सिंधु घाटी सभ्यता । हड़प्पा सभ्यता। sindhu ghati sabhyata notes in hindi PDF complete notes

सिंधु घाटी सभ्यता । हड़प्पा सभ्यता। sindhu ghati sabhyata  notes in hindi PDF complete notes

सिंधु घाटी सभ्यता । हड़प्पा सभ्यता। sindhu ghati sabhyata  notes in hindi PDF complete notes


स्वागत है आपका हमारी साइट पर आज हम आपके लिए सिंधु घाटी सभ्यता के नोट्स लेकर उपस्थित हुए हैं।
सिंधु घाटी सभ्यता को हड़प्पा सभ्यता के नाम से भी जाना जाता है तथा इसे सिंधु सरस्वती सभ्यता के नाम से भी जाना जाता है।
सिंधु घाटी सभ्यता टॉपिक से संबंधित प्रश्न हर एग्जाम में पूछे जाते हैं ऐसी कोई प्रतियोगी परीक्षा अभी तक नहीं हुई है जिसमें सिंधु घाटी सभ्यता टॉपिक न दिया गया हो या फिर उससे संबंधित प्रश्न न पूछे गए हो।
यह भी पढ़े :-  
इसकी उपयोगिता को देखते हुए हमने आपके लिए तैयार किए हैं यह नोट्स "सिंधु घाटी सभ्यता"
हम आशा करते हैं कि यह नोट्स आपके लिए उपयोगी साबित होंगे।
धन्यवाद।



सिन्धु घाटी सभ्यता के नोट्स PDF FORMAT में DOWNLOAD करनें के लिये अंत में दिये गये DOWNLOAD BUTTON पर CLICK  करें।


NOTES

DOWNLOAD LINK

REET

DOWNLOAD

REET NOTES

DOWNLOAD

LDC

DOWNLOAD

RAJASTHAN GK

DOWNLOAD

INDIA GK

DOWNLOAD

HINDI VYAKARAN

DOWNLOAD

POLITICAL SCIENCE

DOWNLOAD

राजस्थान अध्ययन BOOKS

DOWNLOAD

BANKING

DOWNLOAD

GK TEST PAPER SET

DOWNLOAD

CURRENT GK

DOWNLOAD



हमारे यूट्यूब चैनल से जुड़े

              👇

   RJSS CLASSES 




यह भी पढ़े :-  



सिन्धु घाटी सभ्यता/हड़प्पा सभ्यता/सिन्धु-सरस्वती सभ्यता

सिन्धु घाटी सभ्यता

सामान्य परिचय :-

सिंधु घाटी सभ्यता को हड़प्पा सभ्यता क्यों कहा जाता है?
● खुदाई में सर्वप्रथम हड़प्पा नगर मिलने के कारण सिन्धु घाटी सभ्यता को हड़प्पा सभ्यता के नाम से जाना जाता है।
● यह सभ्यता सिन्धु तथा सरस्वती नदी के किनारे विकसित हुई अत: इसे सिन्धु-सरस्वती सभ्यता के नाम से जाना जाता है।
सिन्धु-सरस्वती सभ्यता भारतीय उपमहाद्वीप में प्रथम सभ्यता उत्तर-पश्चिम क्षेत्रों में विकसित हुई।
● भारतीय इतिहास एवं संस्कृति में सरस्वती
नदी का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है।
● सरस्वती नदी के तट पर वेदों की रचना हुई है। 
● वेदों तथा वैदिक साहित्य, महाकाव्यों, पुराणों आदि में इसका व्यापक विवरण प्राप्त होता है । 
● सरस्वती नदी को सिन्धु नदी सहित छः नदियों की माता माना है। 
● अतःसरस्वती नदी सिन्धु नदी से भी प्राचीन है । 
● अतः सरस्वती नदी सभ्यता, सिन्धु घाटी से पूर्व की एक सुसंस्कृत, सुव्यवस्थित सभ्यता थी। 
● वास्तव में वैदिक संस्कृति का जन्म और विकास इसी नदी के तट पर हुआ था।
● सरस्वती नदी शिवालिक पहाड़ियों से निकल कर आदि बद्री में पहुँचती है। वहाँ से हरियाणा, राजस्थान होती हुई कच्छ की खाड़ी में गिरती थी। इसके लुप्त होने के बारे में अनेक किंवदन्तियाँ प्रचलित हैं।
● सिंधु घाटी सभ्यता मिस्र, मेसोपोटामिया, भारत और चीन की चार सबसे बड़ी प्राचीन नगरीय सभ्यताओं से भी अधिक उन्नत थी।
● 1921 में, भारतीय पुरातत्त्व विभाग द्वारा किये गए सिंधु घाटी के उत्खनन से प्राप्त अवशेषों से हड़प्पा तथा मोहनजोदडो जैसे दो प्राचीन नगरों की खोज हुई।
● हड़प्पाई लिपि का प्रथम उदाहरण लगभग 3000 ई.पू के समय का मिलता है।
● व्यापार क्षेत्र विकसित हो चुका था और खेती के साक्ष्य भी मिले हैं। उस समय मटर, तिल, खजूर , रुई आदि की खेती होती थी।
● कोटदीजी नामक स्थान परिपक्व हड़प्पाई सभ्यता के चरण को प्रदर्शित करता है।
● 2600 ई.पू. तक सिंधु घाटी सभ्यता अपनी परिपक्व अवस्था में प्रवेश कर चुकी थी।
● परिपक्व हड़प्पाई सभ्यता के आने तक प्रारंभिक हड़प्पाई सभ्यता बड़े- बड़े नगरीय केंद्रों में परिवर्तित हो चुकी थी। जैसे- हड़प्पा और मोहनजोदड़ो वर्तमान पाकिस्तान में तथा लोथल जो कि वर्तमान में भारत के गुजरात राज्य में स्थित है।
● सिंधु घाटी सभ्यता के क्रमिक पतन का आरंभ 1800 ई.पू. से माना जाता है,1700 ई.पू. तक आते-आते हड़प्पा सभ्यता के कई शहर समाप्त हो चुके थे।
● परंतु प्राचीन सिंधु घाटी सभ्यता के बाद की संस्कृतियों में भी इसके तत्व देखे जा सकते हैं।
● कुछ पुरातात्त्विक आँकड़ों के अनुसार उत्तर हड़प्पा काल का अंतिम समय 1000 ई.पू. - 900 ई. पू. तक बताया गया है।

यह भी पढ़े :- वैदिक सभ्यता

भौगोलिक विस्तार :-

हड़प्पा सभ्यता की खोज किसने की
सिन्धु घाटी सभ्यता की खोज किसने की
● 1921 में दयाराम साहनी तथा 1922 में राखलदास बनर्जी द्वारा हडप्पा तथा मोहनजोदडो में किए गए उत्खननों से सिन्धु-सरस्वती सभ्यता का अनावरण हुआ। 
● पुरास्थल हमें पाकिस्तान में सिन्ध, पंजाब एवं बलूचिस्तान प्रान्तों से तथा भारत में जम्मू-कश्मीर, पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, वर्तमान में राजस्थान, गुजरात तथा महाराष्ट्र प्रान्तों से इस सभ्यता के साक्ष्य मिले हैं। 
● इन सभी प्रान्तों से प्राप्त पुरास्थलों की सूची निम्नलिखित है -
हड़प्पा सभ्यता के प्रमुख स्थल :-
प्रान्त
पुरातात्विक स्थल
बलूचिस्तान (पाकिस्तान)
सुत्कागेण्डोर, सुत्काकोह बालाकोट
पंजाब (पाकिस्तान)
हडप्पा, जलीलपुर, रहमान
ढेरी, सराय खोला,
गनेरीवाल
सिंध (पाकिस्तान)
मोहनजोदडो, चन्हुदड़ो,
कोटदीजी, जुदीरजोदडो
पंजाब (भारत)
रोपड, कोटला निहंगखान, संघोल
हरियाणा (भारत)
बणावली, मीताथल, राखीगढी
जम्मू-कश्मीर
माण्डा (जम्मू)
राजस्थान
कालीबंगा
उत्तर प्रदेश
आलमगीरपुर (मेरठ) हुलास
(सहारनपुर)
गुजरात
रंगपुर, लोथल, प्रभासपाटन, रोजदी, देशलपुर, सुरकोटड, मालवण, भगतराव, धौलवीरा
महाराष्ट्र
दैमाबाद (अहमदनगर)

● नवीन परिगणना के हिसाब से सिन्धु सभ्यता के लगभग 1400 स्थल हमें ज्ञात हैं।
● इनमें 917 भारत में 481 पाकिस्तान में तथा शेष 2 स्थल अफगानिस्तान (शोर्तुगोई मुड़ीगाक) में हैं।
● सिन्धु सभ्यता के विस्तार की उत्तरी सीमा जम्मू क्षेत्र में चेनाब नदी के किनारे स्थित माण्डा पुरास्थल है ।
● इसकी दक्षिणी सीमा महाराष्ट्र के दैमाबाद (अहमदनगर) नामक स्थल पर है। 
● यमुना नदी की सहायक हिण्डन नदी के तट पर स्थित आलमगीरपुर सबसे पूर्वी पुरास्थल है।
● सबसे पश्चिमी पुरास्थल बलूचिस्तान में मकरान तट पर स्थित सुत्कागेण्डोर है। 
● अर्थात् सिन्धु सभ्यता पश्चिम से पूर्व तक 1600 कि.मी. तथा उत्तर से दक्षिण तक 1400 कि.मी. में फैली हुई थी। 
● सिन्धु सभ्यता का वर्तमान में प्राप्त भौगोलिक विस्तार लगभग 15 लाख वर्ग किमी. है।

सिन्धु-घाटी सभ्यता का कालक्रम या समय

सिंधु घाटी सभ्यता की खोज कब हुई?
● सिन्धु-सरस्वती सभ्यता के कालक्रम को लेकर विद्वान एक मत नहीं है।
● अर्नेस्ट मैके ने मोहनजोदडो के अन्तिम चरण को 2500 ई.पू. में निर्धारित करते हुए प्रारम्भ 2800 ई.पू. माना है।
● मार्टीमर व्हीलर ने इस सभ्यता की तिथि 2500 ई.पू. से 1500 ई.पु. के मध्य मानी है। 
● रेडियो-कार्बन पद्धति से इस सभ्यता की तिथि 2300-1750 ई.पू.मानी गई हैं।
● नवीन उत्खननों तथा अनुसंधानो से सिन्धु-सरस्वती सभ्यता के नवीन तथ्य प्रकाश में आये हैं। इन नवीन उत्खननों से पता चलता हैं कि यह सभ्यता 5000 ई. पू. से 3000 ई. पू. के मध्य की हैं। 
● इस प्रकार यह कहा जा सकता हैं कि सिन्धु-सरस्वती सभ्यता विश्व की प्राचीनतम सभ्यता थी।


नगर नियोजन तथा स्थापत्य :-

सिन्धु घाटी सभ्यता की नगर योजना /
हड़प्पा सभ्यता की नगर योजना का वर्णन करें
सिंधु घाटी सभ्यता की मुख्य विशेषताएं
● सुनियोजित नगरों का निर्माण सिन्धु  सभ्यता की एक अनूठी विशेषता है। 
● प्रत्येक नगर के पश्चिम में ईटों से बने एक चबूतरे पर 'गढी' या दुर्ग का भाग है और इसके पूर्व की ओर अपेक्षाकृत नीचे धरातल पर नगर भाग प्राप्त होता है जो जन सामान्य द्वारा निवासित होता था। 
● गढ़ी वाला भाग शायद पुरोहितों अथवा शासक का निवास स्थान होता था। 
● गढी के चारों ओर परकोटे जैसी दीवार थी।
● नगरों की सड़कें सीधी तथा एक दूसरे को समकोण पर काटती हुई दिखती हैं । 
● जिससे सम्पूर्ण नगर वर्गाकार या आयताकार खण्डों में विभक्त हो जाता है। 
● सिन्धु-सरस्वती सभ्यता कालीन सड़कें पर्याप्त चौड़ी होती थीं। इनकी चौडाई 9 फीट से 34 फीट तक मिलती है। और कहीं-कहीं ये सड़कें आधे मील की लम्बाई तक मिली हैं।
● भवन विभिन्न आकार-प्रकार के हैं जिनकी पहचान धनाढ्यों के विशाल भवन, सामान्य जनों के साधारण घर, दुकानें, सार्वजनिक भवन आदि के रूप में की जा सकती है ।
● साधारणतया घर पर्याप्त बड़े थे और उनके मध्य में आँगन होता था। 
● आगन के एक कोने में ही भोजन बनाने का प्रबन्ध था। 
● और इर्द-गिर्द चार या पाँच कमरे बने होते थे। 
● प्रत्येक घर में स्नानागार और पानी की निकासी के लिए नालियों का प्रबन्ध था। और घरों में कुएँ भी थे।
● यह उल्लेखनीय है कि सिन्धु -सरस्वती सभ्यता के लोग सार्वजनिक मार्गों पर अतिक्रमण नहीं करते थे।
● गलियाँ 1 से 2.2 मीटर तक चौड़ी थी । 
● ये गलियाँ सीधी होती थी।
● मोहनजोदडो की हर गली में एक सार्वजनिक कूप मिलता है। 
● कालीबंगा में गलियों एवं सड़कों को एक आनुपातिक ढंग से निर्मित किया गया था । 
● गलियाँ वहाँ 1.8 मी. चौडी और मुख्य सड़कें एवं राजमार्ग इससे दुगुने (3.6 मी.) तिगुने (5.4 मी.) या चौगुने (7.2 मी.) चौड़े थे ।
● सिन्धु-सरस्वती सभ्यता के भवनों में पकाई गई ईटों का इस्तेमाल होना एक अद्भुत बात है। जिस समय अन्य सभ्यताएँ पक्की ईंटों से अनभिज्ञ थी उस समय सिन्धु-सरस्वती सभ्यता के लोग बड़ी कुशलता से उनका प्रयोग कर रहे थे ।

                        नोट
निर्माण में प्रयुक्त ईंटों का अनुपात 4 : 2 : 1 था।

जल निकास प्रणाली :-

हड़प्पा सभ्यता की जल निकासी प्रणाली
सिन्धु घाटी सभ्यता की जल निकासी प्रणाली
● जल प्रबन्धन एवं जल निकास व्यवस्था सिन्धु-सरस्वती व्यवस्था की प्रमुख विशेषता थी
● लगभग प्रत्येक बड़े घर में कुएँ की व्यवस्था थी।
● सार्वजनिक उपयोग हेतु भी कुछ कुए गलियों के किनारे खुदाये गये थे। 
● जल उपलब्धि के साथ ही जल निकासी हेतु भी व्यवस्थित प्रणाली थी। 
● प्रायः प्रत्येक घर के किनारे वर्षा एवं घर के अनुपयुक्त पानी की निकासी हेतु नालियाँ थी। 
● प्रत्येक घर की नाली गली की प्रमुख नालियों से होकर मुख्य सड़क की नालियों में गिरती थी।
● पक्की ईटों से निर्मित नालियाँ अधिकांशतः ढकी हुई होती थी।
● नालियों के बीच - बीच में थोडी दूरी पर गड्ढे बनाये जाते थे जिनमें अवरोधक कूड़ा-कचरा गिर जाता था। और जल निकास के बहाव में रूकावट नहीं होती थी।
● इन गड्ढों के ढक्कन हटाकर सफाई की जाती थी।
● ऊपरी मंजिलों का पानी पक्की ईंटों से बने पटावनुमा नाली से नीचे गिरता था |
● कालीबंगा में लकड़ी के खोखले तनों का उपयोग नालियों के रुप में किया जाता था। 
● कहीं पर भी पानी का जमाव या गंदा पानी भरा नहीं रहता था। 

                      नोट
सिन्धु सभ्यता नगरीय स्वच्छता का श्रेष्ठतम प्रतीक है। ऐसी नाली व्यवस्था विश्व में अन्यत्र कहीं नहीं प्राप्त होती। यहाँ तक कि 18वीं शताब्दी के श्रेष्ठतम मान्य शहर पेरिस में भी ऐसी जल निकासी व्यवस्था नहीं थी।

सिन्ध घाटी सभ्यता में विशिष्ट भवनों का स्थापत्य :-

विशाल स्नानागार :-

● यह मोहनजोदडो में स्थित सबसे महत्वपूर्ण व भव्य निर्माण का नमूना है। 
● यह स्नानागार 39 फीट लम्बा, 23 फीट चौड़ा और 8 फीट गहरा है। 
● इस कुण्ड में जाने के लिए दक्षिण और उत्तर की ओर की सीढ़ियाँ बनी हुई हैं । 
● इसमें इंटों की चिनाई बड़ी सावधानी एवं कुशलता के साथ की गई है। 
● स्नान कुण्ड की फर्श का ढाल दक्षिण-पश्चिम की ओर है। 
● स्नानागार के दक्षिणी-पश्चिमी कोने में ही एक महत्वपूर्ण नाली थी जिसके द्वारा पानी निकास की व्यवस्था थी। 
● इस स्नानागार का उपयोग धार्मिक उत्सवों तथा समारोहो पर होता होगा ।

विशाल अन्नागार:-

● हडप्पा के गढी वाले क्षेत्र में एक विशाल अन्नागार के अवशेष मिले हैं। 
● यह ऊँचे चबूतरे पर बना हुआ था जिसके पीछे बाढ़ से बचाव तथा सीलन से बचाने का उद्देश्य दिखाई पड़ता है। 
● यह अन्नागार या भण्डारागार कई खण्डों में विभक्त था और हवा आने जाने की पर्याप्त व्यवस्था थी। 
● यह अन्नागार राजकीय था । 
● हडप्पा के अतिरिक्त मोहनजोदडो एवं राखीगढ़़ी से भी अन्नागारों के अवशेष मिले हैं।

गोदी या बंदरगाह (लोथल) :-

● लोथल में पक्की ईटों का एक गोदी या बंदरगाह (डॉकयाड) मिला है। 
● जिसका औसत आकार 214.36 मीटर है।
● इसकी वर्तमान गहराई 3.3 मीटर है। 
● अनुमानतः इसकी उत्तरी दीवार में 12 मीटर चौड़ा प्रवेश द्वार था जिसमें से जहाज आते जाते थे। 
● लोथल का डॉकयार्ड वर्तमान में विशाखापट्टनम् में बने हुए डॉकयार्ड से बड़ा है।
● इनके अतिरिक्त धौलावीरा का जलाशय तथा विशाल स्टेडियम भी विश्व की प्राचीन सभ्यताओं से प्राप्त नमूनों में विशिष्ट स्थान रखते हैं।


सामाजिक जीवन :-

सिन्धु घाटी सभ्यता का सामाजिक जीवन
हड़प्पा सभ्यता का सामाजिक जीवन

वर्गीकरण :-

● समाज में कई वर्ग थे। 
● यहाँ सुनार, कुम्भकार, बढई, दस्तकार, जुलाहे, ईटें तथा मनके बनाने वाले पेशेवर लोग थे ।
● कुछ विद्धवानों के अनुसार उस काल में पुरोहितों तथा अधिकारियों व राजकर्मचारियों का एक विशिष्ट वर्ग रहा होगा।
● सम्पन्नता की दृष्टि से गढी वाले क्षेत्र के लोग सम्पन्न रहे होंगे तथा निचले नगर में सामान्य लोग रहते होंगे।

परिवार तथा स्त्रियों की स्थिति :-

सिन्धु घाटी सभ्यता में परिवार की स्थिति
● खुदाई में मिले भवनों से साफ पता लगता है कि सिन्धु-सरस्वती सभ्यता काल में पृथक्-पृथक् परिवारों के रहने की योजना दिखाई देती है।
● अतः इस काल में एकल परिवार योजना रही होगी। 
सिन्धु घाटी सभ्यता में स्त्रियों की स्थिति
● इस सभ्यता में भारी संख्या में नारियो की मूर्तिया मिली हैं। 
● संभवतः यहाँ नारियों का स्थान सम्मानजनक था। 
● क्रीट तथा अन्य भूमध्य सागरीय सभ्यताओं मातृसत्तात्मक समाज पाया जाता था। 
● अतः इससे यह अनुमान किया जा सकता है कि सिन्धु-सरस्वती सभ्यता में भी मातृसत्तात्मक परिवारों का प्रचलन रहा होगा । 
● ऐसी स्थिति में स्त्रियों का समाज में महत्वपूर्ण स्थान रहा होगा।


खान-पान :-

सिन्धु घाटी सभ्यता में खान पान
● सिन्धु-सरस्वती सभ्यता के वासी अपने भोजन में गेहूँ, जौ, चावल, दूध, फल, माँस आदि का सेवन करते थे । 
● फलो में वे अनार, नारियल, नींबू, खरबूजा, तरबूज आदि से परिचित थे।
● पशु पक्षियों की कटी - फटी हड्डियों के मिलने से उनके मांसाहार का पता चलता है। 
● भेड, बकरी, सुअर, मुर्गा, बतख, कछुआ आदि का मांस खाया जाता था। 
● अनाज तथा मसाले पीसने के लिए सिल-बट्टे का प्रयोग किया जाता था।

रहन-सहन, आमोद- प्रमोद :-

सिन्धु घाटी सभ्यता में रहन-सहन और आमोद-प्रमोद
● स्त्रियों की मृणमूर्तियों से उनकी वेशभूषा की जानकारी मिलती है। 
● इन मूर्तियों में उनके शरीर का ऊपरी भाग वस्त्रहीन है तथा कमर के नीचे घाघरे जैसा एक वस्त्र पहना हुआ है। 
● कुछ मूर्तियों में स्त्रियों को सिर के ऊपर एक विशेष प्रकार के पंखे की आकृति का परिधान पहने हुए दिखाया गया है । 
● पुरूषों की अधिकांश आकृतियाँ बिना वस्त्रों के हैं। हालांकि पुरूष कमर पर एक वस्त्र बाँधते थे। 
● कुछ स्थानों पर पुरूषों को शाल ओढे हुए दिखाया गया है।
● पुरूषों में कुछ लोग दाढ़ी-मूँछ रखते थे तथा हजामत करते थे। 
● स्त्रियाँ अपने केशों का विशेष ध्यान रखती थी। 
● बालों को संवारने के लिए कंधियों का और मुख छवि देखने के लिए दर्पण का प्रयोग किया जाता था। 
● खुदाई में कांसे में बने हुए दर्पण एवं हाथीदांत की कंघियाँ प्राप्त हुई हैं। 
● स्त्री- पुरूष दोनों ही आभूषण धारण करते थे। 
● मुख्य रूप से :-
  ◆ मस्तकाभूषण
  ◆ कण्ठहार 
  ◆ कुण्डल
  ◆ अगूंठियाँ
  ◆ चूडियाँ
  ◆ कटिबन्ध
  ◆ पाजेब 
● आदि आभूषण पहने जाते थे।
● सिन्धु सभ्यता के क्षेत्र की खुदाई में मिट्टी के कई खिलौने मिले हैं। 
● इसके अतिरिक्त पासे भी मिले हैं। जिससे पासों के खेलों जैसे चौसर का प्रमाण मिलता है। 
● नर्तकी की प्राप्त मूर्ति से नृत्य संगीत का पता लगता है। 
● कुछ मुहरों पर सारंगी और वीणा का भी अंकन है।

आर्थिक जीवन

सिन्धु घाटी सभ्यता का आर्थिक जीवन

कृषि :-

● सिन्धु-सरस्वती सभ्यता के पर्याप्त जनसंख्या वाले महानगरों का उदय एक अत्यन्त उपजाऊ प्रदेश की पृष्ठभूमि में ही सम्भव था। 
● अधिकांश नगर सुनिश्चित सिंचाई की सुविधा से युक्त उपजाऊ नदी के तटों पर स्थित थे। 
● जलवायु की अनुकूलता, भूमि की उर्वरता एवं सिंचाई की सुविधाओं के अनुरूप विभिन्न स्थलों पर फसलें उगाई जाती थी।
● गेहूँ के उत्पादन के पर्याप्त प्रमाण मिले हैं। 
● हड़प्पा और मोहनजोदडो से जौ के भी प्रमाण मिले हैं । 
● ऐसा जान पड़ता है कि गेहूँ और जौ इस सभ्यता के मुख्य खाद्यान्न थे।
● इसके अतिरिक्त खजूर, सरसों, तिल, मटर तथा राई और चावल से भी ये लोग परिचित थे। 
● कपास की खेती होती थी और वस्त्र निर्माण एक महत्वपूर्ण व्यवसाय रहा होगा ।

                        नोट
1. सिन्धु सभ्यता में ही कपास की खेती का विश्व को पहला उदाहरण मिला है।
2. सिन्धु क्षेत्र में उपज होने के कारण यूनानियो ने कपास के लिए "सिन्डन" शब्द का प्रयोग किया। 

● यहाँ की उर्वरता का मुख्य कारण सिन्धु तथा सरस्वती नदियों में आने वाली बाढ़ थी जो कि काफी जलोढ मिट्टी लाकर मैदानों में छोड़ देती थी।
● सम्भवतः खेतों को जोतने के लिए हलों का प्रयोग होता था।
● कालीबंगा में जुते हुऐ खेत का प्रमाण मिला है 

पशुपालन :-

● गाय, बैल, भैंस, भेड़ पाले जाने वाले प्रमुख पशु थे।
● बकरी तथा सुअर भी पाले जाते थे। 
● कुत्ते, बिल्ली तथा अन्य पशु भी पाले जाते होंगे।
● हाथी और ऊँट की हड्डियाँ बहुत कम मिली हैं।
● लेकिन मुहरों पर इनका अंकन विपुल है। 
● सिन्धु सभ्यता के निवासी घोड़े से भी परिचित थे।
● लोथल से घोड़े की तीन मृण मूर्तियाँ तथा एक जबड़ा मिला है, जो घोड़े का 'है।

उद्योग तथा शिल्प :-

● सिन्धु  सभ्यता कांस्ययुगीन सभ्यता है। 
● ताँबे के साथ टिन को मिलाकर कांसा बनाया जाता था।
● ताम्र और कांस्य के सुन्दर बरतन हड़प्पा कालीन धातु कला के श्रेष्ठ उदाहरण हैं।
● ताँबे से निर्मित औजारों में उस्तरे, छैनी हथौड़ी, कुल्हाडी, चाकू, तलवार आदि मिली है। 
● कांस्य की वस्तुओं के उदाहरण में नर्तकी की मूर्ति मुख्य है। 
● सिन्धु सभ्यता में सोने तथा चाँदी का भी प्रयोग होता था तथा यहाँ के लोग मिट्टी के बरतन बनाने की कला में भी प्रवीण थे।
● मनकों का निर्माण एक विकसित उद्योग था।
● चन्हुदड़ो तथा लोथल में मनका बनाने वालों की पूरी कर्मशाला मिली है। 
● मनके सोने-चाँदी, सेलखडी, सीप तथा मिट्टी से बनाये जाते थे।
● लोथल तथा बालाकोट से विकसित सीप उद्योग के प्रमाण मिले हैं।
● सूत की कताई और सूती वस्त्रों की बुनाई के धन्धे भी अत्यन्त विकसित रहे होंगे ।

व्यापार एवं वाणिज्य :-

● सिन्धु-सरस्वती सभ्यता में आन्तरिक तथा विदेशी व्यापार अत्यन्त विकसित अवस्था में था। 
● उद्योग-धन्धों के लिए कच्चा माल राजस्थान, गुजरात, सिन्ध, दक्षिण भारत, अफगानिस्तान, ईरान तथा मेसोपोटामिया से मँगाया जाता था।
● राजस्थान से ताँबा तथा सोना मैसूर से आता था।
● यहाँ के लोगों के मेसोपोटामिया से व्यापारिक सम्बन्ध होने के स्पष्ट प्रमाण मिले हैं।
● मेसोपोटामिया से सिन्धु सभ्यता की कई दर्जन मुहरें मिली हैं।
● मेसोपोटामिया के एक अभिलेख में दिलमन, मगान और मेलुहा नामक स्थानों की चर्चा की गई है।जिनके साथ वहाँ के लोगो के व्यापारिक सम्बन्ध थे। 
● मेलुहा शब्द भारत के लिए प्रयुक्त किया गया माना जाता है।
● सिन्धु-सरस्वती सभ्यता में व्यापार के लिए वस्तु विनिमय प्रणाली का प्रयोग किया जाता था । 
● यहाँ से भारी संख्या में मुहरें मिली है लेकिन उनका उपयोग पत्र या पार्सल पर छाप लगाने के लिए किया जाता था। 
● माप-तौल का एक निश्चित क्रम था। 
● तोल की ईकाई 16 के अनुपात में थी जैसे-
   ◆ 1, 2, 4, 8, 16, 32, 64, 160, 320 
● सोलह के अनुपात में तौल मापने की परम्परा हमारे यहाँ आधुनिक काल तक चलती आ रही है।

धार्मिक जीवन :-

हड़प्पा सभ्यता का धार्मिक जीवन
सिन्धु घाटी सभ्यता का धार्मिक जीवन
● सिन्धु सभ्यता का प्राचीन धर्म के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान स्वीकार किया जाता है। 
● मातृदेवी की उपासना, पशुपति शिव की परिकल्पना, मूर्तिपूजा, वृक्षपूजा, अग्निपूजा, जल की पवित्रता, तप एवं योग की परम्परा उनके धर्म की ऐसी विशेषताएँ है 
● जिनकी निरन्तरता हमारे वर्तमान धार्मिक जीवन में देखी जा सकती है । 
● बणावली से प्राप्त एक अर्द्धवृत्ताकार ढाँचे के सम्बन्ध में कुछ विद्धानों ने मंदिर होने की संभावना व्यक्त की है।

मातृदेवी की उपासना :-

● हड़प्पा, मोहनजोदडो एवं चुन्हदडो से विपुल मात्रा में मिट्टी की बनी हुई नारी-मूर्तियाँ मिली हैं, जिन्हें पूजा के लिए निर्मित मातृदेवी की मूर्तियाँ माना गया है । 
● भारत में देवी पूजा या शक्ति पूजा की प्राचीनता का प्रारम्भिक बिन्दु सिन्धु सभ्यता में देखा जा सकता है।
● सिन्धु सभ्यता से प्राप्त मुहरों के कुछ चित्रों
से भी मातृदेवी की उपासना के संकेत मिलते हैं।
● राखीगढ़ी में हमें बहुत से अग्निकुण्ड एवं अग्नि वेदिकायें (संभवतः यज्ञवेदियाँ) मिली हैं। इनमें धार्मिक यज्ञों या अग्निपूजा का प्रचलन रहा होगा।

पुरूष देवता (शिव) की उपासना :-

● जॉन मार्शल ने मोहनजोदडो की एक मुहर पर अंकित देवता को ऐतिहासिक काल के पशुपति शिव का प्राक्रूप माना है। 
● इस मुहर में देवता को त्रिमुख एवं पद्मासन मुद्रा में बैठे हुए दिखाया गया है।दृष्टि नासिका के अग्रभाग पर केन्द्रित लगती है, इसके चारों ओर एक हाथी, एक चीता, एक भैंसा तथा एक गैंडा एवं आसन के नीचे हरिण अंकित है। 
● इस अंकन में शिव के तीन रूप देखे जा सकते हैं। जो निम्न है - 
  (1) शिव का त्रिमुख रूप 
  (2) पशुपति रूप 
  (3) योगेश्वर रूप
अग्निवेदिकाएँ :-
● कालीबंगा, लोथल, बणावली एवं राखीगढ़ी के उत्खननों से हमें अनेक अग्निवेदिकाएँ मिली हैं। 
● कुछ स्थलों पर उनके साथ ऐसे प्रमाण भी मिले हैं जिनसे उनके धार्मिक प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त होने की संभावना प्रतीत होती है।
● बणावली एवं राखीगढ़ी से वृत्ताकार अग्निवेदिकाएँ मिली हैं,जिन्हें अर्द्धवृत्ताकार ढाँचे के मन्दिर या घेरे में संयोजित किया गया है।

सिन्धु घाटी सभ्यता में पूजा :-

पशु पूजा, वृक्ष पूजा एवं नाग पूजा

● कई मुहरों पर एकश्रृंग वृषभ (एक सींग वाले बैल) का अंकन है, मिलता जिसके सामने सम्भत: धूपदण्ड रखा हुआ है।
● अनेक छोटी-छोटी मुहरों पर वृक्षों के चित्रांकन से वृक्ष पूजा का आभास होता है। 
● कई छोटी मुहरों पर एक वृक्ष के चारों ओर छोटी दीवार या वेदिका बनी मिलती है। 
● जो उनकी पवित्रता तथा पूजा-विषय होने की द्योतक है। 
● कुछ मुहरों पर स्वास्तिक, चक्र एवं क्रॉस जैसे मंगलचिन्हों का भी अंकन काफी संख्या में मिलता है।
● सिन्धु-सरस्वती सभ्यता के अवशेषों से जल की पवित्रता एवं धार्मिक स्नान की परम्परा के संकेत भी मिलते है। 
● यह अनुमान किया जाता है कि मिट्टी और ताँबे से बनी कुछ गुटिकाओं का ताबीजों के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। 
● मनके भी जैसे त्रिपत्र- अलंकरण युक्त होते थे जो "ताबीज या रक्षाकवच" के रूप में काम आते होंगे।

योग एवं साधना की परम्परा :-

● विद्वानों का अनुमान है कि सिन्धु-सरस्वती सभ्यता में योग एवं साधना की परम्परा के अस्तित्व का संकेत भी मिलता है। 
● इसके दो साक्ष्य हैं - 
(1) पशुपति मुहर में पदमासन मुद्रा में बैठे योगेश्वर शिव का अंकन 
(2 ) मोहनजोदडो से प्राप्त 'योगी' की मूर्ति जिसकी दृष्टि नासाग्र पर टिकी है ।

मृतक संस्कार एवं पुनर्जन्म में विश्वास :-

● मार्शल के अनुसार इस सभ्यता के लोग तीन प्रकार से शवों का क्रिया कर्म करते थे - 
(1) पूर्ण समाधिकरण - इसके अन्तर्गत सम्पूर्ण शव को जमीन के नीचे गाड़ दिया जाता था।
(2) आंशिक समाधिकरण - इसके अन्तर्गत पशु-पक्षियों के खाने के पश्चात् शव के बचे हुए भाग गाडे जाते थे। 
(3 ) दाहकर्म - इसमें शव जला दिया जाता था और कभी-कभी भस्म गाड़ दी जाती थी। 
● शव के साथ कभी-कभी विविध आभूषण, अस्त्र-शस्त्र पात्रादि भी रखे मिलते हैं। 
● इससे प्रतीत होता है कि वे पुनर्जन्म में भी विश्वास रखते थे।


राजनीतिक व्यवस्था :-

● सिन्धु-सरस्वती सभ्यता की राजनीतिक व्यवस्था के बारे में हमें कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है। 
● व्हीलर और पिगट का मानना है कि हडप्पा एवं मोहनजोदडो में दक्षिणी मेसोपोटामिया की तरह पुरोहित का शासन था। 
● कुछ अन्य विद्वान इस बात से सहमत नहीं है। उनका कहना है कि इस सभ्यता के नगरों में मिश्र एवं मेसोपोटामिया की तरह कोई मन्दिर नहीं मिला है ।
● सिन्धु सभ्यता के वासियों की मूल रूचियाँ व्यापार मूलक थी, और उनके नगरों में सम्भवतः व्यापारी वर्ग का शासन था।
● किंतु नगर-नियोजन, पात्र-परम्परा, उपकरण निर्माण, बाट एवं माप आदि के संदर्भ में मानकीकरण एवं समरूपता किसी प्रभावी राजसत्ता के पूर्ण्ण एवं कुशल नियन्त्रण के प्रमाण हैं। 
● व्हीलर के अनुसार यह साम्राज्य, जो इतनी दूर तक फैला हुआ था, एक अच्छे प्रकार से शासित साम्राज्य था ।
● इतने बड़े साम्राज्य के चार प्रमुख क्षेत्रीय केन्द्र हडप्पा, मोहनजोदडो, कालीबंगा और लोथल रहे होंगे
● सिन्धु सभ्यता के निवासियों का जीवन शान्तिप्रिय था 
● युद्ध के अस्त्र-शस्त्र बहुत अधिक संख्या में नहीं मिलते हैं। 
● उपलब्ध हथियारों में काँसे की आरी, ताँबे की तलवाें, कांस्य के बने भालों के अग्रभाग, कटारें, चाकू, नोकदार बाणाग्र आदि मिलते हैं।

कला :-

हड़प्पा सभ्यता की कला
सिन्धु घाटी सभ्यता की कला
● सिन्धु  सभ्यता की मुहरें, मूर्तियाँ, मृद्भाण्ड,
मनके एवं धातु से बनी कतिपय वस्तुयें कलात्मक उत्कृष्टता एवं समृद्धि की परिचायक हैं।

मूर्तिकला :-

● मोहनजोदडो से प्राप्त उल्लेखनीय पत्थर की एक खंडित मानव-मूर्ति जिसका सिर से वक्षस्थल तक का ही भाग बचा है, उल्लेखनीय है।यह मूर्ति त्रिफूलिया आकृति से युक्त शाल ओढे हुए है। 
● हडप्पा के उत्खननों से पत्थर की दो मूर्तियाँ
उपलब्ध हुई हैं।कला के क्षेत्र में शैली और भावाभिव्यक्ति की दृष्टि से ये काफी हद तक यूनानी कलाकृतियों के समकक्ष रखी जा सकती हैं। 
● इनमें से एक लाल बलुआ पत्थर का धड़ है।यह एक युवा पुरूष का धड़ है और इसकी रचना में कलाकार ने मानव शरीर के विभिन्न अंगों के सूक्ष्म अध्ययन का प्रमाण दिया है। 
● दूसरी सलेटी चूना पत्थर की नृत्यमुद्रा में बनाई गई आकृति का धड़ है। इसमें शरीर के विभिन्न अंगों का विन्यास आकर्षक है। यह भी संभावना व्यक्त की गई है कि यह नृत्यरत नटराज की मूर्ति है। कांस्य मूर्तियों में सर्वाधिक कलात्मक नर्तकी की मूर्ति है। यह मूर्ति 14 सेमी ऊँची है। इस मूर्ति में नारी के अंगों का न्यास सुन्दर रूप से हुआ है। इस मूर्ति का निर्माण द्रवीय मोम विधि से हुआ।
● कांस्य मूर्तियों में दैमाबाद से प्राप्त एक रथ की मूर्ति अत्यन्त आकर्षक है। 
● एम. के. धवलिकर के शब्दों में "दैमाबाद से प्राप्त उपर्युक्त चारों कांस्य-मूर्तियाँ भारतीय प्रागैतिहासिक कला के सम्पूर्ण क्षेत्र में अपनी श्रेणी के श्रेष्ठतम शिल्प है।"
● सिन्धु-सभ्यता में मिट्टी की मूर्तियाँ सर्वाधिक संख्या में मिली हैं। 
● मिट्टी की सर्वत्र सुलभता आकृतियों के निर्माण में धातु एवं पत्थर से अधिक आसानी और कम खर्च के कारण प्रायः सभी प्राचीन संस्कृतियों में मृण्मूर्ति कला लोकप्रिय रही। 
● पाषाण-मूर्तियाँ बहुत कम संख्या में मिली हैं। 
● सिन्धु सभ्यता के विविध क्षेत्रों से उपलब्ध मृण्मूर्तियों के विशाल भण्डार में पशुओं और पक्षियों की मूर्तियाँ अधिक संख्या में मिली हैं।
मुहरें :-
● मुहरें इस सभ्यता की सर्वोत्तम कलाकृतियाँ हैं।
● अधिकांश मुहरों पर किसी न किसी पशु की आकृति एवं सिन्धु लिपि में लेख,जो साधारणतया 3 से 8 अक्षर वाले हैं।अधिकांश मुहरें सेलखडी से निर्मित हैं। 
● ये प्रायः इस सभ्यता के नगर स्थलों से ही मिली हैं। 
● यद्यपि इन मुहरों के निर्माण में सावधानी और कलात्मकता नहीं दिखती, तथापि मुहरों के कुछ एक जैसी सुन्दर उदाहरण विश्व की महान कलाकृतियों में अपना स्थान रखते हैं। 
● मुहरों पर अंकित पशु आकृतियों में सबसे अधिक अंकन कूबड़-विहीन बैल का मिलता है। 
● सिन्धु-सभ्यता में दो मुहरें विशेष उल्लेखनीय हैं।
● पहली 'पशुपति मुहर' जिसमें एक चौकी या पीठ पर आसीन 'शिव' एक हाथी, चीता, गैंडा और भैंसें से घिरे हैं। (सबसे प्रसिद्ध)
● दूसरी मुहर पर एक कूबड़दार बैल का अंकन है जो मोहनजोदडो से मिली है ।
● सिन्धु-सरस्वती सभ्यता के विविध क्षेत्रों से उपलब्ध मृण मूर्तियों के विशाल भंडार में पशुओं की मूर्तियाँ अधिक संख्या में मिली हैं।

लिपि :-

हड़प्पा सभ्यता की लिपि
सिन्धु घाटी सभ्यता की लिपि
● सिन्धु-सभ्यता की लिपि अभी भी विद्वानों के लिए एक अबूझ रहस्य है। 
● अभी तक इस लिपि को पढ़ने के बारे में 100 से अधिक दावे प्रस्तुत किये जा चुके हैं, लेकिन उन सब की विश्वसनीयता संदिग्ध है। 
● इस सभ्यता में 2500 से अधिक अभिलेख उपलब्ध हैं। 
● सबसे लम्बे अभिलेख में 17 अक्षर हैं । 
● ये प्रायः मुहरों पर मिलते हैं। 
● अभी तक इस लिपि में लगभग 419 चित्रों की पहचान की जा चुकी है। 
● कालीबंगा के एक अभिलेख के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला गया कि यह लिपि दाहिनी ओर से बांयी ओर लिखी जाती थी।

NOTES

DOWNLOAD LINK

REET

DOWNLOAD

REET NOTES

DOWNLOAD

LDC

DOWNLOAD

RAJASTHAN GK

DOWNLOAD

INDIA GK

DOWNLOAD

HINDI VYAKARAN

DOWNLOAD

POLITICAL SCIENCE

DOWNLOAD

राजस्थान अध्ययन BOOKS

DOWNLOAD

BANKING

DOWNLOAD

GK TEST PAPER SET

DOWNLOAD

CURRENT GK

DOWNLOAD

अन्य जानकारी

● सिन्धु-सरस्वती सभ्यता अपने समय की समृद्ध तथा अनूठी सभ्यता थी। 
● यहाँ के बचे खण्डहर विगत घटना चक्र के मूक लेकिन प्रखर वाचक हैं। 
● यह सभ्यता आज भले ही नष्ट हो गई हो लेकिन उसकी संस्कृति के अनेक तत्वों का अविरल तरंग-प्रवाह हमारी संस्कृति में आज भी विद्यमान है।
● इस सभ्यता की स्थापत्य कला आज आधुनिक भारत के कई भवनों में दिखाई देती है। 
● वहाँ के नगर-नियोजन से प्रेरित कई नगर भारत में विद्यमान हैं। 
● सिन्धु-सरस्वती सभ्यता के निवासियों की आभूषण प्रियता और श्रृंगार के प्रति जागरूकता हमारे सामाजिक जीवन में आज भी देखी जा सकती है। 
● कृषि तथा पशुपालन में सिन्धु-सरस्वती सभ्यता के वासियों ने अनेक नवीन प्रयोग किये जो बाद में भारतीय अर्थव्यवस्था के अंग बन गये। 
● सिन्धु-  सभ्यता का धार्मिक प्रवाह भारतीय संस्कृति में जीवंत रूप में दिखाई देता है। 
● शिव,शक्ति तथा प्रकृति-पूजा सिन्धु-सरस्वती सभ्यता की ही देन है । 
● योग भी इसी सभ्यता की देन है।

सिंधु घाटी सभ्यता का पतन:-

● सिंधु घाटी सभ्यता का लगभग 1800 ई.पू. में पतन हो गया था, परंतु उसके पतन के कारण अभी भी विवादित हैं।
● एक सिद्धांत यह कहता है कि इंडो -यूरोपियन जनजातियों जैसे- आर्यों ने सिंधु घाटी सभ्यता पर आक्रमण कर दिया तथा उसे हरा दिया ।
● सिंधु घटी सभ्यता के बाद की संस्कृतियों में ऐसे कई तत्त्व पाए गए जिनसे यह सिद्ध होता है कि यह सभ्यता आक्रमण के कारण एकदम विलुप्त नहीं हुई थी ।
● दूसरी तरफ से बहुत से पुरातत्त्वविद सिंधु घाटी सभ्यता के पतन का कारण प्रकृति जन्य मानते हैं।
● प्राकृतिक कारण भूगर्भीय और जलवायु संबंधी हो सकते हैं।
● यह भी कहा जाता है कि सिंधु घाटी सभ्यता के क्षेत्र में अत्यधिक विवर्तिनिकी विक्षोभों की उत्पत्ति हुई जिसके कारण अत्यधिक मात्रा में भूकंपों की उत्पत्ति हुई।
● एक प्राकृतिक कारण वर्षण प्रतिमान का बदलाव भी हो सकता है।
● एक अन्य कारण यह भी हो सकता है कि नदियों द्वारा अपना मार्ग बदलने के कारण खाद्य उत्पादन क्षेत्रों में बाढ़आ गई हो।
● इन प्राकृतिक आपदाओं को सिंधु घाटी सभ्यता के पतन का मंद गति से हुआ, परंतु निश्चित कारण माना गया है।

       संक्षिप्त रूप में

● सिंधु घाटी सभ्यता (3300-1700 ई.पू.) विश्व की प्राचीन नदी घाटी सभ्यताओं में से एक प्रमुख सभ्यता थी।
● यह हड़प्पा सभ्यता और सिंधु-सरस्वती सभ्यता के नाम से भी जानी जाती है।
● इसका विकास सिंधु और घघ्घर/हकड़ा (प्राचीन सरस्वती) के किनारे हुआ। 
● मोहनजोदड़ो, कालीबंगा, लोथल, धोलावीरा, राखीगढ़ी और हड़प्पा इसके प्रमुख केंद्र थे।
● रेडियो कार्बन c14 जैसी विलक्षण-पद्धति के द्वारा सिंधु घाटी सभ्यता की सर्वमान्य तिथि 2350 ई पू से 1750 ई पूर्व मानी गई है।
● सिंधु सभ्यता की खोज रायबहादुर दयाराम साहनी ने की.
● सिंधु सभ्यता को प्राक्ऐतिहासिक (Prohistoric) युग में रखा जा सकता है।
● इस सभ्यता के मुख्य निवासी द्रविड़ और भूमध्यसागरीय थे।
● सिंधु सभ्यता के सर्वाधिक पश्चिमी पुरास्थल सुतकांगेंडोर (बलूचिस्तान), पूर्वी पुरास्थल आलमगीर (मेरठ), उत्तरी पुरास्थल मांदा (अखनूर, जम्मू कश्मीर) और दक्षिणी पुरास्थल दाइमाबाद (अहमदनगर, महाराष्ट्र) हैं।
● सिंधु सभ्यता सैंधवकालीन नगरीय सभ्यता थी।
● सैंधव सभ्‍यता से प्राप्‍त परिपक्‍व अवस्‍था वाले स्‍थलों में केवल 6 को ही बड़े नगरों की संज्ञा दी गई है। ये हैं: -
 ◆ मोहनजोदड़ों, हड़प्पा, गणवारीवाला, धौलवीरा,राखीगढ़ और कालीबंगन.
● हड़प्पा के सर्वाधिक स्थल गुजरात से खोजे गए हैं।
● लोथल और सुतकोतदा-सिंधु सभ्यता का बंदरगाह था।
● जुते हुए खेत और नक्काशीदार ईंटों के प्रयोग का साक्ष्य कालीबंगन से प्राप्त हुआ है।
● मोहनजोदड़ो से मिले अन्नागार शायद सैंधव सभ्यता की सबसे बड़ी इमारत थी।
● मोहनजोदड़ो से मिला स्नानागार एक प्रमुख स्मारक है, जो 11.88 मीटर लंबा, 7 मीटर चौड़ा है।
● अग्निकुंड लोथल और कालीबंगा से मिले हैं.
● मोहनजोदड़ों से प्राप्त एक शील पर तीन मुख वाले देवता की मूर्ति मिली है जिसके चारो ओर हाथी, गैंडा, चीता और भैंसा थे.
● हड़प्पा की मोहरों में एक ऋृंगी पशु का अंकन मिलता है.
● मोहनजोदड़ों से एक नर्तकी की कांस्य की मूर्ति मिली है.
● मनके बनाने के कारखाने लोथल और चन्हूदड़ों में मिले हैं.
● सिंधु सभ्यता की लिपि भावचित्रात्मक है. यह लिपि दाई से बाईं ओर लिखी जाती है.
● सिंधु सभ्यता के लोगों ने नगरों और घरों के विनयास की ग्रिड पद्धति अपनाई थी, यानी दरवाजे पीछे की ओर खुलते थे.
● सिंधु सभ्यता की मुख्य फसलें थी गेहूं और जौ.
● सिंधु सभ्यता को लोग मिठास के लिए शहद का इस्तेमाल करते थे.
● रंगपुर और लोथल से चावल के दाने मिले हैं, जिनसे धान की खेती का प्रमाण मिला है।
● सरकोतदा, कालीबंगा और लोथल से सिंधुकालीन घोड़ों के अस्थिपंजर मिले हैं
● तौल की इकाई 16 के अनुपात में थी
●सिंधु सभ्यता के लोग यातायात के लिए बैलगाड़ी और भैंसागाड़ी का इस्तेमाल करते थे
●मेसोपोटामिया के अभिलेखों में वर्णित मेलूहा शब्द का अभिप्राय सिंधु सभ्यता से ही है
● हड़प्पा सभ्यता का शासन वणिक वर्ग को हाथों में था
● सिंधु सभ्यता के लोग धरती को उर्वरता की देवी मानते थे और पूजा करते थे
● पेड़ की पूजा और शिव पूजा के सबूत भी सिंधु सभ्यता से ही मिलते हैं
● स्वस्तिक चिह्न हड़प्पा सभ्यता की ही देन है।
● इससे सूर्यपासना का अनुमान लगाया जा सकता है.
● सिंधु सभ्यता के शहरों में किसी भी मंदिर के अवशेष नहीं मिले हैं।
● सिंधु सभ्यता में मातृदेवी की उपासना होती थी।
● पशुओं में कूबड़ वाला सांड, इस सभ्यता को लोगों के लिए पूजनीय था
● स्त्री की मिट्टी की मूर्तियां मिलने से ऐसा अनुमान लगाया जा सकता है कि सैंधव सभ्यता का समाज मातृसत्तात्मक था
● सैंधव सभ्यता के लोग सूती और ऊनी वस्त्रों का इस्तेमाल करते थे।
● मनोरंजन के लिए सैंधव सभ्यता को लोग मछली पकड़ना, शिकार करना और चौपड़ और पासा खेलते थे।
● कालीबंगा एक मात्र ऐसा हड़प्पाकालीन स्थल था, जिसका निचला शहर भी किले से घिरा हुआ था।
● सिंधु सभ्यता के लोग तलवार से परिचित नहीं थे।
● पर्दा-प्रथा और वैश्यवृत्ति सैंधव सभ्यता में प्रचलित थीं।
● शवों को जलाने और गाड़ने की प्रथाएं प्रचलित थी।
● हड़प्पा में शवों को दफनाने जबकि मोहनजोदड़ों में जलाने की प्रथा थी।
● लोथल और कालीबंगा में काफी युग्म समाधियां भी मिली हैं।
● सैंधव सभ्यता के विनाश का सबसे बड़ा कारण बाढ़ था
● आग में पकी हुई मिट्टी को टेराकोटा कहा जाता है.

NOTES

DOWNLOAD LINK

REET

DOWNLOAD

REET NOTES

DOWNLOAD

LDC

DOWNLOAD

RAJASTHAN GK

DOWNLOAD

INDIA GK

DOWNLOAD

HINDI VYAKARAN

DOWNLOAD

POLITICAL SCIENCE

DOWNLOAD

राजस्थान अध्ययन BOOKS

DOWNLOAD

BANKING

DOWNLOAD

GK TEST PAPER SET

DOWNLOAD

CURRENT GK

DOWNLOAD


ये नोट्स PDF FORMAT में DOWNLOAD करनें के लिये निचे दिये गये DOWNLOAD BUTTON पर CLICK  करें।

नोट :- DOWNLOAD BUTTON  पर CLICK करनें के बाद 11 सेकेंड का इंतजार करें।

एक टिप्पणी भेजें

9 टिप्पणियाँ

  1. उत्तर
    1. हमारा उत्साह वर्धन करनें के लिये धन्यवाद

      हटाएं
  2. Bahut hi sunder
    Bahut achha se banaye hai
    Mai khush ho gya
    Itna achha kahin nahi padha hu

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. हमारा उत्साह वर्धन करनें के लिए धन्यवाद

      हटाएं
  3. बहुत अच्छी तरह से क्रमानुसार लिखा गया हैं। थैंक्यू सर

    जवाब देंहटाएं
  4. अद्भुत, अविश्वसनीय...
    तहे दिल से शुक्रिया... ❤🙏

    जवाब देंहटाएं

शिकायत और सुझाव यहां दर्ज करें ।
👇