राजस्थान में किसान आंदोलन notes hindi pdf ।। rajasthan me kisan andolan

 

राजस्थान में किसान आंदोलन notes hindi pdf ।। rajasthan me kisan andolan

राजस्थान में किसान आंदोलन notes hindi pdf

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● राजस्थान में ब्रिटिश सरकार के आधिपत्य की स्थापना के पश्चात् यहाँ आर्थिक व सामाजिक परिस्थितियों में परिवर्तन आया।

● शासक अंग्रेजी संरक्षण के कारण स्वयं को सुरक्षित मानने लगे तथा अपनी किसान जनता के प्रति निरंकुश होने लगे।

● साथ ही अंग्रेजों की नीतियों के कारण कुटीर उद्योग धंधे बर्बाद होने लगे तथा भूमि पर आश्रित जनसंख्या का प्रतिशत बढ़ने लगा।

● इस प्रकार अब किसानों में असंतोष बढ़ता गया, जिसका परिणाम विभिन्न किसान आंदोलनों के रूप में सामने आया।

● राजस्थान, भारत के अन्य प्रदेशों की तरह कृषि प्रधान है, जहां किसानों का सीधा सम्बन्ध राज्य से या जागीरदार से हमेशा रहा है। 

● पहले किसानों और राज्य या जागीरदार के सम्बन्ध अच्छे थे।

● किसान अपनी उपज का कुछ भाग उन्हें उपहार के रूप में देते थे और आवश्यकता पड़ने पर अपनी सेवाएं देने में अपना गौरव समझते थे।

● राज्य या जागीरदार उन्हे अपना वात्सल्य प्रेम देकर प्रसन्न रखते थे और युद्ध के अवसर पर उनकी हर प्रकार की सुरक्षा की अवस्था कर उनकी सहायता करते थे।

● उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भ से राज्यों का ईस्ट इण्डिया कम्पनी से सम्बन्ध स्थापित हो जाने के पश्चात स्थिति में एक नया पीरवर्तन आया।

● राजा-महाराजा तो अंग्रेजों की छत्रछाया में मौज का जीवन बिताने लगे और उनके सामन्त या जागीरदार भी अपने स्वामियों का अनुसरण करने लगे।


● जब अंग्रेजों को एक निश्चित खिराज राज्यों से प्राप्त होने लगा तो राज्यों ने भी अपने जागीरदारों से सेवा के बदले एक निश्चित कर लेना आरम्भ कर दिया। 

● जागीरदार राज्यों को अपनी निश्चित कर देने के बाद पूर्णतः निश्चित हो गये और वे अपनी जागीर में मौज मस्ती का जीवन जीने लगे। क्रमशः यही से किसानों का शोषण शुरू हो गया।

● जैसे - जैसे  जागीरदारों के खर्च और निरंकुशता बढ़ती गई वैसे - वैसे  किसानों पर आर्थिक मार बढ़ती गई।

● लगान के अतिरिक्त कई लागतें ली जाने लगी जिनकी संख्या 100 से अधिक थी। 

● जागीरदार के यहां विवाह, जन्म-मृत्यु, त्यौहार आदि का अवसर आता तो किसानों को विशेष लागतों की अदायगी करनी पड़ती थी। 

● ठिकानेदार या कामदार लोगो से अमानवीय ढंग से कर वसूल करते थे। 

● फसल की बुवाई हो या कटाई, शादी हो या मरण, दुष्काल हो या महामारी, ठिकाना बिना किसी प्रकार की दया और विवेक के कर वसूली करता था। 

● इसके अतिरिक्त बेगार प्रथा से किसान इतना ग्रसित था कि उसके न करने पर उसे कठोर यातनाएं भोगनी पडती थी। 

● न्याय प्राप्त करने की किसान कल्पना भी नही कर सकता था।


राजस्थान में किसान आन्दोलन के प्रमुख कारण

● प्राचीन काल से मध्य काल तक शासक तथा सामन्तों या जागीरदार के बीच सम्बन्ध मधुर थे।

● इसी प्रकार सामंतों, जागीरदार तथा उनकी रियासत के मध्य भी सम्बन्धों में सदभावना तथा सहयोग देखने को मिलता हैं। 

● खालसा तथा जागीर दोनों ही क्षेत्रों के किसान अपने स्वामी को सम्मान देते थे। 

● इधर शासक तथा सामन्त भी अपने किसानों को सन्तुष्ट रखने के लिए प्रयास में रहते थे, क्योंकि वे जानते थे कि राज्य तथा जागीरों की समृद्धि केवल किसानों पर निर्भर थी।

● किन्तु उन्नीसवी शताब्दी के मध्य से इस व्यवस्था में बदलाव आने लगा और बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में कृषक असन्तोष का स्वरूप अत्यन्त विस्तृत हो गया । 


कृषक असन्तोष के मुख्य कारण निम्नलिखित थे -

पाश्चात्य संस्कृति की ओर झुकाव बढ़ना

● उन्नीसवी शताब्दी के आरम्भ में देशी राज्यों तथा ईस्ट इण्डिया कम्पनी के बीच सन्धियां स्थापित हो गयी थी, जिससे इन राज्यों को अपनी सुरक्षा व्यवस्था की चिन्ता से मुक्ति मिल गयी थी।

● इन सन्धियों को ब्रिटिश सरकार ने यथावत मान लिया था।

● इससे शासन वर्ग, जागीरदार वर्ग, अपनी रियासत के प्रति उदासीन हो गया।

● ऐसी स्थिति में राजा तथा सामन्त दोनों ही वर्ग विलासप्रिय हो गये।

● अंग्रेज अधिकारियों से सम्बन्ध स्थापित हो जाने के बाद उन पर पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव बढ्ने लगा, जिससे उनके रहन-सहन में भारी परिवर्तन आ गया।

● मेयो कॉलेज (अजमेर) में पढ़ने वाली शासकीय पीढ़ियाँ पश्चिमी शैली की वेशभूषा खान-पान, दावतें तथा अंग्रेजी शराब के प्रति अत्यधिक आकृष्ट हो गई।

● यह नई जीवन शैली ठिकानों में उत्पादित वस्तुओं से पूरी हो सकती थी जिन्हें केवल धातु- मुद्रा से ही प्राप्त किया जा सकता था।

● इसी तरह इन जागीरदारों के पुत्रों का मन अब जागीरों में नहीं लगता था।

● अतः राज्यों की राजधानियों में आधुनिक सुखसुविधाओं से सम्पन्न हवेलियो का निर्माण आरम्भ हुआ , जिसके लिए नकद धन की आवश्यकता महसूस की जाने लगी।

● अतः जागीरदारों ने किसानों पर नई लागतें थोप दी।

● जैसे - जैसे  इन जागीरदारों की आवश्यकताएं बढ़ती गई, किसानों का शोषण भी बढ़ता गया।

● इससे किसानों में असंतोष फैलना स्वाभाविक ही था।


जनसंख्या के एक बड़े भाग का कृषि पर निर्भर होना

● कृषक असंतोष का दूसरा मुख्य कारण जनसंख्या के एक बड़े भाग का कृषि पर निर्भर होना था।

● अठारहवीं सदी में कृषि भूमि की कमी नहीं थी और सामन्तों को यह भय बना रहता था कि यदि किसान जागीर छोड़कर अन्यत्र चले गये अथवा कृषि कार्य के स्थान पर अन्य व्यवसाय अपनाने लगे तो उन्हें भारी आर्थिक हानि हो सकती थी।

● अतः सामान्यतः किसानों के साथ उन्होंने उदार व्यवहार किया था, किन्तु अब परिस्थितियां बदल चुकी थी।

● अंगेजो के आगमन से राजस्थान के कुटीर एवं लघु उद्योगों को क्षति पहुंची थी।

● अब अधिक लोग कृषि व्यवसाय की ओर आकर्षित होने लगे।

● 1891 ई. में राजस्थान में 54 प्रतिशत जनसंख्या ही कृषि पर आधारित थी जबकि 1931 ई. में कृषि पर आधारित लोगों की संख्या बढ़कर 73 प्रतिशत हो गई।

● इस काल में जनसंख्या में भी बड़ा परिवर्तन नहीं आया।

● इस समय में कृषि भूमि की मांग बढ़ती जा रही थी।

● श्रमिक अपेक्षाकृत कम मजदूरी पर काम करने को तैयार थे।

● अतः सामंतों को अब किसानों के असंतोष का भय नहीं रहा।

● ऐसी स्थिति में सामन्त अपनी इच्छानुसार लागतों की संख्या वृद्धि करते रहे।


अमानवीय व्यवहार

● किसानों के असंतोष का सर्वाधिक उल्लेखनीय कारण यह था कि जागीरदार अपने किसानों के साथ अमानवीय व्यवहार करते थे।

● छोटी-छोटी बात पर किसानों को बेरहमी से पीटा जाता था।

● जागीरदार अपने अधिकारों का दुरूपयोग करते थे और किसानों पर झूठा मुकदमा चलाते थे, जिससे भारी जुर्माना वसूला जा सके।

● किसानों को बेगार करनी पड़ती थी क्योंकि बेगार से इन्कार करने पर उनको और अधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता था।

● इनके अतिरिक्त किसानों की बहू-बेटियों की इज्जत भी सदैव खतरे में रहती थी।

● लगान न चुकाने पर किसानों को अपनी पुश्तैनी जमीन से बेदखल कर दिया जाता था।

● कीमती सामान व मवेशियों को ले जाना,फसल काट लेना तो सामान्य सी घटना होती थी।

● जागीर में न्याय व कानून कुछ भी नहीं थे।

● जागीरदार ही कानून था और जागीरदार के अन्याय करने पर कृषक कहीं भी शिकायत नहीं कर सकता था।

● ऐसी स्थिति में किसानों के लिए आन्दोलन के मार्ग पर जाने के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं था।

● अत: किसानों ने संगठित होकर जागीरदारों के अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना आरम्भ कर दिया।


वस्तुओं की कीमतों में अस्थिरता

● राजस्थान में कृषक आन्दोलनों के लिए एक अन्य कारण उन समसामयिक परिस्थितियों का है जिनमें कृषि उत्पादन की वस्तुओं का मूल्य गिरता एवं बढ़ता गया। 

● कृषक दोनों ही स्थितियों मे घाटे में रहते थे।

● गिरते मूल्यों में उनकी बचत का मूल्य बहुत कम रहता था और बढ़ते मूल्यों का उन्हे लाभ नहीं मिलता था, क्योंकि जागीरदार लगान लेता था।

● प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के तुरन्त बाद तथा विश्व भर की  आर्थिक मन्दी की अवधि में कृषि उत्पादनों का मूल्य बहुत कम रहा।

● इसके अतिरिक्त 1916 के पश्चात अफीम की खेती कम होती गई और किसानों को धातु मुद्रा की उपलब्धि भी उसी मात्रा में कम होती गई।

● 1913 से पहले मालवा अफीम की खेती 5,62,000 एकड भूमि में होती थी जो 1930 तक केवल 36,476 एकड़ भूमि रह गयी और 1937 तक 20 हजार एकड भूमि ही रह गई।

● इस नकद जिन्स की खेती कम होने से किसानों की धातु मुद्रा की अवश्यकता पूरी नहीं हो सकी।

● बेंगू के किसानों की मुख्य शिकायत अफीम की खेती का कम होना ही था । 

उपर्युक्त कारणों से यह स्पष्ट है कि किसानों की स्थिति दयनीय थी जिस कारण उनको आन्दोलन करने के लिए मजबूर होना पड़ा था। किसानों का असंतोष मुख्यतः जागीरदार के विरूद्ध होता था, क्योंकि वही सब प्रकार के अधिकार अपने पास केन्द्रित किये हुए था ।


बिजौलिया किसान आन्दोलन


● राजस्थान के किसान आन्दोलन के इतिहास में प्रथम संगठित किसान आन्दोलन उदयपुर राज्य की बीजौलिया जागीर में हुआ था।

● बिजौलिया जो वर्तमान में भीलवाड़ा जिले में स्थित है, मेवाड़ राज्य में प्रथम श्रेणी का ठिकाना था। 

● इसका क्षेत्रफल लगभग एक सौ वर्ग मील था।

● इसके अन्तर्गत 40 गाँव थे।

● 1891 में बिजौलिया कस्बे की जनसंख्या 4000 तथा सम्पूर्ण जागीर की जनसंख्या 12000 थी।

● यहाँ के अधिकांश लोगों का जीवन निर्वाह कृषि पर आधारित था। 

● किसानों में अधिकांश धाकड़ जाति के लोग थे।

● वे अपने परिश्रम और दक्षता के लिए प्रसिद्ध थे।

● जाति के रूप में वे संगठित थे तथा पंचायत व्यवस्था में उनकी दृढ़ निष्ठा थी। 

● बिजौलिया जागीर क्षेत्र के पूर्ति में कोटा बूंदी के राज्य थे, दक्षिण ग्वालियर राज्य की सीमा थी और उत्तर-पश्चिम में मेवाड राज्य के क्षेत्र थे।

● इस जागीर की भौगोलिक बनावट इस प्रकार थी कि यहाँ के किसान आन्दोलन के समय बड़ी सुगमता से पड़ोसी सीमावर्ती राज्यों में पलायन कर सकते थे।

●  बिजौलिया किसान आन्दोलन का अध्ययन तीन भागों में किया जा सकता है -


प्रथम चरण

● प्रथम चरण 1897 ई. से 1915 ई. तक का था। इस काल में आन्दोलन का नेतृत्व स्थानीय लोगों द्वारा किया गया । 

द्वितीय चरण

● आन्दोलन का द्वितीय चरण 1915 ई. से आरम्भ हुआ, जो 1923 ई. तक चला । आन्दोलन का यह काल अत्यन्त महत्वपूर्ण था। इस समय में आन्दोलन का संचालन राष्ट्रीय स्तर के योग्य व अनुभवी व्यक्तियों द्वारा सम्पन्न हुआ। इस समय यह आन्दोलन राष्ट्रीय मुख्यधारा से जुड़ गया था। 

तीसरा चरण

● आन्दोलन का तीसरा और अंतिम चरण 1923 से 1941 ई. में हुआ ।


बिजौलिया किसान आन्दोलन का प्रथम चरण (1897-1915 ई.)

● 1897 ई. में बिजौलिया ठिकाने के हजारों किसान एक मृत्यु भोज के अवसर पर गिरधरपुरा गांव में एकत्रित हुए। 

● यहाँ ठिकाने के अत्याचार व शोषण से दुःखी किसानों ने एक दूसरे से विचार-विमर्श किया और निर्णय लिया कि उनके प्रतिनिधि उदयपुर जाकर महाराणा फतहसिंह से भेंट कर उन्हे न्याय करने के लिए कहें।

●  इस निर्णय के अनुसार उन्होने बैरीवाल पाद के निवासी नानजी पटेल और गोपाल निवास के ठाकरी पटेल को महाराणा से मिलने के लिए उदयपुर भेजा । इस प्रतिनिधि मण्डल की शिकायत पर महाराणा ने जांच करवायी और यह पाया कि किसानों की शिकायत सही थी । महाराणा ने बिजौलिया के जागीरदार को किसानों के प्रति अपने व्यवहार एवं प्रशासन में परिवर्तन करने की सलाह दी । परन्तु जागीरदार ने इस सलाह पर कोई ध्यान नहीं दिया तथा प्रतिनिधि मण्डल के सदस्यों को जागीर क्षेत्र से निष्कासित कर दिया।

● रियासती सरकार द्वारा अपनाई गई निष्क्रियता व उदासीनता से बिजौलिया के शासक को किसान विरोधी नीति अपनाने के लिए प्रोत्साहन मिला।

● वर्ष 1899-1900 के अकाल के दौरान किसानों की आर्थिक स्थिति अत्यधिक दयनीय हो गयी थी।

● 1903 की एक घटना से किसानों को खुले आम जागीरदार की सज्ञा को चुनौती देने के लिए मजबूर होना पड़ा । 

● इस वर्ष 'चंवरी' नामक एक नई लाग किसानों पर थोंप दी गयी थी, जिसके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को अपनी पुत्री की शादी के समय 13 रुपये ( कुछ साक्ष्यों में पाँच रुपये लेना लिखा है) चंवरी लाग देना निर्धारित किया गया था । फिर वर के लिए राव साहब के समक्ष उपस्थित होकर नतमस्तक हो आशीर्वाद प्राप्त करना आवश्यक था। इस अपमानजनक कर के लागू करने पर किसानों में रोष व्याप्त होना स्वाभाविक था।

● इस नई लगान का विरोध करने हेतु लगभग 200 विवाह योग्य कुंवारी लडकियों के साथ भारी संख्या में किसान जागीरदार के समक्ष प्रस्तुत हुए।

● जागीरदार ने किसानों के साथ अपमानजनक व्यवहार किया और यहां तक कह दिया कि इन लड़कियों को बाजार में बेच दो तथा चंवरी लाग जमा करा दो।

● इस बात पर किसानों ने निर्णय लिया कि वे ऐसे स्थान पर नहीं रहेंगे जहां जागीरदार हमारी लड़कियों को बिकवाना चाहता है। 

● उसी रात को अनेक गांवों के किसान सीमावर्ती ग्वालियर राज्य के लिए प्रस्थान कर गये । 

● किसानों के निष्ठमण से जागीरदार का चिन्तित होना स्वाभाविक था । अतः जागीरदार ने निष्ठमण करने वाले किसानों को 1904 में वापस बुलवाकर 'चंवरी लाग' को समाप्त करने के साथ-साथ भू-राजस्व लाग-बाग एवं बेगार सम्बन्धी कई रियायतें देने की घोषणा की । 

● इन रियायतों का किसानों को अधिक समय तक लाभ नहीं मिल पाया, क्योंकि 1906 में इन रियायतों को समाप्त कर दिया गया था । 

1906 ई. में राव कृष्णसिंह का निःसन्तान देहांत हो गया। उसके स्थान पर उसका निकट का सम्बंधी पृथ्वीसिंह बिजौलिया का जागीरदार बना।

●  पृथीसिंह ने न केवल उपर्युक्त रियायतों को समाप्त कर दिया बल्कि उसने मेवाड़ राज्य द्वारा नये जागीरदार से तलवार बँधाई कर (उत्तराधिकारी कर) के रूप में ली गई रकम का भार जनता पर डाल दिया।

● किसानों ने जब इसका विरोध किया, तो स्थानीय शासक ने किसान आन्दोलन से जुड़े व्यक्तियों के विरुद्ध सख्ती का रुख अपनाया और दमनकारी नीति का अनुसरण किया।

● वर्ष 1913 में बिजौलिया के किसानों ने पुनः आन्दोलन का रास्ता अपनाया, जिसका नेतृत्व सीतारामदास नामक साधु ने किया। 

● अभी तक किसान स्वयं अपना नेतृत्व कर रहे थे, किन्तु अब एक धार्मिक व्यक्ति उसका नेतृत्व कर रहा था, इससे किसानों में नई शक्ति एवं साहस का संचार हुआ । 

● मार्च 1913 में साधु सीतारामदास के नेतृत्व में लगभग एक हजार किसान जागीरदार के महल में सामने अपनी शिकायतें प्रस्तुत करने के लिए एकत्रित हुए । 

● जागीरदार ने इनसे मिलने से इन्कार कर दिया । जागीरदार के इस अशिष्ट व्यवहार से किसान नाराज हो गये। 

● किसानों ने 1913-1914 में खेत न जोतने का निर्णय लिया । इससे जागीरदार को बड़ी हानि उठानी पड़ी । किसानों ने ग्वालियर, बूंदी एवं उदयपुर की खालसा भूमि पर खेती करके गुजारा किया । 

● जागीरदार ने किसान आन्दोलन से जुडे व्यक्तियों के विरूद्ध दमनकारी नीति अपनाई ।किसान नेता साधु सीतारामदास को ठिकाने के पुस्तकालय से सेवामुक्त कर दिया गया। अन्य किसान नेताओं को जेल में डाल दिया।

इसी बीच 1914 ई. (कई किताबो में दिसम्बर, 1913 लिखा मिलता है।) में जागीरदार पृथ्वी सिंह की मृत्यु हो गयी तथा उसका अल्प वयस्क पुत्र केसरीसिंह जागीरदार बना । 

● जागीरदार की अल्पवयस्कता के कारण जागीर का नियन्त्रण कोर्ट ऑफ वार्ड्स (महाराणा) सीधे उदयपुर राज्य के अन्तर्गत आ गया था । 

● उदयपुर राज्य ने स्थिति से निपटने के लिए जनश्री, 1914 में बिजौलिया के किसानों की समस्याओं की जांच करके 24जून, 1914 को किसानों के लिए कुछ रियायते देने की घोषणा की। किन्तु इन रियायतों का वास्तविक लाभ किसानों तक नहीं पहुंचा।

इस प्रकार इस आंदोलन का प्रथम चरण पूरा होता है ।

बिजौलिया किसान आन्दोलन के प्रथम चरण का निष्कर्ष :-

● किसान आन्दोलन के पहले चरण का मूल्यांकन करते हुए निष्कर्षत यह कहा जा सकता है कि इस चरण में किसानों में नई चेतना एवं साहस का संचार हुआ । इसने ऐसी पृष्ठभूमि तैयार की जिस पर सामन्त विरोधी भावनाओं को प्रकाश में लाया जा सका ।


बिजौलिया किसान आन्दोलन का दूसरा चरण (1915-1923 ई.)

● इस आंदोलन का दूसरा चरण प्रारम्भ होता है, जब 1916 में विजय सिंह पथिक (वास्तविक नाम भूपसिंह) इस आंदोलन से जुड़ते है। 

● 1915 में साधु सीतारामदास ने विजय सिंह पथिक को इस किसान आन्दोलन का नेतृत्व सम्भालने के लिए आमन्त्रित किया था। 

● विजयसिंह पथिक, रासबिहारी तथा शचीन्द्रनाथ सान्याल के क्रान्तिकारी संगठन का सदस्य था ।

● उसका वास्तविक नाम भूपसिंह था तथा वह उत्तरप्रदेश के बुलन्दशहर जिले के गांव गुढावली का रहने वाला था । 

● उन्हें राजस्थान में क्रान्तिकारी गतिविधियों का संगठित करने हेतु भेजा गया था । 

● उनके दल के साथियों ने 23 दिसम्बर, 1912 को दिल्ली में गवर्नर जनरल हॉर्डिंग पर बम फेंका था ।  

● रासबिहारी बोस जापान चले गये तथा शचीन्द्रनाथ सान्याल को सजा हो गयी थी।

● राजस्थान में विजयीसंह पथिक को भी इन घटनाओं से जुड़े होने के संदेह में गिरफ्तार कर लिया गया तथा टाडगढ की जैल में रखा गया । कुछ समय पश्चात ही वे जैल से भाग गये तथा अपना नाम विजयीसंह पथिक रखकर राजस्थान में ही सामाजिक कार्य करने लगे।

● विजयीसंह पथिक ने चित्तौड़गढ़ के समीप ओछरी नामक गांव में किसानों के बीच विद्या प्रचारणी सभा स्थापित की । 

● 1 जनवरी, 1915 में इस सभा का एक समारोह आयोजित किया गया जिसमें साधु सीतारामदास भी सम्मिलित हुए । 

● साधु सीतारामदास विजयीसिंह पथिक के कार्यों से बहुत प्रभावित हुए तथा उन्होने पथिक से बिजौलिया किसान आन्दोलन का नेतृत्व संभालने के लिए कहा।

● विजयसिंह पथिक 1916 में बिजौलिया पहुंचे तथा आन्दोलन का नेतृत्व सम्भाला।

● विजयसिंह पथिक में कार्य करने की अपूर्व क्षमता थी । 

● सर्वप्रथम उन्होंने किसानों को सुनियोजित रूप से संगठित किया तथा आन्दोलन को व्यवस्थित स्वरूप प्रदान किया। 

● उन्होंने बिजौलिया में विद्या प्रचारिणी सभा का गठन किया, जिसके तत्वावधान में एक पुस्तकालय, एक पाठशाला और एक अखाड़ा चालू किया। ये राजनीतिक गतिविधियों के केन्द्र बन गए।

● 1916 में विजयसिंह पथिक ने बिजौलिया किसान पंचायत (ऊपरमाल पंच बोर्ड) की स्थापना की तथा प्रत्येक गांव में इसकी शाखाएं खोली । एक केन्द्रीय पंचायत कोष भी स्थापित किया गया था, जिसमें पंचायत के सदस्यों से धनराशि एकत्रित की गयी थी ।

● मन्नालाल पटेल को बिजौलिया किसान पंचायत का अध्यक्ष (सरपंच) बनाया गया तथा उसके अधीन आन्दोलन संचालन हेतु 13 सदस्यीय समिति गठित की गयी ।

● माणिक्यलाल वर्मा, जो इस समय बिजौलिया ठिकाने में एक कर्मचारी के पद पर कार्यरत थे, पथिक के सम्पर्क में आए, उन्होंने पथिक से प्रभावित होकर ठिकाने की नौकरी से अवकाश ले लिया। 

● उन्होंने पथिक से आजीवन देश सेवा की दीक्षा ली और पथिक के साथ किसानों को संगठित करने के कार्य में जुट गए । 

● इस कार्य में साधु सीतारामदास का भी पथिक को बड़ा सहयोग रहा। 

● विजयसिंह पथिक ऊपरमाल क्षेत्र में अत्यधिक लोकप्रिय हो गए थे। वहाँ के निवासी उन्हें महात्माजी कहकर सम्बोधित करते थे। उनके आदेशों का पालन करने के लिए वे सदैव तैयार रहते थे। 

● पथिक किसानों की दुर्दशा से परिचित हो चुके थे। इस भयावह स्थिति के निवारण हेतु पथिक ने किसान आन्दोलन को सक्रिय बनाने का निर्णय लिया और 1917 ई. में हरियाली अमावस्या के दिन ऊपरमाल पंच बोर्ड के तत्वावधान में क्रान्ति का बिगुल बजाया।

● पथिक ने किसानों को युद्ध का चंदा नहीं देने के लिए आह्वान किया। 

● किसानों ने घोषणा की कि वे बेगार नहीं करेंगे।

● गोविन्द निवास गाँव के नारायणजी पटेल ने ठिकाने में बेगार करने से इन्कार कर दिया। इस पर ठिकाने के कर्मचारियों ने उसे पकड़ लिया और कैद में डाल दिया। 

● इसकी सूचना मिलने पर किसान पंचायत के आदेशानुसार किसानों के जत्थे बिजौलिया पहुँचने लगे। ठिकाने के प्रशासक भयभीत हो गए। उन्होंने नारायणजी पटेल को जेल से मुक्त कर दिया। किसानों की यह प्रथम विजय थी।

● विजयीसंह पथिक ने 1919 में "राजस्थान सेवा संघ नामक संस्था स्थापित की, जिसका मुख्यालय अजमेर में स्थापित किया गया । 

● पथिक अब अजमेर से बिजौलिया आन्दोलन का नेतृत्व कर रहे थे ।

पथिक ने बिजौलिया किसान आन्दोलन को राष्ट्रीय स्तर पर लाने व सहयोग दिलवाने के उद्देश्य से 'प्रताप' समाचार-पत्र के सम्पादक गणेश शंकर विद्यार्थी से सम्पर्क स्थापित किया। 

● गणेश शंकर विद्यार्थी ने अपने समाचार पत्र 'प्रताप' में बिजौलिया आन्दोलन सम्बन्धी समाचार देने के लिए एक स्थायी स्तम्भ ही खोल दिया। 

● इस प्रचार के फलस्वरूप देशवासियों का बिजौलिया किसान आन्दोलन की ओर ध्यान आकर्षित हुआ।

● महात्मा गाँधी ने बिजौलिया किसान आन्दोलन सम्बन्धी जानकारी प्राप्त करने के उद्देश्य से पथिक को बम्बई आमंत्रित किया था । 

● पथिक ने बिजौलिया के किसानों पर किए जा रहे अत्याचारों का विवरण गाँधीजी के समक्ष प्रस्तुत किया, जिससे गाँधीजी प्रभावित हुए। गाँधीजी ने अपने निजी सचिव महादेव भाई को ऊपरमाल के किसानों की स्थिति की जाँच करने बिजौलिया भेजा। 

● गाँधीजी ने इस आशय का एक पत्र महाराणा को भी लिखा था। गाँधीजी ने बिजौलिया किसान आन्दोलन के प्रति नैतिक समर्थन दिया।

● प्रारम्भ में ब्रिटिश सरकार बिजौलिया के आन्दोलनकारी किसानों को रियायतें देने के पक्ष में नहीं थी। परंतु धीरे धीरे स्थिति में परिवर्तन आने लगा। 

● अगस्त, 1920 ई. में भारत में महात्मा गांधी के नेतृत्व में असहयोग आन्दोलन आरम्भ हुआ, जो 1921 ई. में भयंकर रूप ले चुका था।

● ऐसी स्थिति में ब्रिटिश सरकार ने निश्चय किया कि बिजौलिया किसान आन्दोलन को तुरन्त शान्त किया जाए। 

● इस उद्देश्य से ब्रिटिश सरकार ने एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया, जिसमें ए. जी. जी. रॉबर्ट हॉलैंड, उसके सचिव आगल्वी, मेवाड़ के ब्रिटिश रेजीडेन्ट विल्किसन, मेवाड़ राज्य के दीवान प्रभाषचन्द्र चटर्जी और राज्य के सायर हाकिम बिहारीलाल को रखा । 

● लम्बे विचार-विमर्श के पश्चात् 11 फरवरी, 1922 ई. को ठिकाने और किसान पंचायत के बीच समझौता सम्पन्न हुआ।

● ए. जी. जी. हॉलैंड ने किसानों के पक्ष के औचित्य को स्वीकारा था। समझौते के अनुसार किसानों को अनेक रियायतें दी गई थी। लगभग 35 लागें समाप्त कर दी गईं। इस प्रकार, 1922 ई. में आन्दोलन समाप्त हुआ।


बिजौलिया किसान आन्दोलन का तीसरा चरण (1923-1941 ई.)

● वर्ष 1922 का समझौता किसानों की बड़ी सफलता तो थी किन्तु दुर्भाग्य से ठिकाने की बदनीयति के कारण यह समझौता मात्र छलावा बनकर रह गया था । 

● सर्वप्रथम तो इस समझौते को पूरी तरह से लागू नहीं किया गया था तथा समझौते के बाद जागीरदार एवं उसके अधिकारियों को किसानों के साथ व्यवहार अधिक कठोर हो गया था।

● फरवरी, 1922 में गांधीजी द्वारा असहयोग आन्दोलन वापस लेने के बाद समपूर्ण भारत में किसान आन्दोलनों के प्रति ब्रिटिश सरकार की नीति में परिवर्तन आ गया । 

● 1923 के अन्त तक भारत के सभी भागों में किसान आन्दोलनों को दमनात्मक साधनों से कुचल दिया गया था। 

● इसी बीच बेंगू किसान आन्दोलन के सिलसिले में विजयसिंह पथिक को गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हे पांच वर्ष की सजा दी गयी । 

● साधु सीतारामदास खादी कार्यकम में लग गये और मध्यप्रदेश में रहने लगे । 

● अब बिजौलिया के किसान आन्दोलन की सारी जिम्मेदारी माणिक्यलाल वर्मा के हाथ में थी।

● वर्ष 1923 से 1926 के मध्य बिजौलिया के किसानों की कठिनाइयों और अधिक बढ़ गयी थी।

● इन वर्षा में निरन्तर अतिवर्षा अथवा कम वर्षा के फलस्वरूप बिजौलिया में अकाल की स्थिति बनी रही । 

● फसलें प्राय: नष्ट हो गयी । 

● किसानों ने अकाल के कारण लगान में छूट व माफी के लिए बिजौलिया के जागीरदार एवं उदयपुर के महकमा खास में अपने आवेदन पत्र भेजे, किन्तु उनकी कोई सुनवाई नहीं हुई । 

● 1926 में 1922 के समझौते के अनुसार बिजौलिया ठिकाने में भूमि का बन्दोबस्त किया गया । बन्दोबस्त में जो लगान निर्धारित किया गया बह बहुत अधिक था । 

● बारानी क्षेत्र (माल भूमि) की लगान दरे बहुत बढ़ा दी गयी और सिंचित क्षेत्र के लिए लगान अपेक्षाकृत कुछ कम रखा गया अत: किसानों में इस भेदभाव के कारण असंतोष था । 

● मार्च, 1927 में किसान पंचायत की बैठक हुई, इस बैठक में रामनारायण चौधरी और माणिक्य लाल वर्मा भी उपस्थित थे। 

● इस बैठक में माल भूमि छोडने का प्रश्न उठा अन्तिम निर्णय विजयसिंह पथिक पर छोड़ दिया जो जैल से मुक्त होने वाले थे । 

● जैल से छूटने पर विजय सिंह पथिक को मेवाड़ से निर्वासित कर दिया गया, अत: वे ग्वालियर राज्य में चले गये और वही से बिजौलिया किसान आन्दोलन का नेतृत्व करने लगे । 

● विजयसिंह पथिक का मानना था कि किसानों को माल भूमि तभी छोड़नी चाहिए जब उन्हें यह पक्का विश्वास हो जाय कि उनके द्वारा छोड़ी गयी भूमि को और कोई लेने को तैयार नहीं होगा । 

● मई 1927 में किसानों ने अपनी-अपनी माल भूमि से इस्तीफे दे दिये । 

● ठिकाने ने इस भूमि को नीलाम किया। 

● किसानों के दुर्भाग्य से इन जमीनों के अन्य खरीददार मिल गये ।  

● इस निर्णय को लेकर विजयसिंह पथिक तथा माणिक्यलाल वर्मा के सम्बन्ध बिगड़ गये । अतः विजयसिंह पथिक इस आन्दोलन से अलग हो गया। किसान अपनी-अपनी इस्तीफा शुदा जमीनों को वापस प्राप्त करने के लिए व्यग्र हो गये।

● अब किसान आन्दोलन का नेतृत्व माणिक्यलाल वर्मा तथा हरिभाऊ उपाध्याय को सौंपा गया । 

● इन नेताओं ने सेटलमेन्ट कमिश्नर ट्रेंच से मिलकर एक समझौता करवाया जिसमें किसानों को भूमि लौटाने का आश्वासन दिया गया । किन्तु वास्तव में कोई ठोस कार्यवाही नहीं हो सकी।

● माणिक्यलाल वर्मा ने इस कार्य हेतु सत्याग्रह करने का निर्णय लिया। 

● 20 जुलाई, 1931 ई. को सेठ जमनालाल बजाज ने उदयपुर में महाराणा तथा सर सुखदेव प्रसाद से व्यापक विचार विमर्श किया, जिसके फलस्वरूप समझौता हो गया। हालांकि उदयपुर ने इसका पालन न किया, किंतु जब मेवाड़ प्रजामंडल आंदोलन का व्यापक प्रसार हो रहा था, तो इस भय से कि किसान प्रजामंडल से न जुड़ जाएँ, कुछ पहल आवश्यक थी। 

● अक्षय तृतीय वर्ष 1931 को प्रातःकाल 4000 किसानों ने अपनी इस्तीफा शुदा जमीनों पर हल चलाना आरम्भ किया। 

● ठिकानों के कर्मचारियों सहित सेना, पुलिस के सिपाही तथा जमीनों के नये मालिकों के मध्य संघर्ष आरम्भ हो गया । 

● ठिकाने ने सत्याग्रह को कुचलने के लिए दमनकारी नीति अपनायी । 

● माणिक्यलाल वर्मा तथा अन्य किसानों को गिरफ्तार कर लिया गया । 

● इस समय तक हरिभाऊ उपाध्याय के मेवाड प्रदेश पर रोक लग चुकी थी । 

● उपाध्याय ने मेवाड राज्य के अधिकारियों को किसानों की जमीन वापस लौटाने के समय में कई पत्र लिखे, किन्तु उनके प्रयत्न सफल न हुए । 

● अब यह मामला अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद ने अपने हाथ में लिया । 

● महात्मा गांधी को भी बिजौलिया आन्दोलन में किसानों पर होने वाले अत्याचार के समन्ध में बताया गया । 

● महात्मा गांधी की सलाह पर मदनमोहन मालदीव ने मेवाड के प्रधानमंत्री को इस संबंध में पत्र लिखा । 

● इस पर जमनालाल बजाज को वार्ता के लिए उदयपुर बुलाया गया । 

● जमनालाल बजाज ने उदयपुर के महाराणा एवं उनके प्रधानमंत्री सुखदेव प्रसाद से वार्ता कर एक समझौते पर हस्ताक्षर किये । 

● इस समझौते के अनुसार मेवाड सरकार ने आश्वासन दिया कि माल की जमीन धीरे-धीरे पुराने हकदारों को लौटा दी जायेगी, सत्याग्रह में गिरफ्तार लोगों को रिहा कर दिया जायेगा, और 1922 के समझौते का पालन होगा। 

● इस समझौते के अनुसार सत्याग्रही तो जेल से मुक्त हो गये, किन्तु माल भूमि के संबंध में कोई ठोस कार्यवाही नही हो सकी । 

● अत: माणिक्यलाल वर्मा पुनः किसानों का एक प्रतिनिधि मण्डल लेकर मेवाड राज्य के प्रधानमंत्री सुखदेव प्रसाद से मिलने उदयपुर गये । 

● वहां माणिक्यलाल वर्मा को गिरफ्तार करके कुम्भलगढ़ के किले में नजरबन्द कर दिया । नवंबर, 1933 को माणिक्यलाल वर्मा को नजरबन्दी से मुक्त कर दिया गया तथा मेवाड छोड़ने को मजबूर कर दिया ।

● बिजौलिया किसान आन्दोलन का समापन वर्ष 1941 में हुआ जब मेवाड में सर टी. विजय राघवाचार्य प्रधानमंत्री बने । 

● उस समय मेवाड प्रजामण्डल से पाबन्दी उठायी जा चुकी थी और माणिक्यलाल वर्मा आदि प्रजामण्डल के नेता मुक्त किये जा चुके थे।

● प्रधानमंत्री राघवाचार्य के आदेश से तत्कालीन राजस्व मंत्री मोहनसिंह मेहता बिजौलिया गये और माणिक्यलाल वर्मा तथा अन्य किसान नेताओं से बातचीत की । 

● एक समझौता जिसके अनुसार किसानों को अपनी जमीने वापस मिल गयी। माणिक्यलाल वर्मा के जीवन की यह प्रथम बड़ी सफलता थी। भारत के इतिहास में यह अपने ढंग का अनूठा किसान आन्दोलन था जो राज्य की सीमाएं लांघकर पडौसी राज्यों में भी फैला । 

● इस आन्दोलन ने राजस्थान की रियासतों में एक नयी जागृति पैदा की।

● वर्ष 1938 में मेवाड, शाहपुरा, बूंदी आदि रियासतों में प्रजामण्डलों की स्थापना हुई उनकी पृष्ठ भूमि में यही किसान आन्दोलन था।

● इस आन्दोलन ने माणिक्यलाल वर्मा जैसे तेजस्वी नेता को जन्म दिया जो आगे चलकर राजस्थान के राजनीतिक आन्दोलन के एक प्रमुख कर्णधार बने ।

● 1941 ई. में मेवाड़ के दीवान टी. विजय राघवाचार्य ने राजस्व मन्त्री डॉ. मोहनसिंह मेहता को बिजौलिया भेजा, जिन्होंने किसान नेताओं व अन्य नेताओं से बातचीत कर किसानों की समस्या का समाधान करवाया। किसानों को उनकी जमीनें वापस दे दी गई। इस प्रकार यह आन्दोलन समाप्त हुआ।


बेगूं किसान आंदोलन, मेवाड़ (1921 ई.)

● बिजौलिया आंदोलन से प्रेरणा पाकर बेगूं (मेवाड़) के किसानों ने भी अनावाश्यक व अत्यधिक करों, लाग - बाग, बैठ - बेगार व सामन्ती जुल्मों के विरुद्ध रामनारायण चौधरी के नेतृत्व में 1921 ई. में आंदोलन शुरू किया। 

● बेगूं के किसान 1921 ई. में मैनाल के भैरूकुण्ड नामक स्थान पर एकत्रित हुए। 

● 1923 ई. में किसानों के प्रमुख रूपाजी व कृपाजी धाकड़ सेना की गोलाबारी से शहीद भी हुए, लेकिन किसान अपनी मांगों के लिए जूझते रहे ।

● यद्यपि बेगूं के ठिकानेदार ने किसानों से समझौता करने का प्रयास भी किया, लेकिन उसे अमान्य कर बेंगू आंदोलन को बुरी तरह से कुचला गया । 

● किंतु मेवाड़ सरकार आंदोलन को दबा नहीं सकी। 

● बेगूं के ठाकुर अनूपसिंह एंव राजस्थान सेवा संघ के मध्य जो समझौता हुआ, जिसे 'बोल्शेविक समझौते' की संज्ञा दी गई।


भरतपुर किसान आंदोलन

● भरतपुर राज्य में किसानों की दशा अच्छी थी। यहाँ 95 प्रतिशत भूमि सीधे राज्य के नियंत्रण में थी । यहाँ 5 जातियां ब्राह्मण, जाट, गुर्जर, अहीर एवं मेव कमोबेश समान हैसियत रखती थीं । 

● भरतपुर राज्य में 1931 में नया भूमि बन्दोबस्त लागू किया गया जिससे भू-राजस्व में वृद्धि हो गई। भू-राजस्व अधिकारी लम्बरदारों ने इस बढ़े हुए भू-राजस्व के विरोध में आंदोलन शुरू किया ।

● जब राज्य ने इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया तो 23 नवम्बर, 1931 को 'भोजी लम्बरदार' के नेतृत्व में 500 किसान भरतपुर में एकत्रित हुए।

● भोजी लम्बरदार ने राज्य के विरुद्ध भड़काऊ भाषण दिए। नवम्बर, में 1931 में 'भोजी लम्बरदार' को गिरफ्तार कर लिया गया जिससे यह आंदोलन समाप्त हो गया ।

मेव किसान आंदोलन 

● अलवर, भरतपुर क्षेत्र में मोहम्मद हादी ने 1932 ई. में अन्जुमन खादिम उल इस्लाम' नामक संस्था स्थापित कर मेव किसान आंदोलन को एक संगठित रूप दिया । 

● अलवर के मेव किसान आंदोलन का नेतृत्व  गुडगांव के 'चौधरी यासीन खान द्वारा किया गया। 

● इसके नेतृत्व में किसानों ने खरीफ फसल का लगान देना बंद कर दिया। 

● राज्य सरकार ने मेवों को संतुष्ट करने के लिए राज्य कॉन्सिल में एक मुस्लिम सदस्य खान बहादुर काजी अजीजुद्दीन बिलग्रामी को सम्मिलित कर लिया। इसके बावजूद आंदोलन न केवल तेज हुआ, बल्कि उग्र भी हो गया। 

● 1937 में मि. बिलग्रामी के मातहत मेव संकट की जांच हेतु एक विशेष समिति का गठन किया गया। इस समिति की रिपोर्ट के आधार पर मेवों को भू-राजस्व तथा अन्य करों में छूट के साथ-साथ सामाजिक व धार्मिक समस्याओं का समाधान भी किया गया।


अलवर किसान आंदोलन एवं नीमूचाणा हत्याकाण्ड (1921-1925)


● अलवर रियासत में जंगली सुअरों को अनाज खिला कर रोधों में पाला जाता था । ये सुअर किसानों की खड़ी फसल बर्बाद कर देते थे। उनकों मारने पर भी रियासती सरकार ने पाबंदी लगा रखी थी। 

● सुअरों की समस्या के निराकरण हेतु किसानों ने 1921 में आंदोलन शुरू किया। 

● अंततः सरकार ने समझौता कर किसानों को सुअर मारने की इजाजत दे दी। 

● 1923-24 में अलवर महाराजा जयसिंह ने लगान की दरों को बढ़ा दिया। 

● विरोधस्वरूप 14 मई, 1925 को लगभग 800 किसान अलवर के नीमूचाणा गांव में एकत्र हुए। उस सभा पर सैनिक बलों ने मशीनगनों से अंधाधुंध फायरिंग की, जिससे सैकड़ों लोग मारे गए। महात्मा गांधी ने इस कांड को 'जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड से भी वीभत्स' बताया और उसे डायरवाद गहरा एवं व्यापक की संज्ञा दी । 

● अंततः सरकार को लगान के बारे में किसानों के समक्ष झुकना पड़ा, और आंदोलन समाप्त हुआ।


बूंदी राज्य में किसान आन्दोलन

● बिजौलिया और बेगूं के किसानों के समान बूंदी राज्य के किसानों को भी अनेक प्रकार की लागें (लगभग 25), बेगार और ऊँची दरों पर लगान की रकम देनी पड़ रही थी। 

● बिजौलिया और बेगूं के किसानों के आन्दोलन से वे अत्यधिक प्रभावित हुए थे। 

● परिणामतः अप्रैल, 1922 ई. में बिजौलिया की सीमा से जुड़े बून्दी राज्य के बरड़ क्षेत्र के किसानों ने बून्दी प्रशासन के विरुद्ध आन्दोलन आरम्भ कर दिया। इस आन्दोलन का नेतृत्व राजस्थान सेवा संघ के कर्मठ कार्यकर्ता नैनूराम के हाथों में था।

● बूंदी राज्य ने इन किसानों पर अत्याचार प्रारम्भ कर दिए। 

● राजस्थान सेवा संघ के माध्यम से बून्दी राज्य में चल रहे दमनचक्र की सर्वत्र निन्दा की गई। 

● 2 अप्रैल, 1923 ई. को डाबी गांव में किसानों की एक सभा हुई। सभा में एकत्रित किसानों की भीड़ पर पुलिस ने निष्ठुरता से लाठी प्रहार किया तथा गोलियां चलाई, जिसके परिणामस्वरूप नानक भील और देवलाल गुर्जर शहीद हुए। 

● बून्दी राज्य की इस घटना की सर्वत्र निन्दा की गई। 

● बून्दी सरकार ने किसानों की कुछ शिकायतों का निवारण किया और लाग-बाग और बेगार में कुछ रियायतें दी। 

● किसान आन्दोलनकारी राज्य की ओर से दी गई रियायतों से पूर्णतया सन्तुष्ट तो नहीं थे, परन्तु वे अपने आन्दोलन को आगे चलाने की स्थिति में भी नहीं थे, क्योंकि अब उन्हें राजस्थान सेवा संघ से मार्गदर्शन मिलना बन्द हो गया था। 

● 1923 ई. के अन्त तक आन्दोलन प्रायः समाप्त हो गया। 

● 1936 ई. में एक बार फिर बरड़ क्षेत्र में आन्दोलन का दौर चालू हुआ।

● 5 अक्टूबर, 1936 ई. की हिन्डोली में स्थित हूडेश्वर महादेव के मन्दिर में 90 गाँवों के गुर्जर-मीणा किसानों के 500 प्रतिनिधियों का एक विराट सम्मेलन हुआ, जहाँ उन्होंने एक माँग-पत्र तैयार किया और उसे सरकार को प्रेषित किया। सरकार ने उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया।

● किसानों ने राज्य के विरुद्ध आन्दोलन छेड़ दिया, जो लम्बे समय तक चला। 

● अन्ततः सरकार ने चराई करों में कुछ छूट दी और युद्ध ऋण की वसूली में शक्ति का प्रयोग बन्द कर दिया । आन्दोलन के समय जिन लोगों को गिरफ्तार किया गया उन्हें छोड़ दिया गया। इस प्रकार यह आन्दोलन समाप्त हो गया।

जयपुर राज्य में किसान आन्दोलन

● राजस्थान के अन्य राज्यों के किसानों की भाँति जयपुर राज्य के किसानों की स्थिति भी बड़ी दयनीय थी । 

● वे अपने शासकों के आतंक, अत्याचार और शोषण से उत्पीड़ित थे। 

● जयपुर रियासत में किसान आन्दोलन का मूल केन्द्र राज्य के पश्चिमी भाग में स्थित शेखावटी, तोरावटी, साँभर, सीकर और खेतड़ी के ठिकाने थे। 

● किसान आन्दोलन का श्रीगणेश सीकर ठिकाने में हुआ।

● 1922 ई. में सीकर के नये रावराजा कल्याणसिंह ने भूमिकर में 25 से 50 प्रतिशत की वृद्धि कर दी। उसने किसानों को आश्वासन दिया था कि अगले वर्ष उनसे ली जा रही लागों में छूट दे दी जाएगी । 

● रावराजा ने अपने वचन का पालन नहीं किया।

● इससे किसान खिन्न हो गए व आंदोलन प्रारम्भ कर दिया ।

● रामनारायण चौधरी और हरि ब्रह्मचारी के सीकर आने से किसान आन्दोलन को प्रोत्साहन मिला।

● सीकर आन्दोलन की गूंज केन्द्रीय असेम्बली एवं ब्रिटेन के हाउस ऑफ कॉमंस में उठी। 

● ब्रिटिश सरकार ने रावराजा को सलाह दी कि वह अपने ठिकाने में नियमित रूप से भूमि बन्दोबस्त की व्यवस्था करे । 

● रावराजा ने ठिकाने में भूमि बन्दोबस्त करवाने के पूर्व भूमि का सर्वेक्षण करवाया, जिसमें छोटी जरीब का उपयोग किया गया था। 

● सीकर के रावराजा ने 'इजाफा' के नाम पर बीघा भूमि पर दो आना भूमिकर में वृद्धि कर दी।

● जरीब की लम्बाई के मामले को लेकर तथा भूमिकर में की गई वृद्धि के कारण किसानों में पुनः असन्तोष बढ़ने लगा। 

● अक्टूबर, 1925 ई. में जाट सभा का बगड़ (शेखावटी) में एक अधिवेशन आयोजित हुआ, जिसमें राज्य और जागीरदारों द्वारा जाटों पर किए जा रहे सामाजिक और आर्थिक शोषण के विरुद्ध अभियान चलाने सम्बन्धी कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार करने का निर्णय लिया गया। 

● जाट नेताओं ने शेखावाटी के गाँवों में पहुँचकर किसानों से सम्बन्ध स्थापित कर उन्हें ठिकानेदारों को भूमि लगान न देने के लिए समझाया।

● भतरपुर के जाट नेता देशराज ने सीकर और शेखावटी के जाट किसानों को अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने को प्रेरित किया और उनमें एक नयी चेतना उत्पन्न की।

● 1932 ई. में वसन्त पंचमी के पर्व के अवसर पर झुंझुनूं में जाट महासभा के तत्वावधान में भव्य समारोह हुआ। 

● इस समारोह में 60 हजार जाट किसानों ने भाग लिया था। इससे किसान आन्दोलन को प्रोत्साहन मिला। 

● जाटों को संगठित करने के उद्देश्य से देशराज ने सितम्बर, 1933 ई. में पलथाना में एक सभा का आयोजन किया, जिसमें सीकर में एक महायज्ञ करने का निर्णय लिया गया।

● रावराजा ने महायज्ञ के अध्यक्ष की सवारी के लिए हाथी देने से इन्कार कर दिया। 

● किसानों और शासकों के बीच तनाव उत्पन्न हो गया था।

● महायज्ञ के समय ( जनवरी, 1934) किसानों द्वारा दिये गये भाषणों में ठिकाने की नीति की कटु आलोचना की गई थी। 

● इससे खिन्न होकर ठिकाने के रावराजा ने जाट सभा के सचिव चन्द्रभान को गिरफ्तार कर उसे छः सप्ताह की जेल तथा 51 रुपये जुर्माने का दण्ड दिया। 

● जाटों ने इसका कड़ा विरोध किया। 

● सिहोट के ठाकुर मानसिंह द्वारा सोतिया का बास नामक गांव में किसान महिलाओं के साथ किए गए दुर्व्यवहार के विरोध में 25 अप्रैल, 1934 ई. को जाट महिलाओं ने एक सम्मेलन आयोजित किया, जिसमें दस हजार स्त्रियों ने भाग लिया। इस सम्मेलन की अध्यक्षता किशोरी देवी ने की थी।

अप्रैल, 1935 ई. में सीकर ठिकाने का राजस्व अधिकारी पुलिस की सहायता से कूदन ग्राम में भूमि लगान वसूल करने पहुँचा। 

● उस समय जाट किसानों में हिंसा भड़क उठी।

● पुलिस ने गोली चला दी, जिससे चार जाट मारे गए और 14 किसान घायल हुए। 

● शहीद होने वाले किसान थे - चेतराम, टीकूराम तथा लगभग 175 जाट किसान गिरफ्तार कर लिए गए। 

● इस हत्याकांड की गूँज ब्रिटिश संसद में भी सुनाई दी। इससे मजबूर होकर जयपुर के महाराजा को इस ओर ध्यान देना पड़ा।

● आतंककारी साधन अपनाने के बावजूद जाट आन्दोलन को कुचला नहीं जा सका । 

● अन्ततः सीकर ठिकाने को नियमित भूमि सर्वेक्षण तथा बन्दोबस्त का कार्य आरम्भ करना पड़ा तथा किसानों की कतिपय माँगों को स्वीकार करना पड़ा। 

● इस आंदोलन के लिए किसानों को संगठित होने के लिए प्रेरणा देने वाली महिला धापी दादी थी।

● वहीं इस आंदोलन का नेतृत्व करने वाले प्रमुख किसान नेता थे - सरदार हरलाल सिंह, नेतराम सिंह, पृथ्वीसिंह गोठड़ा, पन्ने सिंह बाटड़ानाउ, हरूसिंह पलथाना, गौरूसिंह कटराथल, ईश्वरसिंह भैरूपुरा, लेखराम कसवाली आदि ।

● इस बीच शेखावटी के अन्य ठिकानों में भी जाट आन्दोलन फैल गया । 

● मार्च, 1933 ई. में खेतड़ी, डूंडलोद, नवलगढ़, मण्डावा, बिसाऊ, सूरजगढ़, हमीरवास, इस्माइलपुर, जखारा, मलसीसर, अलसीसर, पाटन आदि ठिकानों में भी जाटों ने भूमि कर देने से मना कर दिया । 

● 16 मई, 1934 ई. को हमीरवास के ठाकुर कल्याणसिंह के आदमियों ने हनुमानपुरा ग्राम के जाट किसानों के घरों में आग लगा दी, जिससे 33 घर जलकर राख हो गए। 

● इसी प्रकार डूंडलोद के ठाकुर ने जयसिंहपुरा गाँव के किसानों को आतंकित किया तथा उसके भाई हरनाथसिंह ने सशस्त्र व्यक्तियों के साथ किसानों पर लाठियों व तलवारों से वार कर जाट किसानों को घायल कर दिया। 

● जागीरदारों की इन हरकतों से शेखावाटी के किसानों ने सशस्त्र संगठित होकर उनका डटकर मुकाबला किया। 

● शेखावटी जाट किसान पंचायत की तरफ से 9 अक्टूबर, 1934 को जयपुर महाराजा को माँग पत्र प्रेषित किया गया और प्रार्थना की कि जागीरदारों के आतंक से उन्हें मुक्त कराएँ। 

● शेखावटी के नाजिम ने भी अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार को प्रेषित की। 

● नाजिम ने किसानों की शिकायतों की पुष्टि की और उनके समाधान के लिए सुझाव दिया । 

● परिणामतः 1936 ई. में ठिकाने में भूमि सर्वेक्षण और भूमि बन्दोबस्त की प्रक्रिया प्रारम्भ हुई, जिससे शेखावटी व सीकर क्षेत्र में कुछ शान्ति हुई।

● सीकर व शेखावटी के दीर्घकालीन किसान संघर्ष का अन्त मार्च, 1947 ई. में जयुपर में हीरालाल शास्त्री के नेतृत्व में लोकप्रिय सरकार के गठन हो जाने के साथ ही हुआ । 

● राजस्व मंत्री टीकाराम पालीवाल ने गैर–खालसा क्षेत्र में भूमि बन्दोबस्त करवाने की व्यवस्था की ।


मारवाड़ किसान आंदोलन


● जयपुर राज्य के शेखावटी के जाट आन्दोलन का प्रभाव मारवाड़ राज्य के डीडवाना और साँभर परगनों तथा शेखावटी से लगे क्षेत्र के जाटों पर भी पड़ा। 

● मई, 1938 ई. में मारवाड़ लोक परिषद की स्थापना हुई। 

● मारवाड़ लोक परिषद ने किसानों की माँगों का जोरदार समर्थन किया तथा सरकार की कटु आलोचना की । 

● जागीरदारों ने किसान आन्दोलन के लिए लोक परिषद के नेताओं को उत्तरदायी ठहराया, इसलिए उन्होंने परिषद के कार्यकर्त्ताओं के प्रति कड़ाई व पाशविक दृष्टिकोण अपनाया।

● 28 मार्च, 1942 ई. को लोक परिषद के कार्यकर्ताओं ने चंद्रावल गांव में उत्तरदायी शासन दिवस मनाने का निर्णय लिया। 

● चन्द्रावल के ठाकुर ने मारवाड़ लोक परिषद के कार्यकर्ताओं को ऐसा करने के लिए रोकने हेतु अपने आदमी भेजे, जिन्होंने परिषद के कार्यकर्ताओं पर लाठी व तेज धार वाले हथियारों से प्रहार किया, जिससे 25 व्यक्तियों को गहरी चोटें आई। 

● सोजत के मीठालाल और विजयशंकर, कंटालिया के मार्कन्डेश्वर और हरिराम चंद्रावल के रामसुख और चाँदमल भयंकर रूप से घायल हुए।

● 13 मार्च, 1947 को डाबड़ा (डीडवाना परगना) गाँव की किसान सभा और लोक परिषद की ओर से एक किसान सम्मेलन बुलाया गया था। 

● लोक परिषद के नेता मथुरादास माथुर, द्वारकादास पुरोहित, राधाकिशन बोहरा, किशनलाल शाह, नरसिंह कच्छवाह, बंशीधर पुरोहित, हरीन्द्र कुमार चौधरी, सी. आर. चौपासनीवाला आदि भाग लेने डाबड़ा पहुँचे, और वे स्थानीय नेता मोतीलाल चौधरी के निवास स्थान पर ठहरे।

● जागीरदारों ने पहले से ही किसान सम्मेलन को न होने देने के लिए तैयारी कर ली थी। 

● जैसे ही लोक परिषद के कार्यकर्ता व नेता वहाँ पहुँचे, उन्होंने मोतीलाल के घर पर लाठियाँ व तेज धारवाले हथियारों से धावा बोल दिया और नेताओं की नृशंसतापूर्ण पिटाई की। मोतीलाल चौधरी की माता के पैर काट दिए गए। उनके पिता और भाई को मार दिया गया। उनकी पत्नी के मुख को विरूप कर दिया गया । गाँव में चारों तरफ आतंक का वातावरण बन गया। डाबड़ा काण्ड की सर्वत्र निन्दा की गई।


बीकानेर किसान आंदोलन 

● बीकानेर राज्य में कुल 2917 गाँव थे, जिनमें से 1393 गाँव जागीरी क्षेत्र में स्थित थे। 

● सीमा से जुड़े सीकर क्षेत्र और शेखावटी के जाट आन्दोलनों का बीकानेर राज्य के जाट किसानों पर व्यापक रूप से प्रभाव पड़ा था। 

● बीकानेर के अनेक जाट प्रतिनिधियों ने झुंझुनूं में आयोजित अखिल भारतीय जाट महासभा के अधिवेशन में तथा सीकर में 20 से 29 जनवरी, 1934 ई. के विशाल जाट प्रजापति महायज्ञ में सक्रिय रूप से भाग लिया था। 

● इन घटनाओं के फलस्वरूप बीकानेर राज्य के जाटों में भी जागीरदारों के विरुद्ध आवाज उठाने का साहस उत्पन्न हुआ तथा उनमें राजनीतिक चेतना आई।

● उस समय बीकानेर राज्य के जागीरी क्षेत्र में 37 लागें विद्यमान थी। 

● किसानों से जागीरदार बेगार लेता था । 

● 1937 ई. में उदरासर के किसानों ने लाग-बाग के विरुद्ध आवाज उठाई। 

● उनके नेता जीवन चौधरी के आग्रह पर बीकानेर प्रजामंडल ने किसानों की शिकायतें राज्य सरकार के समक्ष रखीं, किंतु इसका कोई परिणाम नहीं निकला ।

● बीकानेर राज्य में किसान आन्दोलनों की श्रृंखला में दूधवाखारा गाँव (चूरू के पास) के आन्दोलन का भी एक विशिष्ट स्थान है। 

● पुलिस ने यहाँ खुलकर अत्याचार किया था। 

● किसान नेता हनुमानसिंह ने ठाकुर ने द्वारा किए जा रहे अत्याचारों के विरुद्ध आवाज उठाई। 

● वह पहले भादरा में महाराजा शार्दूलसिंह से मिला और बाद में अनेक साथियों के साथ वह महाराजा से मिलने माउण्ट आबू पहुँचा। महाराजा ने कोई सन्तोषजनक उत्तर नहीं दिया। जब वह आबू से लौट रहा था, तब रतनगढ़ में उसे पुलिस ने (जून, 1945 ई.) गिरफ्तार कर लिया। 

● हनुमानसिंह पर देशद्रोह का मुकदमा चलाया गया और उसे पाँच वर्ष का कारावास दिया गया।

उसने जेल में भूख हड़ताल की। 

● स्वास्थ्य खराब हो जाने पर 10 अगस्त, 1945 ई. को हनुमानसिंह को जेल से मुक्त कर दिया गया। 

● महाराजा ने उसे शान्त करने के लिए 100 मुरबा जमीन गंगानगर क्षेत्र में देने का प्रलोभन दिया था, परन्तु उसने इसे स्वीकार नहीं किया। 

● जेल से मुक्त होकर भी वे लगातार संघर्ष करते रहे, और दो बार और जेल की यात्रा की।

● अन्ततोगत्वा बीकानेर राज्य में लोकप्रिय सरकार की स्थापना हुई, तब उन्हें जेल से मुक्त किया गया। (4 जनवरी, 1948 ई.)

● यद्यपि दूधवाखारा किसान आन्दोलन सफल नहीं रहा, तथापि इससे राजनीतिक चेतना का संचार हुआ। 

● किसानों में आत्मविश्वास जाग्रत हुआ। 

● वे अब अत्याचारों के विरुद्ध आवाज उठाने लगे थे।

● 30 जून से 1 जुलाई, 1946 ई. को प्रजा परिषद ने रायसिंहनगर में एक राजनीतिक सभा का आयोजन किया। 

● इस सभा पर पुलिस ने लाठियों से आक्रमण किया, जिससे अनेक कार्यकर्ता घायल हुए । उग्र भीड़ ने राजकीय विश्राम गृह को घेर लिया। 

भीड़ को हटाने के लिए पुलिस ने गोलियां चलाई जिसके परिणामस्वरूप बीरबलसिंह मारा गया।

● अखिल भारतीय देशी रियासत परिषद की ओर से हीरालाल शास्त्री, गोकुलभाई भट्ट और बीकानेर के रघुवरदयाल गोयल ने रायसिंहनगर कांड की समीक्षा की। 

हनुमानगढ़ में नियुक्त मुंसिफ मजिस्ट्रेट हरदत्तसिंह चौधरी ने राष्ट्रीय चेतना से प्रेरित होकर सरकारी नौकरी से त्याग-पत्र दे दिया। उसने प्रजा परिषद की सदस्यता स्वीकार कर ली।

3 सितम्बर, 1946 ई. के गोगामेड़ी गाँव में एक विशाल किसान सभा का आयोजन किया गया था, जहाँ जागीर प्रथा के उन्मूलन के लिए नारा बुलन्द किया गया।

● अक्टूबर, 1946 ई. में अकाल और सूखे के समय में भी काँगड़ के जागीरदार ने किसानों से पूरा लगान वसूल करना चाहा, जिसका किसानों ने विरोध किया। कुछ किसान महाराजा को शिकायत करने के लिए बीकानेर पहुँचे । 

● इससे जागीरदार आग-बबूला हो गया। 

● किसानों पर अमानवीय अत्याचार किए गए। काँगड़-कांड की सर्वत्र निन्दा की गई। 


● अन्ततः यह संघर्ष 1948 ई. में बीकानेर राज्य में लोकप्रिय मंत्रिमंडल का गठन होने के बाद ही समाप्त हुआ। 

● बीकानेर के किसान आंदोलन के प्रमुख हस्ताक्षरों में एक कुम्भाराम आर्य भी हैं, जिन्होंने परम्परागत् लाग-बाग, बेगार को न देने का बिगुल बजाया। वे बीकानेर प्रजा परिषद से जुड़े रहे। उन्होंने "किसान यूनियन क्यों" पुस्तक भी लिखी। सामंती व्यवस्था के विरोध और किसानों के हित में उनका संघर्ष स्वतंत्रता के उपरांत भी जारी रहा।

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