Bharatiya Itihas के अध्ययन के स्त्रोत | भारतीय इतिहास के स्रोत PDF | Notes Hindi PDF

 

Bharatiya Itihas के अध्ययन के स्त्रोत | भारतीय इतिहास के स्रोत PDF | Notes Hindi PDF

भाग -1
Bharatiya Itihas के अध्ययन के स्त्रोत | भारतीय इतिहास के स्रोत PDF | Notes Hindi PDF




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● यह सत्य है कि प्राचीन भारत ने हैरोडोटस पैदा नहीं किया, जो "हिस्ट्री” जैसा ग्रंथ लिखता ।किंतु इसका तात्पर्य यह नहीं है कि प्राचीन भारत के लोगों की इतिहास में रुचि नहीं थी।

● वस्तुत: उनकी इतिहास विषयक अवधारणा आज के संदर्भ में सर्वथा भिन्न थी।

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● इसी कारण आधुनिक अर्थ में इतिहास लिखने का प्रयास करने वाले विद्वानों को प्राचीन भारत का इतिहास लिखने में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

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● क्योंकि भारत के प्राचीन साहित्य में आख्यान, धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र, वंश विस्तार आदि अनेक विषयों का समावेश होता है।

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● भारतीय दृष्टिकोण मुख्यत: आध्यात्मिक रहा है। बल्कि यूं कहना चाहिए कि अधिकांशत: भौतिक घटनाओं के लेखे-जोखे का महत्व अलग से नहीं पहचाना गया है । 

● इसे हम साहित्य में एक “सामूहिक दृष्टिकोण" का नाम दे सकते हैं । इसका अर्थ यह कदापि नहीं है, कि इतिहास जानने के साधनों का पूर्णतः अभाव है । 

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● सत्य तो यह है कि हमारे पास विश्व का सबसे विशाल साहित्य है जो हमारी सांस्कृतिक धरोहर है  उसी में से ऐतिहासिक सामग्री अलग करनी पड़ती है।

 

परवर्ती काल में हमारी बहुत सी साहित्यिक सामग्री आक्रमणकारियों द्वारा नष्ट करदी गयी थी। इसके अतिरिक्त हमें इस बात की जानकारी मिलती है कि भारत में अलग से भी इतिहास लिखने के प्रयास किये गये थे । 

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सातवीं शताब्दी में भारत का परिभ्रमण करने वाले चीनी यात्री ह्वेनसांग ने उल्लेख किया है कि अच्छी-बुरी घटनाओं का वृत्तांत लिखने के लिए एक अलग अधिकारी होता था ।

● कश्मीरी लेखक कल्हण ने भी लिखा है कि वही गुणवान कवि प्रशंसा का पात्र है जो राग द्वेष से ऊपर उठकर एकमात्र सत्य का निरुपण अपनी भाषा में करता है । 

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● यहाँ लेखक कल्हण का संकेत एक अच्छे इतिहासकार की ओर ही है । इसी से हम कह सकते हैं कि प्राचीन भारत के निवासियों में इतिहास के प्रति अभिरुचि एवं चेतना दोनों विद्यमान थी वस्तुत: वे भारतीय मनीषि इतिहास को एक व्यापक संदर्भ में देखते थे ।

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प्राचीन भारत के इतिहास के साधनों को अध्ययन के लिये निम्न ढंग से वर्गीकृत किया जा सकता है।


साहित्यिक साधन 

● जैसा कि पूर्व उल्लिखित हो चुका है कि प्राचीन भारतीय साहित्यिक सामग्री अपनी व्यापक परिभाषा मे भी इतिहास विषय पर पर्याप्त प्रकाश डालती है। 

● अध्ययन की सुविधा के लिये साहित्यिक सामग्री को भी धर्मग्रन्थ, ऐतिहासिक एवं समसामयिक ग्रन्थ और विदेशी यात्रियों के वृत्तान्त शीर्षक में विभक्त किया जा सकता है। जो इस प्रकार से है :-

धर्मग्रन्थ

प्राचीन भारत के धार्मिक ग्रन्थों मे, जो कि प्रचुर संख्या में उपलब्ध होते हैं, धार्मिक एवं आध्यात्मिक विषयों पर विवेचन के साथ-साथ राजनीतिक, सामाजिक व्यवस्था में वंश एवं “गौत्र" तथा "राजा" अथवा "सम्राट" के पद की महिमा बढ़ती गयी, साहित्यिक सामग्री में भी उनके क्रिया-कलापों का लेखा-जोखा अधिक विस्तार से आने लगा।

● इन ग्रन्थों को भी उनके "धर्म" या "मत" विशेष से सम्बन्धित होने के आधार पर पुन: एक बार और वर्गीकृत कर सकते हैं और उनका विवरण इस प्रकार है :-

ब्राह्मण धर्मग्रंथ

● यह हमारी विशाल साहित्यिक निधि है, जिसमें सर्वप्रथम स्थान वेदों का हैवेद का अर्थ ज्ञान है| ज्ञान कभी एक जाति, काल अथवा देश का नहीं होता । इसीलिए वेदों को सार्वभौम, अनंत, अपौरुषेय, दैवी ओर शाश्वत कहा गया है ।

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वेद 

वेदों की संख्या चार है - ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद व अथर्ववेद।

● वेदों में सबसे प्राचीन ऋग्वेद है। इस ग्रंथ से प्राचीन आर्यों के धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक जीवन पर प्रकाश पड़ता है। इसमें आर्यों की प्राचीनतम ऋचाओं का संकलन है। ऋग्वेद में 10 मण्डल है जिनमें 1028 सूक्त है। 

● इनसे उत्तर वैदिककालीन आर्यों (1500 ई.पू. से 600 ई.पू.) के जीवन पर प्रकाश पड़ता है। 

यजुर्वेद कर्मकाण्ड प्रधान है। 

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सामवेद के अधिकतर मंत्र ऋग्वेद से लिए गये है।

अथर्ववेद में अनेक विषय हैं जैसे ब्रह्मज्ञान, धर्म, औषधि, रोग निवारण आदि। अथर्ववेद में हमें धार्मिक अंधविश्वास भी दिखायी देते है। 

● सभी वेदों के अलग-अलग ब्राह्मण ग्रंथ है।

● कर्मकाण्डों की प्रतिष्ठा बढ़ने के कारण इनका निर्माण किया गया। 


● इन आदि ग्रन्थों के अभाव में संभवत: आर्यों के विस्तार का स्पष्ट ज्ञान प्राप्त करना कठिन हो जाता है। 

● उपनिषद् भी इसी काल की रचनाएं है। इनसे हमें प्राचीन आर्यों के दार्शनिक विचारों का ज्ञान होता है, जैसे कि सृष्टि की रचना किसने की? जीव क्या है? मृत्यु के बाद जीव का क्या होता है? ईश्वर का स्वरुप क्या है- आदि । 

बहुदेववाद के स्थान पर एक ब्रह्म की स्थापना करना इनका उद्देश्य है । 

● उपनिषदों में ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डूक, माण्डूक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय, श्वेताश्वतर, छान्दोग्य, बृहदारण्यक, मैत्रायणी और काषीतकी महत्त्वपूर्ण है।



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वेदांग 

वैदिक काल के अंत में वेदों का अर्थ ठीक प्रकार से समझने के लिए वेदांगों की रचना हुई । 

वेदांग छः हैं- शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद और ज्योतिष । 

● वैदिक स्वरों का शुद्ध उच्चारण करने के लिए "शिक्षा-शास्त्र' का निर्माण हुआ । 

● ऐसे सूब जिनमें विधि और नियमों का प्रतिपादन किया गया है, “कल्पसूत्र' कहलाते हैं | 

कल्पसूत्रों के तीन भाग है श्रौतसूत्र, गृहय सूत्र और धर्मसूत्र ।

● श्रौत सूत्रों में यज्ञ संबंधी नियमों का उल्लेख है।

● गृहय सूत्रों में मनुष्यों के लौकिक तथा पारलौकिक कर्तव्यों का विवेचन है।


धर्मसूत्रों में धार्मिक एवं राजनीतिक कर्तव्यों का उल्लेख है।

● व्याकरण ग्रन्थों में सबसे महत्त्वपूर्ण पाणिनिकृत अष्टाध्यायी है । 

● यास्क ने निरुक्त की रचना की । इसमें वैदिक शब्दों की व्युत्पति बताई गई है । 

● वेदों में अनेक छंदों का प्रयोग मिलता है । इससे स्पष्ट है कि वैदिककाल में ही छंदशास्त्र का बहुत विकास हो चुका था।


स्मृति ग्रंथ

● सूत्र साहित्य के बाद स्मृति ग्रंथों की रचना हुई।

● इनकी संख्या निश्चित नहीं है।

● इनमें पांच स्मृतियां महत्वपूर्ण हैं, मनु, याज्ञवल्क्य, नारद, बृहस्पति और कात्यायन । 

● सबसे प्राचीन स्मृति मनु की है । इसका रचनाकाल ई.पू. 200 से ई.पू. 100 के बीच माना जाता है । 

● मनु , याज्ञवल्क्य (100ई.-300ई.) नारद (100ई.-400ई.) बृहस्पति (300ई.- 500ई.) और कात्यायन (400ई.-600ई.) की स्मृतियों से प्राचीन भारतीयों की धार्मिक, आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक स्थिति का आभास होता है।

मनु व याज्ञवल्क्य की स्मृतियां, वर्तमान हिंदू विधि के प्रमुख स्रोत हैं । 

● इसके अलावा नारद, बृहस्पति एवं कात्यायन की स्मृतियों में प्राचीन भारतीय न्याय व्यवस्था व कानूनी पक्ष पर प्रकाश डाला गया है । 

● साथ ही यह भी स्वीकार किया गया है कि सामाजिक एवं धार्मिक स्थितियों पर जितना स्मृतियों में लिखा गया है उतना अन्य किसी ग्रन्थ में नहीं।

महाकाव्य

● महाकाव्यों में रामायण व महाभारत महत्त्वपूर्ण हैं। अपने वर्तमान रूप में रामायण सम्भवत: दूसरी शती ईसवी के अन्त में विद्यमान थी। 

महाभारत का रचनाकाल 400 ई.पू से 400 ई. के बीच माना जाता है। 

रामायण वाल्मीकि द्वारा रचित है और महाभारत वेदव्यास द्वारा। 

भगवद्गीता महाभारत का ही एक भाग है, जिसकी उपादेयता समस्त विश्व में स्वीकार की गई है। 

● भारतीयों की आध्यात्मिक व दार्शनिक अवधारणाओं का इसमें सुंदर व स्पष्ट चित्रण किया गया है। 

● रामायण एवं महाभारत दोनों से तत्कालीन भारत की सामाजिक, आर्थिक एवं धार्मिक स्थिति का उत्तम विवेचन प्राप्त होता है । बस इतिहास तिथि कमानुसार प्राप्त नहीं होती है।


पुराण

● पुराण अठारह हैं :-

1. ब्रह्म पुराण

2. पद्म पुराण

3. विष्णु पुराण

4. वायु पुराण -- (शिव पुराण)

5. भागवत पुराण -- (देवीभागवत पुराण)

6. नारद पुराण

7. मार्कण्डेय पुराण

8. अग्नि पुराण

9. भविष्य पुराण

10. ब्रह्म वैवर्त पुराण

11. लिङ्ग पुराण

12. वाराह पुराण

13. स्कन्द पुराण

14. वामन पुराण

15. कूर्म पुराण

16. मत्स्य पुराण

17. गरुड़ पुराण

18. ब्रह्माण्ड पुराण

● इनमें मार्कण्डेय, ब्रह्माण्ड, वायु, विष्णु, भागवत और मत्स्य प्राचीन पुराण है, शेष बाद की रचनाएं हैं। प्राचीन भारत का इतिहास लिखने के लिए पुराण बहुत उपयोगी है। 

● पुराणों के विषय धर्म, इतिहास, आख्यान, विज्ञान आदि हैं। 

● पुराणों में दी गयी राजवंशावली प्रागैतिहासिक काल से ही महाभारत युद्ध के बाद परीक्षित के काल तक जाती है। 

● 6ठी सदी ई.पू. से लेकर आंध्र में सातवाहन वंश के पतन तक के राजवंशों और उनके राजाओं के नाम पुराणों में मिलते हैं। 

● वस्तुत: पुराणों से इतिहासकारों को सर्वथा यह असंतोष रहा है कि वे तिथिपरक नहीं हैं और साथ ही काल्पनिक घटनाओं, कथाओं से भी परिपूर्ण हैं।


बौद्धसाहित्य 

बौद्ध एवं जैन धर्मो के ग्रंथों के प्रणेताओं का उद्देश्य भारत का इतिहास लिखना नहीं था तथापि उन्होंने अपने ग्रंथों में अनायास ही बहुत सी ऐतिहासिक सामग्री का समावेश कर दिया है।

● यहां एक बात और स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि यद्यपि संपूर्ण बौद्ध एवं जैन साहित्य बाद के कालों में लेखनीबद्ध किया गया, किन्तु इस आधार पर उनमें प्राप्त होने वाली ऐतिहासिक सामग्री को अप्रमाणित नहीं माना जा सकता । 

● इसका कारण यह है कि प्राचीन भारत में सम्पूर्ण ज्ञान की और विशेषकर धार्मिक ज्ञान को गुरु परंपरा के द्वारा सुरक्षित रखा जाता था। 

बौद्ध धर्म के आरम्भिक ग्रंथ पाली भाषा में प्राप्त होते हैं । किन्तु बाद में संस्कृत, मिश्रित संस्कृत, तिब्बती और चीनी भाषाओं में प्राप्त होते हैं ।

बौद्ध साहित्य में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण स्थान त्रिपिटकों का है। 

● विनय पिटक, और अभिधम्म पिटक को त्रिपिटकों के नाम से जाना जाता है।


विनय पिटक

बौद्ध संघ, भिक्षुओं एवं भिक्षुणियों के लिये आचरणीय-नियम विधान विनय पिटक में प्राप्त होते हैं । विनय पिटक निम्नलिखित तीन भार्गों में विभक्त है-

1 सुत्त विभंग 

2 खन्धक 

3 परिवार अथवा परिवार पाठ 

(1) सुत्त पिटक- सुत्तपिटक में भगवान बुद्ध के धर्मोपदेश मिलते हैं । गौतम बुद्ध तथा उनके धार्मिक प्रचार का विशेष विवरण सुत्तपिटक में मिलता है । सुत्तपिटक निम्नलिखित पांच निकायों में विभक्त है ।

(2) दीग्ध निकाय - इतिहास निर्माण में सहायक के रूप में गद्य एवं पद्य में लिखी यह रचना विशेष है क्योंकि इसमें छठी शताब्दी पूर्व की भगवान बुद्ध के जीवन से सम्बन्धित एवं उनके सम्पर्क में आये व्यक्तियों का विशेष विवरण है

(3) संयुत्त निकाय - इस ग्रन्थ से छठी सदी ई.पू. के राजनीतिक जीवन पर प्रकाश पड़ता है किंतु सामाजिक, आर्थिक व्यवस्था को जानने की दृष्टि से इसका अधिक महत्त्व है ।

(4) मज्झिम निकाय - इसमें बुद्ध को दैविक शक्तियों से युक्त एक अद्भुत व्यक्ति बताया गया है जो बौद्ध धर्म में आये परिवर्तनों के अध्ययन में सहायता देता है ।

(5) अंगुत्तर निकाय - छठी सदी ई.पू. के सोलह महाजन पदों की सूची इस ग्रंथ में मिलती है

(6) खुद्दक निकाय - यह वास्तव में लघु ग्रन्थों का संग्रह है जिसमें कुछ छिटपुट बिखरे प्रसंग मिलते हैं। जिनके न होने पर छठी शताब्दी ई.पू. से मौर्यकाल तक का इतिहास अधूरा रह जाता है ।

(7) अभिधम्मपिटक- इसमें बौद्ध धर्म के दार्शनिक पक्ष का विवेचन मिलता है ।


अन्य बौद्ध ग्रंथ 

● मिलिन्द पन्हों इस ग्रंथ में यूनानी राजा मिलिन्द (मिनेण्डर) और बौद्ध भिक्षु नागसेन के वार्तालाप का विवरण है । 

● संभवत: इस ग्रंथ का मूल अंश ई.पू. द्वितीय शताब्दी में स्वयं नागसेन द्वारा तैयार किया गया।

● दीपवंश संभवत पांचवी शताब्दी ई.पू. में लिखे इस ग्रन्थ रमे कपोल कल्पित कहानियों के पश्चात् भी मौर्यकालीन इतिहास निर्माण में सहायता मिलती है।

महावंश - इसका भी काल और स्वभाव "दीपवंश" जैसा है परन्तु मौर्यकालीन इतिहास पर अच्छा प्रकाश पड़ता है।

महाबोधिवंश - पाली भाषा में लिखे इस ग्रन्थ से मौर्यकालीन इतिहास की सूचनाएं प्राप्त होती हैं ।

महावस्तु - इसमें बुद्ध के जीवन को बिन्दु बनाकर छठी शताब्दी ई.पू. के इतिहास को प्रस्तुत किया गया है ।

ललित विस्तार - मिश्रित संस्कृत के गद्य पद्यात्मक इस ग्रंथ में भगवान बुद्ध की ऐहिक लीलाओं का वर्णन है । यह महायान सम्प्रदाय से संबंधित है । निदान कथा पाली भाषा में लिखे इस ग्रन्थ में भगवान बुद्ध के अतिरिक्त बोधिसत्वों के विषय में भी विवरण मिलते हैं।

● इन ग्रन्थों के अतिरिक्त कुछ बौद्ध ग्रंथों पर लिखी गई टीकाओं से भारतीय इतिहास पर प्रकाश पड़ता है।

● इनमें उल्लेखनीय है - सुमंगलविलासिनी, समन्तपासादिका और महावंश टीका

दिव्यावदान - इतिहास की दृष्टि से उल्लेखनीय इस ग्रन्थ में अशोक एवं उसके उत्तराधिकारियों सहित पुष्यमित्र शुंग के विषय में विवरण मिलता है।

मंजुश्री मूलकल्प

संस्कृत भाषा में लिखे इस ग्रन्थ में मौर्य के पूर्व तथा हर्ष तक की राजनीतिक घटनाओं का बीच-बीच में उल्लेख मात्र कर दिया गया है पर ऐतिहासिक दृष्टि से ये सूचनाएं महत्वपूर्ण हैं।


जैन ग्रंथ

● जैन धर्म के ग्रंथ "आगम" अथवा सिद्धान्त के नाम से ज्ञात हैं । 

जैन आगम साहित्य के अंतर्गत बारह अंग, बारह उपांग दस प्रकीर्ण, छ: छेदि सूत्र, नन्दि, अनुयोग द्वार और चार मूल सूत्र आते हैं।

● ग्रंथों में भगवान महावीर स्वामी की शिक्षाओं के साथ-साथ उनके समय की ऐतिहासिक परम्पराएं भी मिलती हैं । 

मगध साम्राज्य के उत्कर्ष के इतिहास पर सर्वाधिक प्रकाश जैन ग्रंथ डालते हैं । 

● जैन ग्रंथों में उल्लिखित ऐतिहासिक राजा श्रोणिक, कामिद प्रद्योत, बिम्बिसार, उदयन, नन्दवंश के राजा, चन्द्रगुप्त मौर्य, बिन्दुसार, अशोक, दशरथ, सम्पति आदि हैं।

● जैन परम्परा के अनुसार महावीर स्वामी की शिक्षाएं मूलत: चौदह पर्वो (प्राचीन ग्रन्थों) में संकलित थी, परन्तु समयक्रम में इनका ज्ञान खो गया। 

● तदुपरान्त महावीर स्वामी के निर्वाण के 160 वर्षों पश्चात् पाटलीपुत्र में प्रथम जैन समिति बुलायी गयी जिसमें बारह अंगों का संकलन किया गया। 

● आने वाले वर्षों में फिर इस प्रकार के प्रयासों की आवश्यकता पड़ी जिसके फलस्वरूप 300-313 ई. के मध्य मथुरा व वल्लभी में दो अलग-अलग समितियां बुलायी गई।

● जिसका एक परिणाम यह भी निकला कि जैन ग्रन्थों के दो-दो पाठ हो गये और अन्तत: इसमें समन्वय लाने के लिये 553 अथवा 566 ई. में एक और समिति की बैठक वल्लभी में बुलाई गयी, जिसमें सभी जैन ग्रन्थों को एकरूपता में लिपिबद्ध करने का प्रयास किया गया।

● इन ग्रन्थों में न केवल महावीर स्वामी की शिक्षाएं मिलती है बल्कि अपने समय के इतिहास की झलक भी मिलती है। इस दृष्टि से "परिशिष्टपर्वन" उल्लेखनीय है।

● "भद्रवाहु चरित्र" में जैनाचार्य भद्रवाहु के साथ-साथ चन्द्रगुप्त मौर्य के जीवन पर भी कुछ प्रकाश पड़ता है । 

● इनके अतिरिक्त “कथाकोष", "पुष्याश्रव-कथाकोष", लोक विभाग, “त्रिलोक-प्रज्ञप्ति", आवश्यक सूत्र",

"भगवती सूत्र", "कालिका पुराण" आदि अनेक जैन ग्रन्थ भारतीय इतिहास की सामग्री प्रस्तुत करते हैं ।

● "कल्पसूत्रों" से जो कुछ सामग्री प्राप्त हो सकी है, उसकी उपयोगिता निर्विवाद है ।



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ऐतिहासिक एवं समसामयिक ग्रंथ :-

● इनमें मुख्यत: संस्कृत भाषा के ग्रंथ आते हैं।

अष्टाध्यायी डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल ने पाणिनी के प्रसिद्ध व्याकरण ग्रंथ अष्टाध्यायी का

रचनाकाल पांचवी सदी ई.पू. के मध्य निर्धारित किया है, जिसको लगभग सभी विद्वान, स्वीकार करते हैं । इस ग्रंथ में अनेक प्रकार की ऐतिहासिक सामग्री भरी पड़ी है, जिसमें सर्वाधिक उल्लेखनीय उस समय के गणराज्य हैं |

● अर्थशास्त्र - इसमें मौर्यकालीन इतिहास की जानकारी मिलती हैं । इसकी रचना चन्द्रगुप्त मौर्य के प्रधानमंत्री आचार्य कौटिल्य ने की थी। यद्यपि इसके रचनाकाल और प्रामाणिकता को लेकर काफी विवाद है । लेकिन ज्ञान की वर्तमान अवस्था में इसे मौर्ययुग से ही संबद्ध करना समीचीन है ।इस ग्रंथ में सामान्य प्रशासन के साथ-साथ शासन से संबंधित सामान्य सिद्धान्तों का ज्ञान भी प्राप्त होता है ।

पतंजलि का महाभाष्य- पाणिनी की अष्टाध्यायी की तरह दूसरी सदी ई.पू. में लिखित पतंजलि का महाभाष्य इतिहास निर्माण में महत्त्वपूर्ण सहायता प्रदान करता है भारतवर्ष पर होने वाले यूनानी आक्रमण का उल्लेख इस ग्रंथ में हुआ है । 

● इसके अतिरिक्त इस ग्रंथ से यह भी सूचना मिलती है कि पुष्यमित्र शुंग ने यज्ञ (सम्भवतः अश्वमेघ) किया था जिसमें पौरोहित्य कर्म पतंजलि ने किया था ।

गार्गी संहिता - भारत पर होने वाले यूनानी आक्रमण का थोड़े विस्तार से विवरण इस ग्रंथ में हुआ

मालविकाग्निमित्र - कालिदास रचित इस नाटक का कथानक ऐतिहासिक है । इस नाटक से शुंगवंश तथा उसके पूर्ववर्ती राजवंर्शों की समकालीन राजनीतिक परिस्थितियों का बोध होता है। राजपरिवारों के आन्तरिक जीवन का यह दर्पण है। 

मुद्राराक्षस -  विशाखदत्त द्वारा रचित मुद्राराक्षस भी एक नाटक है । उसका कथानक भी ऐतिहासिक है । इस नाटक में राजनीति की महत्ता प्रदर्शित की गई है । इरा नाटक का कथानक नन्दवंश के अत एवं चन्द्रगुप्त मौर्य के राज्यारोहण से सम्बन्धित है और इसका एक महत्त्वपूर्ण पात्र चाणक्य है जो राज्य में सुव्यवस्था स्थापित करने तथा चन्द्रगुप्त मौर्य के शासन को सुरक्षित करने के लिए असीम कूटनीतिक सूझ-बूझ का परिचय देता है ।

राजतरंगिणी -  बारहवीं सदी ई. के कवि कल्हण की राजतरंगिणी सच्चे अर्थों में इतिहास ग्रंथ है । इसमें कल्हण ने प्रारम्भ से -लेकर अपने समय तक का काश्मीर का इतिहास लिखा है।उसने इतिहास लिखने की परंपरा का सूत्रपात किया जिसे उसके शिष्यों ने चालू रखा ।


● इसके अलावा स्थानीय भाषाओं में अनेक ग्रन्थों की रचना हुई ।

● गुजरात ने अपने वीरों के गुणग्णन तथा उनकी स्मृतियों को नवीन रचनाओं में ढालने की परम्पराएं प्रारम्भ की । 

● इस ओर प्रयास करने वाले लेखकों में सोमेश्वर मुख्य है जिसकी रचनाएं रासमाला" एवं "कीर्तिकौमुदी' स्थानीय इतिहास पर पर्याप्त प्रकाश डालती हैं । 

● इसके अतिरिक्त अरिसिंह के सुकृति संकीर्तन", राजशेखर के “प्रबन्ध-कोष", जयसिंह के "हम्मीर

मदमर्दन", मेरुतंग के "प्रबन्ध-चिन्तामणि" तथा बालचन्द्र का “बसन्तविलास" इस दृष्टि से उल्लेखनीय रचनाएं है |

● इसी भांति “रामचरित" में बंगाल के राम पाल का वर्णन दिया गया है । इसके लेखक संध्याकर नन्दी है । आनन्दभट्ट की "बल्लालचरित" बंगाल व बिहार के सेन राजवंश के इतिहास पर प्रकाश डालती है |

● राजस्थान के प्रसिद्ध सम्राट पृथ्वीराज पर अनेक रचनाएं हैं । 

जयानक ने “पृथ्वीराज विजय" लिखा जो कि चौहान नरेश की शौर्य गाथा से परिपूर्ण है। इस कारण सावधानी से इसका उपयोग करना आवश्यक है।

चन्दवरदाई कृत "पृथ्वीराज रासौ" भी इसी कोटि की रचना है। इसमें पृथ्वीराज चौहान व गौरी की लड़ाइयों का विशद विवरण है | 

● कवि विल्हण की रचना "विक्रमांक देवचरित" कल्याणी के चालुक्यों के इतिहास पर प्रकाश डालती है ।

● उपर्युक्त अधिकांश रचनाएं पूर्णतया साहित्यिक हैं और उनके इसी स्वभाव के कारण इन्हें विशुद्ध साहित्य कोटि में रखा जा सकता था किन्तु ये ऐतिहासिक चरित्रों की जीवनियाँ भी हैं और कालचक्र को भी समेटे हुए हैं । इस कारण स्वत: ही इनका एक पृथक वर्ग बन जाता है ।


विदेशियों के विवरण

● समय-समय पर अनेक विदेशियों ने भारत की यात्रा की एवं अपने विवरण भी लिपिबद्ध किए।

● परन्तु उन वृत्तान्तो में कुछ खो गए, कुछ मिश्रित हो गए, कुछ भारतीय परम्पराओं को ठीक से न समझने के फलस्वरूप भ्रामक बातें लिख बैठे। 

● इन दोषों के होते हुए भी तुलनात्मक अध्ययन के लिए विदेशी विवरण बहुत उपयोगी हैं । 

● हम विदेशी विवरण देने वालों में उन्हें भी सम्मिलित करते हैं जो भारत कभी नहीं आए परन्तु अपने स्थान पर बैठे बैठे ही भारत के बारे में जानकर अथवा किसी सम्पर्क माध्यम से समृद्ध होकर अपनी टिप्पणियां लिपिबद्ध कर सके।


यूनानी 

● साधारणतया यह मान्यता रही है कि “विदेशी विवरण” भारत पर सिकन्दर के आक्रमण के साथ अथवा फलस्वरूप प्रभाव में आया है, ऐसा नहीं है। विशेषकर यूनानी लेखक जो सिकन्दर के पूर्वकाल के हैं, में लेक्स, हिकेटिअस मिलेटस, हैरोडोटस तथा केसिअस के नाम उल्लेखनीय हैं । पर इन सबकी अधिकतम जानकारी सिन्धु प्रांत तक ही थी |

"इतिहास के जनक" हेरोडोटस ने अपनी पुस्तक “हिस्टोरिका" में भारत के सम्बन्ध में जानकारी दी है। 

● इन सभी का भारतीय दर्शन के प्रति विशेष आकर्षण था परन्तु इनके विवरण प्रामाणिक नहीं है तथा इनका लाभ किसी अन्य शास्त्रीय अध्ययन के साथ ही उठाया जा सकता है।

● यह सत्य है कि सिकन्दर के साथ भी कुछ ऐसे व्यक्ति आये थे जिन्होंने अपने भ्रमण का वृत्तान्त लिपिबद्ध किया है। उनमें अरिस्टोबुलस, निआर्कस, चारस यूमेनिस आदि प्रमुख है ।

● इन्होंने सिकन्दर के भारत आक्रमण का सजीव चित्रण किया है । दुर्भाग्य है कि इन लेखकों के मूल ग्रन्थ प्राप्य नहीं हैं, हमें इनके विवरण के सम्बन्ध में परवर्ती लेखकों के ग्रन्थों से ही जानकारी मिलती है |

● सिकन्दर के बाद के लेखकों में मेगस्थनीज का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है । वह यूनानी शासक सेल्यूकस की ओर से चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में राजदूत था और उसने अपने प्रवासकाल को अपनी पुस्तक “इण्डिका" में लिपिबद्ध किया है।

● अगर मैगस्थनीज के विवरण को कौटिल्य के “अर्थशास्त्र" के साथ मिलाकर प्रयोग में लिया जाये तो भारत की प्रशासनिक, आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति की एक सजीव प्रस्तुति होती है । 

● इसमें भी सन्देह नहीं कि यह यूनानी यहां रहकर भी भारत की रीतियों एवं समाज के गठन के रहस्यों को सही ढंग से नहीं समझ सका । 

● इसका भी ग्रन्थ लुप्त है और इसका विवरण परवर्ती लेखकों की रचनाओं में ही जीवित है।

● यही स्थिति बिन्दुसार के दरबार में सीरिया से आये राजदूत डायमेकस के ग्रन्थ की है ।

● अन्य यूनानी लेखकों में सर्वप्रथम प्लिनी का नाम लिया जा सकता है । उसने अपनी पुस्तक “नेचुरल हिस्ट्री' में भारत (प्रथम शताब्दी) के पशुओं, पौधों तथा खनिज पदार्थो का उल्लेख किया है । 

● तॉलमी ने दूसरी शताब्दी ई. में भारत के भूगोल से सम्बन्धित एक पुस्तक लिखी जिसमें उसका दृष्टिकोण पूर्णतया वैज्ञानिक था । 

● एरियन ने अपनी रचना में भारत पर मकदूनिया के आक्रमण का अछूता एवं विस्तृत प्रकाश डाला है।

● कर्टियस, जस्टिन तथा स्ट्रेबो की देन को हम भूल नहीं सकते । इनके विवरण चाहे जितने अतिरजित हों, इतिहास के अनेक अधूरे प्रश्नों को सुलझाने में सहायक बन जाते हैं । 

● एक अज्ञात लेखक की पुस्तक "इरिथ्रियन सागर का पेरिप्लस" भारतीय वाणिज्य की स्थिति पर विशेष एवं अनूठा प्रकाश डालती है । 

● ईजिप्ट के मठाधीश काससम की "इंडिका" तथा प्लुस्टस की पुस्तक "क्रिश्चियन टोपोग्राफी ऑफ दी यूनिवर्स" का भी उतना ही महत्व है (547 ई.) ।


चीनी 

● चीन में बौद्धधर्म के प्रसार के फलस्वरूप अनेक चीनी यात्री भगवान बुद्ध की स्थली भारत आए तथा उनमें से कुछ ने यात्रा विवरण भी रचे । 

● वे भारतीय इतिहास के साधन के रूप में उसके अभिन्न अंग बन गए । 


● यद्यपि इस प्रकार के वृत्तान्तो में लेखकों का हर घटना व वस्तु के प्रति उनका धार्मिक दृष्टिकोण ही उभरता है फलस्वरूप इतिहास लेखन एक पक्षीय भावना से दोषग्रस्त हो जाता है फिर भी ये विवरण ऐतिहासिक सामग्री देने के साथ-साथ एक समीक्षात्मक अध्ययन का आधार भी दे देते है ।

● चीनी लेखकों की श्रृंखला में शुमाशीन पहला व्यक्ति है जिसने अपने ग्रन्थ में भारत के इतिहास पर प्रकाश डाला है । 

● तत्पश्चात् लेखकों की जो श्रृंखला है उसमें विशेष रूप से फाह्यान, हवेनसांग तथा इंत्सिंग का नाम उल्लेखनीय है और इन तीनों ने भारत की यात्रा करके अपने संस्मरणों को लिपिबद्ध किया है ।

फाह्यान 399 ई. में गुप्तवंशीय सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के काल में भारत आया था । यात्री ने गंगावर्ती प्रान्तों के शासन प्रबन्ध तथा सामाजिक व्यवस्था का अपनी तरफ से पूरा लेखा-जोखा दिया है । परन्तु उसके वृत्तान्त का मुख्य विषय बौद्ध धर्म ही है । वह हमें बौद्ध सिद्धान्तों, परिपाटियों, नियों तथा उसकी प्रगति के सम्बन्ध में पर्याप्त जानकारी देता है । वह इहलोकपरक विषयों के प्रति बहुधा उदासीन रहा है । इसी प्रवृत्ति के कारण लेखक उसके विवरण को अधूरा समझते हैं।

● चीनी यात्रियों में वेनसांग का स्थान अधिक ऊँचा है । यह एक उत्साही एवं जिज्ञासु यात्री के रूप में 629 ई. में भारत आया जबकि उत्तरी मैदानों में हर्षवर्द्धन का एकछत्र साम्राज्य था । वह सोलह वर्ष तक भारत के विभिन्न स्थलों पर घूमता रहा जिसका सहज परिणाम यह निकला कि वह इतिहास लेखन के प्रति एक स्वस्थ दृष्टिकोण अपना सका । उसके विवरण का महत्त्व इसी बात से आंका जा सकता है कि इतिहासकार यह मानते हैं कि इसके अभाव में सातवीं शताब्दी ई. का भारतीय इतिहास संभवत: इतना अधिक सुलझा हुआ न होता । 

हवेनसांग के ग्रन्थ का नाम "पाश्चात्य संसार के देश" हैं, जिसमें हमें भारत की धार्मिक अवस्था के साथ-साथ सामाजिक एवं आर्थिक स्थितियों का भी पूरा ज्ञान होता है । 

● लगभग 673-95 ई. के मध्य इत्सिंग नाम के एक अन्य चीनी ने भी भारत की यात्रा की । उसने भी बौद्ध धर्म के संदर्भ में भारत की धार्मिक अवस्था का सजीव चित्रण किया है और केवल इसी दृष्टि से ही उसकी उपयोगिता है ।


अन्य विदेशी यात्री एवं लेखक :

● अन्य विदेशी लेखकों में तिब्बती, अरबों एवं मध्य एशियाइयों के नाम मुख्य है । 

● तिब्बती लेखक तारानाथ के ग्रन्थों "कंग्युर" तथा "तंग्युर" रो भी भारत के इतिहास पर प्रकाश पड़ता है।

● शक एवं कुषाणकाल के इतिहास पर तिब्बती लेखकों का अपना योगदान है । 

● अरब एवं मध्य एशियाई लेखकों का योगदान प्राचीन भारत के उतरार्द्ध में है जिसे पूर्व मध्यकाल भी कहा जाता है । 

● वैसे तो अरबों का भारत से सम्बन्ध बहुत प्राचीन है परन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि मुहम्मद बिन कासिम के भारत पर आक्रमण के पश्चात् तो अरब लेखकों ने प्रसंगवश भारत के बारे में काफी लिखना प्रारम्भ कर दिया था । उन लेखकों में सुलेमान “सिलसिला", अलमसूदी मुस्जुलजहाब", अलबिलादुरी "फुतअल्-बुल्दान” “अबुजेदुलहसन इब्नखुदवा", अलइदरीसी आदि विशेष उल्लेखनीय है । 

● इस श्रृंखला में हर्षोत्तरकालीन भारत की अवस्थाओं पर उत्तम विवेचन करने वालों में लेखक अल्बेरुनी सदैव स्मरणीय है । 

● अल्बेस्नी की भारतीय दर्शन एवं कला-कौशल के प्रति रूचि उदाहरणीय है । यहां के वृत्तान्त को लिखने में उसने बहुत ही परिश्रम तथा धैर्य से काम लिया । उसकी पुस्तक "तहकीके हिन्द" भारतीय समाज एवं उसकी मान्यताओं का एक समीक्षात्मक विवरण है जिसका उपयोग परवर्ती इतिहासकारों ने खूब किया है । 

● आश्चर्य यह है कि जब महमूद गजनवी अपनी भौतिक एवं साम्राज्यवादी लिप्साओं में व्यस्त था तब उसका यह दरबारी अल्बेरूनी भारतीय मस्तिष्क का मर्म समझने का यत्न कर रहा था। लेखक ने भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के विषय में जितना लिखा है यदि उतना ही महत्व समकालीन इतिहास को भी दे देता तो उससे इतिहास के पारम्परिक ज्ञान को भी बहुत लाभ पहुंचता।

अनुभागीय सारांश

● प्रचुर मात्रा में उपलब्ध साहित्यिक सामग्री स्पष्टत: इस बात की ओर इंगित करती है कि भारतीय इतिहास के प्रति सचेत थे।

वैदिक साहित्य से राजतरंगिणी तक की जो साहित्यिक यात्रा है वह भारत में इतिहास लेखन के विकास की प्रकिया को दर्शाती है।

● प्रारम्भ में जहां धार्मिक साहित्य में इतिहास ढूंढना पड़ता था वहीं 10वीं एवं 11वीं शताब्दी तक आधुनिक संदर्भ के इतिहास लेखन की नींव एवं चुकी थी । 

● धार्मिक साहित्य मुख्यत: ब्राह्मण, बौद्ध एवं जैन साहित्य में विभक्त था जो विदेशी यात्रियों के एक पक्षीय विवरण के साथ मिलकर भी एक विश्वसनीय वृत्तान्त का निर्माण नहीं करता था। 

● अन्तिम वर्षों में तो स्थानीय भाषाओं में भी साहित्य एवं इतिहास की सर्जना प्रारम्भ हो चुकी थी।

● परन्तु इन सभी के विवरणों पर पूर्ण विश्वास करना भूल है । ये एक पक्षीय दोष से ही ग्रस्त नहीं हैं बल्कि क्रमबद्धता का अभाव एवं कपोल कल्पित घटनाक्रम से आश्चर्य चकित करने वाले है ।


पुरातात्विक साधन

पुरातत्व का महत्त्व इतिहास के अध्ययन में दिनों दिन बढ़ता जा रहा है । यही कारण है कि यह विषय स्वतंत्र अध्ययन बन गया है भारतीय इतिहास में अनेक संदिग्ध स्थलों का निर्धारण करने में इस सामग्री का योगदान प्रशंसनीय रहा है। 

पुरातत्व इतिहास की दो तरह से सहायता करते हैं | एक प्रतिपादक रूप में अर्थात् जानकारी के सर्वथा नये साधन प्रस्तुत करके तथा दूसरे समर्थ रूप में अर्थात् ज्ञात तथ्यों की पुष्टि करके।

● इस महत्वपूर्ण सामग्री को अध्ययन की सुविधा के लिए तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है-

1 अभिलेख

2 स्मारक

3 मुद्राएं



अभिलेख

अभिलेखों का प्रचलन सम्राट अशोक के काल से अथवा उससे पूर्व काल में भी हो चुका था, विवाद का विषय बन सकता है परंतु इसमें सन्देह नहीं कि भारत के इतिहास को प्रकाशित करने में अशोक कालीन तथा अशोक के पश्चात् के अभिलेख ही विशेष उल्लेखनीय हैं । 

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अशोक ने अपनी राजाज्ञा और घोषणाओं को स्तम्भों तथा शिलाओं पर उत्कीर्ण कराया । 

● इससे अशोक के धर्म और राजा के आदर्श पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है । 

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● इससे हमें उसके राज्य की सीमाओं का ज्ञान भी होता है । 

● अशोक के अभिलेख ब्राह्मी व खरोष्ठी लिपि में हैं।

अशोक के पश्चात् के अभिलेखों में जिनमें कुछ प्रशस्तियों के नाम से भी विख्यात हैं, में हरिषेण अथवा प्रयाग प्रशस्ति विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

गुप्तवंश के प्रतापी सम्राट समुद्रगुप्त की दिग्विजयों तथा उसके वैयक्तिक गुणों पर पूर्ण प्रकाश डालने वाली सामग्री इस प्रशस्ति के अतिरिक्त अन्य कोई नहीं है।

● इसी प्रकार महरौली (दिल्ली) के लोह स्तम्भ पर चन्द्रगुप्त विकमादित्य की कीर्ति का उल्लेख है और इसी से ज्ञात होता है कि उसने सिन्धु नदी को पारकर वाहलीक देश को विजय किया । 

● हमें अनुदानों की स्वीकृति सम्बन्धी अनेक अभिलेख प्राप्त हुए हैं । 

● जो समाज के वर्गीकरण के अध्ययन में बहुत सहायक है।

मुहरों तथा मुद्राभिलेखों की संख्या को तो हम निश्चित रूप से एक बहुत भारी, अत: असंख्य कह सकते हैं । 

● इसी श्रृंखला में उड़ीसा में कटक के निकट एक गुफा की दीवारों पर खुदा जिसे हाथीगुम्फा अभिलेख कहते हैं, कलिंग के यशस्वी राजा खारवेल के जीवन और उसकी सफलताओं पर एक नया प्रकाश डालता है ।

ग्वालियर की प्रशस्ति अत्यन्त महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें प्रतिहार शासक राजा भोज की अर्जित सफलताओं का उल्लेख है । 

● इसी प्रकार ऐहोल अभिलेख से हमें दक्षिण के चालुक्य सम्राट पुलकेशिन द्वितीय द्वारा कन्नौज के सम्राट हर्ष पर विजय का उल्लेख प्राप्त होता है ।

● इस प्रकार असंख्य दानपत्र, समर्पण पत्र तथा स्मारक पत्र के रूप में अभिलेखों का निर्माण हुआ।

राजस्थान एवं मध्य भारत में प्रस्तर पत्रों पर उच्चकोटि के नाटकों के अंश उत्कीर्ण हैं ।

● पुदुकोट्टा या दुदुकोत्तई (तमिलनाडू) में संगीत के नियमों का उल्लेख किया गया हैं।

● इसके अतिरिक्त विदेशों में भी कुछ ऐसे अभिलेख प्राप्त हुए हैं जो भारतीय इतिहास पर प्रकाश डालते हैं । 

● इसमें एशिया माइनर में बोगजकोई के लेख में वैदिक देवताओं का उल्लेख किया गया है ।

● पार्सिपोलस तथा नक्शेरूस्तम (ईरान) के अभिलेखों से प्राचीन भारत एवं ईरान के पारस्परिक सम्बन्धों का बोध होता है । 

● इस प्रकार ये अभिलेख इतिहास की कड़ियाँ जोड़ने में बहुत सहायक हैं । ये न केवल शासन प्रबन्ध पर प्रकाश डालते हैं बल्कि प्रमुख व्यक्तियों के चरित्र का मूल्यांकन करने में भी सहायक हैं।

● इससे तत्कालीन धार्मिक एवं सामाजिक स्थितियों का बोध होता है और साथ ही ये कला के भी अद्वितीय नमूने हैं।

● भारत में हुई विज्ञान एवं तकनीकी की प्रगति का अनुमान भी इनसे सहजता से लगाया जा सकता है।

● ये अभिलेख संस्कृत, प्राकृत अथवा मिश्रित, तमिल, तेलगू कन्नड़ आदि भाषाओं में खुदे हुए हैं जिससे हमें समृद्धशाली एवं प्रचलित भाषा की लोकप्रियता का भान होता है । साथ ही साहित्यिक शैली एवं साहित्य की प्रगति का भी बोध होता है |


स्मारक

स्मारक के अन्तर्गत कितनी वस्तुएं आ सकती हैं, यह कहना कठिन है । 

● वास्तव में पुरातत्व सम्बन्धी वर्गों में अभिलेख, मुद्रा तथा ललितकला सम्बन्धी वस्तुओं को छोड़कर, जो कुछ भी धरती के नीचे या ऊपर कला की वस्तु हो या एक ऐसी वस्तु हो जिसके देखने से हमें अपने प्राचीन की याद आ जाये, वह प्राचीन स्मारक मानी जायेगी।

● स्मारकों से हमें अपनी सभ्यता के जीते-जागते उदाहरण मिलते हैं । 

● ये पत्थर, मिट्टी, लकड़ी, धातु के बने हैं । सिंधु घाटी के स्थलों ने हमारी बहुत सी मान्यताओं को बदल दिया है । 

मोहनजोदड़ो हड़प्पा की खुदाइयों ने तो इतिहास में एक नया परिच्छेद ही जोड़ दिया है । 

● तक्षशिला, पाटलिपुत्र, नालन्दा, देवगढ़, राजगिरी मथुरा, सारनाथ, भरहुत कसिया, लक्ष्मणेश्वर, खजुराहो, लालगढ़, चितल दुर्ग, पत्तदकल आदि से कई तथ्य उजागर हुए हैं ।

● खुदाइयों के अतिरिक्त धरती के ऊपर के भवन, मन्दिर, स्तम्भ आदि भी प्राचीन स्मारक के रूप में ऐतिहासिक सामग्री प्रदान करते हैं । ऐसी सामग्रियों का भारत में बाहुल्य है जो तत्कालीन धार्मिक विश्वासों, कला की विभिन्न शैलियों, वाणिज्य-व्यापार आदि असंख्य समस्याओं के समाधान के रूप में हमारे सम्मुख आते हैं । 

● सारनाथ का घण्टाकार स्तम्भ- मस्तक उस प्राचीनकाल की नक्काशी कला का उत्कृष्टतम उदाहरण है।

अजन्ता तथा एलोरा को गुफाएं अपने काल की भित्ति-चित्रकला का श्रेष्ठ नमूना प्रस्तुत करती हैं।

झांसी का देवगढ़ मन्दिर, भीतरगांव का मन्दिर, नालन्दा की महात्मा बुद्ध की ताम्रमूर्ति आदि भारतीय कला की उच्च रेखाओं का स्पष्ट बोध कराते हैं । 

● कभी-कभी इन पर उत्कीर्ण तिथियां इतिहास के कालक्रम के निर्माण में सहायक बन जाती है । मंदिरों, स्तूपों और विहारों से तत्कालीन धार्मिक विश्वासों का पता चलता है । 

● दक्षिण पूर्वी एशिया और मध्य एशिया में जो मंदिरों और स्तूपों के अवशेष मिले हैं, उनसे भारतीय संस्कृति के प्रसार पर महत्वपूर्ण प्रकाश पड़ा है।

● उन स्थलों में जावा, कम्बोज, मलाया, स्याम, बोर्नियो, कोचीन चाइना, कोम्बे आदि मुख्य हैं ।

● जावा का स्मारक “बोरो बुदूर" इस बात का प्रमाण है कि नवीं शताब्दी में वहां महायान बौद्ध धर्म बहुत लोकप्रिय हो गया था । 

● इस प्रकार अंगकोरवात तथा अंजकोरलाभ से भी प्राचीन स्मारक चिन्ह उपलब्ध हुए हैं जिनसे भारतीय औपनिवेशिक प्रसार एवं भारतीयों की कला का बोध होता है ।


मुद्राएं

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● पुरातात्विक सामग्री में मुद्राओं का महत्वपूर्ण स्थान है । प्राचीन सिक्कों पर लिखे लेख और चिह्न महत्वपूर्ण होते हैं । 

● सिक्कों से कई महत्वपूर्ण राजनीतिक एवं आर्थिक जानकारियाँ मिलती है ।

● हिन्दू-यूनानी शासकों के सिक्के भी महत्वपूर्ण स्रोत हैं । 

● भारतीय गणतंत्रात्मक राज्यों की जानकारी भी सिक्कों से मिलती है ।

● पांचाल, मालव व यौधेय गणतन्त्रों का इतिहास सिक्कों से ही अधिक प्राप्त होता है इसी प्रकार सातवाहन कुल का इतिहास भी मुद्राओं से ही प्रकाशित होता है।

समुद्रगुप्त की मुद्राओं के आधार पर ही हम यह स्पष्ट करते हैं कि वह वैष्णव धर्म का अनुगामी था।

● उसकी मुद्राओं पर उत्कीर्ण वीणा के आधार पर ही हम उसे संगीत कला का उपासक कहते हैं।

प्राचीन भारतीय सिक्के सोने, चाँदी तांबे के होते थे । मुद्राशास्त्र का उपयोग आर्थिक इतिहास लिखने में महत्वपूर्ण सिद्ध हो सकता है।

● दक्षिण भारत में प्राप्त रोमन सिक्कों के आधार पर ही भारत एवं रोम के मध्य व्यापार की बात कही जाती है।

● स्वर्ण धातु के सिक्कों में जब मिलावट दिखाई देती है तो यह अनुमान लगाया जा सकता है कि उस समय राज्य की आर्थिक दशा अच्छी नहीं थी । 

गुप्त कालीन सिक्के बहुत कलात्मक हैं, इनसे शासक वर्ग एवं जनता की साहित्य और कला में रुचि दिखाई देती है ।

● इस प्रकार पुरातात्विक साक्ष्य की सहायता से हम प्राचीन भारतीय इतिहास को पहले की अपेक्षा अधिक तर्कसंगत ढंग से समझ सकते हैं।


सारांश

● इस पोस्ट में हमने प्राचीन भारतीयों की इतिहास विषयक अवधारणा व इतिहास के स्रोतों का उल्लेख किया है।

प्राचीन भारतीयों की इतिहास में गहन रुचि थी । लेकिन यह इतिहास वर्तमान की तरह हमें क्रमबद्ध रूप में उपलब्ध नहीं होता है।

● यत्र-तत्र प्रसंगवश ऐतिहासिक घटनाओं का उल्लेख हमें मिल जाता है।

● धर्म का वर्णन करते हुए भी धर्म प्रचारकों ने महत्वपूर्ण घटनाओं की जानकारी दे दी है।

● पुरातात्विक साक्ष्यों में अभिलेख, स्मारकमुद्राएं आती हैं, जिनसे हमें प्राचीन इतिहास की जानकारी मिलती है । 

प्राचीन काल में अभिलेख उत्कीर्ण कराने की परंपरा निहित थी । 

● विशेष अवसरों पर ये लिखे जाते थे । 

● इसके अलावा प्राचीन स्मारक से भी हमें लोगों के रहन-सहन की जानकारी हो जाती है।

मुद्राएं भी महत्वपूर्ण जानकारी देती हैं।

● उन पर लिखे हुए वाक्यों से प्राचीन भारत की राजनीतिक, धार्मिक व आर्थिक स्थिति का आभास हो जाता है।

साहित्यिक व पुरातात्विक साधनों से ही इतिहास को जाना जा सकता है ।


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इतिहास बहुत विस्तृत है इतने बड़े विस्तृत इतिहास को एक छोटी सी पोस्ट में सम्मिलित करना बड़ा ही कठिन कार्य है ।

फिर भी हमने आपके लिए एक करने का प्रयास किया है हालांकि यह पोस्ट कंप्लीट नहीं है जल्द ही इसका पार्ट 2 www.subhshiv.in वेबसाइट पर अपलोड किया जाएगा 



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