भारत के प्रमुख शास्त्रीय नृत्य PDF | Bharat ke Pramukh Shastriya Nritya | Notes Hindi PDF

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भारत के प्रमुख शास्त्रीय नृत्य PDF | Bharat ke Pramukh Shastriya Nritya | Notes Hindi PDF


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 शास्त्रीय नृत्य किसे कहते हैं ?

शास्त्रीय नृत्य परंपरागत रूप से प्रेम, भक्ति, समर्पण आदि की अभिव्यक्ति है। 

● यह संकेतों व शारीरिक क्रियाकलापों द्वारा किया जाता है। 

● संगीत और शाब्दिक रचना इसमें समाहित होती है। 

● यह एक प्रकार का अभिव्यक्ति नाटक है। 

● यह नृत्य कला धर्म से भी जुडी होती है।

भारतीय शास्त्रीय नृत्यों का आधर भरतमुनि द्वारा लिखित प्राचीन कालीन ग्रंथ "नाट्यशास्त्रा" है।

भारतीय शास्त्रीय नृत्य की मुख्य विशेषताऐं है :-

   ◆ अभिव्यक्ति के भाव रस

   ◆ संकेत

   ◆ हाव-भाव

   ◆ अभिनय कला

   ◆ मूल कदम

   ◆ खडे होने का आसन आदि। 

● यह नृत्य अधिकतर धर्मिक आधार, मूल्यों और अध्यात्मिकता से जुडे होते हैं। 

● भरतनाट्यम, कथक,ओडिसी, मोहिनी अट्टम और कुछ अन्य नृत्यों को भारतीय शास्त्रीय नृत्य समझा जाता है। 

शास्त्रीय नृत्य की कुछ विशेषताएं होती है - हस्त मुद्रा, पैरों की थाप, आसन आदि जो संगीत के साथ किया जाता है।

शास्त्रीय नृत्य संस्कृत के ‘शास्त्रा’ शब्द से आया है। इसका अर्थ है प्राचीन शास्त्रों पर आधरित कलाओं व उनका प्रदर्शन। 

शास्त्रीय नृत्य मुख्य रूप से कहानी या अन्य कोई संगीत से संबद्ध नृत्य है। 

● यह क्रियाकलाप, भाव-भंगिमा और संकेतों व आसन की सही स्थिति पर बल देता है। 

● यह शांति और सौहार्द्रता की भी अभिव्यक्ति करता है। यह भक्ति, नियमित अभ्यास के साथ मजबूत और सक्रिय शरीर की मांग करता है।

शास्त्रीय नृत्य नवरस यानि 9 भाव और संवेगों को अभिव्यत्क करते हैं जो कि निम्न है :

1. श्रृंगार अर्थात् प्रेम, सुख और आनंद को परिभाषित करता है।

2. हास्य का अर्थ हंसी और मजाक है।

3. करूणा-दुख का परिचायक है।

4. रौद्र-क्रोध् और गुस्से की अभिव्यक्ति करता है।

5. वीर्य-शक्ति और साहस को दिखाता है।

6. भयानक से अर्थ डर, चिंता और परेशानी है।

7. वीभत्स घृणा है।

8. अद्भुत-अचरज और जिज्ञासा को दिखाता है।

9. शांत-शांति और खामोशी प्रदर्शित करता है।

संगीत नाटक अकादमी और संस्कृति मंत्रालय ने निम्न नृत्यों को भारत के विभिन्न प्रदेशों के शास्त्रीय नृत्य के रूप में मान्यता दी है।

भारत के प्रमुख शास्त्रीय नृत्य कौन कौन से हैं?
भारत के कुल कितने शास्त्रीय नृत्य हैं?

भारत के प्रमुख शास्त्रीय नृत्य कितने हैं ?

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भरतनाट्यम :- 

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भारत का सबसे प्रसिद्ध नृत्य कौन सा है?

भरतनाट्यम नृत्य भारत का सबसे प्रसिद्ध नृत्य है।

यह तमिलनाडु की प्रमुख नृत्य शैली है।

● इस नृत्य शैली में कविता संगीत नृत्य एवं नाट्य का अद्भुत समावेश होता है 

● इस नृत्य शैली की उत्पत्ति भारत के नाट्यशास्त्र से चोल कल में हुई थी।

भरतनाट्यम नृत्य में ऊपरी शरीर स्थिर रखते हैं। साथ ही पैर झुके हुए और घुटने लचीले होते हैं। इनमें पैरों के घुमाव हाथों, हाथों और शरीर के संकेतों के साथ होते है। 

● यह नृत्य गीत संगीत के साथ किया जाता है जो अधिकतर गुरू के साथ करते हैं। 

● धुन के लिए कर्नाटक संगीत का प्रयोग किया जाता है। 

● ज्ञान गीत के साथ हिंदु देवी-देवताओं की पौराणिक कथाऐं शामिल होती है।

● यह एकल और समूह दोनों नृत्यों के रूप में होता है।

● भरतनाट्यम् को प्रचलित करने में कुछ प्रमुख नृत्यागंनाऔं का नाम है-रूकमिणी देवी, अरूणादाले, बाला सरस्वती और यामिनी कृष्णामूर्ति आदि। 

●इस नृत्य को निम्न सात क्रमों में किया

जाता है :- अलारीप्पू, जातिस्वरम् , शब्दम्, वर्णम्, पदम्, थिलना और श्लोकम् अथवा मंगलम्।

1. अलारीप्पू :- अलारीप्पू में वंदना अर्थात्-नृत्य की शुरूआत की जाती है। यह एकाग्रता को

प्रदर्शित करता है।

2. जातिस्वरम् :- जातिस्वरम् नृत्य में ताल, सुर और शारीरिक क्रियाऐं की जाती हैं।

3. शब्दम् :- शब्दम् में एक छोटी सी शब्द रचना होता है।

3. वर्णम् :- वह नृत्य है जो लंबे समय तक छाप छोडता है। वर्णम् होता है।

5. पदम् :- पदम् का अर्थ अभिनय अथवा रस की भावात्मक अभिव्यक्ति है। इसमें प्रार्थना और समर्पण की भावना निहित होती है।

6. थिलना :- थिलना का अर्थ है नृत्य की समाप्ति जहाँ गीत और क्रियाकलाप ताल से होते हैं।

7. श्लोकम् या मंगलम् :- श्लोकम् या मंगलम् नृत्य का अंतिम क्रम होता है जो अध्कितर श्लोक के रूप में होता है।

भरतनाट्यम नृत्य सिल्क साडी की वेशभूषा पहनकर किया जाता है। 

● यह वेशभूषा सुनहरी जरी की कढाई, किनारी लगाकर तैयार किया जाता है। इसकी प्लेटस (साडी की लपटें) को इस प्रकार सीला जाता है कि यह एक विशेष प्रकार की भांति खुलती है। यह विशेषतः अराई मंडी (आधी-बैठने) और मुसी (पूरी तरह से बैठने) पर नजर आता है। मेकअप और गहने भी विशेष होते हैं।


कत्थक :- 


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कत्थक कहाँ का शास्त्रीय नृत्य है?


● यह उत्तर भारत का प्रमुख शास्त्रीय नृत्य है।

● यह नृत्य भगवान कृष्ण द्वारा किया गया था।

● इस नृत्य के दो अंग हैं :-

   (1) ताण्डव (2) लास्प

कथक को संस्कृत के शब्द कथा से उदुभूत किया गया है। कथक में एक कहानी सुनाने के लिए नृत्य का प्रयोग किया जाता है। 

● यह अभिव्यक्ति और शारीरिक क्रियाकलाप से कहानी सुनाते हैं। 

● यह एक प्रकार का सूफी नृत्य है। यह नृत्य ‘घराना’ शैली से किया जाता है। 

कुछ प्रमुख ‘घराना’ शैली हैं - लखनऊ घराना,

बनारस घराना और जयपुर घराना। 

● हर घराने की अपने शैली कथा निर्माण और

वाद्य यंत्रा हैं। यहां पैरों द्वारा विशेष कार्य किया जाता है। घुंघरू और चक्कर (शरीर के चहुं ओर चक्कर लगानाद्) इस नृत्य की प्रमुख विशेषताएं हैं।

कुछ प्रमुख कथक नृत्य कथाऐं व गीत है :-


● ताल तीन ताल जिसमें 16 ताली, झापताल जिसमें 10 ताल, दाद्र जिसमें 6 ताली होती हैं और अन्य

● आमद

● टुकडा

● तोडा

● परण

● चक्कर (शरीर के चहुं और चक्कर लगाना)


कथक नृत्य की वेशभूषा अनारकली या लंबी कमीज चूडीदार के साथ होती है।

ओढिनी का प्रयोग कमर पर बांधनें के लिए किया जाता है। 

● हाथ और गले पर कढाई की जाती है। यह गहनों की भांति प्रतीत होता है। 

वेशभूषा को इस प्रकार बनाया जाता है ताकि चक्कर और घुमाव करते समय परेशानी ना हो। घुंघरूओं को चूडीदार के ऊपर दोनों पैरों पर बांध जाता है।

● कुछ प्रसिद्ध कथक नृर्तक हैं-बिरजू महाराज, सितारा देवी, शोभना नारायण और अन्य

प्रसिद्ध नृर्तक। उन्होंने कथक के प्रचार व प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

कथकली :-

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● यह कर्नाटक एवं मालाबार तट (केरल) की प्रधानता नृत्य शैली है।

● यह पुरुष प्रधान नृत्य है।

● यह सामूहिक नृत्य होता है।

● इस नृत्य शैली का सर्वश्रेष्ठ प्रशिक्षण संस्थान भारतपूझा स्थित केरल कला मंडलम है।

कथकली एक शास्त्रीय नृत्य है जो अधिकतर मलयालम भाषी लोग करते हैं। 

● यह नृत्य केरल में दक्षिण-पश्चिमी क्षेत्रों में किया जाता है। यह नृत्य कुछ हिंदु मंदिरों अथवा कला शैलियों द्वारा विकसित किया जाता है। 

● इनकी प्रमुख विशेषताऐं हैं :-

   👉 ज्यादा मेकअप 

   👉 चेहरे पर मुखैटा 

   👉 विशेष वेशभूषा।

● यह नृत्य अधिकतर पुरुष करते हैं। 


Note :- आजकल कुछ महिलाऐं भी यह नृत्य करने लगी हैं।


● इस नृत्य में भारतीय मार्शल आर्टस और दक्षिण भारत की खेलकूद शारीरिक गतिविधियाँ शामिल होते है। 

● यह नृत्य पौराणिक कथाऐं, अध्यात्मिकता,

हिंदु ग्रंथावलियाँ तथा पुराणों पर आधरित कथाओं का अमिनय मंचन है।

● उदाहरण के लिए-कृष्ण अट्टम एक नाट्य नृत्य है जिसमें हिंदु ईश्वर कृष्ण और रमानट्य में रामायण पर आधरित जीवन और क्रियाकलाप प्रदर्शित किए जाते हैं।

कथकली नृत्य एक लंबे समय तक चलने वाला नृत्य है। 

● यह सुबह से शाम तक विभिन्न अंतरालों पर चलता है। यह कुछ दिन तक भी चल सकता है। आधुनिक कथक कार्यक्रम छोटे होते हैं। 

● इनका कार्यक्रम खुले स्थान जैसे मंदिर के बाहर

प्रागंण में किया जाता है। 

इसके विशेष थिएटर (नाट्य स्थान) कुट्टृमपालम कहलाते हैं। 

● यह स्थान मंदिर के अंदर होते हैं जिनका प्रयोग कथकली के प्रदर्शन में किया जाता है।

● इस नृत्य में मेक-अप अत्यंत महत्वपूर्ण है और लंबे समय तक किया जाता है। 

● इस नृत्य में सात प्रकार के मेक-अप का प्रयोग किया जाता है। 

● इसमें प्रमुख हैं :-

पच्छा (हरा) पजुहुपु (पका हुआ), काठी (चाकू) कारी, ताडी, मिककू और टेपू आदि। 

● रंगों को चावलों से और हरी सब्जियों को मिलाकर (चेहरे के लिए) बनाया जाता है। रंगों का प्रयोग पात्र पर आधरित होता है ।


जैसे-कृष्ण, विष्णु, राम, शिव, सूर्य, युध्ष्ठिर, अर्जुन, नल और अन्य राजा आदि।


● नर्तक इशारों से पात्रा की बात सामने रखते हैं। हाथों की मुद्रा का भी प्रयोग किया जाता है। 

● भाव या संवेगों की अभिव्यक्ति के लिए चेहरे और हाथों की मुद्रा द्वारा की जाती है। 

कथकली नृत्य में 24 मुख्य मुद्रा होती है।

● कथकली नृत्य धीरे-धीरे शुरू होता है। इसमें एक प्रकार का संकेत निहित होता है जिससे वाद्ययंत्रा जुडे होते हैं। यह संकेत नृत्य प्रारंभ करने का परिचायक है।

● यह दर्शकों के लिए भी एक प्रकार का संकेत है।

● सही नाट्य जिसमें गीत संबंध् होते हैं-उन्हें टोटायम और पुरूपटटू कहा जाता है। 

● नाटक प्रदर्शित करने के अनेक तरीके हैं।

● संवेगों को अभिव्यक्त करने के लिए गायक गानों को ऊँचे और नीचे स्वर में गाते हैं। 

कथकली में मुख्य रूप से तीन प्रकार के संगीत वाद्ययंत्रा हैं :-  मडालाम, चिंदा और इडक्का।


कुचिपुड़ी :- 

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● यह आंध्रप्रदेश का प्रसिद्ध नृत्य है।

● इस नृत्य का मुख्य उद्देश्य वैदिक एवं उपनिषदों में वर्णित धर्म एवं आध्यात्म का प्रचार-प्रसार करना है। 

● भागवत एवं पुराण इसका मुख्य आधार है।

● इसकी वेशभूषा सामान्यतः भरतनाट्यम नृत्यशैली के प्रकार की होती है।

कुचिपुड़ि आंध्रप्रदेश का एक सुंदर नाट्य नृत्य है। इस नृत्य में पैरों के तीव्र क्रियाकलाप, नाटय पात्रा, आखों से अभिव्यक्ति और वर्णन के लिए जाना जाता है। 

● यह तांडव और लास्य नृत्य का परिचायक है।

● इस नृत्य में कर्नाटक संगीत का प्रयोग होता है।

● इनमें कांसे प्लेट का प्रयोग होता है। 

● इस नृत्य में संस्कृत और तेलुगु भाषा का प्रयोग होता है। 

● ये नृत्य भली भांति सीखने में लगभग 7 वर्ष से ज्यादा का समय लग सकता है।

● यह नृत्य भरतनाट्यम से जुडा हुआ है। इस नृत्य में दो नृत्य शैलियां साथ-साथ चलती हैं जिन्हें नट्टुवा मेला और नाट्य मेला कहा जाता है। 

नट्टुवा मेला को भरतनाट्यम में और नाट्य मेला को कुचिपुड़ि में विकसित किया जाता है। 

● यह नृत्य दोनों पुरुष और महिलाएं द्वारा किया जाता है।

कुचिपुड़ि नृत्य नाट्य से जुडा हुआ है। यह नृत्य भाषा, अंग विशेष (अंगों के इशारे) और शुद्ध नृत्य पर आधरित है।

कुचिपुड़ि और भरतनाट्यम की वेशभूषा समान और आकर्षक है। 

● नर्तक हल्का मेक-अप करते हैं और गहने जैसे- रखडी, चांदवकी (बाजू बंद), अदा भाषा और

कसीना सार (गले का हार) पहनते हैं। 

● फूल और हल्के गहने हल्की वजन की लकडी से बनाए जाते हैं जिसे बोरूगु कहा जाता है। 

● साडी को विशेष तरीके से पहना जाता है। 

● इस प्रकार के नृत्य में साडी के सामने पंखनुमा कपडा आता है और पल्लू को पीछे की ओर बाँधा जाता है। 

● घुंघरू पैरों पर पहले से बांधे जाते हैं ताकि वह पैरों के साथ साथ सुर प्रदान कर सकें।

● यह नृत्य अधिकतर एकल महिला नर्तकों द्वारा किया जाता है। 

● इस नृत्य की प्रमुख रचनाऐं हैं :- जयदेव लिखित अष्टपडी, रामायण, पुराण और त्यागराज की रचनाऐं आदि।

कुचिपुड़ि के प्रमुख कलाकार हैं : - वेमपती चिन्ना सत्यम् और लक्ष्मी नारायण शास्त्री आदि। 

● इन्हांने कला के विस्तार हेतु चैन्नई में अकादमी की स्थापना की हैं।

ओडिसी :-

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● यह उड़ीसा का प्रसिद्ध नृत्य है।

● भगवान जगन्नाथ को समर्पित यह नृत्य शैली पूर्ण रूप से आध्यात्मिक है।

● इस नृत्य में अंग संचालन, नेत्र संचालन, ग्रीवा संचालन, हस्त मुद्राओं, पद संचालन पर विशेष ध्यान दिया गया है।

ओडिसी को ओरीली भी कहा जाता है। 

● यह एक पुराना नृत्य है जिसे भारत के पूर्वी तट पर हिंदु मंदिरों में किया जाता है। 

● इनका उद्भव ओडिसा से माना जाता है। यह नृत्य भक्ति का प्रदर्शन करता है। 

● इस नृत्य में प्रमुख रूप से भगवान विष्णु को जगन्नाथ, शिव, सूर्य और शक्ति की पूजा अर्चना की जाती है। 

● यह अधिकतर महिला नर्तक, एकल अथवा समूह में करते हैं। 

● आजकल लडके भी ओडिसी नृत्य के प्रदर्शन में भाग लेते हैं।

● इस नृत्य का आधर भाव-भंगिमा है। 

● इसमें शरीर के (एक प्रकार से समरूप शारीरिक क्रियाकलाप), शारीरिक हाव भाव, अभिनय

और मुद्रा का प्रयोग करते हैं। 

● इस नृत्य में संकेतों का भी प्रयोग किया जाता है। इस नृत्य के प्रदर्शन में पैरों की निम्न थाप और ऊपरी शरीर में हाथों और सिर के क्रियाकलापों का प्रयोग करके समरूपता और ताल का संगीतबद्ध निर्माण होता है।

ओडिसी नृत्य के प्रमुख स्तर है :-

● प्रारंभ - मंगल चरण

● नृत्य (शुद्ध नृत्य) बाहु, या बाहु नृत्य अथवा स्थायी नृत्य अथवा बाटुक भैरव

● नृत्य (अभिव्यक्ति नृत्य), अभिनय

● नाट्य (नाटक नृत्य) - कहानी वर्णन

● मोक्ष (नृत्य का अंतिम चरण जिससे आत्मा को स्वतंत्रा किया जा सके)

ओडिसी के तीन मुख्य चरण हैं : -

● क्षमा मांगना

● अभंगा

● त्रिभंगा

ओडिसी नर्तक रंगीन पट्टा साडी (अधिकतर ओडिसा में बनी हुई) पहनी जाती है। 

● इसके साथ मेक-अप और चांदी के गहने पहने जा सकते हैं। इस साडी के प्लेटस इस प्रकार बनायी जाती है जिससे पैरों की थाप में अधिकतर

लचीलापन हो। 

● बालों को बांध जाता है और सफेद फूल बालों में लगाए जाते हैं। इसे अर्द्ध चंद्रमा या मुकुट कहा जाता है।

● चेहरे के मेक-अप में बिंदी और काजल लगाया जाता है। 

● कानों में पहनने वाले विशेष गहने को कापा कहते हैं।

● ऊपरी बाजू में पहनने वाले बहिपुडी या बाजूबंद

कहलाते हैं और चूडियाँ नर्तक के हाथों में पहनी जाती है। 

● हाथों को लाल रंग के आल्टे से रंग किया जाता है।

ओडिसी नृत्य के प्रमुख नृत्य हैं-कल्याण, नट, श्री, गौडा, बाराडी, पंचमा, धन , श्री, कर्नाता, भैरवी और शेकबाराडी। 

ओडिसी नृत्य में मर्डाल, हारमोनियम, बांसुरी, सितार, वायलिन और झांझ आदि का प्रयोग उंगलियों अथवा अन्य शारीरिक भाग से करते हैं।


सतारिया नृत्य

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सतारिया नृत्य असम का शास्त्रीय नृत्य है। इस नृत्य की खोज संत श्रीमंत शंकर देव ने लगभग 500 वर्ष पूर्व की थी। 

● ‘सतारास’ नाम का सामाजिक और धर्मिक

समूह के लोगों ने इस नृत्य की उद्भावना हिंदुत्व और इसकी सीखों की अभिव्यक्ति के लिए किया था। 

● यह असम की भव्यता और सांस्कृतिक विरासत को अभिव्यक्त करता है। 

● यह नृत्य राम और सीता, कृष्ण और राध के जीवन को दिखाता है। 

सतारिया नृत्य जब पुरुष के रूप में किया जाता है, तो पौरूषिक भांगी और स्त्री भांगी के रूप में सीमंगी कहलाता है।

● यह नृत्य शैली संरचनात्मक व्यायाम पर आधारित है, इसे माटी-अखोटा कहा जाता है।

● माटी-आखोटा एक मूलभूत व्यायाम शैली है

जिससे नृत्य में अनेक मुद्रा करने में आसानी

होती है। 

● अनेक नृत्य मुद्राऐं हैं-शरीर की मुद्राऐं, शरीर मोडना, पैरों की क्रियाकलाप, हाथों की मुद्राऐं, कूदना, हाथ व गर्दन के इशारे आदि।

● प्रारंभ में यह नृत्य केवल पुरुष करते थे। अब महिला नर्तकी भी इस नृत्य में भाग लेती हैं। महिला नर्तकी मूंगा रंग की सिल्क साडी मैचिंग ब्लाऊज के साथ पहनती है। 

● माथे पर लाल रंग की बिंदी, लाल रंग की लिपिस्टक, गहरी रंग की आंखें और बालों में फूल लगाती है। 

● यह उन्हें नाटक नृत्य में सहायक है। सोना और चांदी के गहने मिलाकर पहने जाते हैं। 

● यह गहने रखडी, तगडी, कानों के झुमके और भारी गले के हार के रूप में होते हैं। 

● इस नृत्य में प्रयुक्त होने वाले मुख्य वाद्ययंत्रा हैं- खोल, बहि , वायलिन, तानपुरा, हारमोनियम और शंख । 

● सतारी शास्त्रीय नृत्य की पुरस्कार विजेता नर्तकी डा. मलिका खंडाली हैं।


मणिपुरी :- 

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● यह उत्तर मणिपुर में सबसे अधिक प्रचलित है

● इसे विकसित करने का श्रेय वहां के शासक भाग्यचन्द्र को जाता है।

● यह नृत्य एक प्रकार की रासलीला है।

● इसमें 64 प्रकार के रासों का प्रदर्शन होता है।

● इसमें नर्तक एवं नर्तकियां राधा - कृष्ण एवं गोपियों का स्वरूप धारण कर मंच पर लीला करतें हैं  ।

● मणिपुरी नृत्य भारत के उत्तर-पूर्वी राज्य मणिपुर में किया जाता है। 

● यह एक शास्त्रीय नृत्य है।

● यह एक धीमा और सुंदर नृत्य है। 

● अन्य शास्त्रीय  नृत्यों की तुलना में यह नृत्य बेहद आकर्षक है। 

● यह मुख्य रूप से भक्ति रस में किया जाता है। इससे भगवान श्री कृष्ण और उनके बाल्यकाल की कहानियों को दर्शाया गया है। 

● चोलोन अर्थात् क्रियाकलाप, मणिपुर का पुरुष नृत्य है। 

● चारी अथवा चाली मणिपुर के दस रसप्रधन नृत्य के आधर हैं। 

● अधिकतर नर्तकों में कृष्ण, राध और गोपियाँ होती हैं।

मणिपुरी नृत्य की तीन प्रमुख शैलियाँ हैं-

1. लाई हारोबा

2. संकीर्तन

3. रासलीला

लाई हाराबा का अर्थ है ईश्वर की भक्ति करना।

● यहाँ पर खंभा और थिओबी की कहानी सुनाई जाती है।

● अन्य कहानियों के पात्रों को नोंगपोकनिंग योओ और पंयथोईबी कहा जाता है। 

● यह मूल रूप से प्रेम कथाएं होती हैं। यह पात्रों तथा ईश्वर को प्रदर्शित करते हैं जैसे शिव और पार्वती। 

पेना वाद्ययंत्रा का प्रयोग किया जाता है। 

● चैतन्यी वैष्णवी लोग ईश्वर की प्रार्थना गीत, वाद्ययंत्रा बजाकर और नृत्य करके की जाती है।

● संकीर्तन को अधिकतर पुरुष नर्तक प्रदर्शित करते हैं। इस नृत्य में वाद्ययंत्र बजाना, गाना गाना और नृत्य तीनों एक ही व्यक्ति करता है। इसे पंग चोलेम कहा जाता है। 

● यहाँ पर करताल चोलेम भी किया जाता है। इसमें करताल ध्वनि की आवाज और बजाने के अनुसार नृत्य किया जाता है। 

● इसके क्रियाकलाप बेहद आकर्षक होते हैं। इस गायन को ईशोई कहा जाता है जो कि बंगाल की कीर्तन शैली है।

● मणिपुरी शैली के गायन में आवाज हिलती है। इसके ताल बहुत ही रूचिपूर्ण होते हैं। 

● पंग के लिए 64 तालों का प्रयोग किया जाता है। इस नृत्य की वेशभूषा सरल व सपफेद रंग की होती है जिसमें अलग-अलग रंग और प्रकार से पगडी पहनी जाती है। 

● संकीर्तन अनेक अवसरों जैसे जन्मोत्सव, शादियों अथवा नृत्य पर किया जाता है।

मणिपुर की रामलीला भारतीय संस्कृति का आकर्षण है। 

● यह भगवद् कथा को अनुसरण करती है। 

● कृष्ण की बाल्यकाल की कहानियाँ गोपामर और उदृ कालारस कहलाती है। 

● रामलीला की रचनाओं को वसंतरस और कुजारस कहते हैं।

मणिपुरी नृत्य में वेशभूषा अनोखी होती है।

● इसकी वेशभूषा देखने से ही पत चलती है। 

● एक पुरुष नर्तक एक चटक रंग की धेती या छोटा सा धेत्रा पहनता है जो कमर से पैर तक ढकता है।

● सिर पर मुकुट और पंख बांध्कर वह भगवान

श्री कृष्ण का रूप रखते हैं। 

● महिला नर्तक की वेशभूषा कुमिल वेशभूषा कहलाती है। 

● यह एक सुसज्जित लंबी र्स्कट होती है। जो पैरों से सकरा होता है। 

● कमर पर वह एक पफूल के रूप में नजर आता है। 

● एक सुसज्जित वेलवट चोली या ब्लाऊज पहना जाता है। 

● एक आर-पार दिखने वाला सपफेद पर्दा चेहरा ढकने के लिए प्रयोग किया जाता है। 

● चेहरे का मेकअप भी अलग तरह से किया जाता है।

नर्तक विभिन्न प्रकार के गहने शरीर के अलग-अलग हिस्सों पर पहनता है। 

● नर्तक तैरने वाली अप्सराओं के रूप में नजर आती हैं।



मोहिनी अट्टम :- 

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● यह केरल का प्रसिद्ध नृत्य है।

● भगवान विष्णु नें मिहिनी रूप धारण कर केरल तट पर नृत्य किया था।

मोहिनी अट्टम एक मंत्रा मुग्ध् करने वाला नृत्य है जो कि केरल में महिलाओं द्वारा किया जाता है। 

● यह कर्नाटक संगीत पर किया जाता है। यह नृत्य भरतनाट्यम से जुडा माना जाता है।

मोहिनी अट्टम विष्णु की लीला और क्रियाकला को प्रदर्शित करता है। 

● यह लीला मोहिनी अवतार में किया जाता है।

● यह शास्त्रीय नृत्य बहुत आकर्षक है। 

● ताल के साथ होने वाले नृत्य को अदावत कहा जाता है। 

● इस नृत्य में 4 अदावत होती हैं जो कि निशिचर कोलम या स्वरों में होती हैं यह निम्न है :-

थगानामाम - 14

जगानाम - 6

धगानाम - 4

शमी य्रामम या वक्रम (विभिन्न संख्या में)

● यह एक लास्य प्रकार का नृत्य है जैसे निम्न क्रम में किया जाता है :-

1. छोलेकेटु

2. जातिस्वरम

3. वर्णम्

4. पदम्

5. विलाना

6. श्लोकाम्

7. सत्तम्

चेहरे के हावभाव और पैरों की थाप भी विशेष होती है।

वेशभूषा : - 

● इसमें नर्तक सफेद या हल्के सफेद रंग की सादा साडी पहनते हैं , जिसमें सुनहरे चटक रंग की किनारी होती है। 

● यह साडी मैचिंग चोली या ब्लाऊज के साथ पहनी जाती है। 

● इसे केरल कसावु साडी भी कहते हैं। 

मुख्य गहने हैं :- कमर पर सुनहरी बेल्ट, माथे, बालों, कान, गले, कलाई और उंगलियों पर पहने जाने वाले गहने और पैरों में ‘घुंघरू’। 

● माथे पर लाल रंग का टीका लगाया जाता है। लाल लिपिस्टक और काला काजल नृत्य की अभिव्यक्ति में सहायता करते हैं। 

चमेली के सफेद फूल अधिकतर बालों की शोभा बढाते हैं।

संगीत और वाद्य यंत्रा :- 

● इस नृत्य की मुख्य रचनाएं मणि प्रवला में किया जाता है। 

● यह शैली संस्कृत और मलयालम भाषा से मिलकर बनाया गया है। 

● इसकी संगीत शैली कर्नाटक है। 

● कुछ मुख्य वाद्य यंत्रा हैं-कुझीटालम् या झांझ, वीणा, इदक्ला (रेत घडी की आकृति का ड्रम), मृदंगम (ड्रम की आकृति का ड्रम) जिसमें दो सिर और बांसुरी आदि।


कुछ अन्य महत्वपूर्ण भारतीय शास्त्रीय नृत्य :- 


यक्षगान :-

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● यह नृत्य कर्नाटक राज्य से सम्बंधित है।

● इस नृत्य की भाषा कन्नड है।

● इस नृत्य का विषय पौराणिक हिन्दू महाकाव्य है।

यक्षगान एक थिएटर है जो कि कर्नाटक के कन्नड जिलों में विकसित किया जाता है। 

● इसकी शुरूआत एक संत नरहरि तीर्थ द्वारा की जाती है। इन्होंने उदुपि में दशावतार नृत्य का प्रदर्शन किया। 

यक्षगान का अर्थ है :- डेमी ईश्वर के भक्ति गीत। यक्ष का अर्थ है अर्द्ध-ईश्वर तथा गान का अर्थ है : - गीत। 

● यह गीत वैष्णव भक्ति से प्रभावित होता है। 

● यह रूचिकर और रंगीन कपडे, वेशभूषा पहनकर किया जाता है। 

● यह नृत्य बडे मुकुट पहनकर किया जाता है। इसी कारण इस नृत्य की अलग पहचान है। 

● यह एक प्रकार का काव्य-नाटक या नाटक है।

● इस नृत्य में मुख्य संगीतकार को ‘भगवन’ कहा जाता है। यह वर्णन को नियंत्रित करता है। 

● इस नाटक की शुरूआत ‘सवलक्षणा’ से होती है जिनके पश्चात् ‘प्रसंग’ अर्थात् गीतों का प्रवाह प्रारंभ होता है। 

● इसकी पृष्ठभूमि में संगीत ड्रम, पाइप और अन्य वाद्ययंत्रा बजाए जाते हैं। 

● यह महाभारत, रामायण और पुराणों की कहानियों का वर्णन करता है। यक्षगान में हास्य होता है जो कि मजाकिया

(जोकर) प्रदर्शित करता है। 

● इसे ‘हास्यागर’ कहा जाता है। 

● दोनों पुरुष और महिलाऐं यक्षगान करते हैं। 

राजा और दैव्य दर्शाने के लिए अलग-अलग वेशभूषा पहनी जाती है। 

● यह खुले में किया जाता है। 

सुबह से शाम तक चलने वाले इस नृत्य को मंदिरों में ‘रंगस्थला’ में त्यौहारों के समय किया

जाता है।


औट्टनतल्लाल :-

● यह भी केरल का प्रसिद्ध नृत्य है।

● इसे गरीबों का कथककली कहा जाता है।

● इसमें मलयालम भाषा का प्रयोग किया जाता है।

● इसके जनक कुंजन नाम्बियार है।

चाब्यारकुन्तु :-


● यह भी केरल का प्रसिद्ध नृत्य है।

कृष्णन अट्टम :-


● यह नृत्य भगवान कृष्ण की मुद्रा में आठ रातों तक नृत्य किया जाता है।


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