राजस्थान की राजनीतिक एवं प्रशासनिक व्यवस्था notes Hindi

 

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राज्य की कार्यपालिका

● दोहरी कार्यपालिका [कारण:- संसदीय शासन प्रणाली) 

1. राज्यपाल (नाम मात्र)

2. मंत्रिपरिषद, मुख्यमन्त्री (वास्तविक)

राज्यपाल (केन्द्र का प्रतिनिधी ,संवैधानिक प्रधान)

अनुच्छेद 153

● अनुच्छेद 153 के अनुसार एक राज्य का एक राज्यपाल होगा किन्तु, एक से अधिक राज्यों का भी एक राज्यपाल हो सकता है।

(7वें संविधान संसोधन 1956 के द्वारा एक व्यक्ति एक से अधिक राज्यों का राज्यपाल हो सकता है।)

अनुच्छेद 154

● राज्य की कार्यपालिका शक्तियाँ राज्यपाल में निहीत है तथा राज्ययाल इसका प्रयोग अपने अधीनस्थो के माध्यम से संविधान के अनुरूप करेगा। 

अधीनस्थान 

● मंत्रिपरिषद 

● नौकरशाही  

अनुच्छेद 155 

नियुक्ति 

● राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है।

 चयन

● राज्यपाल का चयन संघ सरकार करती है।


(नोट - यह पद भारत शासन अधिनियम 1935 से प्रेरित है।

● नियुक्ति प्रक्रिया कनाडा से ली गई है।)


अनुच्छेद156

कार्यकाल

● शपथ ग्रहण से 5 वर्ष तक के लिए 

● राष्ट्रपति के प्रसाद पर्यन्त

● जब तक इसका उत्तराधिकारी नहीं आता है तब तक अपने पद पर बना रहता है।


● यदि राज्यपाल का पद अचानक रिक्त हो जाए तो सम्बन्धित राज्य के हाई कोर्ट का मुख्य न्यायधीश को कार्यवाहक राज्यपाल नियुक्त किया जा सकता है।

● राज्यपाल राष्ट्रपति को अपना त्यागपत्र देगा।


अनुच्छेद 157 

योग्यताएँ 

● भारत का नागरिक

● 35 वर्ष या इससे अधिक आयु


● सम्बन्धित राज्य का नागरिक या स्थायी निवासी नहीं होना चाहिए।

● सम्बन्धित राज्य के मुख्यमन्त्री से परामर्श किया जाता है।

अनुच्छेद 158

शर्ते (राज्यपाल बनने के लिए)

● संसद या विधान मण्डल का सदस्य नहीं होना चाहिए।

● लाभ का पद स्वीकार नहीं करेगा 

● इसको राजकीय निवास, वेतन, भत्ते मिलेंगे

● इनके वेतन मे कमी नहीं कर सकते बढ़ा सकते हैं।

● यदि राज्यपाल एक से अधिक राज्यों का राज्यपाल है तो, उसके वेतन एवं कार्य का निर्धारण राष्ट्रपति द्वारा किया जायेगा।

अनुच्छेद 159

राज्यपाल की शपथ

● ईश्वर को साक्षी मानकर संविधान और विधि का परिरक्षण, संरक्षण और प्रतिरक्षण करूॅंगा 

● राज्यपाल को शपथ उच्च न्यायालय (H.C) का मुख्य न्यायधीश दिलाता है। 

● राष्ट्रपति द्वारा नियुक्ति पत्र जारी किया जाता है जिसे अधिपत्र कहते हैं

● अधीपत्र को मुख्य सचिव पढ़कर सुनाता है।

कार्य एवं शक्तियाँ

राज्यपाल के पास निम्न शक्तिया है -

● कार्यपालिका शक्तियाँ कार्यकारी 

● विद्यायी व्यवस्थापन शक्तियां

● न्यायिक शक्तियां 

● वित्तिय शक्तियां

● विवेक की शक्तियाँ

अनुच्छेद 164

नियुक्तियां 

● मुख्यमन्त्री की नियुक्ति करता है।

● मुख्यमन्त्री की सलाह पर मंत्रिपरिषद का गठन करता है।

● अनुच्छेद 315 के तहत राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष व सदस्यों की नियुक्ति 

● लोक आयुक्त 

● अनुच्छेद 243 (K) के तहत राज्य निर्वाचन आयुक्त

● सभी सरकारी विश्वविद्यालयो के कुलपतियों को

● राज्य महिला आयोग अध्यक्ष 

● राज्य मानव अधिकार आयोग अध्यक्ष

● राज्य बाल संरक्षण आयोग अध्यक्ष 

● राज्य सूचना आयोग अध्यक्ष

● राज्य के महाधिवक्ता की नियुक्ति


अनुच्छेद 166

● राज्यपाल राज्य के लिए विभिन्न विभागों के मात्रियों के कार्य के बटवारे हेतु आवश्यक नियम निर्मित करवाता है।

अनुच्छेद 167

● मुख्यमन्त्री समय समय पर सरकार की गतिविधियों के बारे में राज्यपाल की अवगत करवाएगा ।

● यदि राज्यपाल किसी प्रशासनिक गतिविधी के बारे में सूचना प्राप्त करना चाहता है तो मुख्यमन्त्री को बोल सकता है। मन्त्री के द्वारा लिए गए निर्णय को मुख्यमन्त्री के माध्यम से मन्त्रिपरिषद के समक्ष रखवाता है।


राज्यपाल की विधायी शक्तियाँ

अनुच्छेद 174

● विधानमण्डल का सत्र बुलाता है तथा सत्र समाप्त करता है, विधानसभा को भंग करता है।

अनुच्छेद 175 

● विधानसभा मे अभिभाषण व संदेश भेजने का अधिकार राज्यपाल के पास होता है।

● विधान सभा में एग्लो इण्डियन व विधान परिषद में 1/6 सदस्यों को मनोनित करता है।(मुख्यमन्त्री व मन्त्रिपरिषद की सलाह से)

ये सदस्य निम्न क्षेत्र से संबंधित होने चाहिए -

● कला क्षेत्र

● विज्ञान

● साहित्य

● समाजसेवा

● सहकारिता

अनुच्छेद 200

● विधेयक पर अनुमति देता है।

● विधेयक पर अनुमति नहीं देता है।

अनुच्छेद 213

● जब विधान मण्डल का सत्र नही चला रहा हो तब अध्यादेश

● राज्य वित्त आयोग राज्य लोक सेवा आयोग, राज्य की अंकेक्षण रिपोर्ट सदन में प्रस्तुत करता है।

न्यायिक शक्तियाँ


● महाधिवक्ता की नियुक्ति (अनुच्छेद 165)

● उच्च न्यायालय के न्यायधीशों की नियुक्ति के सम्बन्ध मे राष्ट्रपति राज्यपाल से परामर्श करता है।

● अधीनस्थ न्यायालयों में न्यायधीशों की नियुक्ति उच्च न्यायालय की सलाह पर करता है।

अनुच्छेद 161 

● क्षमादान की शक्तियां होती है लेकिन कोर्ट मार्शलव मृत्युदण्ड के मामलों मे निर्णय नहीं लेता है।

वित्तिय शक्तियाँ

● प्रतिवर्ष विधानसभा में बजट पेश करवाता है।

● राज्य की आस्कमिक निधि पर नियंत्रण रखता है। 

● विधानसभा में वित्त (वधेयक रखने की अनुमति देता है। 

● राज्य वित्त आयोग का गठन करेगा। (अनु. 243 (i)

● विधानसभा में अनुदान की मांग रखने की सिफारिश करता है।


विवेक की शक्तियां

● अनुच्छेद 163 (i) राज्यपाल की विवेक की शक्तियों को न्यायालय में चुनौति नहीं दी जा सकती है।

● अनुच्छेद 163 (ii) मन्त्रिपरिषद ने क्या सलाह दी है इससे प्रश्नगत नहीं किया जा सकता है। 

● मुख्यमन्त्री की नियुक्ति के सम्बन्ध मे जब विधानसभा में बहुमत ना हो।

● विधान सभा को भंग कर सकता है।

● मन्त्रिपरिषद को भंग कर सकता है।

● विधानसभा का सत्र बुला सकता है।

● अनुच्छेद 356 के तहत राज्य में राष्ट्रपति शासन की सिफारिश करता है।

● मुख्यमन्त्री के विरुद्ध मुकदमे की अनुमति देता है।


नोट:- संविधान में विवेक की शक्तियों को केवल राज्यपाल को दिया गया है राष्ट्रपति के पास कार्य स्वतन्त्रता की शक्तियां होती है।


राज्यपाल के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण कथन 

● पहली महिला राज्यपाल सरोजनी नायडु थी जिन्होने कहा था "सोने के पिंजरे में चिडिया कैद है"।

● श्रीमती विजय लक्ष्मी पाण्डत ने कहा था जिसको वेतन का आकर्षण है वही इस पद को स्वीकार करता है।

● श्री प्रकाश शाह ने कहा था राज्यपाल का काम केवल इतना है कि जहां शून्य स्थान है वहां हस्ताक्षर करने होते हैं। 

● एम.पी. पायली ने राज्यपाल के पद को महत्वपूर्ण मानते हुए लिखा राज्यपाल एक सूझ बूझ वाला परामर्शदाता तथा राज्य में शान्ति का महत्वपूर्ण स्तम्भ है।

अन्य महत्वपूर्ण बातें :-

राज प्रमुख का पद

● मानसिंह (30 मार्च 1948 - 31 अक्टूबर 1956)

राजस्थान में प्रथम राज्यपाल

● श्री गुरुमुख निहाल सिंह (1958)

राजस्थान में अनुच्छेद 356 का प्रयोग

● राजस्थान में 4 बार राष्ट्रपति शासन लगाया गया है। 

1. 13 मार्च 1967 से 26 अप्रेल 1967

 राज्यपाल - डॉ सम्पूर्णानन्द 

2. 30 अप्रेल 1977 से 21 जून 1977 

राज्यपाल - वेदयाल त्यागी

3. 17 फरवरी 1980 से 5 जून 1980 

राज्यपाल - रघुकुल तिलक

4. 5 दिसंबर 1992 से 4 दिसंबर 1993

राज्यपाल - एम चे रेड्डी

राजस्थान में 3 महिला राज्यपाल बनी है।

● प्रतिभा देवी पाटिल - 2004-2007

● श्रीमती प्रभा राव - 2010 - 2010

● श्रीमती मार्गेट आलवा - 2012 - 2014

राजस्थान में राज्यपाल के पद पर रहते हुए 4 राज्यपालो की मृत्यु हुई है।

● दरबारा सिहॅ - 1998 

● निर्मल चन्द्र जैन - 2003

● शिलेन्द्र कुमार सिंह - 2009

● श्रीमती प्रभा राव - 2010

राजस्थान में वर्तमान राज्यपाल

● कलराज मिश्र (9 सितम्बर 2019 से अब तक)


मुख्यमन्त्री

● विधान सभा में बहुमत दल के नेता को राज्यपाल मुख्यमन्त्री के रूप में नियुक्त करता है।(अनुच्छेद 164)

● सर्वप्रथम मुख्यमन्त्री पद 24 जनवरी 1950 को सृजित किया गया।

● मुख्यमन्त्री की नियुक्ति होती है न की निर्वाचन, मनोनयन 

● राज्यपाल मुख्यमन्त्री को पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाता है। 

कार्यकाल

● अनिश्चित

● राज्यपाल के प्रसाद पर्यन्त

● समयानुसार 5 वर्ष

● विधानसभा में बहुमत होने तक पद रहता हो

योग्यताएँ 

● भारत का नागरिक 

● आयु = 25 वर्ष

● विधानसभा का सदस्य बनने की योग्यता रखता हो।

मुख्यमन्त्री के कार्य एवं शक्तियाँ

मन्त्रीपरिषद के सन्दर्भ में

● मन्त्रिपरिषद के गठन हेतू राज्यपाल को सलाह देता है। 

● मन्त्रिपरिषद के सदस्यों के मध्य विभागों का बँटवारा करता है उनमें फेरबदल करता है।

● मन्त्रिपरिषद की बैठकों की अध्यक्षता करता है।

● मन्त्री से मतभेद की स्थिति में त्यागपत्र मांग सकता है।

नोट - यदि मन्त्री त्यागपत्र न दे तो उसे राज्यपाल से बर्खास्त करवा सकता है।

● मन्त्रिपरिषद को निर्देशित व समन्वित करता है उनका सहयोग करता है मार्गदर्शन करता है।

● मुख्यमन्त्री के त्यागपत्र पर मन्त्रिपरिषद भंग हो सकती है। अर्थात मन्त्रिपरिषद भंग हो जाती है!

राज्यपाल के सन्दर्भ में

● अनुच्छेद 167 - मुख्यमन्त्री का कर्तव्य है कि वो समय समय पर सरकार की गतिविधियों के बारे में राज्यपाल को अवगत कराए।

राज्य में सर्वोच्च पदाधिकारियों की नियुक्ति के सम्बंध में राज्यपाल को सलाह देता है -

● महाधिवक्ता

● राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष व सदस्य

● लोक आयुक्त

● राज्य निर्वाचन आयुक्त

● राज्य महिला आयोग अध्यक्ष

● राज्य मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष

मुख्यमन्त्री, राज्य विधान मण्डल के साथ

● सदन का नेता

● विधान मण्डल का सत्र बुलाने के लिए राज्यपाल को सलाह देता है व सत्र समाप्त करता है।

● वह राज्यपाल को किसी भी समय विधान मण्डल भंग करने की सलाह देता है।

● सदन के पटल पर सरकारी नीतिया रखता है।

अन्य शक्तियाँ:

● नियोजन बोर्ड की अध्यक्षता

● अन्तर्राज्यीय परिषद में प्रतिनिधित्व

● क्षेत्रीय परिषद में अध्यक्ष के रूप में जब भूमिका दी जाए तब नीति आयोग की शासी परिषद में राज्य का प्रतिनिधित्व करता है।

● राज्य सरकार का मुख्य प्रवक्ता होता है।

अन्य महत्वपूर्ण तथ्य (राजस्थान के मुख्यमन्त्री के संदर्भ में)  :-

● प्रथम मुख्यमन्त्री - हीरालाल शास्त्री (मनोनित)

● प्रथम निर्वाचित मुख्यमन्त्री - टीकाराम पालीवाल

● निर्वाचित व मनोनित दोनो  - जयनारायण व्यास

● सबसे लम्बा कार्यालय - मोहनलाल सुखाडिया (13नवम्बर 1954 से 8 जुलाई 1977)

● पद पर रहते हुए मृत्यु - बरकतुल्ला खाँ

● प्रथम अल्पसंख्यक - बरकतुल्ला खाँ

● सबसे छोटा कार्यकाल - हीरालाल देवपुरा (23 फरवरी 1985 से 1 मार्च 1985 तक)

● राजस्थान की पहली महिला मुख्यमन्त्री - वसुन्धरा राजे सिंधिया

राजस्थान में अब तक 4 बार राष्ट्रपति शासन लगा है -

1. 13 मार्च 1967 26 अप्रैल 1967

2. 29 अगस्त 1973 - 22 जून 1977

3. 16 मार्च 1980 - 6 जून 1980

4. 15 दिसम्बर 1992 - 4 दिसम्बर 1993


राज्य मन्त्रिपरिषद

● अनुच्छेद 164 राज्यपाल मुख्यमन्त्री की सलाह पर मन्त्री परिषद का गठन करेगा।

● मन्त्रियों की नियुक्ति : राज्यपाल द्वारा

● पद एवं गोपनीयता की शपथ : राज्यपाल द्वारा

● कार्यकाल : अनिश्चित

नोट : उडीसा, झारखण्ड, छत्तीसगट, M.P में जनजातीय मन्त्री को नियुक्त करेगा।

● अनुच्छेद 164 (i) क :- मन्त्रिपरिषद में अधिकतम सदस्य विधान सभा की कुल सदस्य संख्या का 15% या न्यूनतम 12 सदस्य मन्त्री होते हैं। [91 वां संविधान संसोधन 2003]

● दल बदल के आधार पर अयोग्य घोषित व्यक्ति जब तक पुन: निर्वाचित होकर नहीं आएगा तब तक उसे मन्त्री नहीं बनाया जा सकता है।

● सामूहिक उत्तरदायीत्व : विधान सभा के प्रति

● व्यक्तिगत उत्तरदायित्व : राज्यपाल के प्रति

● यदि विधान मण्डल का सदस्य नहीं है तो 6 माह तक मन्त्री बन सकता है।

● वेतन एवं भन्ते विधान मण्डल निर्धारित करती है।

● अनुच्छेद 163 (3) :- विधिक उत्तरदायित्व

● मन्त्री की भूमिका को लेकर न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है।

● मंत्री परिषद : मुख्यमन्त्री, केबिनेट मन्त्री, राज्य मंत्री और उपमन्त्री से मिलकर बनता है।


 मंत्रिपरिषद

● मुख्यमन्त्री 

● केबिनेट (मन्त्रिमण्डल)

● राज्य मन्त्री (स्वतन्त्र प्रभार, अधिनस्थ)

● उप मन्त्री

मंत्रिमंडल

● मुख्यमन्त्री 

● केबिनेट मंत्री 

● राज्यमन्त्री (स्वतन्त्र प्रभार)


नोट : संसदीय सचिव का उल्लेख भारत के संविधान में कहीं नहीं है।


मंत्रिपरिषद 

● मन्त्रिमण्डल इसका भाग होता है।

● इनकी संख्या विधानसभा के कुल सदस्यों का 15% से अधिक नही हो सकती।

● इसकी बैठक 3 माह में एक बार होती है। 

● निर्णय की औपचारिकता निभाते हैं

मंत्रिमंडल

● मन्त्रिपरिषद इसका भाग नही है।

● इनकी संख्या विधानसभा के कुल सदस्यों का 15% से अधिक नही हो सकती। इसमें ऐसी कोई व्यवस्था नहीं होती है। 

● इसकी बैठक सप्ताह में एक बार होती है। ·

● वास्तविक निर्णय लेता है।

राज्य विधान मण्डल

अनुच्छेद 168

राज्य विधानमण्डल

● राज्यपाल

● राज्य विधान परिषद

● राज्य विधान सभा

● प्रत्येक राज्य में एक विधानमण्डल होगा लेकिन जिन राज्यों में केवल एक सदन (विधानसभा) है वहां -

राज्यपाल + विधानसभा = विधान मण्डल


राजस्थान विधानसभा 

प्रथम विधानसभा

● गठन - 29 Feb 1952

● प्रथम बैठक - 23 मार्च 1952

● कुल सदस्य संख्या - 160

● प्रथम विधान सभा अध्यक्ष - श्री नरोत्तम लाल जोशी 

● उपाध्यक्ष : श्री लाल सिंह शक्तावत

● विपक्ष के नेता - जसवन्त सिंह (बीकानेर)

● प्रथम महिला विधायक - यशोदा देवी (बांसवाडा), प्रजा समाजवादी पार्टी

● वर्तमान मे कुल सदस्य संख्या - 200 सीट (अनुच्छेद 332)

● SC - 34 सीट

● ST - 25 सीट

दूसरी विधानसभा

● गठन - 2 अप्रैल 1958

● समय - 2 अप्रैल 1958 से 1962 तक 

● सदस्य - 176 

● राजनीतिक दल - कांग्रेस, राम राज्य परिषद, जन संघ

● विधान सभा अध्यक्ष - रामनिवास मिर्धा 

● मुख्यमन्त्री - मोहनलाल सुखाडिया 

तीसरी विधानसभा 

● गठन - 1962

● समय - 1962-1967 

● विधानसभा अध्यक्ष - रामनिवास मिर्धा

● मुख्यमन्त्री - मोहनलाल सुखाडिया

● इस विधानसभा में एक नई राजनीतिक पार्टी स्वतन्त्र पार्टी शामिल थी इसके अलावा कांग्रेस व जनसंघ ।

चौथी विधानसभा 

● गठन - 1967

● समय - 1967-1972

● सदस्य संख्या - 184

● विधानसभा अध्यक्ष - आचार्य निरंजन नाम

● इस विधान सभा में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नही मिला इस कारण राष्ट्रपति शासन लागू किया गया था । 

● स्वतंन्त्र पार्टी व जनसंघ ने मिल कर डुगरपुर के महारावल लक्ष्मण सिंह के नेतृत्व में सरकार बनाने का दावा पेश किया लेकिन अन्ततः मोहनलाल सुखाडिया के नेतृत्व में कांग्रेस ने सरकार का गठन किया बाद में बरकतुल्ला खां मुख्यमन्त्री बने

● मोहनलाल सुखाड़िया चौथी बार मुख्यमन्त्री बने।

● इसी विधानसभा के दौरान राज्यमन्त्री व संसदीय सचिव का पद सृजित किया गया।


पाँचवी विधानसभा

● गठन - 1972

● समय - 1972-1977

● विधानसभा अध्यक्ष - रामकिशोर व्यास

● मुख्यमन्त्री - बरकतुल्ला खान व हरदेव जोशी

● इस विधानसभा का कार्यकाल 5 वर्ष से अधिक रहा था।

छठी विधानसभा 

● गठन - 1977

● समय - 1977-1980

● सदस्य संख्या - 200

● मुख्यमन्त्री - भैरोंसिंह शेखावत

● विधानसभा अध्यक्ष - महारावल लक्ष्मण सिंह

● राजनीतिक दलों में जनता पार्टी शामिल हुआ।

● पहली बार राजस्थान में गैर कांग्रेसी सरकार का गठन हुआ।

● यह विधानसभा समय से पहले भंग हो गई। 

● इसी समय राजस्थान में तीसरी बार राष्ट्रपति शासन लगा।

सातवी विधानसभा

● गठन - 1980

● समय - 1980 से 1985

● राजस्थान में पहली बार मध्यावधी चुनाव हुए।

● कांग्रेस को इसमें 133 सीटे मिली।

● मुख्यमन्त्री - इस विधान सभा में तीन मुख्य मन्त्री बने 1. जगन्नाथ पहाडीया 2. शिवचरण माधुर 3. हीरालाल देवपुरा 

● विधानसभा अध्यक्ष - पूनम चन्द्र विश्नोई

पहली बार दलित व्यक्ति जगन्नाथ पहाडीया मुख्यमन्त्री बने।

आठवी विधानसभा

● गठन - 1985

● समय - 1985 से 1990

● अध्यक्ष - गिरिराज प्रसाद तिवाडी 

● मुख्यमन्त्री - हरीदेव जोशी, शिवचरण माथुर

नवीं विधानसभा

● गठन - 1990

● समय - 1990 से 1992

● अध्यक्ष - हरिशंकर भाखड़ा 

● मुख्यमन्त्री - भैरोसिंह शेखावत

● दूसरी बार किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नही मिला 

● इस विधानसभा में भाजपा व जनता दल की सरकार बनी।

● दूसरी बार गैर कांग्रेसी सरकार का गठन हुआ।

● यह दूसरी विधान सभा है जो समय से पूर्व भंग हो गई थी।

दसवी विधानसभा

● गठन - 1993

● समय - 1993 से 1998

● अध्यक्ष - (i) हरिशंकर भाखड़ा (ii) शान्तिलाल चपलोत

● मुख्यमन्त्री - भैरोसिंह शेखावत

● इसमें भी किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं हुआ फिर भी B.J.P के नेतृत्व में मिली जुली सरकार बनी।

● लगातार 10 विधानसभा चुनाव जीतने वाले सम्पूर्ण देश के एकमात्र विद्यायक - हरिदेव जोशी

ग्यारवी विधानसभा

● गठन - 1998

● समय - 1998 से 2003

● अध्यक्ष - परसराम मदेरणा

● मुख्यमन्त्री - अशोक गहलोत

बारहवीं विधानसभा

● गठन - 2003

● समय - 2003 से 2008

● अध्यक्ष - सुमित्रा सिह

● मुख्यमन्त्री - वसुन्धरा राजे सिधिया

● पहली बार B.J.P को स्पष्ट बहुमत प्राप्त हुआ।

● इस विधानसभा से राजस्थान में पहली बार महिला मुख्यमन्त्री वसुन्धरा राजे सिधिया बनी 

● इसी विधानसभा में पहली महिला विधानसभा अध्यक्ष सुमित्रा सिह बनी 

● इस विधानसभा में पहली बार महिला राज्यपाल श्रीमती प्रतिभा पाटिल बनी।

तेरहवीं विधानसभा

● गठन - 2008

● समय - 2008 से 2013

● अध्यक्ष - सुमित्रा सिह

● मुख्यमन्त्री - अशोक गहलोत

● विधानसभा अध्यक्ष : दीपेन्द्र सिंह शेखावत

● इस विधानसभा में भी किसी दल को स्पष्ट बहुमत नही मिला।

● कांग्रेस ने निर्दलीय व बसपा विधायको के साथ मिलकर अशोक गहलोत के नेतृत्व में सरकार बनाई।

● इस विधान सभा में पहली बार सर्वाधिक महिला विद्यायक जीतकर आई 

चौदवीं विधानसभा 

 ● गठन - 2013

● समय - 2013 से 2018

● अध्यक्ष - कैलाश मेघवाल

● मुख्यमन्त्री - वसुन्धरा राजे सिधिया

● विपक्ष का नेता - रामेश्वर डूडी

(विपक्ष के नेता को मन्त्री का दर्जा प्राप्त होता है।)

● भाजपा मोदी लहर के कारण प्रचण्ड 163 विधायको के साथ सत्ता में आई 

● वसुन्धरा राजे सिधिया दूसरी बार मुख्यमन्त्री बनी।

विधानसभा : मानसिंह टाउन हॉल नवीन विधानसभा भवन का उदघाटन 6 नवम्बर 2001 क़ो राष्ट्रपति K. R नारायणन के द्वारा किया गया इस विधानसभा के निर्माण में करौली, जोधपुर, बंसी पहाडपुर के इमारती पत्थर का प्रयोग किया गया इस इमारत में चार प्रमुख द्वार है।

1. जयपुर शैली उत्तर

2. मारवाड शैली दक्षिण

3. मेवाड शैली पश्चिम 

4. शेखावाटी शैली पूर्व

 पंद्रवी विधानसभा 

 ● गठन - 2018

● समय - 2018 से 2023

● अध्यक्ष - सी पी जोशी 

● मुख्यमन्त्री - अशोक गहलोत 

● विपक्ष का नेता - गुलाब चंद कटारिया 

● उपनेता प्रतिपक्ष - राजेंद्र राठौड़


नोट 16वीं विधान सभा के चुनाव दिसम्बर 2023 में होंगे।


राजस्थान में द्विदलीय व्यवस्था का कारण

● राजस्थान का मतदाता परिपक्व मानसिकता रखता है। 

● प्रारम्भ से ही प्रभावी विपक्ष की भूमिका

● राजस्थान में क्षेत्रीय मुद्दो का अभाव हो

● सहज भाव से यदि कोई दल गठित हो जाता है तो मतदाता गंभीरता से नही लेते हैं।

सचिवालय

● सचिवालय की स्थापना राजस्थान में 1949 में हुई।

● स्थान - सी स्कीम जयपुर

● भवन का नाम - भगवत्त दास बैरेक्स

सचिवालय व्यवस्था का ऐतिहासिक परिपेक्ष

● 1756 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के कार्यों को पूर्ण करने के लिए फोर्ट विलियम में कार्यालय स्थापित किया गया ।

● यह गवर्नर को सहयोग देने के लिए कुछ सचिवों की नियुक्ति की गई थी।

● 1773 रेग्युलेटिंग एकट के माध्यम से केन्द्रिय शासन की नींव रखी गई जिसमें (1)गवर्नर जनरल और (2)4 सदस्य कार्यकारी परिषद का गठन किया गया।

● कार्यकारी परिषद को सलाह देने के लिए सचिवों की नियुक्ति की गई। तथा इसको इम्पीरीयल सचिवालय कहा गया। 

● 1843 में केन्द्र एवं राज्यों के सचिवालय को पृथक किया गया तथा सबसे पहले बंगाल प्रान्त में राज्य सचिवालय की स्थापना की गई।

सचिवालय

● राज्य सरकार के समस्त विभागों के राजनैतिक एवं प्रशासनिक कार्य पालक जहां सम्मिलित रूप से बैठते है उसे राज्य शासन सचिवालय कहा जाता है।

● इस कार्य स्थल पर नीति व कानून का निर्धारण किया जाता है तथा मन्त्रियों को सहयोग प्रदान किया जाता है।

राजनीतिक संरचना

● मुख्यमन्त्री

● केबिनेट मन्त्री

● राज्य मन्त्री

● उप मन्त्री

● संसदीय सचिव

प्रशासनिक संरचना

● मुख्य सचिव

● अतिरिक्त मुख्य सचिव (11)

विभाग

● 67 बनाए गए हैं।

● शासन सचिव

● अतिरिक्त सचिव | विशिष्ट सचिव

● संयुक्त सचिव

● उप सचिव

● सहायक सचिव

अधीनस्थ कर्मचारी

● अनुभाग अधिकारी

● कार्यालय अधीक्षक

● लिपिक

● L.D.C

● U.D.C

● सहायक कर्मचारी

● मंत्रालयिक कर्मचारी

● आसुलिपिक / टंकन 

● चतुर्थ श्रेणी 

● सफाई कर्मचारी

● किसी विभाग में कितने अधीनस्थ कर्मचारी संलग्न होगे यह उस विभाग की कार्य प्रगति पर निर्भर करता है।

● इस विभाग में किस स्तर का मन्त्री होगा और वे किन किन कार्यों का निर्वहन करेगा इसका उल्लेख इस में होता है।

● सम्बन्धित विभाग में मन्त्री द्वारा अपने अधीनस्थ एवं अधिकारियों एवं कर्मचारियों के कार्यों एवं उत्तरदायित्व का निर्धारण Standing order के माध्यम से किया जाता है। 

● सचिवालय के कार्यो में एकरूपता लाने के लिए सचिवालय मैन्यूअल होता है।

● सचिवालय एक सलाहकार (staff agency) है।

● सचिवालय में निम्न सेवाओं से अधिकारी व कर्मचारी आते हैं :-

1. I.A.S (भारतीय प्रशासनिक सेवा) 

2. R.A.S (राजस्थान प्रशासनिक सेवा)

3. R. Ac.S (राजस्थान अकाउन्ट सेवा) 

4. R.H.J.S (राजस्थान उच्च न्यायिक सेवा)

5. राजस्थान राज्य मन्त्रालयिक सेवा

6. तकनीकी सेवा (वन, चिकित्सा, अभियांत्रिकी)


सचिवालय के कार्य :-

● सरकार की नीतियों का निर्माण करवाना और उनके मध्य तालमेल बनाए रखना।

● राज्य के बजट निर्माण में सहायता करना एवं सार्वजनिक खर्चे पर नियंत्रण रखना।

● क्षेत्रीय कार्यालयों पर नियंत्रण रखना।

● केन्द्र सरकार के मन्त्रालयो के साथ समन्वय बनाए रखना 

● राज्य के लिए सूचना भण्डार के रूप में कार्य करना।

● राज्य की जनता की शिकायतों व अपील को सुनना व निराकरण करना।

मुख्य सचिव

● मुख्य सचिव वरिष्ठ I.A.S आहधकारी होता है।

● यह मुख्यमन्त्री की पसन्द का व्यक्ति होता है।

● राज्य प्रशासन का मुखिया होता है।

● राज्य प्रशासन का किंगपिन 

● राज्य लोक सेवा का नेतृत्व करता है।

● मुख्य सचिव का स्तर केन्द्र मे मंत्रालय के सचिव के बराबर होता है।

● राजस्थान में मुख्य सचिव की नियुक्ति 1949 से 1958 तक केन्द्र सरकार द्वारा की जाती थी।

● प्रथम मुख्य सचिव - के राधाकृष्णन

● मुख्यमन्त्री द्वारा निर्वाचित प्रथम मुख्य सचिव बी.एस मेहता थे जिन्हें मुख्यमन्त्री मोहनलाल सुखाडिया ने चुना था।

मुख्य सचिव का चयन :-

● वरिष्ट भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों में से राज्य के मुख्यमन्त्री द्वारा चयन होता है।

चयन के आधार

● प्रशासनिक सेवा का लम्बा अनुभव हो।

● असाधारण प्रतिभा व आकर्षक व्यक्तित्व हो

● मुख्य मन्त्री का विश्वास पात्र हो।

मुख्य सचिव का पद ना तो राजनीतिक है और ना ही सवैधानिक, यह एक अधिकारिक पद है।

कार्यकाल 

● जबतक इसकी सेवा का काल बचा हो तब तक।

● प्रशासनिक सुधार आयोग ने 3-4 वर्ष करने की सिफारिश की थी।

● पहला प्रशासनिक सुधार आयोग 1966 में मोरारजी देसाई की अध्यक्षता में आया था।

● मोरारजी देसाई के त्यागपत्र के बाद बी. बी. एल माथुर ने चार मुख्यमन्त्री के साथ कार्य किया था 

1. हरीदेव जोशी

2. शिवचरण माधुर 

3. हरीदेव जोशी 

4. भैरोसिंह शेखावत


● सर्वाधिक लम्बी अवधी तक - B.S मेहता [1958-1964]

● राजस्थान में पहली महिला मुख्य सचिव - कुशल सिंह (2009)

● वर्तमान मे मुख्य सचिव - उषा शर्मा

● उषा शर्मा राजस्थान की दूसरी महिला मुख्य सचिव बनी हैं. इनका कार्यकाल जून 2023 तक रहेगा।

मुख्य सचिव के कार्य :-

● मुख्यमन्त्री को सलाह देना।

● राज्य प्रशासन के नेतृत्व प्रदान करना।

● मन्त्री मण्डलीय बैठकों की व्यवस्था करना एवं बैठक से सम्बधित सूचना मन्त्री एवं अन्य प्रशासनिक इकाइयो तक पहुंचाना।

● केन्द्र मे मन्त्रालयो के साथ समन्वय स्थापित करना।

● अन्तर्राज्यिय परिषद एवं क्षेत्रीय परिषद में होने वाली बैठको के दौरान मुख्यमन्त्री को सहयोग करना।

● महत्वपूर्ण व्यक्तियों एवं पदाधिकारियों को प्रोटोकाल उपलब्ध करवाना।

मुख्य सचिव की भूमिका :-
मुख्य मन्त्री के सहयोगी के रूप में

● मुख्यमन्त्री को वांछित सूचना उपलब्ध करवाता है।

● मुख्यमन्त्री के दौरो, बैठको व लोगों से मुलाकात के लिए समन्वय बैठाता है।

प्रशासनिक अधिकारी के रूप में

● राज्य में जितने भी प्रशासनिक अधिकारीयो की संख्या है, सबको निर्देशित व नियंत्रित करता है।

● यह राज्य आपदा प्रबंधन प्रकोष्ठ का सदस्य होता है।

कुछ विभागों का मुखिया होता है 

● सामान्य प्रशासन विभाग 

● प्रशासनिक सुधार विभाग 

● नियोजन विभाग

● पहले कार्मिक विभाग भी इसमे आता था लेकिन वर्तमान मे नहीं है।

● राज्य मेहमान घोषित करता है।

● पुरुस्कार निर्धारण व वितरण।

● आपातकाल के दौरान महत्वपूर्ण भूमिका

● अनु. 356 के दौरान राज्यपाल का मुख्य सलाहकार होता है।

समन्वयकर्ता के रूप में

● मुख्य सचिवों के सम्मेलन में भाग लेता है।

● क्षेत्रिय परिषदों में राज्य की तरफ से सचिव की भूमिका में रहता है।

● अन्तर विभागिय विवादों का निपटारा करवाता है। 

● राज्य मे सौहार्द वातावरण स्थापित करना।

संभाग

● 1829 में लार्ड विलियम बैटिंग ने कलेक्टरों पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए संभागीय व्यवस्था की स्थापना की थी।

● राजस्थान में स्वतन्त्रता के पश्चात यह व्यवस्था स्थायित्व में आयी। 

उस समय पाँच संभाग थे -

● जयपुर

● जोधपुर 

● बीकानेर

● उदयपुर

● कोटा

● अप्रैल, 1962 में मोहनलाल सुखाडि़या सरकार के द्वारा संभागीय व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया। 

● 15 जनवरी, 1987 में हरि देव जोशी सरकार के द्वारा संभागीय व्यवस्था की शुरूआत दुबारा की गई।

वर्तमान में सात संभाग हैं -

1. जयपुर संभाग - जयपुर, दौसा, सीकर, अलवर, झुंझुनू

2. जोधपुर संभाग - जोधपुर, जालौर, पाली, बाड़मेर, सिरोही, जैसलमेर

3. उदयपुर संभाग - उदयपुर, राजसंमद, डूंगरपुर, बांसवाड़ा,चित्तौड़गढ़, प्रतापगढ़

4. बीकानेर संभाग - बीकानेर, गंगानगर, हनुमानगढ़, चुरू

5. कोटा संभाग - कोटा, बुंदी, बांरा, झालावाड़

6. अजमेर संभाग - अजमेर, भीलवाड़ा, टोंक, नागौर

7. भरतपुर संभाग - भरतपुर, धौलपुर, करौली, सवाईमाधोपुर

● 1987 में राजस्थान का छठा संभाग अजमेर को बनाया गया।यह जयपुर संभाग से अलग होकर नया संभाग बना। 

● 4 जुन, 2005 को राजस्थान का 7 वां संभाग भरतपुर को बनाया गया।


संभाग - 1987

जयपुर - बीसलपुर परियोजना 

अज़मेर - बीसलपुर परियोजना 

बीकानेर - इन्दिरा गांधी नहर सभाग

जोधपुर - कार्यक्रम मरु विकास 

उदयपुर - आदीवासी जनजातीय विकाश 

कोटा - चम्बल कमाण्ड

(2005 में भरतपुर - चम्बल) 

● सभी संभागीय आयुक्तों के कार्य है।

जिला प्रशासन पर नियंत्रण समन्वय स्थापित करना।

● प्रशासनिक सुधार आयोग प्रथम ने सम्भागीय आयुक्त के कार्यों को निरर्थक माना था और कहा था यह कार्य राजस्व मण्डल व जिला कलेक्टर के कार्यों का दोहराव है।

जिला

● किसी उद्देश्य विशेष के लिए किए गए भौगोलिक विभाजन को जिला कहते हैं।


वैदिक काल        100 ग्राम      शतग्रामी

मौर्य काल            जनपद       जनपद अधिकारी

गुप्तकाल             विषय         विषयपति

सल्तनतकाल        परगना        सुबेदार

मुग़ल काल          सरकार        किरोडी 

ब्रिटिश काल         जिला         कलेक्टर

● किरोडी - सुबेदार/फौजदार

● अर्थात भारत मे हर काल में जिला विभाजन विधमान था।

भारतीय संविधान में जिला शब्द का प्रयोग :- 

● अनु. 233 मे जिला न्यायधीश के रूप मे

● अनु. 243 जिला परिषद के सम्बन्ध में 

● 6ठी अनुसूची में जनजातिय जिलो के बारे में

जिला स्थापित करने के उद्देश्य :-

● नियन्त्रण स्थापना हेतू 

● राजस्व एकत्रित करने के लिए 

● विकाश कार्यक्रमों के संचालन के लिए 

● प्रशासन में एकत्व स्थापित करने के लिए 

जिला प्रशासन :-

● जिला कलेक्टर कार्यालय तथा अन्य विभागीय प्रशासनिक व्यवस्थाओं का सामूहिक नाम जिला प्रशासन है जो, जिला स्तर पर कार्यरत है।

जिला प्रशासन के बढ़ते हुए महत्व के कारण

● राज्य एवं केन्द्र सरकार की पहुँच स्थानीय स्तर तक बनाए रखने के लिए।

● क्षेत्र व राज्य की राजधानी के मध्य समन्वय बनाए रखने के लिए।

● आम आदमी की पहुँच बनाए रखने के लिए।

● स्थानीय स्तर की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान बनाए रखने के लिए।

कलेक्टर का पद

● सन् 1772 में सर्वप्रथम कलेक्टर का पद सृजित किया गया तथा रॉल्फ सेल्डन पहले कलेक्टर बने।

● इस पद को लाने वाले वारेन हेस्टिंगस थे।

● 1773 में इस पद को समाप्त कर दिया गया।

● 1781 में पुन: सृजित किया गया।

● 1786 में इसे राजस्व एकत्रित करने के पूर्ण अधिकार प्रदान किया गया। 1787 में राजस्व अधिकार के साथ दण्ड नायक की शक्तियाँ प्रदान की गई।

● लार्ड कार्म वालिस को भारत मे लोक सेवा का जनक माना जाता है।

● 1793 मे कलेक्टर से न्यायिक शक्तियाँ प्रथक कर दी गई। 

● 1812 में कलेक्टर को पुनः न्यायिक शक्तियाँ प्रदान की गई।

● जिला कलेक्टर जिला स्तर पर अन्य विभागों के समन्वय के रूप में।

● जिला परिषद के गठन के लिए।

कलेक्टर के पद पर प्रक्रिया :-

● R.A.S - पदोन्नति  = कलेक्टर 

● I.A.S = कलेक्टर

● कलेक्टर पद पर भारतीय प्रशासनिक सेवा का आधिकारी आता है ।

● R.A.S से पदोन्नति होकर भी कलैक्टर बनते है।

● कलेक्टर के पद (पदस्थापना) पर पोस्टिंगं सामान्य प्रशासन विभाग के माध्यम से मुख्यमन्त्री द्वारा होती है।

कलेक्टर की भूमिका :-
प्रशासनिक अधिकारी के रूप में :-

● सामान्य प्रशासन का संचालन करना।

● जिले में जनगणना करवाना।

● चुनाव सम्पन्न करवाना।

● आम आदमी की शिकायतो की सुनवाई करना।

● जिले में गांव ढाणी का भ्रमण करना।

● सैनिक अधिकारीयों से सम्पर्क करना।

● महत्वपूर्ण लोगों को प्रोटोकाल उपलब्ध करवाना।

● जिला स्तरीय राजकीय समारोह में भाग लेना। 

● जिला पुल. सर्किक हाउस डाक बंगले व सरकारी भवनों का रख रखाव।

जिला मजिस्ट्रेट के रूप में :-

● जिले में शान्ति व्यवस्था बनाए रखना।

● अपराधिक प्रक्रिया संहिता (I.P.C) की धारा 144 लागू करना।

● कैदियों को पैरोल पर मुक्त करना।

● जेलों का निरिक्षण करना।

● जिले की वार्षिक अपराधिक रिपोर्ट तैयार करवाता है। 

● शस्त्र, पैट्रोल, विस्फोटक सामग्री के लाईसेंसों को मंजूरी देना।

● रात्री काल में पोस्टमार्टम की अनुमति देना।

भू राजस्व अधिकारी के रूप में :-

● भू राजस्व एकत्रित करवाना।

● भू अभिलेखो का रख रखाव करना।

● आबादी की बसावट के लिए भूमि अधिग्रहीत करना तथा भूमि सुधार से सम्बन्धित कार्यक्रम संचालित करना।

● जिला कोषागार का परिरक्षण करना।

शराब, पैट्रोल, औषधी तथा अन्य मादक पदार्थों पर शुल्क नियंत्रित करना।

● स्टाम्प अधिनियम लागू करवाना।

● सरकारी सम्पदाओं का प्रबन्ध करना।

जिला विकास अधिकारी के रूप मे :-

● स्वतन्त्रता के बाद भारतीय संविधान के माध्यम से एक लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना की गई तथा केन्द्र व राज्य सरकार ने सामाजिक व आर्थिक विकाश के कार्यक्रम अपने हाथ में लिए अत: कलेक्टर अपने परम्परागत दायरे से बाहर आकर विकास अधिकारी की भूमिका का निर्वहन करने लगा।

● केन्द्र व राज्य द्वारा संचालित विकास की योजनाओं का क्रियान्वयन सुनिश्चित करना व उनके मध्य समन्वय सुनिश्चित करना तथा उनकी प्रगति प्रतिवेदन तैयार करके राज्य सरकार को प्रस्तुत करना।

● जिला आयोजना समिति का गठन करवाना व इसके माध्यम से जिले की योजना का निर्माण करना।

● जिले के विकास के मार्ग मे बाधक तत्वों को दूर करना।

नोट :- 1978 में अशोक मेहता समिति ने जिला स्तर पर विकास के कार्यों के लिए अलग से पद सृजित करने की सिफारिस की थी।

समन्वयक अधिकारी के रूप मे :-

● जिला स्तर पर उपस्थित सभी विभागों के मध्य समन्वय स्थापित करता है।

● जिला प्रशासन एवं राज्य सरकार के मध्य समन्वय स्थापित करने का कार्य करता है।

● गैर सरकारी संगठन, स्वयं सेवी संस्थाएँ, दबाव समूहों व सरकारी विभागों के मध्य समन्वय स्थापित करता है।

● जिलाधीश जिले में लगभग 60 से अधिक समीतियों का अध्यक्ष होता है।

आपदा निवारण अधिकारी के रूप में :-

● आपदा प्रबन्धन अधिनियम (2005) के तहत जिला आपदा प्रकोष्ठ (प्राधिकरण) का यह अध्यक्ष होता है।

उपखण्ड अधिकारी

● इसको S.D.m और S.D.0 भी कहते हैं।

● खण्ड: पंचायती राज संस्थाओं के खण्ड (पंचायत समिति) से अलग होते हैं।

● S.D.M (भूमिका) = RME

           ✓R = Revenue = भू राजस्व

           ✓M = Magistrate = दण्डनामक

           ✓E = Executive = कार्यपालक

● उपखण्ड अधिकारी राजस्थान प्रशासनिक सेवा (R.A.S) का अधिकारी है।

● उपखण्ड अधिकारी अपने अधीन तहसीलों एव उनसे सम्बान्धत गांवो में राजस्व प्रशासन एवं अन्य प्रशासनिक गतिविधियों के लिए उत्तरदायी होता है।

S.D.M की भूमिका :-
भू राजस्व अधिकारी के रूप मे :-

● राजस्थान भू राजस्व अधिनियम 1956 के अनुसार भू नियंत्रणकारी राजस्व के मामलों में न्यायिक प्रशासनिक व शक्तियाँ प्राप्त है।

● ग्रामवार भू अभिलेख (नक्शे) तैयार करवाता है।

● तहसीलदार, कानूनगोव पटवारीयों पर नियंत्रण रखता है। 

● भू-सीमांकन, प्रतीक चिन्हों की स्थापना।

● खण्ड की फसल की स्थिति का समाकलन करना (आंकलन)।

● अतिक्रमण हटाना सरकारी भूमि से।

● उपखण्ड की रिपोर्ट कलेक्टर को प्रस्तुत करना।

उपरखण्ड दण्ड नायक के रूप मे :-

● उपरखण्ड में शान्ति व्यवस्था बनाये रखना

● अशान्ति की स्थिति में धारा 144 का प्रयोग 

● उपरखण्ड की फौजदारी रिपोर्ट को तैयार करना।

● पुलिस थाना/चौकियो तथा जेलों का निरिक्षण करना।

भू राजस्व न्यायिक अधिकारी के रूप में :-

● सीमा विवाद, गोचर भूमि से सम्बंधित विवाद।

● भू अभिलेख से सम्बन्धित विवाद।

● काश्तकारों के वर्ग निर्धारित करने से सम्बन्धित विवाद

● उत्तराधिकार विभाजन से सम्बन्धित विवाद

● मुआवजे से सम्बन्धित विवाद।

प्रशासनिक अधिकारी के रूप मे :-

● उचित मूल्य की दुकानों पर चीनी, केरोसीन, चावल, कपडा, साबुन, दाल, गेहूँ आदी का वितरण सही करवाना।

● उपरखण्ड में उपयोग की वस्तुओं की उपलब्धता की जानकारी रखना।

● राजस्व अभियानों के अंतर्गत जन शिकायतों का निवारण करना।

● गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वालों का डाटा एकत्रित करना।

उप जिला निर्वाचन अधिकारी के रूप में :-

● अपने उपरखण्ड में लोकसभा विधानसभा और स्थानीय निकाय के चुनाव सम्पन्न करवाना।

● उपखण्ड अधिकारी जिला कलेक्टर का आँख व कान होता है।

तहसीलदार

● तहसील शब्द अरबी भाषा का है।

● राजस्थान मे तहसील शब्द का प्रयोग 1791 में अलवर राज्य में किया गया था।

● 1872 मे बीकानेर मे भी तहसील शब्द का प्रयोग किया गया।

● अलग अलग राज्यों में इसे अलग अलग नाम से जाना जाता है -

       ✓तमिलनाडु = तालुका

      ✓गुजरात - तालुका

      ✓महाराष्ट्र - तालुका | महल

● तहसीलदार के पद पर राजस्थान प्रशासनिक सेवा की अधीनस्थ सेवा "राजस्थान तहसीलदार सेवा" से आता है। (R.T.S.) से।

● इसकी नियुक्ति राजस्व मण्डल (अजमेर) से होती है।

● तहसीलदार भू राजस्व एकत्रित करता है।

तहसीलदार की भूमिका :-

भू राजस्व अधिकारी के रूप में :-

● प्रत्येक गाँव की भूमि का खसरा, नक्शा और नामान्तरण अभिलेख तैयार करवाता है।

● कानूनगो व पटवारी पर निरिक्षण व नियन्त्रण रखता है। 

● नामान्तरण विवादों का निस्तारण करता है। 

● कृषि भूमि पर बने मकानो का नियमन करता है। ● 1000 वर्ग मीटर तक भी भूमि को आवासीय भूमि में रूपान्तरित करता है।


राजस्व न्यायालय के रूप में कार्य : -

● सीमा सम्बन्धित विवाद का निपटारा करता है।

● नामान्तरण विवाद का निपटारा करता है।

● गोचर भूमि विवाद का निपटारा करता है।

● सरकारी भूमि पर अतिक्रमण पर कार्यवाही करता है।

● वसूली करना।

न्यायिक आधिकारी के रूप मे :-

● भू राजस्व की रजिस्ट्री को प्रविष्ट करना।

● बंटवारा नामे के दावों का निस्तारण करना।

● भूमि मुआवजे का परीक्षण करना।

दण्डनायक के रूप मे :-

● तहसीलदार को यह शक्ति प्राप्त है कि दोषी व्यक्ति को 6 माह की सजा या 200 रुपये का जुर्माना लगा सकता है।

प्रशासनिक अधिकारी के रूप मे :-

● तहसील कोषागार की रक्षा करना।

● आम चुनावों के समय व्यवस्थाएं देखना।

● जनगणना के कार्यक्रम में हाथ बंटाना।

● जाति प्रमाण पत्र, हैसियत प्रमाण पत्र, कृषक प्रमाण पत्र व मूल निवास प्रमाण पत्र जारी करता है।


पटवारी

● पटवारी का पद राजस्व प्रशासन मे निम्नतम किन्तु सर्वाधिक महत्वपूर्ण पद होता है।

● इसकी नियुक्ति राजस्व मण्डल के द्वारा की जाती है। 

● ग्रामीण क्षेत्रों में सदीयों से यह पद प्रभावी रहा है।

● राज्य के लगान वसूली में पटवारी का पदनाम सम्भवतः मुस्लिम शासको की देन है।

● भारत में पटवारी को अलग अलग नाम से जाना जाता है -

      ✓तमिलनाडु - करनम

      ✓महाराष्ट्र - तलस्ती

      ✓राजस्थान - पटवारी

      ✓उत्तरप्रदेश - लेखापाल


● 1999 में शिवचरण माथुर अध्यक्षता में राजस्थान प्रशासनिक सुधार समिति बनी जिसने पटवारी का नाम बदलकर राजस्थान मे लेखापाल करने की सिफारिश की।

● प्रथम प्रशासनिक सुधार समिति 1963 में हरिश चंद्र माथुर की अध्यक्षता में बनी है।

● राजस्थान में सामान्यतः 7500 एकड कृषि भूमी है एवं 3000 खसरों पर एक पटवारी नियुक्त किया जाता है।

पटवारी के कार्य :-

● भूमी के बंटवारे, नामान्तरण, कृषि जोत, मालिकाना हक तथा सम्बन्धित विवादों का सामना सर्वप्रथम पटवारी ही करता है।

● भूमि से सम्बन्धित प्रभाणिक दस्तावेज तैयार करना इन दस्तावेजो मे नक्शे तैयार करना एव उनका रख रखाव करना।

● गिरदावरी रिपोर्ट तैयार करना।

● सर्वेक्षण चिन्हो को सुरक्षित रखना अर्थात रख रखाव करना 

● भूमि की पैमाइश करना।

भू राजस्व मामलों में अपील :

तहसीलदार - S.D.M. -  A.D.M. - DM - मंडल - उच्च न्यायालय - सर्वोच्च न्यायालय 

राज्य निर्वाचन आयोग

● निर्वाचन आयुक्त - डॉ. मधुकर गुप्ता, (आईएस सेवानिवृत)

अनुच्छेद 243 (k)

● राज्य निर्वाचन आयोग (भाग 9) 

● नगरीय संख्याओं के लिए (भाग 9क)

आयोग की नियुक्ति - राज्यपाल द्वारा 

कार्यकाल

● 5 वर्ष या 62 वर्ष

सेवा शर्तो का निर्धारण 

● विधान मण्डल के द्वारा


● पद से हटाने के लिए जिस रीति से उच्च न्यायालय के न्यायधीशों को हटाया जाता है उसी तरीके से संसद द्वारा विशेष बहुमत से पारित प्रस्ताव द्वारा ।

कार्य :-

● पंचायत एवं नगरीय संस्थाओ के चुनाव करवाना

● मतदाता सूची तैयार करवाना

● निर्वाचन के संचालन के लिए उनका पर्यवेक्षण निर्देशन और नियन्त्रित करना

● राज्यपाल के द्वारा सौंपे गए अन्य काम भी करना

राजस्थान लोक सेवा आयोग (R.P.S.C) 

स्थापना 

● तत्कालीन राज प्रमुख द्वारा 16 अगस्त 1949 को एक अध्यादेश जारी किया गया इसी के आधार पर अगस्त 1949 को इसकी स्थापना जयपुर में की गई। बाद में सत्य नारायण राव समिति की सिफारिशों के आधार पर यह अजमेर में स्थापित हो गया।

● कार्यवाहक प्रथम अध्यक्ष - S. K घोष (28 जुलाई 1950 को S.C. त्रिपाठी)

● सर्वाधिक लम्बा कार्यकाल - डी. शंकर तिवाडी (अध्यक्ष के रूप में)

● वर्तमान में अध्यक्ष व 7 सदस्यों का प्रावधान है।

अनुच्छेद 315 

● एक राज्य के लिए एक लोक सेवा आयोग किन्तु यदि एक से अधिक राज्य संसद से मिलकर यह प्रार्थना करे तो संयुक्त लोक सेवा आयोग का गठन किया जा सकता है।

अनुच्छेद 316 

अध्यक्ष व सदस्यों की नियुक्तियां

संयुक्त लोक सेवा आयोग में नियुक्ति राष्ट्रपतिद्वारा राज्य लोक सेवा आयोग - राज्यपाल

शपथ 

● राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष को HC का मुख्य न्यायधीश व अन्य सदस्यों को अध्यक्ष के द्वारा शपथ दिलाते हैं।

कार्यकाल 

● 6 वर्ष या 62 वर्ष जो भी पहले हो

त्यागपत्र 

● राज्यपाल को

अनुच्छेद 317 

● पद से हटाने की प्रक्रिया 

● आरोप - क़दाचार की जाँच SC के न्यायधीश के द्वारा 

● पद से हटाएगा - राष्ट्रपति 

● कदाचार की जांच के दौरान सदस्य व अध्यक्ष को राज्यपाल निलम्बित कर सकता है।

अनुच्छेद 318

● राज्य लोक सेवा आयोग के लिए सदस्यों व कर्मचारियों की सेवा शर्तों का निर्धारण राज्यपाल करेगा इनको वेतन भन्ते राज्य की सचित निधी से दिए जाते हैं।

अनुच्छेद 319

● सेवा निवृति के बाद अन्य लाभ के पद पर नही जाएगा।

अध्यक्ष 

● U.P.S.C का अध्यक्ष 

● U.P.S.C का सदस्य 

● अन्य राज्यों में अध्यक्ष 

● जब उसकी आयु 62 वर्ष पूर्ण नहीं हो

सदस्य 

● उसी आयोग में अध्यक्ष बन सकता है 

● दूसरे आयोग (राज्य) में अध्यक्ष बन सकता है 

● संघ लोक सेवा आयोग में अध्यक्ष व सदस्य बन सकता है।

अनुच्छेद 320
कार्य

● राज्य की लोक सेवाओं के लिए भर्ती परीक्षा का आयोजन करना।

● भर्ती पद्धति के बारे मे सलाह देना।

● पदोन्नती, अनुशासात्मक कार्यवाही के बारे में, सिद्धान्तों के सम्बन्ध में सरकार को सलाह देना।


अनुच्छेद 323

● प्रतिवेदन - राज्यपाल - विधान सभा के पटल पर।

राज्य मानवाधिकार आयोग

● गठन - 18 जनवरी 1999

● 23 मार्च 2000 को कार्य प्रारम्भ किया।

● मानव अधिकार अधिनियम 1993 की धारा 21 में लिखा हुआ है कि राज्य सरकार मानवाधिकार आयोग का गठन कर सकती है किन्तु यह राज्य की इच्छा पर निर्भर है।

● प्रथम अध्यक्ष - श्रीमति कात्ता भटनागर

संरचना

● अध्यक्ष (योग्यता - HC का मुख्य न्यायधीश रह चुका हो)

● 2 सदस्य (1. न्यायिक सेवा में HC का या जिला न्यायालय का न्यायधीश। 

2. ऐसा व्यक्ति जो मानव अधिकार का जानकार हो।)

नियुक्ति 

● राज्यपाल के द्वारा मुख्यमन्त्री की अध्यक्षता में गठित की गई समिती की सिफारिशों के आधार पर।

समिती के सदस्य :-

● विधान सभा अध्यक्ष 

● नेता प्रतिपक्ष 

● गृहमंत्री

कार्यकाल 

● 5 वर्ष या 70 वर्ष आयु में जो पहले हो 


● अध्यक्ष व सदस्यों को पद से कदाचार के आधार पर हटाने का कार्य राष्ट्रपति के पास होता है।

● कदाचार की जाँच S.C का न्यायधीश करता है।

● यह अपनी वार्षिक रिपोर्ट राज्यपाल को देता है।

राज्य सूचना आयोग

गठन 

● 18 अप्रेल 2006 

● इसका मुख्यालय जयपुर में है।

संरचना 

● मुख्य सूचना आयुक्त

● सदस्य 

मुख्य सूचना आयुक्त 

● प्रथम - एम.डी. कौरानी

● वर्तमान - श्री देवेन्द्र भूषण गुप्ता (डी बी गुप्ता)

सदस्य

● अधिकतम 10

● सदस्य - नारायण बारेठ तथा शीतल धनकड़

● नियुक्ति - राज्यपाल द्वारा 

मुख्यमन्त्री की अध्यक्षता में गठित समिति की सिफारिशों के आधार पर।

समिती :-

● मुख्यमन्त्री 

● नेता प्रतिपक्ष (विधानसभा) 

● c.m द्वारा मनोनित मंन्त्री 

योग्यता 

● अध्यक्ष व सदस्य बनने के लिए विधि विज्ञान, प्रौद्योगिकी समाज सेवा प्रबन्ध, पत्रकारिता, जनसम्पर्क एवं प्रशासन का व्यापक अनुभव होना आवश्यक है।

शर्तें 

● संसद या विधान मण्डल का सदस्य नहीं होगा।

● अन्य लाभ का पद धारण नही करेगा।

● राजनैतिक पक्षो से जुड़ा हुआ नही होगा।

कार्यकाल

● 5 वर्ष या 65 वर्ष आयु में जो भी पहले हो।

● पुन: नियुक्ति का पात्र नहीं होगा।

● किन्तु सूचना आयुक्त मुख्य सूचना आयुक्त के रूप में नियुक्ति के लिए पात्र होगा

● इनको शपथ राज्यपाल दिलाता है। 

● इनका त्यागपत्र भी राज्यपाल स्वीकार करता  है।

हटाने की प्रक्रिया

● कदाचार का आरोप - जाँच (S.C. का न्यायधीशा)

● राज्यपाल द्वारा हटाया जाएगा 

कार्य :- 

निम्नलिखित शिकायतें प्राप्त करेगा और

उनकी जाँच करेगा

● यदि किसी व्यक्ति ने सरकारी कार्यालय से सूचना चाहिए और वह कार्यालय मना कर दे तो

● यदि निर्धारित समयावधि में सूचना नहीं दी जाती है (30 days) 

● यदि सूचना के बदले में अपेक्षा से विपरीत अनुचित पैसे की मांग कर ले तो

● यदि सूचना अपूर्ण मिथ्या भ्रम में डालने वाली हो

● सर्वप्रथम हम जिस कार्यालय से सूचना प्राप्त करना चाहते है उस कार्यालय के लोक सूचना अधिकारी से सम्पर्क करते हैं। 

● सम्बन्धित अधिकारी 30 दिन के अन्दर सूचना उपलब्ध करवायेगा

● यदि वह 30 दिन के बाद अन्तिम 5 दिन तक सूचना नहीं देता है तो प्रथम अपील अधिकारी के पास जाया जाता है। प्रथम अपील अधिकारी भी सुनवाई नहीं करता है (30 दिन तक) तो राज्य सूचना आयुक्त के पास अपील की जाती है।

स्थानीय स्वशासन

● स्थानीय स्वशासन के जनक- लार्ड रिपन

स्थानीय स्वशासन

ग्रामीण क्षेत्र

● पंचायती राज 

● त्रिस्तरीय 

         स्तर                     संस्था

       जिला                जिला परिषद 

       खण्ड                 पंचायत समिति 

       ग्राम                  ग्राम पंचायत

कुल जिले (परिषद) : 33

कुल पंचायत समितियाँ: 352

कुल ग्राम पंचायत: 11283

शहरी क्षेत्र

नगर निगम (7)

नगर परिषद (34)

नगर पालिका (147)


● स्थानीय स्वशासन राज्य सूची का विषय है। 

● 2 0ct 1952 सामुदायिक विकास कार्यक्रम तथा 1953 राष्ट्रिय प्रसार सेवा योजना ये दोनो योजनाए विफल हो गई थी।

● विफलता के कारणों का पता लगाने के लिए B.R मेहता की अध्यक्षता में जनवरी 1957 में समिति का गठन किया गया रिपोर्ट NOV. 1957 में प्रस्तुत की। इस रिपोर्ट में जो मुख्य सिफारिश की गई वो इस प्रकार से हैं :-

लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण

● त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था की स्थापना हो।

● जिलाधीश को जिला परिषद का अध्यक्ष बनाया जाए।

● ग्राम पंचायतो के चुनाव प्रत्यक्ष करवाये जाए।

● शेष संस्थाओं के चुनाव ग्राम पंचायत के सदस्यों द्वारा करवाए जाए जिससे तीनो संस्थार जुडी रहे।

● इस समिति की सिफारिशों के आधार पर 20ct 1959 को नागौर के बगदरी गाँव में पंडित जवाहर लाल नेहरू द्वारा इसका उद्‌घाटन किया गया।

अशोक मेहता समिति (1977)
मुख्य सिफारिशें :

● दो स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था हो - 

      1. जिला परिषद

      2. मण्डल पंचायत

● पंचायत चुनावों में राजनीतिक दलों को भाग लेने की अनुमति दी जाए।

● इन संस्थाओं के पास कर लागू करने की शक्ति हो।

● न्याय पंचायतों का गठन।

● जनसंख्या अनुपात मे SC/ST को आरक्षण।

जी. वी. के. राव समिति - 1985
मुख्य सिफारिशे :

● चार स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था लागू हो।

● राज्य विकास परिषद का गठन किया जाए।

● इस समिति ने जिला विकास आयुक्त का पद सृषित करने की सिफारिश की।

● इस अधिकारी को जिला स्तर से जुड़े सभी विकास कार्यो से जोड़ा जाए।

एल.एम. सिधवी समिति - 1986-87

● लोकतन्त्र व विकास के लिए पंचायती राज संस्थाओं का पुनरुत्थान।

● इन संस्थाओं को संवैधानिक मान्यताएं प्रदान की जाए।

● ग्राम समूहों के लिए न्याय पंचायत का गठन किया जाए।

● ग्राम सभा के महत्व पर बल दिया जाए।

● ग्राम पंचायतो के पास अधिक वित्तिय संसाधन हो।

● इस समिति के बाद पी. के भुंगन समिति का गठन किया गया।

P.K. थुंगन समिति - 1988

● इस समिति का उददेश्य "पंचायती राज व्यवस्थाओं मे राजनीतिक एवं प्रशासनिक ढाँचे की जाँच करना।

● पंचायती राज संस्थाओं को संविधान में स्थान दिया जाए।

● जिला परिषद इस व्यवस्था की धुरी होना चाहिए।

● इनका कार्यकाल 5 वर्ष निश्चित हो।

● इन संस्थाओं की वित्तिय स्थिति सुधारने के लिए राज्य वित्त आयोग जैसी संस्था का गठन किया जाए।

गाडगिल समिति - 1988

अध्यक्ष - वी. .एम गाडगिल

उददेश्य - पंचायती राज संस्थाओं को प्रभावकारी कैसे बनाया जाये 

● इन संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा दिया जाए

● त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था हो।

● पंचायती राज के सभी स्तरों पर प्रत्यक्ष निर्वाचन हो 

● SC/ST महिलाओं को आरक्षण

राज्य वित्त आयोग, राज्य निर्वाचन आयोग का गठन किया जाए ।

● इन संस्थाओं को कर शुल्क लगाने की शक्ति मिले।

स्वतंत्र भारत में पंचायती राज संस्थाओं का स्वर्णकाल राजीव गाँधी काल को कहा जाता है।

राजस्थान में पंचायती राज

● राजस्थान में प्रथम पंचायती राज अधिनियम 1953 में जारी किया गया था।

● राजस्थान में पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव के लिए Feb 1954 में गतिविधियां प्रारम्भ की गई लेकिन विफल रही।

● 2 सितम्बर 1959 को राजस्थान विधानसभा मे राजस्थान पंचायत समिति व जिला परिषद अधिनियम जारी किया गया था और इसी आधार पर पहली बार राजस्थान में पंचायती राज संस्थाओं के 1960-61 में पहली बार चुनाव हुए।

सादिक अली समिति - 1963

● पंचायती राज से सम्बन्धित राजस्थान सरकार द्वारा गठित समिति।

● इस समिति ने सिफारिश की थी कि प्रधान व जिला प्रमुख के चुनाव के लिए एक वृहत्तर निर्वाचक मण्डल गठित किया जाए।

गिरधारी लाल व्यास समिति -1973

● प्रत्येक पंचायत के लिए ग्राम सेवक व ग्राम सचिव नियुक्त करने पर बल दिया जाए।


73 वाँ संसोधन विधेयक 1992 

● पंचायत संस्थाओं को मजबूत बनाने और उन्हें संवैधानिक दर्जा दिलाने के उद्देश्य से 73वां संविधान संशोधन अधिनियम 1992 में संसद द्वारा पारित किया गया था। 

● जो 24 अप्रैल 1993 को प्रभाव से लागू हुआ था। 

● इसीलिए प्रत्येक वर्ष 24 अप्रैल को पंचायती राज दिवस मनाया जाता हैं।

● 73वां संविधान संशोधन अधिनियम 1992 के तहत पंचायत संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया था। 

इस संसंशोधन अधिनियम के तहत निम्न प्रावधान किये गए थे :

● संविधान में 73वें संविधान संशोधन अधिनियम के तहत भाग 9 का शीर्षक पंचायत रखा गया।

भाग 9 में अनुच्छेद 243(A) से 243(O) के प्रावधान सम्मिलित किये गए।

● संविधान में एक नयी 11वीं अनुसूची जोड़ी गई जिसमें 29 कार्यकारी विषय शामिल करके पंचायतों को उन पर कार्य करने की शक्ति प्रदान की गई।

73वें संविधान संशोधन अधिनियम से संबंधित अनुच्छेद


अनुच्छेद 243 - परिभाषाएँ


अनुच्छेद 243 क (A) - ग्रामसभा

अनुच्छेद 243 ख (B) -  ग्राम पंचायतों का गठन 

अनुच्छेद 243 ग (C) - पंचायतों की संरचना 

अनुच्छेद 243 घ (D) - स्थानों का आरक्षण

अनुच्छेद 243 ङ (E) - पंचायतों की कार्यकाल 

अनुच्छेद 243 च (F) - सदस्यता के लिए अयोग्यताएँ 

अनुच्छेद 243 छ (G) - पंचायतों की शक्तियाँ , प्राधिकार और उत्तरदायित्व

अनुच्छेद 243 ज (H) - पंचायतों द्वारा कर लगाने की शक्तियाँ और उनकी निधियाँ 

अनुच्छेद 243 झ (I) - वित्तीय स्थिति के पुनर्विलोकन के लिए वित्त आयोग का गठन 

अनुच्छेद 243 ञ (J)  - पंचायतों की लेखाओं की संपरीक्षा 

अनुच्छेद 243 ट (K) - पंचायतों के लिए निर्वाचन

अनुच्छेद 243 ठ (L) - संघ राज्यों क्षेत्रों को लागू होना 

अनुच्छेद 243 ड (M) - इस भाग का कतिपय क्षेत्रों को लागू न होना

अनुच्छेद 243 ढ (N) - विद्यमान विधियों और पंचायतों का बना रहना

अनुच्छेद 243 ण (O) - निर्वाचन सम्बन्धी मामलों में न्यायालयों के हस्तक्षेप का वर्णन  


11वीं अनुसूची में शामिल विषय

● कृषि (कृषि विस्तार शामिल)।

● भूमि विकास, भूमि सुधार कार्यान्वयन, चकबंदी और भूमि संरक्षण।

● लघु सिंचाई, जल प्रबंधन और जल-विभाजक क्षेत्र का विकास।

● पशुपालन, डेयरी उद्योग और कुक्कुट पालन।

मत्स्य उद्योग।

● सामाजिक वानिकी और फार्म वानिकी।

● लघु वन उपज।

● लघु उद्योग जिसके अंतर्गत खाद्य प्रसंस्करण उद्योग भी शामिल हैं।

● खादी, ग्राम उद्योग एवं कुटीर उद्योग।

● ग्रामीण आवासन।

● पेयजल।

● ईंधन और चारा।

● सड़कें, पुलिया, पुल, फेरी, जलमार्ग और अन्य संचार साधन।

● ग्रामीण विद्युतीकरण, जिसके अंतर्गत विद्युत का वितरण शामिल है।

● अपारंपरिक ऊर्जा स्रोत।

● गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम।

● शिक्षा, जिसके अंतर्गत प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालय भी हैं।

● तकनीकी प्रशिक्षण और व्यावसायिक शिक्षा।

● प्रौढ़ और अनौपचारिक शिक्षा।

● पुस्तकालय।

● सांस्कृतिक क्रियाकलाप।

● बाज़ार और मेले।

● स्वास्थ्य और स्वच्छता (अस्पताल, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और औषधालय)।

● परिवार कल्याण।

● महिला और बाल विकास।

● समाज कल्याण (दिव्यांग और मानसिक रूप से मंद व्यक्तियों का कल्याण)।

● दुर्बल वर्गों का तथा विशिष्टतया अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का कल्याण।

● सार्वजनिक वितरण प्रणाली।

● सामुदायिक आस्तियों का अनुरक्षण।


● लोकसभा ने 22 दिसम्बर व राज्यसभा ने 23 दिसम्बर को पारित कर दिया था। 

● 20 अप्रेल 1992 को राष्ट्रपति ने हस्ताक्षर किए थे । 

● 24 अप्रैल 1993 में भारत में लागू हुआ



73 वे संविधान संसोधन की मुख्य विशेषताएं:


● अनुच्छेद 243(क) (A) - ग्राम सभा

● गठन = ग्राम पंचायत सर्किल के सभी व्यस्क मतदाता जिनका नाम मतदाता सूची में उल्लेखित हो से मिलाकर बनेगी

● अध्यक्षता - सरपंच

● सचिव - V.D.O ग्रामसेवका

● गणपूर्ति - कुल सदस्यों के 1/10 सदस्य

● कुल बैठकें - संवैधानिक प्रावधान - 2 बैठके (6 माह-6 माह)

● किन्तु राजस्थान में वर्तमान में 4=बैठकों का प्रावधान - (1) 26 जनवरी (2)15 अगस्त (3) 02 अक्टूबर (4) 01 मई

● राजस्थान में पहली ग्राम सभा का आयोजन 26 जनवरी 1999 को जयपुर जिले की मुहाना ग्राम पंचायत में किया गया।

PESA - पंचायत एक्सटेंशन शेड्युल्ड एरियाज (भूरिया समिति) 

● यह एक्ट 1996 में पारित किया गया ।

● राजस्थान में 30 SEP+ 1999 को लागू हुआ था।

● यह कानून यह निर्धारित करता है इस एक्ट के माध्यम से भाग 9 के प्रावधानों की अनुसूची 5 में लागू करना है।

● इस एक्ट में यह निर्धारित किया गया कि प्रत्येक गांव में एक ग्राम सभा होगी जो लोगों की परम्पराओं रीति रिवाजो उनकी सांस्कृतिक पहचान और सामुदायिक संसाधनों को सुरक्षित रखना तथा विवादों को निपटाना के लिए परम्परागत तकनीक का प्रयोग करना।

● वर्ष 2016 तक कुल 10 राज्यों में लागू किया गया -आन्ध्रप्रदेश, तेलंगाना, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, उडीसा, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान व हिमाचल प्रदेश।

अनुच्छेद 243 (F) :- योग्यता

● सदस्य - स्थानीय निवासी हो

● आयु 21 वर्ष

● सरकारी नौकरी में न हो

● मतदाता सूचि में नाम हो

● शारीरिक व मानसिक रूप से स्वस्थ हो।

● मृत्युभोज कानून के अन्तर्गत दण्डित नहो।

● 1995 के बाद 2 से अधिक बच्चे ना हो।

● लाभ के पद पर ना हो।

● संविधा कर्मचारी न हो इन संस्थाओं को।


● पंचायती राज अधिनियम 1994 की धारा -19 के अन्तर्गत होता है।

सरपंच के लिए शैक्षणिक योग्यता

● जनजातिय क्षेत्रों में 5वीं पास।

● अन्य क्षेत्रों में 8 वी पास


● पंचायत समिति व जिला परिषद के लिए 10वीं पास।

अनुच्छेद 243(M) :- छूट प्राप्त क्षेत्र

● जहाँ पर यह लागू नहीं हुआ है।

● JK नागालेण्ड, मिजोरम, मेघालय।


● 10 राज्य पेसा एक्ट के रूप में है।

अनु 243 (E) :- पंचायतों का कार्यकाल 

● गठन से 5 वर्ष के लिए

● यदि पद रिक्त हो जाए तो 6 माह में चुनाव आवश्यक।


● 6वीं अनुसूची में उल्लेखित राज्य जहाँ पर यह लागू नहीं हुआ है (असम, मेघालय, त्रिपुरा, मिजोरम - 10 जिले)

गठन का आधार
1. जनसंख्या
ग्राम पंचायत

● 3000 की जनसंख्या पर 9 वार्ड होगें प्रति 1000 अतिरिक्त जनसंख्या पर 2 वार्ड होगें।

पंचायत समिति

● 100000 जनसंख्या पर 15 वार्ड प्रति 15000 अतिरिक्त जनसंख्या पर 2 वार्ड होंगे 

जिला परिषद

● 400000 की जनसंख्या पर 17 वार्ड प्रति 100000 अतिरिक्त जनसंख्या पर 2 बार्ड होंगे

2. सदस्य
ग्राम पंचायत

● 1+9 (न्यूनतम्)

पंचायत समिति

● 15 सदस्य

जिला परिषद

● 17 सदस्य

3. सरचना
ग्राम पंचायत

● सरपच (प्रत्यक्ष चुनाव)

● वार्ड पंच (प्रत्यक्ष चुनाव)

● उपसरपंच (वार्ड पंचो में से अप्रत्यक्ष रूप से चुनते है)

●  V.D.O

पंचायत समिति

● प्रधान

● उप प्रधान

● सदस्यों में से अत्यक्ष चुनाव द्वारा

● सदस्य - प्रत्यक्ष चुनाव द्वारा

● B.D.O

जिला परिषद

● प्रमुख

● उप प्रमुख

● सदस्यों में से अत्यक्ष चुनाव द्वारा

● सदस्य - प्रत्यक्ष चुनाव द्वारा

● C.E.O


4. बैठके
ग्राम पंचायत

● 5 तारिख 20 तारिख 15 दिन में एक बैठक

● 1 अप्रैल 2010 को 5 विषय पंचायती राज को सौपे गए -

1. कृषि 

2. प्राथमिक शिक्षा 

3. स्वास्थ्य 

4. महिला एवं बाल कल्याण 

5. सामाजिक न्याय व अधिकारिता

पंचायत समिति

● एक माह में बैठक

जिला परिषद

● 3 माह में बैठक

शपथ 

● सरपंच, वार्ड पंच और उपसरपंच को शपथ पीठासीन अधिकारी दिलाता है।

● प्रधान, उपप्रधान, पंचायत समिति सदस्यों को शपथ उपखण्ड अधिकारी दिलाता है।

● प्रमुख, उपप्रमुख और जिला परिषद सदस्यों को शपथ जिला कलेक्टर दिलाता है।

त्याग पत्र

● सरपंच, वार्ड पंच और उपसरपंच का त्याग पत्र B.D.O. स्वीकार करता है।

● उपप्रधान, पंचायत समिति सदस्यों का त्याग पत्र प्रधान स्वीकार करता है।

● प्रधान, उपप्रमुख और जिला परिषद सदस्यों का त्याग पत्र जिला प्रमुख स्वीकार करता है।

● जिला प्रमुख का त्याग पत्र संभागीय आयुक्त स्वीकार करता है।

अविश्वास प्रस्ताव की शर्ते

● चुनाव के बाद वर्ष तक अविश्वास प्रस्ताव नहीं लाया जा सकता।

● तीसरे व चौथे वर्ष में लाया जा सकता है किन्तु 3/4 बहुमत से पारित होना आवश्यक है।

● अन्तिम 5 वें वर्ष में अविश्वास प्रस्ताव नहीं लाया जा सकता।

● एक बार पारित नहीं होता है तो उस वर्ष दुबारा नहीं लाया जा सकता है।

● अविश्वास प्रस्ताव को रखने से पूर्व सम्बन्धित अधिकारी के समक्ष 1/3 बहुमत से प्रस्ताव रखना आवश्यक है।

वेतन(रूपये)

                         पहले            अब 

● जिला प्रमुख      10,000      12,000

● प्रधान               7,000         8,400

● सरपंच              4,000         4800

नगरीय संस्थाए

● भारत में 1687 में मद्रास नगर निगम की स्थापना सर्वप्रथम हुई थी।

● राजस्थान में माउण्ट आबु नगरपालिका सर्वप्रथम 1864 मे स्थापित।

● राजस्थान में प्रथम निर्वाचित नगरपालिका - ब्यावर

भारत में नगरीय संस्थाएं
अधिसूचित क्षेत्र :-

● इसका गठन सरकार अधिसूचना के द्वारा करती है इसलिए इसे अधिसूचित क्षेत्र कहा जाता है।

● यह उन कस्बो मे गठित की जाती है जो औधोगिकरण के कारण विकसित हुए है किन्तु वहां पर नगर पालिका की स्थापना नहीं की जा सकती है। 

● इसमें अध्यक्ष व सदस्यों को राज्य सरकार द्वारा नामित नही किये जाते है। यह न तो निर्वाचित निकाय है और नाही सवैधानिक।

छावनी बोर्ड :-

● इसका गठन छावनी क्षेत्र अधिनियम 1924 के अन्तर्गत किया।

● भारत में कुल 66 छावनी बोर्ड मौजूद हैं। उत्तर भारत में 9 छावनी बोर्ड हैं (7 हिमाचल प्रदेश में और 2 जम्मू-कश्मीर में)। भारत के उत्तर-पश्चिम भाग में 8 छावनियाँ हैं (1 दिल्ली में और 1 हरियाणा में, 3 पंजाब में और 3 राजस्थान में)। उत्तर-मध्य क्षेत्र में उत्तराखंड में 9 छावनियाँ हैं। भारत के मध्य भाग में 18 छावनियाँ हैं (मध्य प्रदेश में 5 और उत्तर प्रदेश में 13)। पश्चिम भाग में गुजरात में 1 छावनी है। पूर्वी भाग में 7 छावनियाँ हैं (बिहार, झारखंड, मेघालय और ओडिशा प्रत्येक में 1 छावनी है और पश्चिम बंगाल में 4 छावनियाँ हैं)। भारत के दक्षिणी भाग में 4 छावनियाँ हैं (कर्नाटक, केरल, तेलंगाना और तमिलनाडु प्रत्येक में 1 छावनी है)।

● इनकी स्थापना छावनी क्षेत्र की असैनिक आबादी पर नगरपालिका प्रशासन की दृष्टि से की जाती है।

● छावनी बोर्ड मे आधे सदस्य निर्वाचित होते है जो नागरिको द्वारा चुने जाते है इनका कार्यकाल तीन वर्ष का होता है। 

● आधे सदस्य मिल्ट्री स्टेशन से अधिकारी होते हैं और तब तक सदस्य रहता है जब तक स्टेशन पर नियुक्ति है। 

● अध्यक्ष - सेना का अधिकारी

● उपाध्यक्ष - निर्वाचित सदस्यों में से


74वां संविधान संशोधन विधेयक - 1992

● लोकसभा में 22 दिसंबर को तथा राज्यसभा में 23 दिसंबर को पारित हुआ।

● राष्ट्रपति ने 20 अप्रैल 1993 को हस्ताक्षर किये।

● 1 जून 1993 को भारत में लागू हुआ।

● किन्तु राजस्थान में 1994 में इस अधिनियमों के प्रावधानों को राजस्थान नगरपालिका व नगर निगम अधिनियम 1992 में स्थापित किया गया।

● 2009 में राजस्थान में नगर पालिका अधिनियम जारी किया था इसमें अध्यक्ष, सभापति, महापौर के चुनाव जनता द्वारा प्रत्यक्ष करने का प्रावधान था।

● इसलिए वर्ष 2009 व 2010 के नगरपालिका चुनाव प्रावधान लागू रहा किन्तु 2014 में पुन: संशोधन किया और चुनाव अप्रत्यक्ष कर दिया।

भाग 9 (क) नगरिये संस्थाएँ

● अनुच्छेद 243 (P) से अनुच्छेद 243 (ZG) तक 

इस संशोधन के तहत 12वीं अनुसूची जोड़ी गई जिसमें 18 विषयों का उल्लेख मिलता है।

नगर 

● जनसंख्या (न्यूनतम) - 5000

● गैर कृषि कार्यों में 75% शामिल हो।

● 400 व्यक्ति/वर्ग Km घनत्व

● राजस्व की स्थिति अच्छी हो उद्योग स्थापित हो।

नगर पंचायत

● अनुच्छेद 243(Q) - तीन प्रकार

    1. नगर पालिका

    2. नगर परिषद 

    3. नगर निगम

नगरपालिका :-

● A श्रेणी -  1 लाख से 5 लाख जनसख्या

● B श्रेणी - 50000 से 100000 जनसख्या

● C श्रेणी - 25000 - 50000 जनसख्या

● D श्रेणी - 25,000 जनसख्या


नगर निगम :- (सभी संभाग मुख्यालय)

● जयपुर

● भरतपुर

● कोटा

● अजमेर

● जोधपुर

● उदयपुर

● बीकानेर

वार्ड समितियाँ :-

● जिन नगरीय संस्थाओं की जनसंख्या 3 लाख से अधिक हो वहा पर वार्ड सभा के गठन का प्रावधान किया गया है।

● वार्ड सभा का मुख्य कार्य स्वच्छता, स्ट्रीट लाईट, उधोगो का रख रखाए।

● वार्ड सभा का अध्यक्ष - पार्षद पांच अन्य सदस्य जो वार्ड के नागरिक होगें जिनकी आयु 25 वर्ष से अधिक है।

आरक्षण की व्यवस्था अनुच्छेद 243 (T)

● चक्रिय पद्धति - SC / ST | OBC /महिला / सा० पुरुष

● जनसंख्या अनुपात - SC / ST | OBC - 21% व महिला / सा० पुरुष - 50%

कार्यकाल अनुच्छेद 243 (T)

● 5 वर्ष

● पद रिक्त होने पर 6 माह के अन्दर चुनाव आवश्यक है।

योग्यता

● स्थानीय नागरिक।

● आयु - 21 वर्ष।

● लाभ के पद पर ना हो।

● नैतिक अक्षमता का आरोप सिद्ध ना हो।

● कुष्ठ रोगी नही होना चाहिए।

● दीवालिया या पागल ना हो।

● नगरपालिका कर बकाया नही होना चाहिए।

1995 के बाद 2 से अधिक बच्चे नही होने चाहिए।

नगरपालिका अधिनियम 2009 की धारा 21 के तहत शैक्षणिक योग्यता की 10 वीं पास।

अनुच्छेद 243 (F)

● पंचायती राज संस्थाओं के लिए 

अनुच्छेद 243 (ZA)

● नगरीय संस्थाओं के लिए

अनुच्छेद 243 (I) 

● वित्त आयोग पंचायती राज के लिए

अनुच्छेद 243 (Y)

● वित्त आयोग नगरीय संस्थाओं के लिए

● लेकिन कुछ राज्य ऐसे हैं जिनमे यह नियम लागू नही होता।

● राजस्थान में भी कुछ जिले है जिनमें यह नियम लागू नहीं है।

राज्य जहां पर यह नियम लागू नहीं होता :

● 10 राज्य जिनके अनुसुचित क्षेत्रों में यह लागु नही होता है।

1. आन्ध्रप्रदेश

2. मध्यप्रदेश

3. झारखण्ड

4. गुजरात

5. छत्तीसगढ़

6. राजस्थान

7. तेलंगाना

8. महाराष्ट्र

9. उड़ीसा

10. हिमाचल 

● राजस्थान में जिले इससे प्रभावित है पूर्ण रूप से 3 जिले हैं।

10 जनजातीय अनुसुचित क्षेत्र :-

● असम -  3 जिले

● मेघालय - 3 जिले

● मिजोरम - 3 जिले

● त्रिपुरा - 1 जिले

जिला योजना समिति 243 (Z)
संरचना -

● कुल सदस्य = 25

● अध्यक्ष = जिला प्रमुख

● 4 सदस्य राज्य सरकार द्वारा नामित

● 20 सदस्य शहरी व ग्रामीण जनसंख्या के अनुपात से वितरित (20 सदस्य  - शहरी - वार्ड पंच, नगरी - पार्षद

उद्देश्य

● ग्रामीण विकास योजनाओं को समेकित करना व क्रियान्वन सुनिश्चित करना।

कार्य

● जिले की आयोजना का प्रारूप तैयार करके राज्य सरकार को भेजना 

● यह समिति पंचायती राज व नगरीय संस्थाओ के द्वारा निर्धारित योजनाओं को समेकित करेगी और राज्य सरकार के समक्ष पेश करेगी।

● यह पंचायती राज व नगरीय संस्थाओं के साझा हितों का ध्यान रखेगी। जैसे जल संसाधन, प्राकृतिक संरचना


DRDA = District Rular Development agency.
महानगरीय योजना समिति

● जिन नगरो की जनसंख्या 10 लाख से अधिक है वहां पर महानगर योजना समिति का प्रावधान किया गया है। 

जिसमे 2/3 सदस्य नगरीय एवं पंचायती राज संस्थाओं से जनसंख्या के अनुपात में निर्धारित किए जायेंगे।

● 1/3 सदस्य राज्य सरकार द्वारा नामित किए जायेंगे।

जनसंख्या के आधार पर :-
नगरपालिका

● 20,000 जनसंख्या

नगर परिषद

● 1 लाख से 

नगर निगम 

● 5 लाख से अधिक

वार्ड (न्यूनतम) :-
नगरपालिका

● 13

नगर परिषद

● 13

नगर निगम

● 13

राजनैतिक प्रमुख :-
नगरपालिका

● अध्यक्ष 

नगर परिषद

● सभापति 

नगर निगम

● महापौर (मेयर)

निर्वाचन :-
नगरपालिका

● अप्रत्यक्ष (पार्षदो मे से किया जाता है - प्रत्यक्ष)

नगर परिषद

● अप्रत्यक्ष (पार्षदो मे से किया जाता है - प्रत्यक्ष)

नगर निगम

● अप्रत्यक्ष (पार्षदो मे से किया जाता है - प्रत्यक्ष)

संरचना :-
नगरपालिका

● अध्यक्ष, पदेन सदस्य, उपाध्यक्ष , पार्षद 

नगर परिषद

● सभापति, पदेन, उपसभापति, MP, पार्षद, MLA

नगर निगम

● महापौर (मेयर), उप महापौर, MP, पार्षद, MLA

अधिकारी :-
नगरपालिका

● E.0 (अधीशासी अधिकारी) 

नगर परिषद

● आयुक्त 

नगर निगम

● आयुक्त

शपथ

● इन सदस्यों को शपथ जिला कलेक्टर या इसके द्वारा नामित व्यक्ति शपथ दिलाता है।

बैठक

● 60 दिन में एक सामान्य बैठक।

● विशेष बैठक 15 दिन में एक बार

● महापौर (मेयर) बुला सकता है।

नगरीय संस्थाए

पद से हटाने की प्रक्रिया :-

● चुनाव के बाद 2 वर्ष तक अविश्वास प्रस्ताव नहीं लाया जा सकता।

● तीसरे व चौथे वर्ष में लाया जा सकता है।

● प्रस्ताव पारित के लिए 3/4 सदस्यों का बहुमत आवश्यक है।

● अन्तिम 5 वें वर्ष में नहीं लाया जा सकता।

(नगरीय संस्थाओं के सदस्य त्यागपत्र संभागीय आयुक्त देते हैं।)

Right to Recall :- 2011

● 3/4 सदस्य लिखित में कलेक्टर को देंगे।

● सत्यापन करवाने के लिए बैठक क्लेक्टर बुलाता है।

● बहुमत से प्रस्ताव पारित होने पर क्लेक्टर राज्य सरकार को सूचना देगा।

● राजस्थान में बारा जिले की मांगरोल नगर पालिका में 12.12.2012 में Right to Recall पारित किया गया।

नगरीय संस्थाओं के आय के स्रोत:

● राज्य सरकार से प्राप्त अनुदान व ऋण।

● House tax, शहरी विकास tax, और चूगी कर।

● विज्ञापन व होर्डिंग से प्राप्त खाली भूमि किराये पर देना।

● भूमि की नीलामी।

● मनोरंजन कर से प्राप्त आय।

सिटिजन चार्टर

● वह दस्तावेज जो किसी संस्था द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाओं के बारे में उल्लेख होता है।

● सिटिजन चार्टर सबसे पहले ब्रिटेन में 1991 में जारी किए गए ।

● भारत में सबसे पहले 1997 में खाद्य एवं आपूर्ति मंत्रालय में लाया गया था।

● 1998 में दिल्ली नगर निगम में इसे लागू किया गया।

● राजस्थान में सबसे पहले सिटिजन चार्टर 1998 में सार्वजनिक वितरण विभाग ने जारी किया गया था उसके बाद में राजस्थान राजस्व मण्डल अजमेर द्वारा जारी किया गया था।

● सिटिजन चार्टर वाद योग्य नहीं हैं अर्थात सिटिजन चार्टर को न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।


राजस्थान सरकार ने 2 लोक सेवा गारन्टी अधिनियम दिए 
1. लोक सेवा गारन्टी अधिनियम -2011

● 14 नवम्बर 2011 में इसे लागू किया गया।

● वर्तमान में 18 विभागों की 153 सेवाओं को प्रदान करने की गारन्टी दी गई है।

2. राजस्थान जन सुनवाई अधिनियम 2012 

● 1 अगस्त 2012 को लागू किया गया

● उद्देश्य = जनता को घर के नजदीक अपनी शिकायतों की सुनवाई का अधिकार प्रदान किया गया।

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