Bhakti आंदोलन ।PDF।भक्ति आंदोलन Notes Hindi Pdf

 Bhakti आंदोलन।PDF। भक्ति आंदोलन Notes Hindi Pdf

Bhakti aandolan । भक्ति आंदोलन PDF । भक्ति आंदोलन Notes Hindi Pdf । भक्ति आंदोलन NCERT


हमसे जुड़ें

TELEGRAM 

SUBHSHIV

YOUTUBE

SUBHSHIV



भक्ति आन्दोलन

● भारतीय इतिहास में भक्ति आंदोलन का अर्थ ऐसे आंदोलन से है जिसमें व्यक्तिगत कल्पना वाले सर्वशक्तिमान ईश्वर के प्रति समर्पण का भाव लोकप्रिय हुआ। 

● इसका उद्गम हमें प्राचीन भारत के ब्राह्मण तथा बौद्ध परम्पराओं में मिलता है। 

● यह दक्षिण भारत में एक धार्मिक प्रथा से प्रारंभ हुआ तथा धार्मिक समानता और व्यापक स्तर पर सामाजिक प्रतिभागिता से यह एक लोकप्रिय आंदोलन के रूप में परिवर्तित हो गया। 

● प्रख्यात संतों के नेतत्व में यह आंदोलन 10वीं शताब्दी ई. में अपने सर्वोच्च शिखर पर पहुंच गया।

भक्ति के सिद्धांत के प्रचार-प्रसार के लिए यह आंदोलन विभिन्न परम्पराओं से बना तथा

उपमहाद्वीप के विभिन्न भागों में इसने विभिन्न रूप धारण किए।

भक्ति आंदोलन ने रूढ़िवादी ब्राह्मणवादी परम्पराओं पर प्रहार करने का प्रयत्न किया।

आरंभिक मध्यकाल में इस आंदोलन में कमी आई।

● इतिहासकार भक्ति आंदोलन के उदय

के लिए इस्लाम के आगमन तथा सूफियों के प्रचार को उत्तरदायी मानते हैं। 

● उनका तर्क है कि तुर्कों की विजय ने परम्परावादी राजपूत - ब्राह्मण वर्चस्व के विरुद्ध प्रतिक्रिया के लिए राह बनाई। 

● कुछ इतिहासकारों के अनुसार भक्ति आंदोलन का उदय सामन्ती अत्याचार के खिलाफ एक प्रतिक्रिया थी। 

● इस तथ्य के पक्ष में हमें भक्ति आंदोलन के

संतों की सामन्तवाद विरोधी कविताएं मिलती हैं जैसे, कबीर, नानक, चैतन्य और तुलसीदास की। 

भक्ति आंदोलन के उद्भव संबंधी एक भी विचार ऐसा नहीं है जो कि कायम रह सके। 

● यह तत्कालीन संतों की विचारधारा तथा कविताओं से स्पष्ट है कि वे रुढ़िवादी ब्राह्मण का विद्रोह कर रहे थे। 

● वे धार्मिक समानता में विश्वास करते थे तथा

स्वयं को सामान्य जनता की दुख-तकलीफों में शामिल करते थे।

● कुछ विद्वानों का मानना है कि आरंभिक मध्यकाल में हुए सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों

ने भक्ति आंदोलन के उद्भव के लिए आवश्यक माहौल बनाया। 

● 13वीं तथा 14वीं शताब्दी में निर्मित वस्तुओं, विलासिता संबंधी तथा अन्य कलात्मक वस्तुओं की मांग ने शहरों में शिल्पियों का प्रवेश कराया। 

● ये शिल्पी समानता के विचारों से प्रभावित होकर

भक्ति आंदोलन के प्रति आकर्षित हुए। 

● इन समूहों ने उन्हें ब्राहमणों द्वारा दिए निम्न स्तर

को मानने से इंकार कर दिया। 

● इस आंदोलन को समाज के इस वर्ग से पूर्ण समर्थन प्राप्त हुआ। 

● मध्यकाल के आरम्भिक वर्षो में भक्ति आंदोलन सुधार व परिवर्तन का एक महत्त्वपूर्ण आंदोलन बन गया। 

● ईसा पूर्व छठी शताब्दी में असनातनी आंदोलनों के उदय के बाद भारतीय इतिहास में भक्ति आंदोलन नए विचारों व प्रथाओं के उद्गम को प्रस्तुत करता है, जिसने सम्पूर्ण देश को प्रभावित किया तथा सुधार आंदोलनां को प्रारम्भ किया।

● हिन्दु धर्म में जीवन का उद्देष्य मोक्ष बताया गया है। तथा मोक्ष के तीन मार्ग कर्म,ज्ञान और भक्ति बताए गयें है।

● कर्म व ज्ञान का उल्लेख सर्वप्रथम भगवत गीता में मिलता है। जबकि भक्ति का सर्वप्रथम उल्लेख श्वेतास्वर उपनिषद में मिलता है।

भक्ति आन्दोलन की सुरूआत दक्षिण भारत से हुई तथा इसका उल्लेख सर्वप्रथम तमिल ग्रन्थ तिरूमुरई प्रबन्धम् में मिलता हैं।

● भक्ति आंदोलन में अलवर सन्त व नयनार संत दोनों ने भाग लिया। 

● अलवर के संत भगवान विष्णु के भक्त थे उनकी संख्या 12 थी तथा उनसें एक महिला संत थी जिसका नाम अंडाल था।

● नयनार संत शिवभक्त थे तथा उनकी संख्या 63 थी।

● भगवतपुरान में कहा गया है कि भक्ति द्रविङ देश में जन्मी कर्नाटक में विकसित हुई महाराष्ट्र में कुछ साल रहने के बाद गुजरात में जीर्ण हुई।

भक्ति आंदोलन के प्रणेता रामानुजाचार्य माने जाते है।

भक्ति आंदोलन मध्यकाल की एक महत्वपूर्ण घटना है। एक व्यापक सामाजिक,सांस्कृतिक प्रक्रिया जिसने भारतीय समाज को गहराई तक प्रभावित किया। 

भक्ति आंदोलन बुद्ध के बाद का सबसे प्रभावी आंदोलन था जो समूचे देश में फैला जिसमें ऊँच-नीच, स्त्री-पुरूष, हिंदू-मुस्लिम सभी की भागीदारी थी। 

● अपने मूल रूप में यद्यपि यह एक धार्मिक आंदोलन था, किंतु सामाजिक रूढ़ियों, सामंती बंधनों के नकार का स्वर, एक सहिष्णु, समावेशी समाज की संकल्पना भी इसमें मौजूद थी।

 

भक्ति आंदोलन उदय एवं विकास :- 

मध्यकाल में लगभग 3-4 सौ वर्षों तक चलने वाले भक्ति आंदोलन का जन्म सहसा नहीं हुआ। 

भक्ति आंदोलन को हम दो भागों में विभक्त कर सकते हैं , 6-10 सदी और 10-16 सदी

भक्ति के बीज तो वैदिक काल में ही मिलते है। ब्राह्मण, उपनिषद, पुराण से होते हुए क्रमशः भक्ति का विस्तार होता है। और भागवत संप्रदाय के रूप भक्ति को एक व्यापक आयाम मिलता है। 

● एक आंदोलन के रूप में भक्ति को प्रचारित-प्रसारित करने का श्रेय, दक्षिण के अलवार (विष्णुभक्त) , नयनार (शिव भक्त) भक्तों को है जिनका समय 6-10 सदी तक है। 

भक्ति आंदोलन का उदय दक्षिण से हुआ और वह क्रमशः उत्तर भारत में फैलता गया। 

हिन्दी में उक्ति है- 

भक्ति द्राविड़ उपजी लाए रामानंद/प्रगट करी कबीर ने सप्तद्वीप नवखंड।'

दोनों उद्धरणों से विदित होता है कि भक्ति का उदय द्रविड़ देश (तमिलनाडु) में हुआ। 

● एक संस्कृत श्लोक से ज्ञात होता है कि "द्रविड़ देश में उदय के पश्चात्, भक्ति का आगे विकास कर्नाटक, फिर महाराष्ट्र में हुआ और उसका पतन गुजरात देश में हुआ, फिर वृंदावन में उसे पुनर्जीवन, उत्कर्ष मिला।" 

● हिन्दी की अनुश्रुति में भक्ति को रामानंद द्वारा दक्षिण से उत्तर ले जाने और कबीर द्वारा प्रचारित-प्रसारित किए जाने का स्पष्ट संकेत है।

● स्पष्ट है कि संस्कृत श्लोक का सम्बद्ध कृष्ण भक्ति से और हिन्दी अनुश्रुति का सम्बन्ध रामभक्ति से है। 

● अलवारों नयनारों का प्रमुख विरोध बौद्ध और जैन धर्म से था। 

● उन दिनों दक्षिण में इन दोनों धर्मों का काफी प्रभाव था, किन्तु अपने मूल स्वरूप को खोकर ये धर्म कर्मकाण्डीय जड़ता और तमाम तरह की विकृतियों के शिकार हो गए थे। 

● ऐसे समय में अलवार (विष्णुभक्त) और नयनार (शिव भक्त) संतों ने जनता के बीच भक्ति को प्रचारित करने का कार्य किया।

महाराष्ट्र में भक्ति आंदोलन को ज्ञानदेव, नामदेव ने आगे बढ़ाया। इनकी भक्ति सगुण - निर्गुण के विवादों से परे थी। 

ज्ञानदेव की भक्ति पर उत्तर भारत के नाथ पंथ का भी गहरा प्रभाव था। 

● आगे चलकर महाराष्ट्र में तुकाराम और गुरु रामदास हुए। 

आठवीं सदी में शंकराचार्य ने बौद्धधर्म का

प्रतिवाद करते हुए वेदों, उपनिषदों की नई व्याख्या कर वैदिक धर्म को पुनः प्रतिष्ठित किया। उनका विरोध अलवार एवं नयनार से भी था। उन्होंने अद्वैतवाद ,मायावाद का प्रवर्तन कर ज्ञान को, सर्वोपरि महत्ता दी। 

शंकराचार्य का विरोध परवर्ती वैष्णव आचार्यों रामानुज, मध्वाचार्य, विष्णुस्वामी,वल्लभाचार्य, निम्बार्क ने किया। ये लोग सगुण ब्रह्म के उपासक और भक्ति द्वारा मुक्ति को मानने वाले थे।

● शंकराचार्य जहाँ वर्णाश्रम व्यवस्था के समर्थक थे वहीं इन आचार्यों का भक्तिमार्ग भेदभाव रहित था।

रामानुज के शिष्य राघवानंद ने भक्ति को उत्तर भारत में प्रचारित किया। इनके शिष्य रामानंद हुए, जिन्होंने भक्ति मार्ग को और भी उदार बनाकर सगुण-निर्गुण दोनों की उपासना का उपदेश दिया। इनके शिष्यों में सगुण भक्त और निर्गुण संत दोनों हुए। 

स्वामी रामानंद ने राम भक्ति का द्वार सबके लिए सुलभ कर दिया। साथ ही ग्रहस्तो में वर्णसंकरता ना फैले, इस हेतु विरक्त संन्यासी के लिए कठोर नियम भी बनाए। 

● स्वामी रामानंद नें अनंतानंद, भावानंद, पीपा, सेन नाई, धन्ना, नाभा दास, नरहर्यानंद, सुखानंद, कबीर, रैदास, सुरसरी, पदमावती जैसे बारह लोगों को अपना प्रमुख शिष्य बनाया, जिन्हे द्वादश महाभागवत के नाम से जाना जाता है। इन्हें अपने अपने जाति समाज मे, और इनके क्षेत्र में भक्ति का प्रचार करने का दायित्व सौपा।

● इनमें कबीर दास और रैदास आगे चलकर काफी ख्याति अर्जित किये। 

● कालांतर में कबीर पंथ, रामानंदीय सम्प्रदाय से अलग रास्ते पर चल पड़ा । 

रामानंदीय सम्प्रदाय सगुण उपासक है और विशिष्टाद्वेत सिद्धान्त को मानते है । 

कबीर और रविदास ने निर्गुण राम की उपासना की। 

● इस तरह कहें तो स्वामी रामानंद ऐसे महान संत थे जिसकी छाया तले सगुण और निर्गुण दोनों तरह के संत-उपासक विश्राम पाते थे। 

जब समाज में चारो ओर आपसी कटूता और वैमनस्य का भाव भरा हुआ था, वैसे समय में स्वामी रामानंद ने भक्ति करने वालों के लिए नारा दिया "जात-पात पूछे ना कोई-हरि को भजै सो हरि का होई"

● रामानंद ने सर्वे प्रपत्तेधिकारिणों मताः का शंखनाद किया और भक्ति का मार्ग सबके लिए खोल दिया। किन्तु वर्णसंकरता नहीं हो, इसलिये संन्यासी / वैरागी के लिए कठोर नियम बनाए, उन्होंने महिलाओं को भी भक्ति के वितान में समान स्थान दिया।

रामानंद ने रामभक्ति मार्ग को प्रशस्त किया, जिसमें आगे चलकर तुलसीदास हुए। 

कृष्ण भक्तिमार्ग को वल्लभाचार्य, विष्णुस्वामी, निम्बार्क, हितहरिवंश, विट्ठलनाथ ने आगे बढ़ाया

निर्गुण भक्तिमार्ग में कबीर सर्वोपरि है, उन्होंने, वैष्णव सम्प्रदाय से ही नहीं, सिद्धों, नाथों और महाराष्ट्र के संतज्ञानेश्वर, नामदेव से बहुत कुछ ग्रहण कर निर्गुण पंथ का उत्तर भारत में प्रवर्तन

किया।

● भारत में इस्लाम के आगमन के साथ सूफी मत का भी प्रवेश हुआ। 

सूफी मत इस्लाम की रूढ़ियों से मुक्त एक उदारवादी शाखा है। इसके कई संप्रदाय है -चिश्ती, कादिरा, सुहरावर्दी, नक्शबंदी, शत्तारी। 

● भारत में चिश्ती और सुहरावर्दी संप्रदाय का विशेष प्रसार हुआ। 

हिंदू-मुस्लिम के सांस्कृतिक समन्वयीकरण में सूफी मत काफी सहायक हुआ।

● इस प्रकार भक्ति आंदोलन दक्षिण भारत से शुरु होकर समूचे भारत में फैला और शताब्दियों तक जन सामान्य को प्रेरित-प्रभावित करता है। 

● उसका एक अखिल भारतीय स्वरूप था, उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम सभी जगहों पर हम इस आंदोलन का प्रसार देखते हैं, सभी वर्ग, जाति, लिंग, समुदाय, संप्रदाय, क्षेत्र की इसमें भूमिका, सहभागिता थी।

महाराष्ट्र में ज्ञानदेव, नामदेव, तुकाराम, रामदास, गुजरात में नरसी मेहता, राजस्थान में मीरा, दादू दयाल, उत्तर भारत में, कबीर, रामानंद, तुलसी, सूर जायसी, रैदास, पंजाब में गुरु नानक देव, बंगाल में चण्डीदास, चैतन्य, जयदेव असम में शंकरदेव सक्रिय थे। 

● भक्ति आंदोलन के दौरान कई संप्रदायों का जन्म हुआ, जिन्होंने मानववाद के उच्च मूल्यों का प्रसार किया, सामान्य जन-जीवन में स्फूर्ति एवं जागरण का संचार किया।

भक्ति आंदोलन के उदय के कारण :- 

भक्ति आंदोलन का उदय मध्यकालीन इतिहास की एक प्रमुख घटना है। 

● इसका उदय अकस्मात नहीं होता है बल्कि बहुत पहले से ही इसके निर्माण की प्रक्रिया चल रही थी, जिसे युगीन परिस्थितियों ने गति प्रदान किया।

ग्रियर्सन ने भक्ति आंदोलन को ईसाईयत की देन माना है- उनका यह मत अप्रमाणिक, अतार्किक है। 

आचार्य शुक्ल ने इसे तत्कालीन राजनीतिक

परिस्थितियों का परिणाम मानते हुए पराजित हिंदू समाज की सहज प्रतिक्रिया माना है, वह लिखते है- देश में मुसलमानों का राज्य प्रतिष्ठित हो जाने पर हिंदू जनता के हृदय में गौरव, गर्व और उत्साह के लिए वह अवकाश न रह गया। उसके सामने उनके देव-मंदिर गिराए जाते थे, देव, मूर्तियाँ तोड़ी जाती थीं और पूज्य पुरुषों का अपमान होता था और वे कुछ भी नही कर सकते थे। ऐसी दशा में अपनी वीरता के गीत न तो वे गा ही सकते थे न बिना लज्जित हुए सुन सकते थे।

● आगे चलकर जब मुस्लिम साम्राज्य दूर तक स्थापित हो गया तब परस्पर लड़ने वाले स्वतंत्र

राज्य भी नहीं रह गये। इतने भारी राजनैतिक उलटफेर के पीछे हिंदू जन समुदाय पर बहुत दिनों

तक उदासी-सी छाई रही। अपने पौरुष से हताश लोगों के लिए भगवान की शक्ति और कारण की ओर ध्यान ले जाने के अतिरिक्त दूसरा मार्ग ही क्या था।' 

● इस प्रकार शुक्ल जी भक्ति आंदोलन के उदय का इस्लाम के आक्रमण से क्षत-विक्षत, अपने पौरुष से हताश हिन्दू जाति के पराजय बोध से जोड़ते हैं।

भक्ति काल के उदय सम्बन्धी शुक्ल जी के मत से असहमति जताते हुए आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी लिखते हैं कि- 'मैं जोर देकर कहना चाहता हूँ कि अगर इस्लाम नहीं आया होता तो भी इस हिंदी साहित्य का बारह आना वैसा ही होता, जैसा कि आज है।' 

आचार्य द्विवेदी भक्ति आंदोलन पर इस्लामी आक्रमण का प्रभाव तो स्वीकार करते हैं, किंतु भक्ति आंदोलन को उसकी प्रतिक्रिया नहीं मानते।

● बहरहाल दोनों आचार्यों के मतों में भिन्नता के बावजूद इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि भक्ति आंदोलन का एक सम्बन्ध इस्लामी आक्रमण से भी है। 

● द्विवेदी जी भक्ति आंदोलन को भारतीय पंरपरा का स्वाभाविक विकास मानते है, इसे उन्होंने शास्त्र और लोक के द्वन्द्व की उपज माना है जिसमें शास्त्र पर लोकशक्ति प्रभावी साबित हुई,और भक्ति आंदोलन का जन्म हुआ। 

● इसके मूल में वह बाहरी कारणों की जगह भीतरी शक्ति की ऊर्जा देखते है- भारतीय पांडित्य ईसा की एक शताब्दी बाद आचार-विचार और भाषा के क्षेत्रों में स्वभावतः ही लोक की ओर झुक गया था। 

● यदि अगली शताब्दियों में भारतीय इतिहास की अत्यधिक महत्वपूर्ण घटना अर्थात् इस्लाम का प्रमुख विस्तार न भी घटी होती तो भी वह इसी रास्ते जाता। उसके भीतर की शक्ति उसे इसी स्वाभाविक विकास की ओर ठेले जा रही थी।' 

● द्विवेदी जी, मध्यकालीन भक्ति साहित्य के विकास के लिए बौद्ध धर्म के लोक धर्म में रूपांतरित होने और प्राकृत-अपभ्रंश की श्रृंगार प्रधान कविताओं की प्रतिक्रिया को देखते है। 

● इस संदर्भ में रामस्वरूप चतुर्वेदी का मत उल्लेखनीय है-"अच्छा होगा कि प्रभाव और प्रतिक्रिया दोनों रूपों में इस्लाम की व्याख्या सहज भाव और अकुंठ मन से किया जाए।" तब आचार्य शुक्ल और आचार्य द्विवेदी के बीच दिखने वाला यह प्रसिद्ध मतभेद अपने-आप शांत हो जाएगा। 

भक्ति-काव्य के विकास के पीछे बौद्ध धर्म का लोक मूलक रूप है और प्राकृतों के श्रृंगार काव्य की प्रतिक्रिया है तो इस्लाम के सांस्कृतिक आतंक से बचाव की सजग चेष्टा भी है।' 

रामस्वरूप चतुर्वेदी मध्यकालीन भक्तिकाव्य के उदय में इस्लाम की आक्रामक परिस्थिति का गुणात्मक योगदान स्वीकार करते हैं। 

भक्ति आंदोलन के उदय के पीछे तत्कालीन आर्थिक, सामाजिक परिस्थितियाँ भी कार्यरत थी, इसका विवेचन के. दामोदरन, इरफान हबीब, रामविलास शर्मा, मुक्तिबोध ने किया है। 

● इस्लामी राज्य की उत्तर भारत में स्थापना और उसकी स्थिरता के कारण व्यापार वाणिज्य का तेजी से विकास होता है, नये उद्योग-धंधे ही नहीं, स्थापित होते, नए-नए नगरों का भी निर्माण होता है, इसके फलस्वरूप भारत का जो कामगार वर्ग था, जिसमें प्रायः निचली जातियों के लोग अधिक थे की, आर्थिक स्थिति में सुधार होता और उनमें एक आत्मसम्मान, अपनी सम्मानजनक सामाजिक स्थिति को पाने की भावना बलवती होती है।  

● यह अकारण नहीं है कि भक्ति आंदोलन में इन निचली जातियों की भागीदारी सर्वाधिक है।

● इस्लामी राज्य स्थापित होने से परम्परागत सामाजिक ढाँचे को एक धक्का लगता है , सामंतों एवं पुरोहितों का प्रभुत्व- प्रभाव कम होता है। 

● कह सकते है कि भक्ति आंदोलन के उदय में तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक - सांस्कृतिक परिस्थितियाँ सभी अपना योगदान दे रही थी। 

● अत: भक्ति आंदोलन के उदय में कई कारणों का संयुक्त योगदान है।

भक्ति आंदोलन का महत्व :- 

भक्ति आंदोलन मध्यकाल का एक व्यापक और प्रभावी आंदोलन था, जिसने भारतीय समाज को गहरे स्तर पर प्रभावित किया।

● इसने एक ओर जहाँ सत्य शील, सदाचार, करूणा, सेवा जैसे उच्च मूल्यों को प्रचारित किया वहीं समाज के दबे-कुचले वर्ग को भक्ति का अधिकारी बनाकर उनके अंदर आत्मविश्वास का संचार भी किया। 

भक्ति आंदोलन की प्रगतिशील भूमिका को रेखांकित करते हुए शिवकुमार मिश्र लिखते है- 'इस आंदोलन में पहली बार राष्ट्र के एक विशेष भूभाग के निवासी तथा कोटि-कोटि साधारण जन ही शिरकत नहीं करते, समग्र राष्ट्र की शिराओं में इस आंदोलन की ऊर्जा स्पंदित होती है, एक ऐसा जबर्दस्त ज्वार उफनता है कि उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम सब मिलकर एक हो जाते है, सब एक दूसरे को प्रेरणा देते है, एक-दूसरे से प्रेरणा लेते है, और मिलजुल कर भक्ति के एक ऐसे विराट नद की सृष्टि करते हैं, उसे प्रवहमान बनाते हैं, जिसमें अवगाहन कर राष्ट्र के कोटि-कोटि साधारण जन सदियों से तप्त अपनी छाती शीतल करते हैं, अपनी आध्यात्मिक तृषा बुझाते हैं, एक नया आत्म्विश्वास, जिंदा रहने की, आत्म सम्मान के साथ जिंदा हरने की शक्ति पाते हैं।' 

भक्ति आंदोलन एक व्यापक लोकजागरण था।

उत्तर भारत में भक्ति आंदोलन :- 

उत्तर भारत में भक्ति आंदोलन में सामाजिक - आर्थिक आंदोलन सम्मिलित थे जो दक्षिण

के किसी आचार्य से संबंधित थे तथा दक्षिण में प्रारंभ हुए आंदोलन की ही निरन्तरता लगभग इस आंदोलन में दिखाई देती है। 

● हालाँकि इन दोनों क्षेत्रों की परम्पराओं में

समानता मिलती है किंतु प्रत्येक संत की शिक्षाओं में भक्ति की धारणा भिन्न ही दिखती है। 

कबीर जैसे निर्गुण संतों ने वर्णाश्रम की पूरी व्यवस्था तथा इस पर आधारित जाति व्यवस्था को नकार कर नए मूल्यों की स्थापना की जिसने एक नए तथा उदार वर्ग के उदय में मदद की। 

सगुण भक्ति धारा वाले सतों, जैसे -तुलसीदास ने वर्ण व्यवस्था को कायम रखते हुए ब्राह्मणों की सर्वोच्चता को बनाए रखा। 

● उन्होंने भगवान में समर्पण तथा विश्वास पर बल दिया तथा वे मूर्ति पूजा के प्रति विशेष रूप से कटिबद्ध थे।


एकेश्वरवादी भक्ति :-


उत्तर भारत में कबीर (1440.1578 ई.) सबसे पुराने तथा सर्वाधिक प्रभावशाली सन्त थे।

कबीर एक जुलाहे थे। उन्होंने अपनी जिन्दगी का एक लम्बा समय बनारस में गुज़ारा था।

● उनकी कविताएँ सिक्खों के पवित्रा ग्रंथ गुरु ग्रन्थ साहिब में भी सम्मिलित की गई है।

● कबीर से प्रेरित होने वाले मुख्य सन्त रैदास थे।


गुरुनानक पंजाब में खत्रा वर्ग से थे तथा धन्ना राजस्थान के जाट किसान थे। 


उत्तर भारत के एकेश्वरवादी सन्तों की शिक्षाओं में निम्न समानताएँ हमें देखने को मिलती हैं :-

● अधिकतर एकेश्वरवादी सन्त निम्न जातियों से सम्बन्धित थे, तथा इस बात के प्रति जागरूक थे कि उनके विचारों में समानता है। 

● वे एक दूसरे की शिक्षाओं तथा प्रभाव के प्रति भी सजग थे। 

● अपनी-अपनी रचनाओं में उन्होंने अपने पूर्ववर्तियों का तथा एक दूसरे का वर्णन विचारधाराओं में एकता को दर्शाते हुए किया है।

● सभी वैष्णव भक्ति के सिद्धान्त से तथा नाथपंथी आन्दोलन और सूफी से भी प्रभावित थे। 

● उनके विचार इन तीनों परम्पराओं का संयोजन प्रतीत होते हैं।

खुदा के प्रति व्यक्तिगत अनुभव को दी गई महत्ता भी निर्गुण भक्ति सन्तों की एक अन्य विशेषता है।

● वे निर्गुण भक्ति में विश्वास करते थे न कि सगुण भक्ति में। 

● उन्होंने भक्ति का सिद्धान्त तो वैष्णववाद से लिया था, किन्तु उसे निर्गुण रूप दिया था।

● हालाँकि उन्होंने खुदा को कई नामों से पुकारा किन्तु उनके खुदा अरूपी, अनवतरित, सर्वव्यापी तथा अवर्णनीय हैं।

● भक्ति सन्तों ने तत्कालीन वर्चस्व वाले धर्मों (हिन्दू तथा इस्लाम) दोनों को नकार दिया तथा इन धर्मां के नकारात्मक पहलुओं की निन्दा की।

● उन्होंने ब्राहमणों की सर्वोच्चता को चुनौती दी तथा जाति व्यवस्था और मूर्तिपूजा पर प्रहार किया।

● उन्होंने पूरे उत्तर भारत में प्रचलित तथा लोकप्रिय भाषा में कविताओं का सृजन किया। इससे उन्हें सर्वसामान्य में अपने विचारों का प्रचार करने में मदद मिली।

● इससे विभिन्न निम्न वर्गों के बीच उनके विचार द्रुत गति से फैले।

वैष्णव भक्ति :- 

● 14वीं शताब्दी तथा 15वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में उत्तर भारत में रामानन्द लोकप्रिय वैष्णव भक्ति सन्त बनकर उभरे। 

● वे दक्षिण भारत मूल के थे, परन्तु बनारस

में निवास करते थे। 

● क्योंकि उनके अनुसार यह दक्षिण भारत के भक्ति आन्दोलन तथा उत्तर भारत के वैष्णव भक्ति आन्दोलन के बीच का सूत्रा था। 

● उन्होंने अपनी भक्ति का विषय विष्णु के बजाय राम को बना लिया। 

● उन्होंने राम तथा सीता की उपासना क और उत्तर भारत में राम की उपासना के जनक कहलाए

एकेश्वरवादी सन्तों की ही भाँति उन्होंने जाति व्यवस्था का विरोध किया तथा उपासना पद्धति को लोकप्रिय बनाने के लिए सामान्य भाषा में शिक्षाओं का प्रचार किया। 

● उनके अनुयायियों को रामानन्दी कहा गया।

भक्ति आन्दोलन के महत्त्वपूर्ण सन्त तुलसीदास भी हैं। 

16वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में प्रख्यात भक्ति संत वल्लभाचार्य ने कृष्ण भक्ति को लोकप्रिय बनाया।

● उनका अनुसरण करने वालों में मुख्य सन्त सूरदास तथा मीराँ बाई  थे।

बंगाल के भक्ति आन्दोलन का स्वरूप उत्तर और दक्षिण भारत में चल रहे भक्ति आंदोलन से सर्वथा भिन्न था। 

● यह भागवत पुराण की वैष्णव भक्ति परम्परा, सहज बौद्ध तथा नाथपंथी परम्परा से प्रभावित था।

● ये परम्पराएँ समर्पण के गूढ़ तथा भावना पर

आधारित थीं। 

12वीं शताब्दी में जयदेव इस परम्परा के मुख्य कवि थे। उन्होंने कृष्ण और राधा के संदर्भों द्वारा प्रेम के रहस्यात्मक पहलुओं को दर्शाया। 

● इस क्षेत्र के लोकप्रिय भक्ति सन्त चैतन्य हुए ।

● उन्हें कृष्ण के ही एक अवतार के रूप में देखा गया।

● उन्होंने ब्राम्हण व धर्म ग्रंथों के वर्चस्व पर कोई प्रश्न चिह्नन तो नहीं लगाए।

● उन्होंने संकीर्तन (पवित्रा नृत्य के साथ समूह गान) को भी लोकप्रिय बनाया। 

● उनके समय में बंगाल में भक्ति आंदोलन एक सुधार आंदोलन में बदल गया, क्योंकि इसने

जाति-व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया।

महाराष्ट्र में भक्ति आन्दोलन भागवत पुराण तथा शिव नाथपंथी से प्रेरित हुआ। 

● महाराष्ट्र का सबसे उल्लेखनीय भक्ति सन्त ज्ञानेश्वर थे। 

भागवत गीता पर उनकी टीका ज्ञानेश्वरी

ने महाराष्ट्र में भक्ति दर्शन की नींव डाली। 

● जाति व्यवस्था का पुरजोर विरोध करते हुए

उन्होंने भक्ति के द्वारा प्रभु को पाने पर बल दिया।

● उस क्षेत्रा के देव विठोबा थे तथा उनके अनुयायी उनके मन्दिर में वर्ष में दो बार तीर्थ यात्रा किया करते थे। 

● महाराष्ट्र के अन्य महत्त्वपूर्ण भक्ति धारा के संत, सन्त नामदेव (1270 - 350) थे। 

● एक ओर उत्तर भारत में उन्हें एकेश्वरवादी तथा निर्गुण धारा का संत मानते हैं वहीं महाराष्ट्र में वह वरकरी (वैष्णव भक्ति परम्परा) परम्परा के ही अंग माने जाते है। 

● महाराष्ट्र के अन्य भक्ति संतों में मुख्य थे- : 

   ■ चोका, सोनार, तुकाराम तथा एकनाथ। 

तुकाराम की शिक्षाएं दोहों के रूप में

संग्रहीत हैं जो गाथा का निर्माण करती हैं जबकि मराठी में एकनाथ की शिक्षा मराठी भाषा में आध्यात्मिक रचनाएं हैं।


भक्ति आन्दोलन के प्रमुख संत :-

शकराचार्य :- 

● जन्म 788ई. में कलादी (केरल) 

● पिता-शिवगुरू

● माता-आर्यम्बा।

शंकर आचार्य का जन्म 788 ई में केरल में कालपी अथवा 'काषल' नामक ग्राम में हुआ था। 

● इनके पिता का नाम शिवगुरु भट्ट और माता का नाम सुभद्रा था। 

● बहुत दिन तक सपत्नीक शिव को आराधना करने के अनंतर शिवगुरु ने पुत्र-रत्न पाया था, अत: उसका नाम शंकर रखा।

● जब ये तीन ही वर्ष के थे तब इनके पिता का देहांत हो गया। ये बड़े ही मेधावी तथा प्रतिभाशाली थे। 

● छह वर्ष की अवस्था में ही ये प्रकांड पंडित हो गए थे और आठ वर्ष की अवस्था में इन्होंने संन्यास ग्रहण किया था।

● इनके संन्यास ग्रहण करने के समय की कथा बड़ी विचित्र है। कहते हैं, माता एकमात्र पुत्र को संन्यासी बनने की आज्ञा नहीं देती थीं। तब एक दिन नदी किनारे एक मगरमच्छ ने शंकराचार्यजी का पैर पकड़ लिया तब इस वक्त का फायदा उठाते शंकराचार्यजी ने अपने माँ से कहा " माँ मुझे सन्यास लेने की आज्ञा दो नही तो हे मगरमच्छ मुझे खा जायेगी ", इससे भयभीत होकर माता ने तुरंत इन्हें संन्यासी होने की आज्ञा प्रदान की ; और आश्चर्य की बात है की, जैसे ही माता ने आज्ञा दी वैसे तुरन्त मगरमच्छ ने शंकराचार्यजी का पैर छोड़ दिया। इसके बाद गोविन्द नाथ से शंकराचार्य नें संन्यास ग्रहण किया।

● पहले ये कुछ दिनों तक काशी में रहे, और तब इन्होंने विजिलबिंदु के तालवन में मण्डन मिश्र को सपत्नीक शास्त्रार्थ में परास्त किया। 

● इन्होंने समस्त भारतवर्ष में भ्रमण करके बौद्ध धर्म को मिथ्या प्रमाणित किया तथा वैदिक धर्म को पुनरुज्जीवित किया। 

● कुछ बौद्ध इन्हें अपना शत्रु भी समझते हैं, क्योंकि इन्होंने बौद्धों को कई बार शास्त्रार्थ में पराजित करके वैदिक धर्म की पुन: स्थापना की।

32 वर्ष की अल्प आयु में सम्वत 820 ई में केदारनाथ के समीप स्वर्गवास हो गया।

● ये शंकर के अवतार माने जाते हैं।

● ये भारत के एक महान दार्शनिक एवं धर्मप्रवर्तक थे। 

● इन्होने अद्वैत वेदान्त को ठोस आधार प्रदान किया।

भगवद्गीता, उपनिषदों और वेदांतसूत्रों पर लिखी हुई इनकी टीकाएँ बहुत प्रसिद्ध हैं। 

● उनके विचारोपदेश आत्मा और परमात्मा की एकरूपता पर आधारित हैं जिसके अनुसार परमात्मा एक ही समय में सगुण और निर्गुण दोनों ही स्वरूपों में रहता है।

● इन्होने सांख्य दर्शन का प्रधानकारणवाद और मीमांसा दर्शन के ज्ञान-कर्मसमुच्चयवाद का खण्डन किया।

● इन्होंने अनेक विधर्मियों को भी अपने धर्म में दीक्षित किया था। 

● इन्होंने ब्रह्मसूत्रों की बड़ी ही विशद और रोचक व्याख्या की है।

● इन्होंने ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, मांडूक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय, बृहदारण्यक और छान्दोग्योपनिषद् पर भाष्य लिखा।

वेदों में लिखे ज्ञान को एकमात्र ईश्वर को संबोधित समझा और उसका प्रचार तथा वार्ता पूरे भारतवर्ष में की। 

● उस समय वेदों की समझ के बारे में मतभेद होने पर उत्पन्न चार्वाक, जैन और बौद्ध मतों को शास्त्रार्थों द्वारा खण्डित किया

● इन्होने महेतवार दर्शन की स्थापना की जिसमें केवल ब्रह्म सत्ता को परम सत्ता माना जाता है। यह दर्शन जीव व जगत को मिथ्यो मानता है।

शंकराचार्य बौद्ध धर्म की महायान शाखा से प्रभावित थे इस कारण उन्हे प्रच्छन्न बुद्ध भी कहते है।

● इन्होने बहतसूत्र,गीता व कुछ उपनिषदों पर भाष्यों की रचना की।

● इनकी मृत्यु 820 ई. में बद्रीनाथ (उत्तराखंड) मे 32 वर्ष में हुई।

इन्होने देश के चारों कोनों में चार मठों की स्थापना की :- 


पूर्व

गोर्वधन मठ (लबभाद्र व सुमद्रा से)

पुरी (उङिसा)

पश्चिम

सारदा मठ (श्री कृष्ण से समंबंधित)

द्वारिका (गुजरात)

उतर

ज्योर्तिमढ (विष्णु से समंबंधित)

बद्रीनाथ (उतराखण्ड)

दक्षिण

भारतीय मठ (शिव से समंबंधित)

श्रृंगरी(कर्नाटक)


● शंकराचार्य को भक्ति आन्दोलन का आदिपुरूष भी कहा जाता है।

रामानाजुचार्य :- 

● जन्म 1017 ई.पेरम्बदूर (तमिलनाडू) 

● पिता - केशव

● माता-कान्तिमति

● गुरू - युमुनाचार्य।

● विशिष्टा द्वेतवाद के प्रवर्तक थे।

● यह अलवार भक्ति परम्परा के संत थे तथा इन्हे भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है।

● रामानुजाचार्य को भक्ति आंदोलन का प्रणेता व संस्थापक कहा जाता हैं। 

● यह ईश्वर की सगुण भक्ति में विश्वास करते थे।

● इन्होने शंकराचार्य के अद्वेतवाद के वाद का खण्डन किया।

● इन्होने विशिष्टा द्वेतवाद दर्शन की स्थापना की।

● इन्होने कान्ची व श्री रंगपटनम को अपना प्रमुख केन्द्र बनाया ।

● यह वेष्णव संत थे तथा तत्कालीन श्रीरंगपटनम के चोल शाषक कुलोन्तग प्रथम सेव धर्म का अनुयायी था, जिसके विराध के कारण इन्हे श्री रंगपटनम छोङकर कोची जाना पङा।

● इन्होने श्री सप्रदाय की स्थापना की तथा ब्रह्मसुत्र पर श्री भाव्य की रचना की।

● इन्होने तिरूपती (तेलगांना) को श्री सप्रदाय का प्रमुख केन्द्र बनाया।

● इन्होने वेदान्त सार, वेदान्त द्वीप, वेदार्थ -संग्रह, न्याय कुलीश तथा गीता पर एक टीका की रचना की।

रामानुजाचार्य के अनुसार भक्ति से प्रसन्न ईश्वर स्वयं मोक्ष प्रदान करता है।


निम्बार्काचार्य :- 

● जन्म -1165 निम्बापुर (तमिलनाडु)

● निम्बार्काचार्य को भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र का अवतार माना जाता है।

● हैतादेतवद/भेदाभेद के प्रवर्तक थे।

● निम्बार्काचार्य के अनुयायियों ने निम्बार्क सम्प्रदाय की स्थापना की जिसकी प्रधान पीट (सलेमाबाद) अजमेर में हैं।

● सगुण भक्ति के उपासक निम्बार्काचार्य भगवान कृष्ण के किशोर रूप की उपासना करते थे। तथा राधा को श्री कृष्ण की पत्नि मानते थे।

● इन्होने द्वेतवाद व अद्वैतवाद दोनो को अपने दर्शन में स्थान दिया। इस कारण इनके दर्शन द्वैताद्वैतवाद या भेदाभेद दर्शन कहा जाता है। 

● यह सनक सम्प्रदाय/ हंस सम्प्रदाय से भी कहा जाता है। 

निम्बार्काचार्य से समंबंधित निम्बार्क सम्प्रदाय की प्रधान पीठ सलेमाबाद (अजमेर) में स्थित है।

● इन्होने वेदान्त परिजात सौरभ देश श्लोकी सिद्धान्त रतन नामक ग्रन्थो की रचना की।


माधवाचार्य :-

● जन्म -1199ई. उडिपी (कर्नाटक)

● द्वैतवाद के प्रवर्तक थे।

● यह आत्मा व प्रमात्मा दोनो को अलग-2 तत्व मानते थे, इसी कारण इनका दर्शन द्वैतवाद कहलाता है।

● माधवचार्य सगुण भक्ति परम्परा के सन्त थे तथा वे भगवान विष्णु को परमात्मा मानते थे।

● इन्हे वायु का अवतार माना जाता है। 

● इन्होने ब्राह्मन सम्प्रदाय की स्थापना की।

● इन्होंने पूर्णप्रज्ञ भावया की रचना की।

● इनके सम्प्रदाय को नया रूप देकर जन-जन तक फैलाने का कार्य बंगाल के सन्त चैतन्य महाप्रभु ने किया।

चैतन्य महाप्रभु भक्ति आन्दोलन के एकमात्र संत थे,जो मूर्तिपूजा मे विश्वास रखते थे।


वल्लाभाचार्य :- 

● जन्म-1479 (काषी) वाराणसी मृत्यु -1531 (काषी) वाराणसी।

शुद्धाद्वैतवाद/पुष्टीमार्ग के प्रवर्तक थे। यह सगुण भक्ति परम्परा के उपासक थे व भगवान श्री कृष्ण को श्री नाथ जी के नाम से पूजते थे।

● इन्होने शुद्धदैतवार की स्थापना की जिसे पुष्टिमार्ग भी कहा जाता है।

● इन्हें विजयनगर के शासक कृष्णदेवराय का संरक्षण प्राप्त था। 

● इन्होने रूद्र सम्प्रदाय की स्थापना की। 

● इन्होने पूर्व मीमांसा, भावय, संबोधिनी सिद्धान्त, रहस्य अणु भाष्य तथा (52 वैष्णवों की वार्ता) नामक ग्रन्थो की रचना की।

● इनके पुत्र विट्ढलनाथ ने अदरहाप-कवि मंडली का संगठन किया।

 

रामानन्द :- 

( कबीरदास जी के गुरू )

◆ इनके गुरू - राघवानंद,

● जन्म-1299 ई. कान्यकुंज ब्राह्मण परिवार में हुआ।

● मृत्यु-1411 ई.-प्रयाग,डलाहबाद

भक्ति परम्परो के प्रथम संत जिन्होने राम को उपवासक माना।

● यह उतर भारत में भक्ति परम्परा के प्रथम सन्त थे, जिन्होने उतर भक्ति परम्परादक्षिण भक्ति परम्परा को जोङा इस कारण इन्हें दोनों के मध्य संत कहा जाता है।

● ये भक्ति परम्परा के प्रथम संत थे जिन्होने संस्कृत के स्थान पर हिन्दी भाषा में अपने सिद्धान्तों का प्रचार किया।

● इनके कुल 12 शिष्य थे जो अलग-2 जातियों से समंबंधित थे। जैसे- रैदास (मेघवाल) कबिर (जुलाहा) सदना (कसाई),सेन (नाई), पीपा (क्षत्रिय) धन्ना (जाट), नामदेव (दर्जी) अनत सुखानंद,सुरसुरानंद,भावानंद, नरहरयानन्द।

रामानन्द ने महिलाओं को भी अपना शिष्य बनाया , उनकी प्रमुख दो शिष्याएं थी :-

(1) पद्मावती (2) सुरसरि।

● इन्होने रामावत सम्प्रदाय की स्थापना की जिसमें भगवान राम की भक्ति की प्रधानता थी। 

● रामानन्द की भक्ति दास्य भाव की भक्ति/ सगुण भक्ति थीं।


संत कबीर :- 

● दादूदयाल के गुरू

● जन्म-1440ई. (काशी/वाराणासी/बनारस), 

● मृत्यु -1518 ई. (मगहर)

निर्गुण भक्ति परम्परा के प्रथम संत जो आजीवन गृहस्थ आश्रम में रहें।

● कबीर अरबी भाषा का शब्द है जिसका हिन्दी रूपान्तरण महान होता है।

● इन्होने हिन्दु व मुस्लिमों के मध्य समन्वय स्थापित करने के अनेक प्रयास किए। 

● ये निर्गुण भक्ति धारा के प्रथम सन्त थे जो आजीवन गृहस्थ आश्रम में रहे।

● ये दिल्ली के सुल्तान सिकंदर लादी के समकालीन थे तथा रामानंद को अपना गुरू मानते थे।

● इन्होने सधुक्कड़ी भाषा का प्रयोग किया तथा इनके वचनों का संग्रह ’बीजक’ कहलाता है।

● इन्होने आत्मा की शुद्धता पर बल दिया व एकेष्वरवाद के  समर्थक थे।


संत दादू दयाल :- 

● जन्म-1544 ई.(अहमदाबाद गुजरात) 

● नरैना में गुफा मे इनकी समाधि है जिसे दादू खौल कहते है। 

राजस्थान के कबीर कहे जाने वाले दादू दयाल का जन्म 1544 अहमदाबाद में हुआ। 

● इन्होने अपना मूल स्थान नरैना (नारायणा) जयपुर को बनाया। 

● 1573 ई. में इन्होने निपंथ सम्प्रदाय की स्थापना की।

● निर्गुण भक्ति परम्परा के सन्त दादूदयाल जी अपने सिद्धान्तों का प्रचार सत्संग के माध्यम से करते थे व सत्संग स्थल अलख दरिबा कहलाते थें।

● इनके कुल 152 शिष्य थे जिनमें से 52 को दादू स्तम्भ कहा जाता है।

● 1585 ई. में अकबर ने इन्हे अपने इबादत रवाना (फतेहपुर सिकरी) में धार्मिक विष्यो पर वार्तालाप करने के लिए बुलाया 40 दिन वहां रहकर इन्होने अकबर से धार्मिक विषयों पर वार्तालाप किया। 

सुंदरदास जी दादु दयाल के शिष्य जिन्होने 42 ग्रन्थो की रचना की जिसमें ज्ञान समुद्र व सर्वयने दीपिका प्रसिद्ध है।


रज्जब जी :- 

● दादू के ये शिष्य जो आजीवन दुल्हे के वेश में रहे इन्होने वाणी व सवांगी रचनाएं लिखी। 

● इनका कहना था कि "यह संसार वेद है व सृष्टि कुरान है।"


एकमात्र संत जो राजस्थान से बाहर अपने सिद्धान्तो का प्रचार प्रसार करने गए । - धना जी।

’’आने वाले समय मे किसी भी व्यक्ति की जाति नही पुछी जायेगी।" - गुरू नानक


चैतन्य महाप्रभु :- 

● जन्म-1486, नदिया

● बचपन का नाम - विश्वंभर

● मृत्यु-1534,पुरी (उङिसा)

● इनके गुरू केशवभारती ने इन्हें चैतन्य नाम दिया।

● यह भक्तिधारा के प्रथम सन्त थे जिन्होने मूर्ति पूजा का समर्थन किया।

● इन्होने कीर्तन के माध्यम से भक्ति का सन्देश दिया।

● इन्होने गौडीय सम्प्रदाय की नींव डाली जिसे अचिन्त्य भेदाभेद सम्प्रदाय भी कहा जाता है।

● उडीसा के शासक प्रताप रन्द्र गजपति इनके शिष्य थे।

● इनकी दो उपाधिया थी :-

(1) गौराग महाप्रभु (2) विद्यासागर।

● इन्होने चैतन्य चरित्र और चैतन्य चरितामृत नामक ग्रन्थो की रचना की।


गुरू नानक :- 

● जन्म-1469ई. तलवंडी (पाकिस्तान में ) खत्री परिवार, 

● पिता-कालू

● माता-तृप्ता देवी

● इनकी मृत्यु 1539 ई. में करतारपुर (पाकिस्तान) में हुई।

इनका जन्म रावी नदी के किनारे स्थित तलवण्डी नामक गाँव में कार्तिकी पूर्णिमा को एक खत्रीकुल में हुआ था। 

● तलवण्डी पाकिस्तान में पंजाब प्रान्त का एक नगर है। 

● कुछ विद्वान इनकी जन्मतिथि 15 अप्रैल, 1469 मानते हैं। किन्तु प्रचलित तिथि कार्तिक पूर्णिमा ही है, जो अक्टूबर-नवम्बर में दीवाली के 15 दिन बाद पड़ती है। 

● इनके पिता का नाम मेहता कालूचन्द खत्री तथा माता का नाम तृप्ता देवी था। 

● तलवण्डी का नाम आगे चलकर नानक के नाम पर ननकाना पड़ गया। इनकी बहन का नाम नानकी था।

● बचपन से इनमें प्रखर बुद्धि के लक्षण दिखाई देने लगे थे। 

● लड़कपन ही से ये सांसारिक विषयों से उदासीन रहा करते थे। 

● पढ़ने-लिखने में इनका मन नहीं लगा। 7-8 साल की उम्र में स्कूल छूट गया क्योंकि भगवत्प्राप्ति के सम्बन्ध में इनके प्रश्नों के आगे अध्यापक ने हार मान ली तथा वे इन्हें ससम्मान घर छोड़ने आ गए।

● तत्पश्चात् सारा समय वे आध्यात्मिक चिन्तन और सत्संग में व्यतीत करने लगे। 

● बचपन के समय में कई चमत्कारिक घटनाएँ घटीं जिन्हें देखकर गाँव के लोग इन्हें दिव्य व्यक्तित्व मानने लगे। 

● बचपन के समय से ही इनमें श्रद्धा रखने वालों में इनकी बहन नानकी तथा गाँव के शासक राय बुलार प्रमुख थे।

● इनका विवाह बालपन मे सोलह वर्ष की आयु में गुरदासपुर जिले के अन्तर्गत लाखौकी नामक स्थान के रहने वाले मूला की कन्या सुलक्खनी से हुआ था। 

● 32 वर्ष की अवस्था में इनके प्रथम पुत्र श्रीचन्द का जन्म हुआ। चार वर्ष पश्चात् दूसरे पुत्र लखमीदास का जन्म हुआ। 

● दोनों लड़कों के जन्म के उपरान्त 1507 में नानक अपने परिवार का भार अपने ससुर पर छोड़कर मरदाना, लहना, बाला और रामदास इन चार साथियों को लेकर तीर्थयात्रा के लिये निकल पडे़।

● उन पुत्रों में से 'श्रीचन्द आगे चलकर उदासी सम्प्रदाय के प्रवर्तक हुए।

इन्होने सिक्ख पंथ की स्थापना की। 

● इन्होंने 30 वर्षो की अवधी में भारत का पांच बार ब्रमण किया जो उदासिस कहलाते है।

● इन्होने अपने सिद्धान्तो का  प्रचार करने के लिए श्रीलंका, अफगानिस्तान व मक्क-मदीना की यात्रा की।

नानक अपना उपदेष छोटी-2 कविताओं में दिया करते थे जिन्हे 5वें गुरू अर्जूनदेव ने गुरू ग्रन्थ साहिब में संकलित किया। 

● इन्होने कहा था कि आने वाले समय में कोई भी व्यक्ति अपनी जाति से नहीं पहचाना जायेगा।

● इन्होने मुसलमानों को सलाह दी कि दया को मस्जिद समझो।

● इन्हे भारत का किंग मार्टिन लूचर भी कहा जाता है।


मीरा बाई :-

● जन्म -1498 ई. कुडकी ग्राम (पाली/नागौर) 

● दादा-राव दूदा, 

● पिता-राव रतन सिंह

● ससुर-राणासांगा

● पति-भोजराज

मीराबाई का जन्म सन 1498 ई. में पाली के कुड़की गांव में में दूदा जी के चौथे पुत्र रतन सिंह के घर हुआ। 

मीराबाई बचपन से ही कृष्णभक्ति में रुचि लेने लगी थीं।

● इनका का विवाह मेवाड़ के सिसोदिया राज परिवार में हुआ।

● उदयपुर के महाराजा भोजराज इनके पति थे जो मेवाड़ के महाराणा सांगा के पुत्र थे। 

● विवाह के कुछ समय बाद ही उनके पति का देहान्त हो गया। पति की मृत्यु के बाद उन्हें पति के साथ सती करने का प्रयास किया गया, किन्तु मीरा इसके लिए तैयार नहीं हुईं। 

● पति की मृत्यु पर भी मीराबाई ने अपना श्रृंगार नहीं उतारा, क्योंकि वह गिरधर को अपना पति मानती थी।

● इनकी भक्ति भगवान कृष्ण के प्रति माधुर्य/कान्त भाव की थी तथा ये श्री कृष्ण को अपने प्रियतम के रूप् में पूजती थी।

● इनके गुरू का नाम रैदास था तथा रैदास जी की छतरी चितौङगढ दुर्ग में स्थित है

● इन्होने दासी सम्प्रदाय की स्थापना की तथा यह राजपूताने की एकमात्र महिला भक्ति संत है।

● इन्होने अपनी रचनाएं ब्रज गुजराती व राजस्थानी भाषा में की तथा इनके भक्ति गीतों को मीरा पदावली के नाम से जाना जाता है।

● इन्होने राग गोविन्दराग सोरठा की रचना की तथा इन्ही के निर्देशन में रत्नू खाती ने नरसि जी रो मायरो की रचना की।

● इनकी मृत्यु 1557 ई. में द्वारिका (गुजरात)में हुई।


इनकी तुलना सूफी संत रबिना से की जाती है जिन्होने भी ईश्वर को अपने पति के रूप में पूजा।


संतधन्ना :- 

● जन्म-धुवन गांव (टोंक)।

● गुरू  :- रामानन्द।

● इन्होने राजस्थान में भक्ति आन्दोलन का प्रणेता या संस्थापक कहा जाता है।

● इन्होने गृहस्थ जीवन में ईश्वर की निर्गुण भक्ति की।

● राजस्थान के एकमात्र संत है जिन्होने राज्य से बाहर जाकर भक्ति के सिद्धान्तो का प्रचार-प्रसार किया। 


तुलसीदास :- 

● जन्म 1532, राजापुर (यू.पी.) पत्नी - रत्नावली

● पुस्तक-रत्नावली, रामचरित मानस (अवधि-1574)

● इन्ही के कारण अकबर के काल को हिन्दी साहित्य का स्वर्णकाल कहा जाता है।

● इन्होने ईश्वर की सगुण भक्ति को स्वीकार किया तथा भगवान राम की भक्ति पर बल दिया।

● इनके गुरू का नाम नरहरिदास था।

● इन्होने विनय पत्रिका,कवितावली गीतावली पार्वती मंगल, जानकी मंगल व रामाज्ञा प्रश्न श्लाका की रचना की।

समर्थ गुरू रामदास :- 

● यह धरकरी सम्प्रदाय से समंबंधित थे।

● यह छत्रपति शिवाजी के आध्यात्मिक गुरू थें।

● इन्होने परमार्थ सम्प्रदाय की स्थापना की ।

माहाराष्ट्र में भक्ति आन्दोलन:-

● महाराष्ट्र में भक्ति आन्दोलन दो भागो में बंटा हुआ था। 

(1) बरकरी

● ये भगवान राम श्री कृष्ण या विटल के भक्त थे। 

(2) धरकरी

● ये भगवान राम के भक्त थे।

● महाराष्ट्र में भक्ति आन्दोलन पण्डरपुर के मुख्य देवता विट्टल के मन्दिर के चारों और केन्द्रित था।

● विट्टल के प्रमुख तीन भक्त थे  :- 

(1) ज्ञानदेव/ज्ञानेष्वर 

(2) नामदेव 

(3) तुकाराम।

(1) ज्ञानेष्वर/ज्ञानदेव :- 

● इन्हे महाराष्ट्र में भागवत धर्म का संस्थापक कहा जाता है।

● इन्हे बारकरी सम्प्रदाय भगवान विष्णु का 11वाँ अवतार मानता है।

● इन्होने मराठी भाषा में भगवत गीता पर ज्ञानेष्वरी नामक टीका लिखी।

● इन्होने चंगदेव प्रशस्ति और अम्रतानुभव ग्रन्थो की रचना की।

● संत ज्ञानेश्वर का जन्म ई. सन् 1275 में भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में पैठण के पास आपेगांव में हुआ था। उनके पिता का नाम विट्ठल पंत एवं माता रुक्मिणी बाई थीं। 

● बहुत छोटी आयु में ज्ञानेश्वर जी को जाति से बहिष्कृत होने के कारण नानाविध संकटों का सामना करना पड़ा। उनके पास रहने को ठीक से झोपड़ी भी नहीं थी। संन्यासी के बच्चे कहकर सारे संसार ने उनका तिरस्कार किया। लोगों ने उन्हें सर्वविध कष्ट दिए, पर उन्होंने अखिल जगत पर अमृत सिंचन किया। 

● वर्षानुवर्ष ये बाल भागीरथ कठोर तपस्या करते रहे। उनकी साहित्य गंगा से राख होकर पड़े हुए सागर पुत्रों और तत्कालीन समाज बांधवों का उद्धार हुआ। 

● भावार्थ दीपिका की ज्योति जलाई। वह ज्योति ऐसी अद्भुत है कि उनकी आंच किसी को नहीं लगती, प्रकाश सबको मिलता है। 

ज्ञानेश्वर जी के प्रचंड साहित्य में कहीं भी, किसी के विरुद्ध परिवाद नहीं है। क्रोध, रोष, ईर्ष्या, मत्सर का कहीं लेशमात्र भी नहीं है। समग्र ज्ञानेश्वरी क्षमाशीलता का विराट प्रवचन है। 

● महान संत ज्ञानेश्वर जी ने मात्र 21 वर्ष की उम्र में संसार का परित्याग कर समाधि ग्रहण की तथा 1296 ई. में उनकी मृत्यु हुई।

ज्ञानेश्वर ने मराठी भाषा में भगवद्‍गीता के ऊपर एक 'ज्ञानेश्वरी' नामक दस हजार पद्यों का ग्रंथ लिखा है। 

● 'ज्ञानेश्वरी', 'अमृतानुभव' ये उनकी मुख्य रचनाएं हैं। भारत के महान संतों एवं मराठी कवियों में संत ज्ञानेश्वर की गणना की जाती है।


(2) नामदेव :- 

● इनका जन्म एक दर्जी परिवार में हुआ तथा प्रारम्भ में यह एक डाकू थे।

● इन्होने मराठी भाषा में अनेक भक्ति गीतों की रचना की जिन्हे अभंगो के नाम से जाना जाता है।

● ये मूर्ति पुजा के विरोधी थे तथा इन्होने उपवास तीर्थयात्रा बलिदान और अन्य धार्मिक आडम्बरों की कटु आलोचना की।

● नामदेव कहते थे कि "एक पत्थर को पूजा जाता है। और दुसरे पत्थर को पैरो तले रौंदा जाता है। यदि एक पत्थर में भगवान है तो दुसरे पत्थर में भी भगवान है।"

● इनके भक्ति गीत पद गुरू ग्रन्थ साहिब में संकलित है।

नामदेव का जन्म शके 1192 में प्रथम संवत्सर कार्तिक शुक्ल एकादशी को नरसी ब्राह्मणी नामक ग्राम में दामा शेट शिंपी (छीपा) के यहाँ हुआ था।

● संत शिरोमणि श्री नामदेव जी ने विसोबा खेचर से दीक्षा ली। जो नामदेव पंढरपुर के "विट्ठल" की प्रतिमा में ही भगवान को देखते थे, वे खेचर के संपर्क में आने के बाद उसे सर्वत्र अनुभव करने लगे। उसकी प्रेमभक्ति में ज्ञान का समावेश हो गया। ● डॉ॰ मोहनसिंह नामदेव को रामानंद का शिष्य बतलाते हैं। 

● परन्तु महाराष्ट्र में इनकी बहुमान्य गुरु परंपरा इस प्रकार है -

ज्ञानेश्वर और नामदेव उत्तर भारत की साथ साथ यात्रा की थी। 

ज्ञानेश्वर मारवाड़ में कोलदर्जी नामक स्थान तक ही नामदेव के साथ गए। 

● वहाँ से लौटकर उन्होंने आलंदी में शके 1218 में समाधि ले ली। 

ज्ञानेश्वर के वियोग से नामदेव का मन महाराष्ट्र से उचट गया और ये पंजाब की ओर चले गए।

गुरुदासपुर जिले के घोभान नामक स्थान पर आज भी नामदेव जी का मंदिर विद्यमान है। वहाँ सीमित क्षेत्र में इनका "पंथ" भी चल रहा है। 

● संतों के जीवन के साथ कतिपय चमत्कारी घटनाएँ जुड़ी रहती है। 

नामदेव के चरित्र में भी सुल्तान की आज्ञा से इनका मृत गाय को जिलाना, पूर्वाभिमुख आवढ्या नागनाथ मंदिर के सामने कीर्तन करने पर पुजारी के आपत्ति उठाने के उपरांत इनके पश्चिम की ओर जाते ही उसके द्वार का पश्चिमाभिमुख हो जाना, विट्ठल की मूर्ति का इनके हाथ दुग्धपान करना, आदि घटनाएँ समाविष्ट हैं। 

● महाराष्ट्र से लेकर पंजाब तक विट्ठल मंदिर के महाद्वार पर शके 1272 में समाधि ले ली। 

● कुछ विद्वान् इनका समाधिस्थान घोमान मानते हैं, परंतु बहुमत पंढरपुर के ही पक्ष में हैं।

● एक दिन नामदेव जी के पिता किसी काम से बाहर जा रहे थे। उन्होंने नामदेव जी से कहा कि अब उनके स्थान पर वह ठाकुर की सेवा करेंगे जैसे ठाकुर को स्नान कराना, मन्दिर को स्वच्छ रखना व ठाकुर को दूध चढ़ाना। जैसे सारी मर्यादा मैं पूर्ण करता हूँ वैसे तुम भी करना। देखना लापरवाही या आलस्य मत करना नहीं तो ठाकुर जी नाराज हो जाएँगे।

नामदेव जी ने वैसा ही किया जैसे पिताजी समझाकर गए थे। जब उसने दूध का कटोरा भरकर ठाकुर जी के आगे रखा और हाथ जोड़कर बैठा व देखता रहा कि ठाकुर जी किस तरह दूध पीते हैं? ठाकुर ने दूध कहाँ पीना था? वह तो पत्थर की मूर्ति थे। नामदेव को इस बात का पता नहीं था कि ठाकुर को चम्मच भरकर दूध लगाया जाता व शेष दूध पंडित पी जाते थे। उन्होंने बिनती करनी शुरू की हे प्रभु! मैं तो आपका छोटा सा सेवक हूँ, दूध लेकर आया हूँ कृपा करके इसे ग्रहण कीजिए। भक्त ने अपनी बेचैनी इस प्रकार प्रगट की -

● हे प्रभु! यह दूध मैं कपला गाय से दोह कर लाया हूँ। हे मेरे गोबिंद! यदि आप दूध पी लेंगे तो मेरा मन शांत हो जाएगा नहीं तो पिताजी नाराज़ होंगे। सोने की कटोरी मैंने आपके आगे रखी है। पीए! अवश्य पीए! मैंने कोई पाप नहीं किया। यदि मेरे पिताजी से प्रतिदिन दूध पीते हो तो मुझसे आप क्यों नहीं ले रहे? हे प्रभु! दया करें। पिताजी मुझे पहले ही बुरा व निकम्मा समझते हैं। यदि आज आपने दूध न पिया तो मेरी खैर नहीं। पिताजी मुझे घर से बाहर निकाल देंगे।

● जो कार्य नामदेव के पिता सारी उम्र न कर सके वह कार्य नामदेव ने कर दिया। उस मासूम बच्चे को पंडितो की बईमानी का पता नहीं था। वह ठाकुर जी के आगे मिन्नतें करता रहा। 

● अन्त में प्रभु भक्त की भक्ति पर खिंचे हुए आ गए। पत्थर की मूर्ति द्वारा हँसे। 

● नामदेव ने इसका जिक्र इस प्रकार किया है -

ऐकु भगतु मेरे हिरदे बसै ।

नामे देखि नराइनु हसै ॥

● एक भक्त प्रभु के ह्रदय में बस गया। नामदेव को देखकर प्रभु हँस पड़े। हँस कर उन्होंने दोनों हाथ आगे बढाएं और दूध पी लिया। दूध पीकर मूर्ति फिर वैसी ही हो गई।

दूधु पीआई भगतु घरि गइआ ।

नामे हरि का दरसनु भइआ ॥ 

● दूध पिलाकर नामदेव जी घर चले गए। इस प्रकार प्रभु ने उनको साक्षात दर्शन दिए। यह नामदेव की भक्ति मार्ग पर प्रथम जीत थी।

● शुद्ध ह्रदय से की हुई प्रर्थना से उनके पास शक्तियाँ आ गई। वह भक्ति भव वाले हो गए और जो वचन मुँह निकलते वही सत्य होते


(3) तुकाराम :- 

● गुरु/शिक्षक :- बाबाजी चैतन्य

● दर्शन :- वारकरी, वैष्णव संप्रदाय

संत तुकाराम (1608-1650), सत्रहवीं शताब्दी एक महान सन्त  थे। जो भारत में लम्बे समय तक चले भक्ति आन्दोलन के एक प्रमुख स्तम्भ थे।

● ये जाति से सूद्र थे तथा छत्रपति शिवाजी के समकालीन थें।

● इन्होने पण्डरपुर में बारकरी सम्प्रदाय की स्थापना की।

● इन्होने शिवाजी से भेंट करने से इन्कार कर दिया था।

संत तुकाराम का जन्म 17वीं सदी में पुणे के देहू कस्बे में हुआ था। 

● वे तत्कालीन 'भक्ति आंदोलन' के एक प्रमुख स्तंभ थे। उन्हें 'तुकोबा' भी कहा जाता है। 

● तुकाराम को चैतन्य नामक साधु ने 'रामकृष्ण हरि' मंत्र का स्वप्न में उपदेश दिया था। 

● वे विट्ठल यानी विष्णु के परम भक्त थे। 

● तुकराम की अनुभव दृष्टि बेहद गहरी व ईशपरक रही, जिसके चलते उन्हें कहने में संकोच न था कि उनकी वाणी स्वयंभू, ईश्वर की वाणी है। 

● उनका कहना था कि दुनिया में कोई भी दिखावटी चीज नहीं टिकती। झूठ लंबे समय तक संभाला नहीं जा सकता। 

● झूठ से सख्त परहेज रखने वाले तुकाराम को संत नामदेव का रूप माना गया है। इनका समय सत्रहवीं सदी के पूर्वार्द्ध का रहा। 

● दुनियादारी निभाते एक आम आदमी संत कैसे बना, साथ ही किसी भी जाति या धर्म में जन्म लेकर उत्कट भक्ति और सदाचार के बल पर आत्मविकास साधा जा सकता है। 

● यह विश्वास आम इंसान के मन में निर्माण करने वाले थे संत तुकाराम (तुकोबा) अपने विचारों, अपने आचरण और अपनी वाणी से अर्थपूर्ण तालमेल साधते अपनी जिंदगी को परिपूर्ण करने वाले तुकाराम जनसामान्य को हमेशा कैसे जीना चाहिए, यही प्रेरणा देते हैं।


संत शंकर देव असम के भक्ति संत थे जो भगवान श्री कृष्ण के भक्त थें परन्तु भगवान श्री कृष्ण की मूर्ति पूजा के विरोध के विरोधी थें।

नरसि मेहता गुजरात के प्रसिद्ध संत थे। इन्होंने वैष्णव जन तो ते ने कहिए नामक गीत की रचना की। 


       DOWNLOAD



एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ