवाबदेह प्रशासन, विधानमण्डल व कार्यपालिका में समन्वय और व्यापक हितों पर आधारित राजनीतिक व्यवस्था के साधन के रूप में देखा। 

● यह एक ऐसी राजनीति थी, जिसमें व्यक्तिवाद व सामूहिकता के बीच समन्वय कायम किया गया।

● इस बात में कोई संदेह नहीं है कि भारत का संविधान उदारवादी परम्परा पर आधारित है। इसका कार्यात्मक रूप लोकतन्त्र के रूप में सामने आता है और इसका सामाजिक -आर्थिक आधार कल्याणकारी राज्य की धारणा के रूप में विकसित हुआ। 

● संक्षेप में, भारत का संविधान पूंजीवाद, उदारवादी, कल्याणकारी प्रजातंत्र का एक मिश्रण है जिसमें आर्थिक शक्तियों को सीमित हाथों में रखा गया है तथा राजनीतिक अधिकारों का उदारता के साथ वितरण किया गया है। 

निष्कर्ष :-

संविधान के विभिन्न प्रावधानों के सम्बन्ध में संविधान निर्माताओं द्वारा अपनाए गए दृष्टिकोण से यह नितान्त स्पष्ट है कि संविधान निर्माता सिद्धांतवादिता के स्थान पर व्यवहारिकता से प्रेरित थे। 

संविधान निर्माण के प्रत्येक पहलू पर विभिन्न मत और दृष्टिकोण प्रकट किए गए तथा वाद-विवाद में विभिन्न प्रवृतियों का उद्घाटन हुआ। संविधान सभा में अधिकांश निर्णय यथासंभव आम राय के लिए जाने की कोशिश की गई। 

● इस संविधान की रचना में नेताओं ने पुराने और नए विचारों में अधिक से अधिक सामंजस्य लाने का प्रयत्न किया गया।

 

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